नीति आयोग Part 1
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💡 व्याख्या
नीति आयोग — भाग 1
नीति आयोग का गठन
योजना आयोग से नीति आयोग तक
नीति आयोग के उद्देश्य
नीति आयोग का गठन
नीति आयोग भारत सरकार का प्रमुख सार्वजनिक नीति विचार मंच है, जिसे 1 जनवरी 2015 को स्थापित किया गया। इसका पूरा नाम राष्ट्रीय भारत परिवर्तन संस्थान है। नीति आयोग की स्थापना का उद्देश्य ऐसी संस्थागत व्यवस्था विकसित करना था जो राज्यों के साथ मिलकर विकास की प्राथमिकताओं, नीतिगत दिशा और दीर्घकालीन रणनीतियों पर काम कर सके। इसके गठन के साथ भारत की नीति-निर्माण व्यवस्था में सहभागी और परामर्श आधारित दृष्टिकोण को अधिक महत्व मिला।
नीति आयोग केवल योजनाओं को ऊपर से नीचे लागू करने वाली संस्था के रूप में नहीं बनाया गया, बल्कि इसे राज्यों और केंद्र के बीच संवाद तथा नीति संबंधी विचार-विमर्श को मजबूत करने के लिए विकसित किया गया। इसका कार्य आर्थिक विकास, सामाजिक क्षेत्र, नवाचार, सतत विकास और विभिन्न क्षेत्रों में सुधारों से संबंधित नीतिगत सुझाव देने तक विस्तृत है। प्रतियोगी परीक्षाओं में नीति आयोग के गठन का वर्ष, इसका स्वरूप और इसके प्रमुख उद्देश्य महत्वपूर्ण तथ्य माने जाते हैं।
| बिंदु | महत्वपूर्ण तथ्य |
|---|---|
| स्थापना | 1 जनवरी 2015 |
| प्रकृति | सार्वजनिक नीति विचार मंच |
| मुख्य उद्देश्य | नीति-निर्माण में सहयोग और रणनीतिक मार्गदर्शन |
| महत्वपूर्ण दृष्टिकोण | केंद्र और राज्यों के बीच सहभागिता |
योजना आयोग से नीति आयोग तक
नीति आयोग को समझने के लिए योजना आयोग से उसके संबंध को समझना आवश्यक है। योजना आयोग की स्थापना 1950 में हुई थी और लंबे समय तक यह भारत की पंचवर्षीय योजनाओं तथा संसाधनों के नियोजन से जुड़ी केंद्रीय संस्था रहा। समय के साथ भारतीय अर्थव्यवस्था अधिक जटिल और विविध हुई तथा राज्यों की विकास संबंधी आवश्यकताओं में भी अंतर बढ़ा। इस बदलते परिवेश में ऐसी संस्था की आवश्यकता महसूस हुई जो केवल केंद्रीय योजना निर्धारण तक सीमित न होकर राज्यों की भागीदारी और नीति सहयोग पर अधिक जोर दे।
इसी संदर्भ में 2015 में नीति आयोग की स्थापना की गई और योजना आयोग की पुरानी व्यवस्था को समाप्त किया गया। नीति आयोग का दृष्टिकोण अधिक लचीला, परामर्श आधारित और दीर्घकालीन नीति सोच पर केंद्रित है। यह अंतर परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण है: योजना आयोग पारंपरिक केंद्रीकृत नियोजन से जुड़ा था, जबकि नीति आयोग सहयोग, नीति नवाचार और केंद्र-राज्य सहभागिता पर अधिक बल देता है। दोनों संस्थाओं की तुलना करते समय उनकी स्थापना, कार्यप्रणाली और राज्यों के साथ संबंधों को ध्यान में रखना चाहिए।
| आधार | योजना आयोग | नीति आयोग |
|---|---|---|
| स्थापना | 1950 | 2015 |
| मुख्य दृष्टिकोण | केंद्रीय नियोजन | नीति सहयोग और रणनीतिक सोच |
| राज्यों की भूमिका | तुलनात्मक रूप से अधिक केंद्रीकृत व्यवस्था | सहभागिता और परामर्श पर जोर |
नीति आयोग के उद्देश्य
नीति आयोग के प्रमुख उद्देश्यों में भारत के विकास के लिए साझा राष्ट्रीय दृष्टिकोण तैयार करना, राज्यों के साथ निरंतर संवाद स्थापित करना और दीर्घकालीन नीतिगत प्राथमिकताओं को विकसित करना शामिल है। इसका उद्देश्य विभिन्न सरकारी स्तरों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना तथा विकास संबंधी नीतियों को स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप अधिक प्रभावी बनाने में सहायता करना है।
नीति आयोग नीति निर्माण में नवाचार, ज्ञान और प्रमाण आधारित विचारों को प्रोत्साहित करता है। यह विभिन्न क्षेत्रों में उपलब्ध अनुभवों का अध्ययन करके बेहतर नीतिगत विकल्पों की पहचान करने और राज्यों तथा केंद्र सरकार को सुझाव देने में भूमिका निभाता है। इसके उद्देश्यों को समझते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि नीति आयोग का मूल चरित्र एक विचार और नीति मंच का है। इसलिए इसके कार्यों को पारंपरिक मंत्रालय या सीधे बजट आवंटन करने वाली संस्था के रूप में नहीं समझना चाहिए।
सहकारी संघवाद
प्रतिस्पर्धी संघवाद
नीति आयोग की संरचना
सहकारी संघवाद
सहकारी संघवाद का अर्थ केंद्र और राज्यों के बीच ऐसी साझेदारी से है जिसमें दोनों स्तर की सरकारें राष्ट्रीय विकास के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए मिलकर कार्य करती हैं। नीति आयोग को इस दृष्टिकोण को मजबूत करने वाली प्रमुख संस्थाओं में माना जाता है। भारत जैसे विशाल और विविध देश में सभी राज्यों के लिए एक जैसी नीतियाँ समान परिणाम नहीं दे सकतीं। इसलिए राज्यों की स्थानीय परिस्थितियों, संसाधनों और विकास आवश्यकताओं को नीति निर्माण में शामिल करना बहुत महत्वपूर्ण है।
नीति आयोग केंद्र और राज्यों के बीच संवाद के माध्यम से विभिन्न विकास संबंधी मुद्दों पर विचार-विमर्श को बढ़ावा देता है। सहकारी संघवाद में राज्यों को केवल नीतियों के कार्यान्वयनकर्ता के रूप में नहीं देखा जाता, बल्कि उन्हें नीति संबंधी चर्चा में भागीदार माना जाता है। इससे विकास की प्राथमिकताओं को अधिक व्यावहारिक बनाने में सहायता मिल सकती है। प्रतियोगी परीक्षाओं में सहकारी संघवाद को नीति आयोग की प्रमुख कार्य-दृष्टियों से जोड़कर पूछा जा सकता है।
प्रतिस्पर्धी संघवाद
प्रतिस्पर्धी संघवाद में राज्यों के बीच बेहतर प्रदर्शन और विकास परिणाम प्राप्त करने के लिए स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को प्रोत्साहित किया जाता है। इसका उद्देश्य राज्यों को विभिन्न क्षेत्रों में अपनी नीतियों, प्रशासनिक क्षमता और विकास परिणामों में सुधार करने के लिए प्रेरित करना है। नीति आयोग राज्यों के प्रदर्शन की तुलना करने वाले विभिन्न सूचकांकों और मूल्यांकन व्यवस्थाओं के माध्यम से इस प्रकार की प्रतिस्पर्धा को प्रोत्साहित करने में भूमिका निभाता है।
सहकारी और प्रतिस्पर्धी संघवाद एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। सहकारी संघवाद सहयोग और साझेदारी पर बल देता है, जबकि प्रतिस्पर्धी संघवाद बेहतर परिणामों के लिए स्वस्थ तुलना और प्रदर्शन सुधार को प्रोत्साहित करता है। दोनों दृष्टिकोणों का संयोजन राज्यों को अपनी कमजोरियों की पहचान करने तथा बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों से सीखने का अवसर दे सकता है। परीक्षा में दोनों अवधारणाओं के बीच अंतर पूछे जाने की संभावना रहती है, इसलिए इनके मूल उद्देश्य स्पष्ट रूप से समझना उपयोगी है।
| संघवाद का रूप | मुख्य जोर | उद्देश्य |
|---|---|---|
| सहकारी संघवाद | केंद्र-राज्य सहयोग | साझा विकास |
| प्रतिस्पर्धी संघवाद | राज्यों के प्रदर्शन की तुलना | बेहतर परिणाम और सुधार |
नीति आयोग की संरचना
नीति आयोग की संस्थागत संरचना ऐसी बनाई गई है जिसमें केंद्र सरकार के शीर्ष स्तर के साथ राज्यों की भागीदारी और विशेषज्ञता को स्थान मिलता है। इसकी संरचना को समझना प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, पूर्णकालिक सदस्य, पदेन सदस्य तथा शासी परिषद जैसे प्रमुख घटक शामिल होते हैं। प्रधानमंत्री नीति आयोग के अध्यक्ष होते हैं और संस्था के शीर्ष स्तर पर नीति संबंधी दिशा प्रदान करते हैं।
नीति आयोग की संरचना का उद्देश्य विभिन्न क्षेत्रों की विशेषज्ञता, प्रशासनिक अनुभव और राज्यों की आवाज को नीति विचार-विमर्श से जोड़ना है। शासी परिषद में राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के प्रतिनिधित्व के माध्यम से संघीय संवाद को संस्थागत रूप दिया जाता है। उपाध्यक्ष और मुख्य कार्यकारी अधिकारी संस्था के दैनिक नीतिगत और प्रशासनिक कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इस प्रकार इसकी संरचना को केवल एक केंद्रीय सरकारी विभाग की तरह समझना उचित नहीं है; यह बहु-स्तरीय नीति संवाद और विशेषज्ञ सलाह का मंच है।
| संरचनात्मक घटक | मुख्य भूमिका |
|---|---|
| अध्यक्ष | प्रधानमंत्री; शीर्ष नीतिगत नेतृत्व |
| उपाध्यक्ष | नीति आयोग के कार्यों में प्रमुख नेतृत्व |
| पूर्णकालिक सदस्य | नीति और विशेषज्ञता संबंधी योगदान |
| शासी परिषद | केंद्र और राज्यों के बीच संवाद |
प्रधानमंत्री की भूमिका
नीति आयोग के अध्यक्ष प्रधानमंत्री होते हैं। यह व्यवस्था संस्था को राष्ट्रीय विकास की व्यापक प्राथमिकताओं के साथ जोड़ती है। प्रधानमंत्री की अध्यक्षता नीति आयोग को उच्च स्तर का नीतिगत नेतृत्व प्रदान करती है और केंद्र तथा राज्यों के बीच विकास संबंधी संवाद को दिशा देने में सहायता करती है। प्रधानमंत्री की भूमिका को समझते समय यह याद रखना चाहिए कि नीति आयोग का अध्यक्ष पद किसी अन्य स्वतंत्र व्यक्ति के पास नहीं होता।
प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में नीति आयोग राष्ट्रीय विकास से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों पर व्यापक दृष्टिकोण विकसित करने का प्रयास करता है। संस्था की संरचना में राज्यों की भागीदारी के साथ प्रधानमंत्री का नेतृत्व केंद्र-राज्य संवाद को राष्ट्रीय प्राथमिकताओं से जोड़ता है। प्रतियोगी परीक्षाओं में नीति आयोग के अध्यक्ष के बारे में सीधे तथ्यात्मक प्रश्न पूछे जा सकते हैं। इसलिए अध्यक्ष के रूप में प्रधानमंत्री की भूमिका और नीति आयोग की स्थापना के वर्ष को साथ में याद रखना उपयोगी है।
उपाध्यक्ष और CEO
नीति आयोग में उपाध्यक्ष और मुख्य कार्यकारी अधिकारी यानी CEO की भूमिकाएँ अलग-अलग प्रकृति की हैं। उपाध्यक्ष नीति आयोग के नीतिगत कार्यों और विचार-विमर्श में महत्वपूर्ण नेतृत्व प्रदान करते हैं, जबकि CEO संस्था के प्रशासनिक और कार्यान्वयन संबंधी संचालन में प्रमुख भूमिका निभाते हैं। CEO की नियुक्ति केंद्र सरकार द्वारा की जाती है और यह पद संस्था के दैनिक कार्यों के प्रभावी समन्वय के लिए महत्वपूर्ण है।
उपाध्यक्ष तथा CEO को एक ही पद समझना परीक्षा में सामान्य भ्रम का कारण बन सकता है। उपाध्यक्ष नीति आयोग के उच्च नीतिगत नेतृत्व का हिस्सा होते हैं, जबकि CEO प्रशासनिक संचालन और विभिन्न कार्यक्रमों तथा कार्यों के समन्वय से जुड़े होते हैं। नीति आयोग की संस्थागत संरचना समझने के लिए इन दोनों पदों के बीच यह मूल अंतर स्पष्ट रखना आवश्यक है।
| पद | मुख्य विशेषता |
|---|---|
| उपाध्यक्ष | नीतिगत नेतृत्व और विचार-विमर्श |
| CEO | प्रशासनिक संचालन और कार्यों का समन्वय |
शासी परिषद
नीति आयोग की शासी परिषद केंद्र और राज्यों के बीच संस्थागत संवाद का महत्वपूर्ण मंच है। इसमें राज्यों तथा संबंधित केंद्रशासित प्रदेशों के प्रतिनिधियों को शामिल किया जाता है। इसका उद्देश्य राष्ट्रीय विकास के मुद्दों पर केंद्र और राज्यों के बीच विचारों का आदान-प्रदान तथा साझा प्राथमिकताओं पर चर्चा को बढ़ावा देना है। इस व्यवस्था से संघीय ढाँचे में राज्यों की भागीदारी को अधिक व्यवस्थित रूप मिलता है।
शासी परिषद को समझते समय इसे नीति आयोग की सामान्य प्रशासनिक इकाई के बजाय केंद्र-राज्य नीति संवाद के मंच के रूप में देखना चाहिए। इसके माध्यम से राज्यों की अलग-अलग विकास आवश्यकताओं और अनुभवों को राष्ट्रीय नीति चर्चा में स्थान मिलता है। सहकारी संघवाद की अवधारणा से इसका सीधा संबंध है। परीक्षाओं में शासी परिषद की संरचना, अध्यक्षता और उद्देश्य से संबंधित तथ्य पूछे जा सकते हैं।
नीति आयोग और बदलती नीति-निर्माण व्यवस्था
नीति आयोग की स्थापना को भारत में नीति-निर्माण की बदलती शैली के संदर्भ में समझना चाहिए। भारतीय अर्थव्यवस्था में राज्यों की विकास आवश्यकताएँ, क्षेत्रीय असमानताएँ, तकनीकी परिवर्तन और वैश्विक आर्थिक परिस्थितियाँ लगातार बदलती रहती हैं। ऐसे वातावरण में नीतियों को केवल एक केंद्रीय ढाँचे से तय करने के बजाय विभिन्न हितधारकों से सुझाव लेना और अलग-अलग राज्यों के अनुभवों को समझना उपयोगी होता है। नीति आयोग इसी प्रकार के विचार-विमर्श और रणनीतिक नीति सोच को बढ़ावा देने वाली संस्था के रूप में कार्य करता है।
इस दृष्टिकोण में दीर्घकालीन लक्ष्य, नीति विकल्पों का विश्लेषण और बेहतर प्रशासनिक परिणामों की खोज महत्वपूर्ण हो जाती है। नीति आयोग का महत्व इसलिए भी है कि यह सरकार के विभिन्न स्तरों के बीच नीति संबंधी विचारों को जोड़ने का प्रयास करता है। अर्थव्यवस्था के विद्यार्थियों के लिए यह समझना आवश्यक है कि आधुनिक नीति-निर्माण केवल संसाधनों के वितरण तक सीमित नहीं है, बल्कि संस्थागत क्षमता, नवाचार, परिणाम और राज्यों की भागीदारी भी उसके महत्वपूर्ण हिस्से हैं।
नीति आयोग की संस्थागत विशेषताएँ
नीति आयोग की संस्थागत विशेषताओं में विशेषज्ञता, परामर्श, रणनीतिक सोच और संघीय सहभागिता को विशेष महत्व दिया जाता है। इसकी संरचना में अलग-अलग क्षेत्रों के अनुभव और ज्ञान को नीति संबंधी चर्चाओं से जोड़ने का प्रयास किया जाता है। यह व्यवस्था नीति समस्याओं को केवल प्रशासनिक आदेश के रूप में देखने के बजाय उनके आर्थिक, सामाजिक और क्षेत्रीय प्रभावों का व्यापक अध्ययन करने में सहायता करती है।
संस्था की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यह विभिन्न राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के विकास अनुभवों को समझने का अवसर प्रदान करती है। इससे नीति निर्माण में स्थानीय परिस्थितियों का महत्व बढ़ता है। किसी एक राज्य में सफल नीति दूसरे राज्य में उसी रूप में सफल हो, यह आवश्यक नहीं है। इसलिए नीति विचार मंच के रूप में अलग-अलग परिस्थितियों की तुलना और उनसे सीखना उपयोगी प्रक्रिया है।
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| विशेषज्ञता | जटिल नीतिगत समस्याओं का बेहतर विश्लेषण |
| परामर्श | विभिन्न स्तरों से विचार प्राप्त करना |
| रणनीतिक सोच | दीर्घकालीन विकास दिशा पर ध्यान |
| संघीय सहभागिता | राज्यों को नीति संवाद में स्थान |
सहकारी और प्रतिस्पर्धी संघवाद का संयुक्त महत्व
भारतीय संघीय व्यवस्था में सहकारी और प्रतिस्पर्धी संघवाद को साथ समझना अधिक उपयोगी है। सहकारी संघवाद केंद्र और राज्यों के बीच साझा प्रयास पर जोर देता है, जबकि प्रतिस्पर्धी संघवाद राज्यों को बेहतर प्रदर्शन के लिए प्रेरित करता है। यदि केवल प्रतिस्पर्धा हो और सहयोग न हो तो विकास संबंधी समस्याओं में साझा समाधान कठिन हो सकता है। इसी प्रकार केवल सहयोग हो लेकिन प्रदर्शन की तुलना और सुधार की प्रेरणा न हो तो दक्षता बढ़ाने की गुंजाइश कम हो सकती है।
इसलिए दोनों अवधारणाएँ एक-दूसरे की पूरक हो सकती हैं। राज्यों के बीच स्वस्थ तुलना से नई नीतियों और बेहतर प्रशासनिक तरीकों को अपनाने की प्रेरणा मिलती है, जबकि केंद्र और राज्यों के बीच सहयोग से साझा राष्ट्रीय लक्ष्यों पर काम करना आसान होता है। प्रतियोगी परीक्षाओं में इन दोनों अवधारणाओं को अलग-अलग परिभाषित करने के साथ इनके संयुक्त महत्व पर भी प्रश्न बनाए जा सकते हैं।
नीति आयोग पढ़ते समय सामान्य भ्रम
नीति आयोग से संबंधित प्रश्नों में कुछ सामान्य भ्रम बार-बार दिखाई देते हैं। पहला भ्रम योजना आयोग और नीति आयोग को एक ही संस्था मान लेना है। दूसरा भ्रम नीति आयोग को प्रत्यक्ष रूप से सभी सरकारी योजनाओं का बजट आवंटित करने वाली संस्था समझना है। तीसरा भ्रम उपाध्यक्ष और CEO की भूमिकाओं को समान मानना है। चौथा भ्रम सहकारी संघवाद और प्रतिस्पर्धी संघवाद को एक ही अवधारणा समझना है। इन अंतर को स्पष्ट रखना तथ्यात्मक प्रश्नों में गलतियों को कम करता है।
एक अन्य महत्वपूर्ण बात यह है कि नीति आयोग को मंत्रालय की सामान्य प्रशासनिक संरचना के बजाय नीति संबंधी विचार और रणनीतिक सलाह के मंच के रूप में समझना चाहिए। इसके विभिन्न अंगों की भूमिका अलग है और परीक्षा में पद, संरचना तथा संघीय संवाद से जुड़े प्रश्नों में शब्दों का सूक्ष्म अंतर महत्वपूर्ण हो सकता है। इसलिए केवल रटने के बजाय संस्था की मूल कार्यप्रणाली को समझकर तैयारी करना अधिक प्रभावी है।
नीति आयोग के मूल तथ्य
नीति आयोग से जुड़े मूल तथ्यों में इसकी स्थापना 1 जनवरी 2015, प्रधानमंत्री का अध्यक्ष होना, सार्वजनिक नीति विचार मंच के रूप में इसका स्वरूप तथा केंद्र और राज्यों के बीच नीति सहयोग पर इसका जोर प्रमुख हैं। इसे समझने का सबसे सरल तरीका यह है कि नीति आयोग भारत की विकास प्रक्रिया में रणनीतिक सोच, नीति सलाह, नवाचार और संघीय सहयोग को बढ़ावा देने वाली संस्था है।
परीक्षा की तैयारी में योजना आयोग और नीति आयोग के बीच अंतर, नीति आयोग की स्थापना, अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, CEO, शासी परिषद और संघवाद संबंधी दृष्टिकोण को विशेष रूप से दोहराना चाहिए। नीति आयोग का अध्ययन केवल नाम और वर्ष याद करने तक सीमित नहीं होना चाहिए; इसकी संस्थागत भूमिका और नीति-निर्माण में महत्व समझना भी आवश्यक है।
| परीक्षा तथ्य | उत्तर |
|---|---|
| नीति आयोग की स्थापना | 1 जनवरी 2015 |
| अध्यक्ष | प्रधानमंत्री |
| स्वरूप | सार्वजनिक नीति विचार मंच |
| प्रमुख संघीय दृष्टिकोण | सहकारी और प्रतिस्पर्धी संघवाद |
नीति आयोग की भूमिका को समझने का सरल तरीका
नीति आयोग की भूमिका को समझने के लिए इसे तीन व्यापक स्तरों पर देखा जा सकता है। पहला स्तर राष्ट्रीय विकास की दिशा से संबंधित है, जहाँ दीर्घकालीन प्राथमिकताओं और रणनीतिक नीतियों पर विचार किया जाता है। दूसरा स्तर केंद्र और राज्यों के बीच संवाद का है, जहाँ अलग-अलग क्षेत्रों की आवश्यकताओं तथा अनुभवों को नीति चर्चा में स्थान मिलता है। तीसरा स्तर ज्ञान और नीति विचार का है, जहाँ विभिन्न विकास समस्याओं के लिए बेहतर विकल्पों और सुधारों पर विचार किया जाता है।
यह दृष्टिकोण नीति आयोग को भारतीय आर्थिक शासन की महत्वपूर्ण संस्था बनाता है। किसी भी अर्थव्यवस्था में नीतियों की सफलता केवल नीति की घोषणा पर निर्भर नहीं करती, बल्कि उसके सही संदर्भ, प्रशासनिक क्षमता और विभिन्न स्तरों के समन्वय पर भी निर्भर करती है। इसलिए नीति आयोग का अध्ययन करते समय संस्था के नाम और स्थापना वर्ष के साथ उसकी नीति संबंधी भूमिका तथा संघीय दृष्टिकोण को समझना आवश्यक है।
परीक्षा तैयारी के लिए महत्वपूर्ण अंतर
परीक्षा की दृष्टि से नीति आयोग के अध्ययन में कुछ बुनियादी अंतर विशेष रूप से याद रखने चाहिए। योजना आयोग और नीति आयोग के बीच अंतर में स्थापना काल, कार्य-दृष्टिकोण और नीति प्रक्रिया प्रमुख हैं। इसी तरह सहकारी संघवाद में सहयोग तथा साझा प्रयास पर बल दिया जाता है, जबकि प्रतिस्पर्धी संघवाद में राज्यों के प्रदर्शन और सुधार की प्रेरणा प्रमुख होती है। उपाध्यक्ष और CEO के पदों को भी उनकी अलग-अलग भूमिकाओं के साथ याद करना चाहिए।
| तुलना | पहला पक्ष | दूसरा पक्ष |
|---|---|---|
| पुरानी और नई संस्था | योजना आयोग | नीति आयोग |
| संघवाद का दृष्टिकोण | सहकारी संघवाद | प्रतिस्पर्धी संघवाद |
| संस्थागत पद | उपाध्यक्ष | CEO |
ऐसी तुलना आधारित तैयारी से बहुविकल्पीय प्रश्नों में मिलते-जुलते विकल्पों को अलग पहचानना आसान होता है। विशेष रूप से स्थापना वर्ष, पदनाम और संस्था के उद्देश्य से जुड़े विकल्पों को ध्यानपूर्वक पढ़ना चाहिए।
नीति आयोग के मूल तथ्यों का पुनरावलोकन
नीति आयोग की तैयारी में स्थापना की तारीख, अध्यक्ष का पद, संस्थागत स्वरूप, शासी परिषद तथा संघवाद की दोनों प्रमुख अवधारणाओं को एक साथ दोहराना चाहिए। इससे अलग-अलग तथ्यों के बीच संबंध स्पष्ट होता है और परीक्षा में पूछे जाने वाले सीधे तथा मिलान आधारित प्रश्नों को हल करना आसान होता है।
इस अध्याय को पढ़ते समय तथ्य, संस्थागत भूमिका और संघीय अवधारणाओं को साथ जोड़कर दोहराना चाहिए।
त्वरित पुनरावृत्ति
नीति आयोग के भाग 1 की त्वरित पुनरावृत्ति में दस मुख्य बिंदुओं को याद रखें: 2015 में गठन, योजना आयोग के स्थान पर नई संस्था, नीति-निर्माण में रणनीतिक सोच, सहकारी संघवाद, प्रतिस्पर्धी संघवाद, संस्थागत संरचना, प्रधानमंत्री की अध्यक्षता, उपाध्यक्ष और CEO की अलग भूमिकाएँ, शासी परिषद तथा मूल तथ्य। इन बिंदुओं को आपस में जोड़कर पढ़ने से तथ्यात्मक और अवधारणात्मक दोनों प्रकार के प्रश्नों की तैयारी बेहतर होती है।
| क्रम | याद रखने योग्य बिंदु |
|---|---|
| 1 | गठन — 1 जनवरी 2015 |
| 2 | योजना आयोग के बाद नई नीति संस्था |
| 3 | प्रधानमंत्री — अध्यक्ष |
| 4 | सहकारी संघवाद — केंद्र और राज्यों की साझेदारी |
| 5 | प्रतिस्पर्धी संघवाद — बेहतर प्रदर्शन के लिए स्वस्थ प्रतिस्पर्धा |
| 6 | शासी परिषद — केंद्र-राज्य संवाद का प्रमुख मंच |
परीक्षा की दृष्टि से नीति आयोग का महत्व
नीति आयोग भारतीय अर्थव्यवस्था और शासन से जुड़े प्रतियोगी परीक्षाओं में महत्वपूर्ण विषय है क्योंकि इससे संस्थागत सुधार, संघवाद, सार्वजनिक नीति और विकास प्रशासन के प्रश्न बनते हैं। विशेष रूप से स्थापना वर्ष, योजना आयोग से अंतर, प्रधानमंत्री की भूमिका, उपाध्यक्ष और CEO, शासी परिषद तथा सहकारी एवं प्रतिस्पर्धी संघवाद जैसे विषय बार-बार उपयोगी होते हैं। तथ्य याद करने के साथ संस्थागत भूमिकाओं का अंतर समझना अधिक प्रभावी तैयारी देता है।
नीति आयोग का अध्ययन भारतीय आर्थिक व्यवस्था में बदलते नीति-निर्माण दृष्टिकोण को समझने में भी सहायता करता है। यह विषय अर्थव्यवस्था, भारतीय राजव्यवस्था और शासन के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी बनाता है। इसलिए परीक्षा में इससे जुड़े सीधे तथ्यात्मक प्रश्नों के साथ-साथ अवधारणा आधारित प्रश्नों की तैयारी भी करनी चाहिए।