गरीबी और असमानता Part 2
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गरीबी और असमानता — भाग 2 : विस्तृत अध्ययन सामग्री
गरीबी और असमानता के अध्ययन में गरीबी समितियों, गरीबी रेखा निर्धारण की विभिन्न पद्धतियों, बहुआयामी गरीबी, गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों और असमानता के मापन को समझना अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह भाग इन अवधारणाओं को परीक्षा-केंद्रित दृष्टिकोण से व्यवस्थित करता है।
गरीबी समितियाँ
भारत में गरीबी के आकलन और गरीबी रेखा के निर्धारण की पद्धति समय के साथ विकसित हुई है। अलग-अलग विशेषज्ञ समितियों ने उपलब्ध आँकड़ों, उपभोग व्यवहार, न्यूनतम आवश्यकताओं और जीवन स्तर को ध्यान में रखते हुए गरीबी मापन के अलग-अलग तरीके सुझाए। परीक्षा की दृष्टि से इन समितियों का क्रम और उनकी प्रमुख विशेषताएँ विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं।
गरीबी समितियों का मूल उद्देश्य यह समझना रहा कि किसी व्यक्ति या परिवार को न्यूनतम जीवन स्तर से नीचे कब माना जाए और देश में ऐसे लोगों की संख्या का विश्वसनीय अनुमान कैसे लगाया जाए। गरीबी मापन की पद्धति में बदलाव के साथ गरीबी के आधिकारिक अनुमानों की व्याख्या भी बदल सकती है। इसलिए किसी समिति का नाम केवल याद करना पर्याप्त नहीं है; उसके दृष्टिकोण को समझना भी आवश्यक है।
भारतीय गरीबी अध्ययन में डी. टी. लकड़ावाला समिति, सुरेश तेंदुलकर समिति और सी. रंगराजन समिति विशेष रूप से चर्चित हैं। इन समितियों की सिफारिशों में गरीबी रेखा, उपभोग व्यय और न्यूनतम आवश्यकताओं के आकलन से संबंधित महत्वपूर्ण बदलाव दिखाई देते हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं में अक्सर पूछा जाता है कि कौन-सी समिति किस पद्धति या अवधारणा से जुड़ी थी।
| समिति | मुख्य संदर्भ |
|---|---|
| लकड़ावाला समिति | गरीबी अनुमान की पुरानी आधिकारिक पद्धति से संबंधित |
| तेंदुलकर समिति | गरीबी रेखा और उपभोग व्यय के आकलन में महत्वपूर्ण बदलाव |
| रंगराजन समिति | गरीबी रेखा के वैकल्पिक आकलन और अधिक व्यापक उपभोग मानक पर जोर |
समितियों के अध्ययन में यह अंतर भी समझना चाहिए कि गरीबी रेखा किसी व्यक्ति की वास्तविक आय का साधारण कटऑफ मात्र नहीं है। विभिन्न पद्धतियों में उपभोग व्यय, कीमतों और आवश्यक वस्तुओं तथा सेवाओं की लागत जैसे तत्वों को अलग-अलग तरीके से शामिल किया जा सकता है। इसलिए दो अलग पद्धतियों से निकले गरीबी अनुमानों की सीधे तुलना करते समय सावधानी आवश्यक है।
लकड़ावाला समिति
डी. टी. लकड़ावाला समिति भारतीय गरीबी मापन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण चरण से जुड़ी है। इस समिति की सिफारिशों के आधार पर लंबे समय तक भारत में गरीबी के आधिकारिक अनुमानों की पद्धति विकसित हुई। परीक्षा में इसका महत्व इसलिए अधिक है क्योंकि यह भारत में गरीबी रेखा निर्धारण की पुरानी पद्धति से सीधे जुड़ी हुई समिति है।
लकड़ावाला दृष्टिकोण में गरीबी का आकलन मुख्यतः प्रति व्यक्ति उपभोग व्यय के आधार पर किया जाता था। अलग-अलग राज्यों और ग्रामीण तथा शहरी क्षेत्रों के लिए कीमतों तथा उपभोग संबंधी परिस्थितियों को ध्यान में रखने का प्रयास किया गया। इससे गरीबी के अनुमान को केवल राष्ट्रीय औसत पर आधारित रखने के बजाय क्षेत्रीय कीमतों और परिस्थितियों से जोड़ने में सहायता मिली।
इस पद्धति की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह थी कि गरीबी रेखा के निर्धारण में पूर्व निर्धारित उपभोग मानकों और उनसे संबंधित व्यय को महत्व दिया गया। बाद में अर्थव्यवस्था, उपभोग पैटर्न और स्वास्थ्य तथा शिक्षा जैसी आवश्यकताओं की बदलती भूमिका के कारण इस दृष्टिकोण की समीक्षा की आवश्यकता महसूस हुई।
प्रतियोगी परीक्षा में लकड़ावाला समिति को तेंदुलकर और रंगराजन समितियों से अलग पहचानना जरूरी है। सामान्यतः प्रश्न समिति के नाम, गरीबी अनुमान की पद्धति और उसके ऐतिहासिक महत्व पर आधारित होते हैं। इसलिए समितियों को कालक्रम और उनकी प्रमुख सिफारिशों के साथ पढ़ना अधिक उपयोगी होता है।
| परीक्षा बिंदु | लकड़ावाला समिति |
|---|---|
| संबंधित क्षेत्र | गरीबी मापन |
| मुख्य आधार | उपभोग व्यय आधारित गरीबी अनुमान |
| महत्व | भारत की पुरानी आधिकारिक गरीबी अनुमान पद्धति |
| बाद में समीक्षा | तेंदुलकर समिति द्वारा नई पद्धति की सिफारिश |
तेंदुलकर समिति
सुरेश तेंदुलकर समिति ने भारत में गरीबी मापन की पद्धति को महत्वपूर्ण रूप से पुनर्विचार करने की दिशा में कार्य किया। इसका उद्देश्य गरीबी रेखा को बदलती आर्थिक परिस्थितियों और लोगों की वास्तविक उपभोग आवश्यकताओं के अधिक उपयुक्त आकलन से जोड़ना था। इसकी सिफारिशों के बाद भारत में गरीबी अनुमान की चर्चा में एक महत्वपूर्ण पद्धतिगत बदलाव आया।
तेंदुलकर समिति ने गरीबी को केवल एक पुराने कैलोरी मानक के आधार पर देखने के बजाय उपभोग व्यय के व्यापक दृष्टिकोण पर जोर दिया। स्वास्थ्य और शिक्षा पर होने वाले निजी खर्च को भी जीवन स्तर के आकलन में महत्व मिला। इससे गरीबी रेखा को लोगों द्वारा आवश्यक वस्तुओं और सेवाओं पर किए जाने वाले वास्तविक खर्च से अधिक निकटता से जोड़ने का प्रयास हुआ।
इस समिति के दृष्टिकोण में ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच पहले से प्रयुक्त अलग-अलग उपभोग टोकरी की जगह एक अधिक तुलनीय संदर्भ अपनाने की दिशा दिखाई देती है। कीमतों में अंतर को समायोजित करने के लिए उपयुक्त मूल्य सूचकांकों का प्रयोग किया गया। यह परिवर्तन गरीबी के तुलनात्मक और अधिक सुसंगत अनुमान के लिए महत्वपूर्ण था।
परीक्षा की दृष्टि से तेंदुलकर समिति को लकड़ावाला समिति के बाद के महत्वपूर्ण सुधार के रूप में याद किया जा सकता है। प्रश्नों में अक्सर पूछा जाता है कि किस समिति ने गरीबी मापन में स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे निजी खर्चों को अधिक महत्व दिया या पुरानी पद्धति की समीक्षा की। इसलिए समिति और उसके दृष्टिकोण का संबंध स्पष्ट रखना चाहिए।
| बिंदु | तेंदुलकर समिति से संबंध |
|---|---|
| मुख्य विषय | गरीबी मापन की नई पद्धति |
| महत्वपूर्ण जोर | उपभोग व्यय और आवश्यक सेवाओं पर खर्च |
| संदर्भ | लकड़ावाला पद्धति की समीक्षा |
| परीक्षा महत्व | समिति की सिफारिशों और गरीबी रेखा से जुड़े प्रश्न |
रंगराजन समिति
सी. रंगराजन समिति ने भारत में गरीबी के आकलन के लिए एक वैकल्पिक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। समिति ने गरीबी रेखा को निर्धारित करने के लिए भोजन के साथ-साथ कपड़े, शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और अन्य आवश्यक गैर-खाद्य जरूरतों पर होने वाले खर्च को अधिक व्यापक रूप से शामिल करने की दिशा में सुझाव दिया।
रंगराजन समिति का दृष्टिकोण यह दर्शाता है कि गरीबी का अर्थ केवल भोजन की न्यूनतम आवश्यकता पूरी न कर पाना नहीं है। आधुनिक जीवन में शिक्षा, स्वास्थ्य, कपड़े, आवास और अन्य आवश्यकताओं पर खर्च भी न्यूनतम जीवन स्तर का हिस्सा हैं। इसलिए गरीबी रेखा निर्धारित करते समय इन आवश्यकताओं की लागत को ध्यान में रखना महत्वपूर्ण है।
समिति ने ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के लिए अलग-अलग गरीबी रेखा टोकरी की अवधारणा को महत्व दिया। इसका उद्देश्य दोनों क्षेत्रों में उपभोग की अलग प्रकृति और आवश्यक वस्तुओं तथा सेवाओं की लागत में अंतर को ध्यान में रखना था। इस कारण रंगराजन समिति का अध्ययन भारतीय गरीबी मापन के विकासक्रम को समझने में उपयोगी है।
तेंदुलकर और रंगराजन समितियों को एक-दूसरे से जोड़कर पढ़ना परीक्षा की दृष्टि से लाभकारी है। तेंदुलकर पद्धति में उपभोग व्यय और आवश्यक सेवाओं के खर्च को महत्व मिला, जबकि रंगराजन समिति ने गरीबी रेखा के लिए अधिक व्यापक उपभोग टोकरी और न्यूनतम आवश्यकताओं के खर्च पर जोर दिया।
| बिंदु | रंगराजन समिति |
|---|---|
| मुख्य विषय | गरीबी रेखा और गरीबी अनुमान |
| दृष्टिकोण | भोजन तथा आवश्यक गैर-खाद्य जरूरतों का व्यापक समावेश |
| क्षेत्रीय आधार | ग्रामीण और शहरी परिस्थितियों को अलग संदर्भ में देखना |
| परीक्षा महत्व | गरीबी मापन की समितियों के तुलनात्मक प्रश्न |
बहुआयामी गरीबी
बहुआयामी गरीबी का दृष्टिकोण गरीबी को केवल आय या उपभोग व्यय की कमी के रूप में नहीं देखता। इसमें व्यक्ति या परिवार के जीवन से जुड़ी कई प्रकार की वंचनाओं को एक साथ समझने का प्रयास किया जाता है। शिक्षा, स्वास्थ्य और जीवन स्तर जैसी स्थितियाँ इस व्यापक दृष्टिकोण के महत्वपूर्ण आयाम हो सकती हैं।
मौद्रिक गरीबी में मुख्य प्रश्न यह होता है कि किसी व्यक्ति या परिवार का आय अथवा उपभोग व्यय निर्धारित गरीबी रेखा से नीचे है या नहीं। इसके विपरीत बहुआयामी दृष्टिकोण यह पूछता है कि परिवार को जीवन की आवश्यक सुविधाओं में किन-किन क्षेत्रों में वंचना का सामना करना पड़ रहा है। इसलिए दोनों माप अलग-अलग प्रकार की जानकारी देते हैं।
बहुआयामी गरीबी को समझने में शिक्षा से संबंधित उपलब्धता और उपस्थिति, स्वास्थ्य संबंधी परिस्थितियाँ तथा जीवन स्तर से जुड़ी सुविधाएँ महत्वपूर्ण हो सकती हैं। स्वच्छता, पेयजल, आवास, बिजली और अन्य बुनियादी सुविधाओं की कमी भी परिवार की वास्तविक जीवन स्थितियों को प्रभावित करती है।
भारत में बहुआयामी गरीबी के संदर्भ में नीति निर्माण का उद्देश्य केवल आय बढ़ाना नहीं बल्कि विभिन्न सामाजिक और आर्थिक वंचनाओं को कम करना भी है। यदि किसी परिवार की आय गरीबी रेखा से ऊपर है लेकिन उसे स्वास्थ्य, शिक्षा या स्वच्छता जैसी आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध नहीं हैं, तो केवल आय के आधार पर उसकी पूरी स्थिति समझना कठिन हो सकता है।
| दृष्टिकोण | मुख्य ध्यान |
|---|---|
| मौद्रिक गरीबी | आय या उपभोग व्यय का निर्धारित सीमा से नीचे होना |
| बहुआयामी गरीबी | विभिन्न सामाजिक और जीवन-स्तर संबंधी वंचनाएँ |
परीक्षा में बहुआयामी गरीबी और गरीबी रेखा के बीच अंतर पूछा जा सकता है। याद रखें कि बहुआयामी दृष्टिकोण गरीबी के अनेक आयामों को साथ लेकर चलता है। इसलिए इसे केवल एक मौद्रिक सीमा का दूसरा नाम मानना सही नहीं है।
गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम
गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों का उद्देश्य गरीब और कमजोर वर्गों की आय, रोजगार, खाद्य सुरक्षा, आवास, वित्तीय पहुँच तथा बुनियादी सेवाओं की स्थिति में सुधार करना रहा है। भारत में समय के साथ गरीबी कम करने के लिए रोजगार आधारित, आजीविका आधारित और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े अनेक कार्यक्रम विकसित किए गए।
गरीबी कम करने की नीति में केवल तत्काल आय सहायता पर्याप्त नहीं मानी जाती। दीर्घकाल में कौशल, उत्पादक रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, आधारभूत सुविधाओं और वित्तीय समावेशन में सुधार व्यक्ति की आय अर्जित करने की क्षमता को मजबूत कर सकते हैं। इसी कारण गरीबी उन्मूलन को व्यापक विकास नीति से जोड़कर देखना आवश्यक है।
ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और आजीविका से जुड़े कार्यक्रम विशेष महत्व रखते हैं। रोजगार के अवसर बढ़ने से परिवार की आय में सुधार हो सकता है और आर्थिक संकट के समय न्यूनतम सुरक्षा मिल सकती है। इसी प्रकार स्वयं सहायता समूह, कौशल विकास और ग्रामीण अवसंरचना जैसी पहलें स्थानीय आर्थिक गतिविधियों को मजबूत कर सकती हैं।
शहरी क्षेत्रों में गरीबी से निपटने के लिए कौशल, रोजगार, आवास, सार्वजनिक सेवाओं और सामाजिक सुरक्षा तक पहुँच महत्वपूर्ण है। शहरी गरीबों की समस्याएँ ग्रामीण गरीबी से अलग हो सकती हैं क्योंकि उनमें अनौपचारिक रोजगार, आवास की लागत, परिवहन और बुनियादी सेवाओं तक पहुँच जैसे मुद्दे अधिक प्रमुख हो सकते हैं।
गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों का मूल्यांकन करते समय केवल लाभार्थियों की संख्या देखना पर्याप्त नहीं है। यह भी देखना आवश्यक है कि कार्यक्रम से वास्तविक आय, रोजगार, पोषण, शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और सामाजिक सुरक्षा में कितना सुधार हुआ। लक्षित लाभ सही व्यक्ति तक पहुँचना, कार्यान्वयन की गुणवत्ता और स्थानीय परिस्थितियाँ कार्यक्रम की सफलता को प्रभावित करती हैं।
| नीति क्षेत्र | गरीबी कमी में संभावित योगदान |
|---|---|
| रोजगार | आय और आजीविका के अवसर बढ़ाना |
| कौशल विकास | उत्पादक रोजगार की क्षमता बढ़ाना |
| सामाजिक सुरक्षा | आर्थिक झटकों से कमजोर परिवारों की रक्षा |
| बुनियादी सेवाएँ | स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन स्तर में सुधार |
असमानता के मापन
आय असमानता का अर्थ समाज में अलग-अलग व्यक्तियों या परिवारों के बीच आय के वितरण में अंतर से है। असमानता को समझने के लिए केवल औसत आय देखना पर्याप्त नहीं होता, क्योंकि औसत किसी देश या क्षेत्र की आय के वितरण को नहीं बताता। इसलिए वितरण आधारित संकेतकों का उपयोग किया जाता है।
असमानता के मापन के लिए आय, उपभोग व्यय, संपत्ति या अन्य आर्थिक संसाधनों के वितरण का अध्ययन किया जा सकता है। अलग-अलग संकेतक वितरण के अलग पहलुओं को दर्शाते हैं। परीक्षा में यह समझना जरूरी है कि गरीबी और असमानता एक ही अवधारणा नहीं हैं। गरीबी न्यूनतम मानक से नीचे की स्थिति पर केंद्रित होती है, जबकि असमानता पूरे वितरण में अंतर को देखती है।
असमानता का अध्ययन करते समय क्विंटाइल, दशमक, प्रतिशतक और विभिन्न समूहों की आय हिस्सेदारी जैसे तरीके उपयोगी हो सकते हैं। उदाहरण के लिए आबादी को आय के आधार पर समूहों में बाँटकर यह देखा जा सकता है कि कुल आय का कितना हिस्सा निम्न आय वाले समूहों और उच्च आय वाले समूहों के पास है। इससे वितरण की संरचना को समझने में सहायता मिलती है।
असमानता का स्तर आर्थिक अवसरों, शिक्षा, स्वास्थ्य, संपत्ति, रोजगार और सामाजिक गतिशीलता से जुड़ा हो सकता है। यदि आर्थिक विकास का लाभ विभिन्न समूहों तक समान रूप से नहीं पहुँचता, तो औसत आय बढ़ने के बावजूद असमानता बनी रह सकती है या बढ़ सकती है। इसलिए समावेशी विकास में वृद्धि के साथ वितरण संबंधी परिणामों पर भी ध्यान दिया जाता है।
| मापन का तरीका | क्या समझने में सहायता मिलती है |
|---|---|
| आय हिस्सेदारी | विभिन्न आय समूहों के पास कुल आय का हिस्सा |
| उपभोग हिस्सेदारी | विभिन्न समूहों के उपभोग वितरण का अंतर |
| क्विंटाइल विश्लेषण | आबादी के पाँच आय समूहों की तुलना |
| गिनी गुणांक | आय या उपभोग वितरण की असमानता का संक्षिप्त संकेतक |
गिनी गुणांक
गिनी गुणांक आय या उपभोग वितरण में असमानता को मापने वाला एक प्रसिद्ध सांख्यिकीय संकेतक है। इसका मान सामान्यतः 0 से 1 के बीच व्यक्त किया जाता है। शून्य के निकट मान अधिक समान वितरण का संकेत देता है, जबकि 1 के निकट मान अधिक असमान वितरण की ओर संकेत करता है। कुछ स्रोतों में इसे 0 से 100 के पैमाने पर भी व्यक्त किया जाता है।
गिनी गुणांक का संबंध लॉरेन्ज वक्र से है। लॉरेन्ज वक्र वास्तविक आय वितरण और पूर्ण समानता की स्थिति के बीच अंतर को दर्शाता है। पूर्ण समानता की स्थिति में आबादी का प्रत्येक हिस्सा कुल आय के उसी अनुपात का हिस्सा रखता है। वास्तविक वितरण इस रेखा से जितना अधिक दूर होता है, असमानता उतनी अधिक मानी जाती है और गिनी गुणांक भी सामान्यतः अधिक होता है।
गिनी गुणांक की सबसे बड़ी उपयोगिता यह है कि यह आय या उपभोग वितरण की जटिल जानकारी को एक संक्षिप्त संख्या में व्यक्त करता है। इससे अलग-अलग समय, क्षेत्रों या देशों के बीच वितरण संबंधी तुलना करना आसान हो सकता है। हालांकि किसी एक संकेतक से असमानता की पूरी तस्वीर समझना हमेशा पर्याप्त नहीं होता।
परीक्षा में गिनी गुणांक के मान की व्याख्या पर प्रश्न पूछा जा सकता है। यदि गिनी गुणांक बढ़ता है तो सामान्यतः वितरण में असमानता बढ़ने का संकेत मिलता है। यदि यह घटता है तो वितरण अधिक समान होने की दिशा में जा सकता है। लेकिन तुलना करते समय समान मापन पद्धति, आय या उपभोग आधार और संबंधित समय अवधि का ध्यान रखना चाहिए।
| गिनी गुणांक | सामान्य व्याख्या |
|---|---|
| 0 के निकट | अधिक समान वितरण |
| 1 के निकट | अधिक असमान वितरण |
| बढ़ता मान | असमानता बढ़ने का संकेत |
| घटता मान | अधिक समान वितरण की दिशा का संकेत |
यह भी याद रखना चाहिए कि गिनी गुणांक गरीबी की संख्या नहीं बताता। किसी देश में गरीबी कम हो सकती है लेकिन आय असमानता फिर भी अधिक हो सकती है। इसी प्रकार असमानता कम होने पर भी यदि सभी लोगों की आय बहुत कम है, तो गरीबी की समस्या बनी रह सकती है। इसलिए दोनों संकेतकों को अलग-अलग समझना आवश्यक है।
गरीबी और समावेशी विकास
समावेशी विकास का उद्देश्य आर्थिक विकास के लाभों को समाज के विभिन्न वर्गों और क्षेत्रों तक व्यापक रूप से पहुँचाना है। गरीबी कमी इस दृष्टिकोण का महत्वपूर्ण हिस्सा है, क्योंकि केवल राष्ट्रीय आय या उत्पादन बढ़ना पर्याप्त नहीं माना जाता। विकास की प्रक्रिया में रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, बुनियादी सेवाओं और आर्थिक अवसरों तक कमजोर वर्गों की पहुँच भी महत्वपूर्ण होती है।
गरीबी कम करने के लिए उत्पादक रोजगार का विस्तार विशेष महत्व रखता है। यदि गरीब परिवारों को स्थायी और पर्याप्त आय वाले रोजगार मिलते हैं, तो वे अपनी उपभोग क्षमता बढ़ाने के साथ शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास जैसी आवश्यकताओं पर अधिक खर्च कर सकते हैं। कौशल विकास और बेहतर अवसंरचना भी रोजगार के अवसरों को बढ़ाने में सहायता कर सकते हैं।
समावेशी विकास में सामाजिक सुरक्षा की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। बीमारी, बेरोजगारी, प्राकृतिक आपदा या अन्य आर्थिक झटके गरीब परिवारों की स्थिति को अचानक खराब कर सकते हैं। सामाजिक सुरक्षा ऐसे जोखिमों से न्यूनतम संरक्षण प्रदान कर सकती है। इससे परिवारों को संकट के समय आवश्यक उपभोग बनाए रखने और अत्यधिक ऋण पर निर्भरता कम करने में सहायता मिल सकती है।
शिक्षा और स्वास्थ्य में निवेश गरीबी कमी का दीर्घकालीन आधार है। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मानव पूंजी और भविष्य की आय क्षमता को मजबूत करती है, जबकि बेहतर स्वास्थ्य व्यक्ति की कार्यक्षमता और रोजगार में भागीदारी को प्रभावित करता है। इसलिए समावेशी विकास में केवल वर्तमान आय नहीं बल्कि भविष्य की उत्पादक क्षमता पर भी ध्यान देना आवश्यक है।
असमानता को कम करना भी समावेशी विकास का महत्वपूर्ण पहलू हो सकता है। यदि आर्थिक अवसरों और संसाधनों का वितरण बहुत असमान है, तो निम्न आय वाले परिवारों की शिक्षा, स्वास्थ्य, वित्तीय सेवाओं और उत्पादक संपत्तियों तक पहुँच सीमित हो सकती है। इसलिए व्यापक विकास रणनीति में अवसरों की समानता और कमजोर समूहों की भागीदारी को महत्व दिया जाता है।
| समावेशी विकास का क्षेत्र | गरीबी कमी में भूमिका |
|---|---|
| रोजगार | आय और आजीविका के अवसर बढ़ाना |
| शिक्षा | मानव पूंजी और भविष्य की आय क्षमता मजबूत करना |
| स्वास्थ्य | उत्पादकता और जीवन स्तर सुधारना |
| सामाजिक सुरक्षा | आर्थिक झटकों से संरक्षण |
| वित्तीय समावेशन | औपचारिक वित्तीय सेवाओं तक पहुँच बढ़ाना |
परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य
गरीबी और असमानता से जुड़े प्रश्नों में समितियों के नाम, उनके कार्यकाल से संबंधित संदर्भ, गरीबी रेखा निर्धारण की पद्धति और विभिन्न दृष्टिकोणों के बीच अंतर बार-बार पूछा जा सकता है। इसलिए केवल गरीबी की सामान्य परिभाषा याद करना पर्याप्त नहीं है। लकड़ावाला, तेंदुलकर और रंगराजन समितियों की प्रमुख विशेषताओं को क्रम से समझना आवश्यक है।
परीक्षा में यह भ्रम हो सकता है कि सभी गरीबी समितियों ने एक ही आधार पर गरीबी रेखा निर्धारित की थी। वास्तव में समय के साथ गरीबी मापन की पद्धतियों में बदलाव हुआ। बदलती कीमतों, उपभोग पैटर्न और स्वास्थ्य तथा शिक्षा जैसी आवश्यकताओं के महत्व ने गरीबी मापन को अधिक व्यापक बनाने की आवश्यकता पैदा की।
बहुआयामी गरीबी से संबंधित प्रश्नों में यह ध्यान रखना चाहिए कि इसका उद्देश्य केवल आय की कमी को मापना नहीं है। इसमें विभिन्न प्रकार की वंचनाओं को संयुक्त रूप से देखा जाता है। इसलिए किसी परिवार की मौद्रिक गरीबी की स्थिति और उसकी बहुआयामी गरीबी की स्थिति एक जैसी होना आवश्यक नहीं है।
गिनी गुणांक से संबंधित प्रश्नों में मान की दिशा पर विशेष ध्यान देना चाहिए। सामान्यतः 0 पूर्ण समानता और 1 पूर्ण असमानता की सैद्धांतिक सीमाओं को दर्शाता है। इसलिए गिनी गुणांक का अधिक होना अधिक असमान वितरण का संकेत देता है। इसे गरीबी दर समझना एक सामान्य परीक्षा भ्रम है।
| तथ्य | याद रखने योग्य बिंदु |
|---|---|
| लकड़ावाला समिति | भारत की पुरानी गरीबी अनुमान पद्धति से संबंधित |
| तेंदुलकर समिति | गरीबी मापन में उपभोग व्यय और आवश्यक सेवाओं पर खर्च को महत्व |
| रंगराजन समिति | अधिक व्यापक न्यूनतम उपभोग आवश्यकताओं के आधार पर गरीबी रेखा का वैकल्पिक आकलन |
| बहुआयामी गरीबी | आय से आगे बढ़कर अनेक वंचनाओं का अध्ययन |
| गिनी गुणांक | आय या उपभोग वितरण में असमानता का संकेतक |
गरीबी मापन में समितियों का महत्व
गरीबी मापन की समितियों का महत्व इस बात में है कि उन्होंने अलग-अलग समय में उपलब्ध आर्थिक आँकड़ों और सामाजिक परिस्थितियों के आधार पर गरीबी के आकलन को अधिक उपयुक्त बनाने का प्रयास किया। किसी भी गरीबी रेखा के पीछे यह प्रश्न होता है कि न्यूनतम जीवन स्तर के लिए किन वस्तुओं और सेवाओं को आवश्यक माना जाए तथा उनकी लागत कैसे निर्धारित की जाए।
समितियों की सिफारिशों को समझने से यह स्पष्ट होता है कि गरीबी मापन एक स्थिर प्रक्रिया नहीं है। अर्थव्यवस्था में कीमतों, उपभोग के पैटर्न, सेवाओं की लागत और लोगों की आवश्यकताओं में बदलाव के साथ मापन पद्धति की समीक्षा की आवश्यकता हो सकती है। इसलिए अलग-अलग समितियों के अनुमान को उनके संबंधित पद्धतिगत संदर्भ में देखना चाहिए।
प्रतियोगी परीक्षाओं में समितियों से जुड़े प्रश्न अक्सर मिलान, कथन-आधारित या कालक्रम के रूप में आते हैं। उदाहरण के लिए पूछा जा सकता है कि किस समिति ने किस प्रकार की गरीबी रेखा पद्धति पर जोर दिया। इसलिए समिति का नाम, प्रमुख विचार और उसके बाद आए सुधारों का क्रम साथ में पढ़ना सबसे उपयोगी रणनीति है।
गरीबी और नीति निर्माण
गरीबी के विश्वसनीय मापन से सरकार को यह समझने में सहायता मिलती है कि कमजोर आबादी का आकार और उसकी स्थिति कैसी है। इससे रोजगार, खाद्य सुरक्षा, आवास, सामाजिक सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य और आजीविका से संबंधित नीतियों के लिए प्राथमिकताएँ निर्धारित करने में सहायता मिल सकती है।
गरीबी के आँकड़ों की उपयोगिता तभी बढ़ती है जब उन्हें क्षेत्र, ग्रामीण-शहरी स्थिति और सामाजिक-आर्थिक विशेषताओं के संदर्भ में भी देखा जाए। राष्ट्रीय औसत किसी विशेष राज्य, जिले या समुदाय की कठिनाइयों को छिपा सकता है। इसलिए लक्षित नीति निर्माण के लिए अधिक सूक्ष्म आँकड़ों की आवश्यकता होती है।
गरीबी और असमानता के बीच संबंध
गरीबी और असमानता में स्पष्ट अंतर समझना आवश्यक है। गरीबी किसी न्यूनतम मानक से नीचे रहने की स्थिति को दर्शा सकती है, जबकि असमानता आबादी के विभिन्न समूहों के बीच आय या उपभोग के वितरण में अंतर को मापती है। किसी अर्थव्यवस्था में गरीबी कम होने के साथ-साथ असमानता बनी रह सकती है।
उदाहरण के लिए यदि सभी आय समूहों की आय बढ़ती है लेकिन उच्च आय वाले समूहों की आय अधिक तेजी से बढ़ती है, तो औसत आय बढ़ने के बावजूद असमानता बढ़ सकती है। इसी तरह केवल असमानता का स्तर देखकर यह तय नहीं किया जा सकता कि कितने लोग गरीबी में रह रहे हैं। दोनों के लिए अलग संकेतक और नीति दृष्टिकोण आवश्यक हैं।
बहुआयामी दृष्टिकोण का महत्व
बहुआयामी गरीबी शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, स्वच्छता और जीवन स्तर जैसी अनेक वंचनाओं को साथ में देखने का प्रयास करती है। इससे केवल आय आधारित गरीबी से आगे बढ़कर परिवारों की वास्तविक जीवन परिस्थितियों का व्यापक आकलन किया जा सकता है।
परीक्षा में सामान्य भ्रम
परीक्षा में गरीबी रेखा, गरीबी दर, गरीबी समिति, बहुआयामी गरीबी और असमानता के संकेतकों को एक-दूसरे का पर्याय मानने से गलत उत्तर हो सकता है। गरीबी रेखा एक निर्धारित न्यूनतम मानक है, जबकि गरीबी दर उस मानक से नीचे रहने वाली आबादी के अनुपात से संबंधित हो सकती है।
एक अन्य सामान्य भ्रम यह है कि गिनी गुणांक गरीबी को मापता है। वास्तव में यह आय या उपभोग वितरण में असमानता को दर्शाता है। इसी प्रकार बहुआयामी गरीबी को केवल कम आय का दूसरा नाम नहीं माना जाना चाहिए, क्योंकि इसमें अनेक प्रकार की सामाजिक और जीवन-स्तर संबंधी वंचनाएँ शामिल हो सकती हैं।
त्वरित पुनरावृत्ति
गरीबी समितियाँ, लकड़ावाला समिति, तेंदुलकर समिति, रंगराजन समिति, बहुआयामी गरीबी, गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम, असमानता के मापन और गिनी गुणांक इस भाग के प्रमुख परीक्षा बिंदु हैं। इनके साथ समावेशी विकास और संबंधित महत्वपूर्ण तथ्यों को भी दोहराना चाहिए।
समग्र परीक्षा महत्व
यह विषय भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रतियोगी परीक्षाओं में तथ्यात्मक तथा अवधारणात्मक दोनों प्रकार के प्रश्नों के लिए उपयोगी है। समितियों की सिफारिशों, गरीबी मापन की पद्धतियों और असमानता के संकेतकों को क्रम तथा विशेषताओं के साथ समझना बेहतर उत्तर देने में सहायता करता है।