राजकोषीय नीति Part 2
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💡 व्याख्या
राजकोषीय नीति और राजकोषीय अनुशासन
राजकोषीय नीति सरकार की आय, व्यय और उधारी के माध्यम से अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाली महत्वपूर्ण नीति है। इसके अंतर्गत सरकार आर्थिक वृद्धि, रोजगार, मूल्य स्थिरता और सार्वजनिक वित्तीय स्थिरता जैसे उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए वित्तीय निर्णय लेती है। राजकोषीय अनुशासन का अर्थ यह है कि सरकारी आय और व्यय, घाटे तथा ऋण का प्रबंधन इस प्रकार किया जाए कि वर्तमान आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ भविष्य की वित्तीय स्थिरता भी बनी रहे।
FRBM अधिनियम का प्रमुख उद्देश्य
FRBM अधिनियम अर्थात राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन से संबंधित व्यवस्था का उद्देश्य सरकारी वित्त में अधिक अनुशासन, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व को बढ़ावा देना है। इसका संबंध राजकोषीय घाटे और सार्वजनिक ऋण को टिकाऊ दिशा में रखने तथा सरकार की वित्तीय स्थिति के बारे में स्पष्ट जानकारी उपलब्ध कराने से है। परीक्षा की दृष्टि से यह समझना महत्वपूर्ण है कि FRBM व्यवस्था का व्यापक उद्देश्य सरकार को जिम्मेदार राजकोषीय प्रबंधन की दिशा में आगे बढ़ाना है।
राजकोषीय अनुशासन का अर्थ
राजकोषीय अनुशासन का आशय सरकारी आय, व्यय, घाटे और ऋण को नियंत्रित तथा टिकाऊ ढंग से प्रबंधित करने से है। इसका अर्थ यह नहीं है कि सरकार को हर परिस्थिति में घाटा शून्य रखना चाहिए। मंदी, प्राकृतिक आपदा या अन्य असाधारण परिस्थितियों में सरकार को आर्थिक गतिविधि और सार्वजनिक आवश्यकताओं के समर्थन के लिए अतिरिक्त व्यय करना पड़ सकता है। महत्वपूर्ण बात यह है कि लंबे समय में घाटे और ऋण की स्थिति ऐसी रहे जिसे सरकार संभाल सके।
राजकोषीय नीति में घाटा वित्तपोषण
जब सरकार की कुल प्राप्तियों की तुलना में उसका व्यय अधिक होता है, तो इस अंतर को पूरा करने के लिए विभिन्न वित्तीय साधनों का उपयोग किया जाता है। सरकारी उधारी घाटे के वित्तपोषण का एक महत्वपूर्ण माध्यम हो सकती है। उधारी से सरकार को वर्तमान आवश्यकताओं के लिए संसाधन मिलते हैं, लेकिन इसके साथ भविष्य में मूलधन और ब्याज चुकाने की जिम्मेदारी भी जुड़ती है। इसलिए घाटा वित्तपोषण की मात्रा और उसके उपयोग का विवेकपूर्ण प्रबंधन आवश्यक है।
परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण बिंदु
- FRBM व्यवस्था का संबंध राजकोषीय अनुशासन, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व से है।
- राजकोषीय अनुशासन का उद्देश्य घाटे और ऋण को दीर्घकाल में टिकाऊ रखना है।
- घाटा वित्तपोषण में सरकारी उधारी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
- अत्यधिक मांग और मुद्रास्फीति के समय संकुचनकारी राजकोषीय उपाय उपयोगी हो सकते हैं।
- मंदी के समय विस्तारवादी उपाय कुल मांग और आर्थिक गतिविधि को समर्थन दे सकते हैं।
राजकोषीय पारदर्शिता, घाटा और सार्वजनिक ऋण
राजकोषीय प्रबंधन की गुणवत्ता केवल सरकार के आय और व्यय के आकार से निर्धारित नहीं होती, बल्कि इस बात से भी जुड़ी होती है कि वित्तीय जानकारी कितनी स्पष्ट और विश्वसनीय रूप से प्रस्तुत की जाती है। राजकोषीय पारदर्शिता से सरकार की प्राप्तियों, व्यय, घाटे और ऋण की स्थिति को समझने में सहायता मिलती है। इससे संसद, नीति-निर्माताओं और नागरिकों को सरकारी वित्त की वास्तविक स्थिति का आकलन करने में सुविधा होती है।
FRBM व्यवस्था में राजकोषीय पारदर्शिता
FRBM व्यवस्था में राजकोषीय पारदर्शिता का महत्व इसलिए है क्योंकि स्पष्ट वित्तीय जानकारी सरकार की जवाबदेही को मजबूत करती है। यदि बजट, घाटे, उधारी और वित्तीय दायित्वों से संबंधित जानकारी व्यवस्थित रूप से उपलब्ध हो, तो राजकोषीय नीतियों का बेहतर मूल्यांकन किया जा सकता है। पारदर्शिता से छिपे हुए वित्तीय जोखिमों की पहचान करने और सार्वजनिक संसाधनों के उपयोग पर निगरानी रखने में भी मदद मिलती है।
लगातार ऊँचे राजकोषीय घाटे का प्रभाव
यदि राजकोषीय घाटा लंबे समय तक ऊँचा बना रहता है, तो सरकार की उधारी की आवश्यकता बढ़ सकती है। लगातार अधिक उधारी से सार्वजनिक ऋण और ब्याज भुगतान का बोझ बढ़ने की संभावना रहती है। कुछ परिस्थितियों में सरकार की उधारी वित्तीय संसाधनों पर दबाव डाल सकती है और निजी क्षेत्र के लिए उपलब्ध संसाधनों को प्रभावित कर सकती है। हालांकि वास्तविक प्रभाव अर्थव्यवस्था की वृद्धि, ब्याज दर, निवेश की स्थिति और घाटे के उपयोग जैसे अनेक कारकों पर निर्भर करता है।
मंदी में विस्तारवादी राजकोषीय नीति
मंदी के समय आर्थिक गतिविधि और कुल मांग कमजोर हो सकती है। ऐसी स्थिति में सरकार विस्तारवादी राजकोषीय नीति के माध्यम से मांग और उत्पादन को समर्थन देने का प्रयास कर सकती है। सरकारी व्यय बढ़ाना इसका एक सामान्य तरीका है। उदाहरण के लिए सार्वजनिक अवसंरचना, रोजगार या अन्य विकासात्मक कार्यक्रमों पर अतिरिक्त व्यय आर्थिक गतिविधि को प्रोत्साहित कर सकता है। इसका उद्देश्य मंदी के नकारात्मक प्रभाव को कम करना होता है।
सार्वजनिक ऋण का अर्थ
सार्वजनिक ऋण से आशय सरकार द्वारा लिए गए उन ऋणों और उधारियों से है जिन्हें सरकार को भविष्य में चुकाना होता है। सरकार अपने व्यय और वित्तीय आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए विभिन्न स्रोतों से उधार ले सकती है। सार्वजनिक ऋण का स्तर अकेले किसी अर्थव्यवस्था की स्थिति तय नहीं करता; ऋण का आकार, उसकी लागत, अवधि, उपयोग और अर्थव्यवस्था की ऋण चुकाने की क्षमता भी महत्वपूर्ण होती है।
परीक्षा उपयोगी तथ्य
- राजकोषीय पारदर्शिता सरकारी वित्त की वास्तविक स्थिति समझने में सहायता करती है।
- लगातार ऊँचा राजकोषीय घाटा सार्वजनिक ऋण और ब्याज दायित्व बढ़ा सकता है।
- मंदी में सरकारी व्यय बढ़ाना विस्तारवादी राजकोषीय नीति का सामान्य उपाय है।
- सार्वजनिक ऋण सरकार की भविष्य में ऋण चुकाने की जिम्मेदारी को दर्शाता है।
- केंद्र और राज्यों की राजकोषीय स्थिति कर प्राप्तियों, हस्तांतरण, व्यय और उधारी सहित कई कारकों से प्रभावित होती है।
राजकोषीय नीति, आर्थिक वृद्धि और नीति की प्रभावशीलता
राजकोषीय नीति का आर्थिक वृद्धि से गहरा संबंध है क्योंकि सरकार अपने व्यय, कर व्यवस्था और उधारी के माध्यम से उत्पादन, निवेश और कुल मांग को प्रभावित कर सकती है। हालांकि राजकोषीय नीति का प्रभाव केवल सरकारी व्यय की मात्रा पर निर्भर नहीं करता। संसाधनों का उपयोग किस क्षेत्र में किया जा रहा है, अर्थव्यवस्था की वर्तमान स्थिति क्या है और सरकारी वित्त कितना टिकाऊ है, जैसे कारक भी इसके परिणामों को प्रभावित करते हैं।
दीर्घकालिक वित्तीय स्थिरता की चुनौती
राजकोषीय नीति के सामने प्रमुख चुनौतियों में लगातार बढ़ता सार्वजनिक ऋण, ऊँचा राजकोषीय घाटा और बढ़ता ब्याज भुगतान शामिल हो सकते हैं। यदि सरकार की उधारी लंबे समय तक तेज गति से बढ़ती रहे, तो भविष्य में उपलब्ध वित्तीय संसाधनों पर दबाव पड़ सकता है। इसलिए वर्तमान विकास आवश्यकताओं और भविष्य की ऋण चुकाने की क्षमता के बीच संतुलन बनाए रखना दीर्घकालिक राजकोषीय स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण है।
सार्वजनिक व्यय की गुणवत्ता का महत्व
सार्वजनिक व्यय की गुणवत्ता इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि समान राशि खर्च करने पर भी अलग-अलग प्रकार के व्यय का अर्थव्यवस्था पर प्रभाव अलग हो सकता है। उत्पादक निवेश आर्थिक क्षमता और भविष्य के उत्पादन को बढ़ाने में सहायता कर सकता है, जबकि कुछ व्यय मुख्यतः तत्काल मांग को प्रभावित करते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि गैर-निवेश व्यय हमेशा अनावश्यक है; शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा जैसे व्यय भी व्यापक आर्थिक और सामाजिक लाभ दे सकते हैं। मुख्य बात संसाधनों का कुशल और उद्देश्यपूर्ण उपयोग है।
आर्थिक तेजी में संकुचनकारी राजकोषीय नीति
जब अर्थव्यवस्था में मांग बहुत तेज हो और मुद्रास्फीति का दबाव बढ़ रहा हो, तब सरकार संकुचनकारी राजकोषीय नीति अपना सकती है। इसका उद्देश्य कुल मांग की वृद्धि को नियंत्रित करना होता है। इसके लिए सरकारी व्यय में उपयुक्त कमी या करों में वृद्धि जैसे उपायों पर विचार किया जा सकता है। नीति का चुनाव आर्थिक परिस्थितियों, मुद्रास्फीति के कारणों और सरकार की व्यापक आर्थिक प्राथमिकताओं को ध्यान में रखकर किया जाता है।
राजकोषीय नीति की प्रभावशीलता को प्रभावित करने वाले कारक
राजकोषीय नीति का प्रभाव कई परिस्थितियों पर निर्भर करता है। अर्थव्यवस्था में मांग की स्थिति, उपभोक्ताओं और व्यवसायों की प्रतिक्रिया, सरकारी व्यय की गति, करों में बदलाव का प्रभाव, ब्याज दरें, सार्वजनिक ऋण और वित्तीय संसाधनों की उपलब्धता इसके परिणामों को प्रभावित कर सकते हैं। यदि नीति लागू होने में अधिक समय लगे, तो आर्थिक परिस्थिति बदल सकती है और अपेक्षित प्रभाव कमजोर हो सकता है। इसलिए राजकोषीय नीति का मूल्यांकन उसके उद्देश्य और वास्तविक आर्थिक संदर्भ दोनों के आधार पर किया जाना चाहिए।
परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण बिंदु
- राजकोषीय नीति उत्पादक सार्वजनिक व्यय के माध्यम से दीर्घकालीन आर्थिक वृद्धि को समर्थन दे सकती है।
- ऊँचा ऋण, राजकोषीय घाटा और ब्याज भुगतान दीर्घकालिक वित्तीय स्थिरता के लिए चुनौती बन सकते हैं।
- सार्वजनिक व्यय की गुणवत्ता उसके आर्थिक और सामाजिक परिणामों को प्रभावित करती है।
- आर्थिक तेजी और मुद्रास्फीति के दबाव में संकुचनकारी राजकोषीय नीति अपनाई जा सकती है।
- राजकोषीय नीति की प्रभावशीलता आर्थिक परिस्थितियों और लोगों तथा व्यवसायों की प्रतिक्रिया सहित कई कारकों पर निर्भर करती है।
स्वचालित स्थिरीकारक, प्राथमिक घाटा और राजकोषीय समेकन
राजकोषीय नीति में कुछ ऐसे तंत्र होते हैं जो आर्थिक परिस्थितियों में बदलाव आने पर बिना किसी नए विवेकाधीन निर्णय के सरकारी आय या व्यय को प्रभावित करते हैं। इन्हें स्वचालित स्थिरीकारक कहा जाता है। इसके साथ प्राथमिक घाटा, सार्वजनिक ऋण की स्थिरता और राजकोषीय समेकन जैसी अवधारणाएँ भी राजकोषीय स्थिति को समझने में महत्वपूर्ण हैं। इन अवधारणाओं का अध्ययन प्रतियोगी परीक्षाओं में विशेष रूप से उपयोगी है।
स्वचालित स्थिरीकारकों का प्रमुख उदाहरण
स्वचालित स्थिरीकारक वे राजकोषीय व्यवस्थाएँ हैं जिनकी वजह से आर्थिक चक्र के अनुसार सरकारी आय या व्यय स्वतः बदलते हैं। प्रगतिशील कर व्यवस्था और बेरोजगारी से जुड़ी कुछ सामाजिक सुरक्षा व्यवस्थाएँ इसके सामान्य उदाहरण मानी जाती हैं। आर्थिक तेजी में कर प्राप्तियाँ बढ़ सकती हैं, जबकि मंदी में कर भार घटने और कुछ सामाजिक सहायता व्यय बढ़ने से कुल मांग पर स्थिरीकरणकारी प्रभाव पड़ सकता है। इनके लिए हर बार अलग से नया नीतिगत निर्णय आवश्यक नहीं होता।
सार्वजनिक ऋण की स्थिरता और ऋण-जीडीपी अनुपात
सार्वजनिक ऋण की स्थिरता का आकलन करते समय ऋण और सकल घरेलू उत्पाद के अनुपात का विशेष महत्व होता है। केवल ऋण की पूर्ण राशि देखकर अर्थव्यवस्था पर उसके बोझ का सही अनुमान नहीं लगाया जा सकता। यदि अर्थव्यवस्था का आकार और आय बढ़ रही हो, तो समान ऋण राशि का भार अलग हो सकता है। इसलिए ऋण-जीडीपी अनुपात के साथ आर्थिक वृद्धि, ब्याज दर, प्राथमिक शेष और सरकार की भविष्य की आय जैसी बातों को भी देखा जाता है।
प्राथमिक घाटा क्या है?
प्राथमिक घाटा राजकोषीय घाटे की उस स्थिति को समझने में सहायता करता है जिसमें ब्याज भुगतान के प्रभाव को अलग करके वर्तमान राजकोषीय स्थिति का आकलन किया जाता है। इसे सामान्यतः राजकोषीय घाटे में से ब्याज भुगतान घटाने के रूप में समझाया जाता है। यदि प्राथमिक घाटा कम हो या प्राथमिक अधिशेष हो, तो इसका अर्थ यह हो सकता है कि वर्तमान अवधि की आय और गैर-ब्याज व्यय के बीच स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर है, भले ही पुराने ऋण पर ब्याज भुगतान अधिक हो।
केंद्र और राज्यों के बीच राजस्व साझा करना
भारत के संघीय वित्तीय ढाँचे में केंद्र और राज्यों के बीच संसाधनों का वितरण महत्वपूर्ण है। राजस्व साझा करने की व्यवस्था का एक प्रमुख उद्देश्य विभिन्न स्तर की सरकारों के बीच उपलब्ध वित्तीय संसाधनों का संतुलित वितरण करना और राज्यों को उनकी जिम्मेदारियों के अनुरूप संसाधन उपलब्ध कराने में सहायता करना है। इससे क्षेत्रीय असमानताओं को कम करने तथा सार्वजनिक सेवाओं के वित्तपोषण में राज्यों की क्षमता को समर्थन मिल सकता है।
राजकोषीय समेकन का मुख्य आशय
राजकोषीय समेकन का अर्थ सरकारी वित्तीय स्थिति को अधिक टिकाऊ बनाने के लिए राजकोषीय घाटे और ऋण के दबाव को नियंत्रित करने की प्रक्रिया से है। इसमें राजस्व बढ़ाने, व्यय को अधिक कुशल बनाने या दोनों के माध्यम से सरकारी वित्त को मजबूत करने के उपाय शामिल हो सकते हैं। राजकोषीय समेकन का अर्थ केवल व्यय में कटौती करना नहीं है; इसका उद्देश्य वित्तीय स्थिरता और आर्थिक प्राथमिकताओं के बीच उचित संतुलन बनाना होता है।
परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण बिंदु
- स्वचालित स्थिरीकारक आर्थिक चक्र के प्रभाव को बिना नए विवेकाधीन निर्णय के कम कर सकते हैं।
- ऋण-जीडीपी अनुपात सार्वजनिक ऋण के बोझ और स्थिरता को समझने का महत्वपूर्ण संकेतक है।
- प्राथमिक घाटा राजकोषीय घाटे से ब्याज भुगतान को अलग करके वर्तमान राजकोषीय स्थिति समझने में मदद करता है।
- केंद्र-राज्य राजस्व साझेदारी संघीय वित्तीय संसाधनों के संतुलित वितरण में महत्वपूर्ण है।
- राजकोषीय समेकन का व्यापक उद्देश्य सरकारी वित्त को दीर्घकाल में अधिक टिकाऊ बनाना है।
राजकोषीय घाटा, सरकारी उधारी और मुद्रास्फीति नियंत्रण
राजकोषीय घाटा सरकार की वित्तीय स्थिति का एक महत्वपूर्ण संकेतक है। जब सरकार का कुल व्यय उसकी संबंधित प्राप्तियों से अधिक होता है, तो इस अंतर को पूरा करने के लिए उधारी सहित विभिन्न साधनों का सहारा लिया जा सकता है। इसलिए राजकोषीय घाटे का प्रबंधन केवल घाटे की मात्रा घटाने तक सीमित नहीं है, बल्कि राजस्व, व्यय, उधारी, आर्थिक वृद्धि और वित्तीय स्थिरता के बीच संतुलन बनाना भी आवश्यक है।
राजकोषीय घाटा कम करने के उपाय
सरकार राजकोषीय घाटे को कम करने के लिए राजस्व बढ़ाने और व्यय को अधिक कुशल बनाने जैसे उपाय अपना सकती है। कर अनुपालन में सुधार से राजस्व प्राप्तियाँ बढ़ सकती हैं, जबकि अनावश्यक या कम प्राथमिकता वाले व्यय को नियंत्रित करने से खर्च पर दबाव कम हो सकता है। सार्वजनिक परिसंपत्तियों के बेहतर उपयोग और उत्पादकता बढ़ाने वाले उपाय भी वित्तीय स्थिति को मजबूत कर सकते हैं। हालांकि घाटा कम करने के उपायों का चुनाव आर्थिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।
सरकारी उधारी और निजी क्षेत्र पर दबाव
यदि सरकार वित्तीय घाटे को पूरा करने के लिए बहुत अधिक उधारी करती है, तो वित्तीय बाजार में उपलब्ध संसाधनों पर दबाव पड़ सकता है। ऐसी स्थिति में ब्याज दरों में वृद्धि या ऋण की उपलब्धता में बदलाव के माध्यम से निजी निवेश प्रभावित होने की संभावना को भी देखा जाता है। इस घटना को सामान्यतः निजी निवेश के विस्थापन या क्राउडिंग आउट प्रभाव की अवधारणा से समझाया जाता है। इसका वास्तविक प्रभाव वित्तीय बाजार और अर्थव्यवस्था की परिस्थितियों पर निर्भर करता है।
राजस्व घाटा क्या दर्शाता है?
राजस्व घाटा तब उत्पन्न होता है जब सरकार का राजस्व व्यय उसकी राजस्व प्राप्तियों से अधिक हो जाता है। यह संकेत दे सकता है कि सरकार की नियमित आय वर्तमान नियमित व्यय को पूरी तरह पूरा नहीं कर रही है। राजस्व घाटे की स्थिति में सरकार को अपनी वित्तीय आवश्यकताओं के लिए अन्य संसाधनों पर निर्भर होना पड़ सकता है। इसलिए राजस्व प्राप्तियों और राजस्व व्यय की स्थिति को समझना राजकोषीय प्रबंधन के लिए महत्वपूर्ण है।
कर नीति और मुद्रास्फीति नियंत्रण
कर नीति के माध्यम से सरकार अर्थव्यवस्था में उपलब्ध आय और कुल मांग को प्रभावित कर सकती है। यदि मांग अत्यधिक बढ़ने के कारण मुद्रास्फीति का दबाव पैदा हो रहा हो, तो उपयुक्त परिस्थितियों में करों में वृद्धि से लोगों और व्यवसायों की उपलब्ध आय प्रभावित हो सकती है और कुल मांग की वृद्धि को सीमित करने में सहायता मिल सकती है। हालांकि मुद्रास्फीति के सभी कारण मांग से संबंधित नहीं होते, इसलिए कर नीति का प्रभाव मुद्रास्फीति की प्रकृति और व्यापक आर्थिक परिस्थितियों पर निर्भर करता है।
मंदी में सरकारी व्यय बढ़ाने का उद्देश्य
प्रतिचक्रीय राजकोषीय नीति में मंदी के दौरान सरकारी व्यय बढ़ाने का प्रमुख उद्देश्य कमजोर कुल मांग और आर्थिक गतिविधि को समर्थन देना होता है। सरकार अवसंरचना, सार्वजनिक सेवाओं या अन्य लक्षित कार्यक्रमों पर खर्च बढ़ाकर आय और रोजगार को सहारा दे सकती है। इससे निजी मांग कमजोर होने की स्थिति में अर्थव्यवस्था में अतिरिक्त मांग उत्पन्न हो सकती है। इस प्रकार विस्तारवादी राजकोषीय नीति आर्थिक चक्र की मंदी को कम करने में सहायक हो सकती है।
परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण बिंदु
- राजकोषीय घाटा कम करने के लिए राजस्व बढ़ाना और व्यय की दक्षता सुधारना उपयोगी उपाय हो सकते हैं।
- अत्यधिक सरकारी उधारी से निजी निवेश के विस्थापन की संभावना को क्राउडिंग आउट प्रभाव कहा जाता है।
- राजस्व घाटा राजस्व व्यय के राजस्व प्राप्तियों से अधिक होने को दर्शाता है।
- उपयुक्त परिस्थितियों में कर वृद्धि कुल मांग के दबाव को कम करने में सहायता कर सकती है।
- मंदी में सरकारी व्यय बढ़ाने का उद्देश्य कुल मांग, उत्पादन और रोजगार को समर्थन देना है।
FRBM, राजकोषीय उत्तरदायित्व और ऋण प्रबंधन
राजकोषीय उत्तरदायित्व का संबंध इस बात से है कि सरकार सार्वजनिक धन का उपयोग कितनी जिम्मेदारी और टिकाऊ ढंग से करती है। राजकोषीय घाटे, सरकारी उधारी और सार्वजनिक ऋण का उचित प्रबंधन वर्तमान आर्थिक आवश्यकताओं को पूरा करने के साथ भविष्य की वित्तीय क्षमता को बनाए रखने में सहायता करता है। FRBM से संबंधित व्यवस्था इसी व्यापक राजकोषीय अनुशासन और उत्तरदायित्व के संदर्भ में महत्वपूर्ण है।
FRBM और राजकोषीय उत्तरदायित्व
FRBM अधिनियम के संदर्भ में राजकोषीय उत्तरदायित्व का प्रमुख उद्देश्य सरकारी वित्त को अधिक अनुशासित, पारदर्शी और टिकाऊ बनाना है। सरकार को अपने वित्तीय निर्णयों में घाटे, ऋण और भविष्य के दायित्वों को ध्यान में रखना आवश्यक होता है। राजकोषीय उत्तरदायित्व का अर्थ यह नहीं है कि सरकार किसी भी परिस्थिति में व्यय नहीं बढ़ा सकती, बल्कि यह है कि वित्तीय निर्णय स्पष्ट उद्देश्यों और दीर्घकालीन स्थिरता को ध्यान में रखकर लिए जाएँ।
राजकोषीय अनुशासन न होने की समस्या
यदि राजकोषीय अनुशासन कमजोर हो जाए और सरकार लंबे समय तक आय की तुलना में बहुत अधिक व्यय करती रहे, तो राजकोषीय घाटा और सार्वजनिक ऋण बढ़ सकते हैं। बढ़ते ऋण के साथ ब्याज भुगतान का बोझ भी बढ़ सकता है, जिससे भविष्य में विकासात्मक और कल्याणकारी कार्यक्रमों के लिए उपलब्ध संसाधनों पर दबाव पड़ सकता है। अत्यधिक वित्तीय असंतुलन सरकार की आर्थिक झटकों से निपटने की क्षमता को भी कमजोर कर सकता है।
घाटा वित्तपोषण और सरकारी उधारी
घाटा वित्तपोषण के लिए सरकार द्वारा उधारी लेने का प्रत्यक्ष प्रभाव यह हो सकता है कि सरकार के पास वर्तमान व्यय और वित्तीय आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अतिरिक्त संसाधन उपलब्ध हो जाएँ। लेकिन उधारी के साथ भविष्य में मूलधन और ब्याज चुकाने की जिम्मेदारी भी जुड़ती है। इसलिए सरकारी उधारी का प्रभाव केवल तत्काल संसाधनों की उपलब्धता तक सीमित नहीं होता, बल्कि भविष्य की राजकोषीय स्थिति और ऋण दायित्वों पर भी पड़ता है।
मंदी में राजकोषीय प्रोत्साहन
आर्थिक मंदी के दौरान निजी मांग और निवेश कमजोर हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में राजकोषीय प्रोत्साहन के माध्यम से सरकार आर्थिक गतिविधि को समर्थन देने का प्रयास कर सकती है। सार्वजनिक व्यय में वृद्धि या लक्षित कर राहत जैसे उपाय लोगों और व्यवसायों की मांग को सहारा दे सकते हैं। यदि परिस्थितियाँ अनुकूल हों, तो इससे उत्पादन और रोजगार को समर्थन मिल सकता है तथा मंदी की तीव्रता कम करने में सहायता मिल सकती है।
ऋण प्रबंधन का प्रमुख उद्देश्य
राजकोषीय नीति में ऋण प्रबंधन का प्रमुख उद्देश्य सरकार की वित्तीय आवश्यकताओं को उचित लागत और स्वीकार्य जोखिम के साथ पूरा करना तथा ऋण को दीर्घकाल में टिकाऊ बनाए रखना है। सरकार को यह ध्यान रखना होता है कि ऋण की मात्रा, ब्याज लागत, परिपक्वता अवधि और पुनर्भुगतान संबंधी जोखिम नियंत्रित रहें। प्रभावी ऋण प्रबंधन से वित्तीय स्थिरता बनाए रखने और भविष्य में अत्यधिक ऋण दबाव से बचने में सहायता मिलती है।
परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण बिंदु
- FRBM से संबंधित व्यवस्था राजकोषीय अनुशासन और उत्तरदायित्व को मजबूत करने के उद्देश्य से महत्वपूर्ण है।
- कमजोर राजकोषीय अनुशासन से घाटा, सार्वजनिक ऋण और ब्याज भुगतान का दबाव बढ़ सकता है।
- सरकारी उधारी वर्तमान वित्तीय आवश्यकताओं के लिए संसाधन उपलब्ध कराती है, लेकिन भविष्य में पुनर्भुगतान दायित्व भी बनाती है।
- मंदी में राजकोषीय प्रोत्साहन उत्पादन और रोजगार को समर्थन दे सकता है।
- ऋण प्रबंधन का उद्देश्य लागत, जोखिम और दीर्घकालीन ऋण स्थिरता के बीच उचित संतुलन बनाना है।
पूंजीगत व्यय, कर अनुपालन और राजकोषीय पारदर्शिता
राजकोषीय नीति की गुणवत्ता का आकलन करते समय यह देखना महत्वपूर्ण होता है कि सरकार उपलब्ध संसाधनों का उपयोग किस प्रकार कर रही है। पूंजीगत व्यय, बेहतर कर अनुपालन, व्यय की प्राथमिकता और राजकोषीय पारदर्शिता जैसे तत्व सार्वजनिक वित्त को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनका प्रभाव तत्काल आर्थिक गतिविधि के साथ-साथ दीर्घकालीन उत्पादन क्षमता और वित्तीय स्थिरता पर भी पड़ सकता है।
पूंजीगत व्यय और आर्थिक वृद्धि
पूंजीगत व्यय को आर्थिक वृद्धि के लिए महत्वपूर्ण माना जा सकता है क्योंकि इससे ऐसी परिसंपत्तियों और अवसंरचना का निर्माण हो सकता है जो भविष्य में उत्पादन क्षमता बढ़ाने में सहायता करें। सड़क, रेल, सिंचाई, ऊर्जा और अन्य सार्वजनिक अवसंरचना में निवेश आर्थिक गतिविधि की लागत कम करने तथा निजी निवेश के लिए अनुकूल वातावरण बनाने में योगदान दे सकता है। हालांकि किसी भी पूंजीगत परियोजना का वास्तविक लाभ उसकी गुणवत्ता, उपयोगिता और क्रियान्वयन की दक्षता पर निर्भर करता है।
कर अनुपालन और सरकारी वित्त
कर अनुपालन बढ़ने का अर्थ है कि अधिक करदाता कानून के अनुसार अपनी कर देयताओं का सही ढंग से पालन कर रहे हैं। इससे सरकार की कर प्राप्तियाँ मजबूत हो सकती हैं और सार्वजनिक व्यय के लिए उपलब्ध संसाधनों में वृद्धि हो सकती है। बेहतर अनुपालन से समान कर दरों पर भी अधिक राजस्व प्राप्त होने की संभावना रहती है। इससे सरकार की उधारी पर निर्भरता कम करने और राजकोषीय स्थिति को अधिक टिकाऊ बनाने में सहायता मिल सकती है।
व्यय की प्राथमिकता तय करने का कारण
सरकार के वित्तीय संसाधन सीमित होते हैं, जबकि सार्वजनिक आवश्यकताएँ अनेक होती हैं। इसलिए राजकोषीय नीति में व्यय की प्राथमिकता तय करना आवश्यक है। प्राथमिकता निर्धारण के माध्यम से सरकार उन क्षेत्रों में संसाधन केंद्रित कर सकती है जहाँ आर्थिक, सामाजिक या विकासात्मक लाभ अधिक अपेक्षित हों। शिक्षा, स्वास्थ्य, अवसंरचना, सामाजिक सुरक्षा और अन्य सार्वजनिक आवश्यकताओं के बीच उचित संतुलन बनाना प्रभावी बजट प्रबंधन का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
राजकोषीय नीति और सार्वजनिक ऋण
राजकोषीय घाटे को पूरा करने के लिए सरकार द्वारा लगातार उधारी लेने पर सार्वजनिक ऋण बढ़ सकता है। इसलिए राजकोषीय नीति और सार्वजनिक ऋण के बीच सीधा संबंध है। हालांकि ऋण का बढ़ना हमेशा नकारात्मक नहीं माना जाता, क्योंकि उधार लेकर किया गया उत्पादक निवेश भविष्य में आर्थिक क्षमता और सरकारी आय को बढ़ाने में सहायता कर सकता है। महत्वपूर्ण यह है कि ऋण की गति और लागत अर्थव्यवस्था की उसे संभालने की क्षमता के अनुरूप रहे।
राजकोषीय पारदर्शिता के लाभ
राजकोषीय पारदर्शिता बढ़ने से सरकारी वित्त की वास्तविक स्थिति को समझना आसान होता है। बजट, घाटे, ऋण और सरकारी दायित्वों की स्पष्ट जानकारी से नीति-निर्माताओं तथा नागरिकों को सरकार के वित्तीय निर्णयों का मूल्यांकन करने में सहायता मिलती है। पारदर्शिता जवाबदेही को मजबूत कर सकती है और वित्तीय जोखिमों की समय पर पहचान में मदद कर सकती है। इससे सार्वजनिक संसाधनों के बेहतर प्रबंधन की संभावना भी बढ़ती है।
परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण बिंदु
- पूंजीगत व्यय सार्वजनिक अवसंरचना और उत्पादन क्षमता को मजबूत कर आर्थिक वृद्धि में योगदान दे सकता है।
- बेहतर कर अनुपालन से सरकारी राजस्व और वित्तीय क्षमता मजबूत हो सकती है।
- सीमित संसाधनों के कारण सरकार के लिए व्यय की प्राथमिकता तय करना आवश्यक है।
- लगातार राजकोषीय घाटे की वित्तपोषण आवश्यकता सार्वजनिक ऋण को बढ़ा सकती है।
- राजकोषीय पारदर्शिता सरकारी वित्त की निगरानी और जवाबदेही को मजबूत करती है।
मध्यम अवधि के लक्ष्य, सब्सिडी और संघीय राजकोषीय असंतुलन
राजकोषीय नीति केवल एक वित्तीय वर्ष की आय और व्यय तक सीमित नहीं होती। सरकार को मध्यम और दीर्घ अवधि में घाटे, ऋण, राजस्व तथा व्यय की दिशा को भी ध्यान में रखना पड़ता है। इसी संदर्भ में मध्यम अवधि के राजकोषीय लक्ष्य, सब्सिडी का प्रबंधन, कर आधार का विस्तार और केंद्र-राज्य वित्तीय संबंधों में संतुलन महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
मध्यम अवधि के राजकोषीय लक्ष्य
मध्यम अवधि के राजकोषीय लक्ष्य रखने का प्रमुख लाभ यह है कि सरकार को अपने वित्तीय निर्णयों के लिए एक स्पष्ट और अपेक्षाकृत स्थिर दिशा मिलती है। केवल वार्षिक परिणाम पर ध्यान देने के बजाय सरकार घाटे, ऋण और राजस्व की स्थिति को कई वर्षों के परिप्रेक्ष्य में देख सकती है। इससे बजट योजना अधिक व्यवस्थित हो सकती है और वर्तमान व्यय तथा भविष्य की वित्तीय स्थिरता के बीच संतुलन बनाने में सहायता मिल सकती है।
सब्सिडी से जुड़ी प्रमुख चुनौती
सब्सिडी का उद्देश्य आवश्यक वस्तुओं, सेवाओं या लक्षित समूहों को आर्थिक सहायता देना हो सकता है, लेकिन इनका लंबे समय तक बढ़ता वित्तीय बोझ राजकोषीय स्थिति पर दबाव डाल सकता है। यदि सब्सिडी अच्छी तरह लक्षित न हो, तो सीमित संसाधनों का अपेक्षित लाभार्थियों तक प्रभावी रूप से पहुँचना कठिन हो सकता है। इसलिए सब्सिडी नीति में सामाजिक उद्देश्य, लक्षित लाभ, लागत और दीर्घकालीन वित्तीय स्थिरता के बीच संतुलन आवश्यक है।
कर आधार को व्यापक बनाने का अर्थ
कर आधार को व्यापक बनाने का अर्थ है अधिक व्यक्तियों, व्यवसायों और आर्थिक गतिविधियों को उपयुक्त कर व्यवस्था के दायरे में लाना, ताकि सरकार की राजस्व क्षमता मजबूत हो। इसका उद्देश्य केवल मौजूदा करदाताओं पर कर दर बढ़ाना नहीं होता। बेहतर कर प्रशासन, अनुपालन में सुधार और अनौपचारिक आर्थिक गतिविधियों के अधिक औपचारिक होने से भी कर आधार व्यापक हो सकता है। इससे राजस्व संग्रह अपेक्षाकृत अधिक स्थिर और टिकाऊ बनाने में सहायता मिल सकती है।
मंदी में सार्वजनिक निवेश का प्रतिचक्रीय प्रभाव
मंदी के दौरान निजी निवेश और मांग कमजोर हो सकती है। ऐसी स्थिति में सरकार द्वारा सार्वजनिक निवेश बढ़ाने से निर्माण गतिविधि, रोजगार और संबंधित क्षेत्रों की मांग को तत्काल समर्थन मिल सकता है। यदि अतिरिक्त सरकारी व्यय अर्थव्यवस्था की कमजोर कुल मांग को सहारा देता है, तो वह प्रतिचक्रीय प्रभाव पैदा कर सकता है। इस प्रकार सार्वजनिक निवेश आर्थिक मंदी की तीव्रता कम करने और भविष्य की उत्पादन क्षमता मजबूत करने में दोहरा योगदान दे सकता है।
ऊर्ध्वाधर राजकोषीय असंतुलन
केंद्र और राज्यों की राजकोषीय स्थिति में ऊर्ध्वाधर असंतुलन से आशय सामान्यतः उस स्थिति से है जिसमें किसी स्तर की सरकार, विशेषकर राज्यों, की व्यय जिम्मेदारियाँ उसके अपने राजस्व संसाधनों की तुलना में अधिक होती हैं। ऐसी स्थिति में अंतर को पूरा करने के लिए अंतर-सरकारी हस्तांतरण और संसाधनों के अन्य माध्यम महत्वपूर्ण हो जाते हैं। संघीय वित्तीय व्यवस्था में इस असंतुलन को समझना केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय संबंधों के अध्ययन के लिए आवश्यक है।
परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण बिंदु
- मध्यम अवधि के राजकोषीय लक्ष्य सरकार को कई वर्षों की वित्तीय दिशा तय करने में सहायता करते हैं।
- सब्सिडी की प्रमुख चुनौती उसके वित्तीय बोझ और लक्षित लाभ के बीच संतुलन बनाना है।
- कर आधार का विस्तार अधिक करदाताओं और आर्थिक गतिविधियों को कर व्यवस्था के दायरे में लाने से संबंधित है।
- मंदी में सार्वजनिक निवेश मांग और रोजगार को समर्थन देकर प्रतिचक्रीय भूमिका निभा सकता है।
- ऊर्ध्वाधर राजकोषीय असंतुलन व्यय जिम्मेदारियों और अपने राजस्व संसाधनों के बीच स्तरगत अंतर को दर्शाता है।
क्षैतिज असंतुलन, आकस्मिक देनदारियाँ और व्यय दक्षता
राजकोषीय नीति की स्थिरता का आकलन करते समय केवल कुल घाटे और ऋण को देखना पर्याप्त नहीं होता। संघीय वित्तीय व्यवस्था में राज्यों के बीच संसाधनों और वित्तीय आवश्यकताओं का अंतर, सरकारी ऋण का उपयोग, मध्यम अवधि की विश्वसनीय योजना, आकस्मिक देनदारियाँ तथा सार्वजनिक व्यय की दक्षता भी महत्वपूर्ण विषय हैं। इन पहलुओं को समझने से राजकोषीय जोखिमों का व्यापक आकलन किया जा सकता है।
क्षैतिज राजकोषीय असंतुलन
क्षैतिज राजकोषीय असंतुलन का संबंध एक ही स्तर की विभिन्न सरकारों, जैसे अलग-अलग राज्यों, की राजस्व क्षमता और व्यय आवश्यकताओं के बीच अंतर से होता है। राज्यों के आर्थिक आधार, कर संग्रह क्षमता, जनसंख्या, भौगोलिक परिस्थितियों और सार्वजनिक सेवाओं की आवश्यकताएँ अलग-अलग हो सकती हैं। इसलिए सभी राज्यों के पास समान वित्तीय क्षमता होना आवश्यक नहीं है। वित्तीय हस्तांतरण की व्यवस्था इन अंतरों को कम करने में सहायता कर सकती है।
ऋण से लगातार वर्तमान व्यय का वित्तपोषण
यदि सरकार लगातार ऋण लेकर अपने वर्तमान या नियमित व्यय को वित्तपोषित करती रहे, तो सार्वजनिक ऋण और ब्याज दायित्व बढ़ सकते हैं। इससे भविष्य में सरकारी आय का बड़ा हिस्सा ऋण सेवा में जाने की संभावना रहती है और विकासात्मक व्यय के लिए उपलब्ध संसाधनों पर दबाव पड़ सकता है। ऋण का उपयोग पूरी तरह अनुचित नहीं है, लेकिन दीर्घकालीन स्थिरता के लिए यह महत्वपूर्ण है कि उधारी का स्तर सरकार की पुनर्भुगतान क्षमता और वित्तीय स्थिति के अनुरूप रहे।
विश्वसनीय मध्यम अवधि की राजकोषीय योजना
विश्वसनीय मध्यम अवधि की योजना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे सरकार की राजकोषीय दिशा के बारे में स्पष्टता बढ़ती है। यदि घाटे, ऋण, राजस्व और व्यय के लिए यथार्थवादी लक्ष्य तथा अपेक्षाएँ निर्धारित हों, तो बजट निर्णय अधिक व्यवस्थित ढंग से लिए जा सकते हैं। विश्वसनीय योजना से नीति की अनिश्चितता कम हो सकती है और सरकार को आर्थिक परिस्थितियों में बदलाव के बावजूद दीर्घकालीन वित्तीय स्थिरता बनाए रखने के लिए बेहतर आधार मिल सकता है।
आकस्मिक देनदारियाँ
आकस्मिक देनदारियाँ ऐसी संभावित वित्तीय जिम्मेदारियाँ होती हैं जिनका भुगतान भविष्य में किसी विशेष घटना के घटित होने पर सरकार को करना पड़ सकता है। सरकारी गारंटी जैसी व्यवस्थाएँ इसका उदाहरण हो सकती हैं। इन दायित्वों का तत्काल बजट व्यय आवश्यक नहीं होता, लेकिन यदि संबंधित जोखिम वास्तविक हो जाए, तो सरकार पर वित्तीय बोझ पड़ सकता है। इसलिए राजकोषीय जोखिम का आकलन करते समय आकस्मिक देनदारियों को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।
व्यय की दक्षता बढ़ाने का अर्थ
सार्वजनिक व्यय की दक्षता बढ़ाने का अर्थ उपलब्ध संसाधनों से अधिक बेहतर और लक्षित परिणाम प्राप्त करना है। इसका उद्देश्य केवल सरकारी खर्च कम करना नहीं है। यदि समान संसाधनों से अधिक लाभार्थियों तक बेहतर सार्वजनिक सेवा पहुँचे या किसी कार्यक्रम का अपेक्षित परिणाम कम लागत में प्राप्त हो, तो व्यय की दक्षता में सुधार माना जा सकता है। इसके लिए बेहतर योजना, निगरानी, लक्ष्य निर्धारण और संसाधनों के प्रभावी उपयोग की आवश्यकता होती है।
परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण बिंदु
- क्षैतिज राजकोषीय असंतुलन समान स्तर की सरकारों के बीच राजस्व क्षमता और व्यय आवश्यकताओं के अंतर से संबंधित है।
- लगातार ऋण लेकर वर्तमान व्यय करने से भविष्य में ऋण और ब्याज का बोझ बढ़ सकता है।
- विश्वसनीय मध्यम अवधि की योजना राजकोषीय निर्णयों में स्पष्टता और स्थिरता बढ़ाती है।
- आकस्मिक देनदारियाँ भविष्य में उत्पन्न होने वाली संभावित सरकारी वित्तीय जिम्मेदारियाँ हैं।
- व्यय दक्षता का अर्थ उपलब्ध संसाधनों से बेहतर और अधिक प्रभावी परिणाम प्राप्त करना है।
क्षैतिज असंतुलन, आकस्मिक देनदारियाँ और व्यय दक्षता
राजकोषीय नीति की स्थिरता का आकलन करते समय केवल कुल घाटे और ऋण को देखना पर्याप्त नहीं होता। संघीय वित्तीय व्यवस्था में राज्यों के बीच संसाधनों और वित्तीय आवश्यकताओं का अंतर, सरकारी ऋण का उपयोग, मध्यम अवधि की विश्वसनीय योजना, आकस्मिक देनदारियाँ तथा सार्वजनिक व्यय की दक्षता भी महत्वपूर्ण विषय हैं। इन पहलुओं को समझने से राजकोषीय जोखिमों का व्यापक आकलन किया जा सकता है।
क्षैतिज राजकोषीय असंतुलन
क्षैतिज राजकोषीय असंतुलन का संबंध एक ही स्तर की विभिन्न सरकारों, जैसे अलग-अलग राज्यों, की राजस्व क्षमता और व्यय आवश्यकताओं के बीच अंतर से होता है। राज्यों के आर्थिक आधार, कर संग्रह क्षमता, जनसंख्या, भौगोलिक परिस्थितियों और सार्वजनिक सेवाओं की आवश्यकताएँ अलग-अलग हो सकती हैं। इसलिए सभी राज्यों के पास समान वित्तीय क्षमता होना आवश्यक नहीं है। वित्तीय हस्तांतरण की व्यवस्था इन अंतरों को कम करने में सहायता कर सकती है।
ऋण से लगातार वर्तमान व्यय का वित्तपोषण
यदि सरकार लगातार ऋण लेकर अपने वर्तमान या नियमित व्यय को वित्तपोषित करती रहे, तो सार्वजनिक ऋण और ब्याज दायित्व बढ़ सकते हैं। इससे भविष्य में सरकारी आय का बड़ा हिस्सा ऋण सेवा में जाने की संभावना रहती है और विकासात्मक व्यय के लिए उपलब्ध संसाधनों पर दबाव पड़ सकता है। ऋण का उपयोग पूरी तरह अनुचित नहीं है, लेकिन दीर्घकालीन स्थिरता के लिए यह महत्वपूर्ण है कि उधारी का स्तर सरकार की पुनर्भुगतान क्षमता और वित्तीय स्थिति के अनुरूप रहे।
विश्वसनीय मध्यम अवधि की राजकोषीय योजना
विश्वसनीय मध्यम अवधि की योजना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे सरकार की राजकोषीय दिशा के बारे में स्पष्टता बढ़ती है। यदि घाटे, ऋण, राजस्व और व्यय के लिए यथार्थवादी लक्ष्य तथा अपेक्षाएँ निर्धारित हों, तो बजट निर्णय अधिक व्यवस्थित ढंग से लिए जा सकते हैं। विश्वसनीय योजना से नीति की अनिश्चितता कम हो सकती है और सरकार को आर्थिक परिस्थितियों में बदलाव के बावजूद दीर्घकालीन वित्तीय स्थिरता बनाए रखने के लिए बेहतर आधार मिल सकता है।
आकस्मिक देनदारियाँ
आकस्मिक देनदारियाँ ऐसी संभावित वित्तीय जिम्मेदारियाँ होती हैं जिनका भुगतान भविष्य में किसी विशेष घटना के घटित होने पर सरकार को करना पड़ सकता है। सरकारी गारंटी जैसी व्यवस्थाएँ इसका उदाहरण हो सकती हैं। इन दायित्वों का तत्काल बजट व्यय आवश्यक नहीं होता, लेकिन यदि संबंधित जोखिम वास्तविक हो जाए, तो सरकार पर वित्तीय बोझ पड़ सकता है। इसलिए राजकोषीय जोखिम का आकलन करते समय आकस्मिक देनदारियों को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।
व्यय की दक्षता बढ़ाने का अर्थ
सार्वजनिक व्यय की दक्षता बढ़ाने का अर्थ उपलब्ध संसाधनों से अधिक बेहतर और लक्षित परिणाम प्राप्त करना है। इसका उद्देश्य केवल सरकारी खर्च कम करना नहीं है। यदि समान संसाधनों से अधिक लाभार्थियों तक बेहतर सार्वजनिक सेवा पहुँचे या किसी कार्यक्रम का अपेक्षित परिणाम कम लागत में प्राप्त हो, तो व्यय की दक्षता में सुधार माना जा सकता है। इसके लिए बेहतर योजना, निगरानी, लक्ष्य निर्धारण और संसाधनों के प्रभावी उपयोग की आवश्यकता होती है।
परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण बिंदु
- क्षैतिज राजकोषीय असंतुलन समान स्तर की सरकारों के बीच राजस्व क्षमता और व्यय आवश्यकताओं के अंतर से संबंधित है।
- लगातार ऋण लेकर वर्तमान व्यय करने से भविष्य में ऋण और ब्याज का बोझ बढ़ सकता है।
- विश्वसनीय मध्यम अवधि की योजना राजकोषीय निर्णयों में स्पष्टता और स्थिरता बढ़ाती है।
- आकस्मिक देनदारियाँ भविष्य में उत्पन्न होने वाली संभावित सरकारी वित्तीय जिम्मेदारियाँ हैं।
- व्यय दक्षता का अर्थ उपलब्ध संसाधनों से बेहतर और अधिक प्रभावी परिणाम प्राप्त करना है।
प्राथमिकता-आधारित व्यय और राजकोषीय नीति का संतुलन
राजकोषीय नीति में सरकार को सीमित वित्तीय संसाधनों के बीच अनेक आर्थिक और सामाजिक आवश्यकताओं को पूरा करना होता है। इसलिए व्यय की प्राथमिकता, राजस्व और व्यय का संतुलन, आर्थिक विकास तथा राजकोषीय अनुशासन के बीच उचित सामंजस्य आवश्यक है। किसी एक संकेतक को अलग से देखकर नीति की सफलता का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होता।
प्राथमिकता-आधारित व्यय का उद्देश्य
प्राथमिकता-आधारित व्यय का उद्देश्य सीमित सरकारी संसाधनों को उन क्षेत्रों में केंद्रित करना है जहाँ सार्वजनिक आवश्यकता और अपेक्षित लाभ अधिक हों। सरकार को विकास, अवसंरचना, शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा और अन्य आवश्यकताओं के बीच उचित क्रम निर्धारित करना पड़ता है। इससे कम प्राथमिकता वाले खर्च पर नियंत्रण रखते हुए महत्वपूर्ण कार्यक्रमों के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध कराने में सहायता मिल सकती है।
राजस्व और व्यय के बीच संतुलन
राजस्व और व्यय के बीच उचित संतुलन राजकोषीय स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण है। यदि लंबे समय तक सरकारी व्यय उपलब्ध राजस्व से बहुत अधिक रहे, तो उधारी और सार्वजनिक ऋण बढ़ सकते हैं। दूसरी ओर, अत्यधिक कठोर व्यय नियंत्रण से विकास और आवश्यक सार्वजनिक सेवाएँ प्रभावित हो सकती हैं। इसलिए सरकार को आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार राजस्व जुटाने, व्यय करने और घाटे का प्रबंधन करने के बीच संतुलित दृष्टिकोण अपनाना होता है।
विकास और राजकोषीय अनुशासन का संतुलन
आर्थिक विकास के लिए सरकार को अवसंरचना, मानव पूंजी और अन्य उत्पादक क्षेत्रों में निवेश करना पड़ सकता है, लेकिन इन कार्यक्रमों को वित्तीय रूप से टिकाऊ रखना भी आवश्यक है। यदि विकास के नाम पर लगातार अत्यधिक घाटा और ऋण बढ़ाया जाए, तो भविष्य की वित्तीय क्षमता प्रभावित हो सकती है। इसी तरह अत्यधिक राजकोषीय कठोरता से आवश्यक निवेश कमजोर हो सकता है। इसलिए विकासात्मक आवश्यकताओं और दीर्घकालीन राजकोषीय अनुशासन के बीच संतुलन महत्वपूर्ण है।
राजकोषीय नीति की सफलता का व्यापक मूल्यांकन
राजकोषीय नीति की सफलता का मूल्यांकन केवल राजकोषीय घाटे के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि नीति के कई उद्देश्य हो सकते हैं। आर्थिक वृद्धि, रोजगार, मूल्य स्थिरता, सार्वजनिक निवेश, सामाजिक कल्याण और ऋण की स्थिरता भी महत्वपूर्ण परिणाम हैं। कम घाटा अपने आप में अच्छी नीति का प्रमाण नहीं है यदि उसके कारण आवश्यक विकासात्मक व्यय अत्यधिक कम हो जाए। इसी प्रकार अधिक घाटा भी हर परिस्थिति में खराब नहीं होता, यदि उसका उपयोग उचित और उत्पादक उद्देश्यों के लिए किया जा रहा हो तथा ऋण टिकाऊ हो।
FRBM, घाटा, ऋण और राजकोषीय अनुशासन को साथ पढ़ना
FRBM, राजकोषीय घाटा, सार्वजनिक ऋण और राजकोषीय अनुशासन एक-दूसरे से जुड़े हुए विषय हैं। घाटे को समझने से सरकार की अतिरिक्त वित्तीय आवश्यकता स्पष्ट होती है, जबकि ऋण यह बताता है कि उधारी के कारण सरकार पर कितना संचयी दायित्व बन सकता है। राजकोषीय अनुशासन इन दोनों के टिकाऊ प्रबंधन से संबंधित है और FRBM व्यवस्था इसी व्यापक वित्तीय उत्तरदायित्व तथा अनुशासन के संदर्भ में महत्वपूर्ण है। इसलिए परीक्षा की तैयारी में इन अवधारणाओं को अलग-अलग याद करने के बजाय उनके आपसी संबंध को समझना अधिक उपयोगी है।
अंतिम परीक्षा पुनरावृत्ति
- प्राथमिकता-आधारित व्यय सीमित संसाधनों को अधिक महत्वपूर्ण सार्वजनिक उद्देश्यों की ओर निर्देशित करता है।
- राजस्व और व्यय का संतुलन दीर्घकालीन राजकोषीय स्थिरता के लिए आवश्यक है।
- आर्थिक विकास और राजकोषीय अनुशासन को एक-दूसरे के विरोधी मानने के बजाय संतुलित करना आवश्यक है।
- राजकोषीय नीति का मूल्यांकन घाटे के साथ वृद्धि, रोजगार, निवेश और ऋण स्थिरता जैसे परिणामों से भी किया जाना चाहिए।
- FRBM, घाटा, ऋण और राजकोषीय अनुशासन परस्पर संबंधित अवधारणाएँ हैं और इन्हें साथ समझना परीक्षा की दृष्टि से उपयोगी है।
FRBM अधिनियम
FRBM अधिनियम यानी Fiscal Responsibility and Budget Management Act भारत में राजकोषीय अनुशासन और सरकारी वित्त में अधिक पारदर्शिता स्थापित करने के उद्देश्य से बनाया गया महत्वपूर्ण कानून है। इसका व्यापक उद्देश्य राजकोषीय घाटे और सार्वजनिक वित्त को टिकाऊ दिशा में रखना है। प्रतियोगी परीक्षाओं में इसके उद्देश्य, राजकोषीय उत्तरदायित्व, बजट प्रबंधन और संशोधनों से जुड़े प्रश्न महत्वपूर्ण होते हैं।
राजकोषीय अनुशासन
राजकोषीय अनुशासन का अर्थ है कि सरकार अपने व्यय, घाटे और ऋण को ऐसी सीमा में रखे जिससे सार्वजनिक वित्त लंबे समय तक टिकाऊ बना रहे। अनुशासित राजकोषीय व्यवस्था में अनावश्यक घाटे और अत्यधिक उधारी को नियंत्रित करने के साथ उत्पादक व्यय को प्राथमिकता दी जाती है। इससे ब्याज भार, ऋण जोखिम और व्यापक आर्थिक अस्थिरता को सीमित करने में सहायता मिल सकती है।
घाटा वित्तपोषण
घाटा वित्तपोषण वह व्यवस्था है जिसके माध्यम से सरकार अपने व्यय और उपलब्ध प्राप्तियों के बीच की कमी को पूरा करती है। इसके लिए उधारी सहित विभिन्न वित्तीय साधनों का उपयोग किया जा सकता है। घाटा वित्तपोषण आर्थिक मंदी में मांग को सहारा दे सकता है, लेकिन अत्यधिक और लंबे समय तक बना घाटा ऋण, ब्याज भार तथा मुद्रास्फीति संबंधी जोखिम बढ़ा सकता है।
राजकोषीय नीति और मुद्रास्फीति
राजकोषीय नीति का मुद्रास्फीति पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ सकता है। जब सरकार व्यय बढ़ाती है या करों में कमी करती है, तो कुल मांग बढ़ सकती है और क्षमता सीमित होने पर कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। इसके विपरीत, अत्यधिक मांग की स्थिति में सरकार व्यय नियंत्रित करके या कर राजस्व बढ़ाकर संकुचनकारी रुख अपना सकती है।
राजकोषीय नीति और आर्थिक वृद्धि
राजकोषीय नीति आर्थिक वृद्धि को सार्वजनिक निवेश, बुनियादी ढाँचे, शिक्षा, स्वास्थ्य और उत्पादक सरकारी व्यय के माध्यम से प्रभावित कर सकती है। उपयुक्त राजकोषीय समर्थन से उत्पादन क्षमता और रोजगार में वृद्धि हो सकती है। हालांकि, अत्यधिक उधारी या गैर-उत्पादक व्यय लंबे समय में निजी निवेश और वित्तीय स्थिरता पर दबाव डाल सकते हैं, इसलिए व्यय की गुणवत्ता महत्वपूर्ण है।
प्रतिचक्रीय राजकोषीय नीति
प्रतिचक्रीय राजकोषीय नीति का उद्देश्य व्यापार चक्र के उतार-चढ़ाव को कम करना है। आर्थिक मंदी के समय सरकार मांग और रोजगार को सहारा देने के लिए व्यय बढ़ा सकती है या करों में राहत दे सकती है। इसके विपरीत, अत्यधिक तेजी और मांग दबाव की स्थिति में राजकोषीय नीति को अपेक्षाकृत संकुचनकारी बनाया जा सकता है। यह स्थिरीकरणकारी राजकोषीय नीति की प्रमुख अवधारणा है।
सार्वजनिक ऋण
सार्वजनिक ऋण सरकार द्वारा पूर्व में ली गई उधारी का संचयी दायित्व है। इसका उपयोग विकासात्मक निवेश, बजटीय आवश्यकताओं और असाधारण परिस्थितियों में वित्तीय संसाधन जुटाने के लिए किया जा सकता है। ऋण का मूल्यांकन केवल उसके आकार से नहीं बल्कि उसकी स्थिरता, ब्याज भार, ऋण-से-GDP अनुपात और उससे वित्तपोषित व्यय की उत्पादकता के आधार पर भी किया जाता है।
केंद्र और राज्यों की राजकोषीय स्थिति
भारत में केंद्र और राज्यों की राजकोषीय स्थिति एक-दूसरे से जुड़ी हुई है क्योंकि दोनों स्तरों की सरकारों के पास अलग-अलग कर स्रोत, व्यय दायित्व और उधारी संबंधी आवश्यकताएँ हैं। वित्तीय हस्तांतरण, करों में हिस्सेदारी और अनुदान केंद्र-राज्य वित्तीय संबंधों को प्रभावित करते हैं। समग्र राजकोषीय स्थिरता के लिए दोनों स्तरों पर जिम्मेदार वित्तीय प्रबंधन आवश्यक है।
राजकोषीय नीति की चुनौतियाँ
राजकोषीय नीति के सामने सीमित राजस्व संसाधन, बढ़ते व्यय दायित्व, सार्वजनिक ऋण, ब्याज भुगतान, आर्थिक चक्र और विकास तथा वित्तीय अनुशासन के बीच संतुलन जैसी चुनौतियाँ रहती हैं। सरकार को यह तय करना होता है कि उपलब्ध संसाधनों का उपयोग किस प्रकार किया जाए ताकि तत्काल आर्थिक आवश्यकताओं के साथ दीर्घकालीन वित्तीय स्थिरता भी बनी रहे।
राजकोषीय नीति से जुड़े परीक्षा तथ्य
परीक्षा की दृष्टि से राजकोषीय नीति के अंतर्गत FRBM अधिनियम, राजकोषीय अनुशासन, घाटा वित्तपोषण, मुद्रास्फीति, आर्थिक वृद्धि, प्रतिचक्रीय नीति और सार्वजनिक ऋण जैसी अवधारणाओं को आपस में जोड़कर पढ़ना चाहिए। विशेष रूप से राजकोषीय घाटा, प्राथमिक घाटा, राजस्व घाटा और ऋण के बीच अंतर स्पष्ट रखना उपयोगी है। केंद्र और राज्यों की राजकोषीय स्थिति से जुड़े तथ्य भी महत्वपूर्ण हैं।
त्वरित पुनरावृत्ति
| विषय | मुख्य बिंदु | परीक्षा संकेत |
|---|---|---|
| FRBM अधिनियम | राजकोषीय उत्तरदायित्व और वित्तीय अनुशासन | कानूनी ढाँचा |
| राजकोषीय अनुशासन | घाटा और ऋण को टिकाऊ स्तर पर रखना | वित्तीय स्थिरता |
| घाटा वित्तपोषण | सरकारी वित्तीय कमी की पूर्ति | उधारी और अन्य साधन |
| प्रतिचक्रीय नीति | व्यापार चक्र के प्रभाव को कम करना | मंदी में समर्थन, तेजी में नियंत्रण |
| सार्वजनिक ऋण | सरकार की संचयी उधारी | ऋण स्थिरता और ब्याज भार |
समग्र महत्त्व
राजकोषीय नीति के ये विस्तृत पहलू सरकारी वित्त और व्यापक आर्थिक स्थिरता के बीच संबंध को समझने में सहायता करते हैं। FRBM अधिनियम और राजकोषीय अनुशासन वित्तीय स्थिरता से जुड़े हैं, जबकि घाटा वित्तपोषण, सार्वजनिक ऋण और प्रतिचक्रीय नीति सरकार की आर्थिक भूमिका को स्पष्ट करते हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं में अवधारणात्मक प्रश्नों के साथ-साथ इनके उद्देश्य, प्रभाव, अंतर और अनुप्रयोग पर आधारित प्रश्न भी पूछे जा सकते हैं।