Environment Protection Act 1986: नियम, संशोधन, प्रवर्तन और दंड व्यवस्था
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Environment Protection Act 1986 के तहत बने नियम, EIA, CRZ, Waste Management Rules, प्रवर्तन व्यवस्था और Jan Vishwas 2023 के बाद नई दंड प्रणाली की पूरी जानकारी।
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💡 व्याख्या
📚 विस्तृत जानकारी
पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 एक समर्थकारी कानून है, इसलिए इसका वास्तविक क्रियान्वयन इसके तहत बनाए गए नियमों और अधिसूचनाओं से होता है। अधिनियम की धारा 6 और धारा 25 केंद्र सरकार को पर्यावरण गुणवत्ता मानक, उत्सर्जन मानक, प्रतिबंधित क्षेत्र और खतरनाक पदार्थों के प्रबंधन के लिए नियम बनाने की व्यापक शक्ति देती है। इसी शक्ति के तहत सबसे पहला और आधारभूत नियम पर्यावरण (संरक्षण) नियम, 1986 बनाया गया, जिसे 19 नवंबर 1986 को ही अधिसूचित किया गया था। यही नियम इस पूरे नियामक ढांचे की नींव है और समय-समय पर इसमें संशोधन कर नए मानक जोड़े जाते रहे हैं।
पर्यावरण (संरक्षण) नियम, 1986 में चार अनुसूचियां हैं जो इसके तकनीकी पक्ष को स्पष्ट करती हैं। अनुसूची एक में 100 से अधिक उद्योगों जैसे चीनी, सीमेंट, उर्वरक, पेट्रोलियम रिफाइनरी, ताप विद्युत संयंत्र के लिए उत्सर्जन और बहिःस्राव के मानक निर्धारित हैं। अनुसूची दो में खतरनाक पदार्थों के प्रबंधन की प्रक्रिया और अधिकतम अनुमत सांद्रता, अनुसूची तीन में पर्यावरण नमूना लेने की विधि और अनुसूची चार में मान्यता प्राप्त प्रयोगशालाओं और सरकारी विश्लेषकों की सूची दी गई है। इन नियमों के तहत केंद्र सरकार किसी भी नए उद्योग के लिए मानक तय कर सकती है और राज्य बोर्डों को इन मानकों को और अधिक कठोर बनाने का अधिकार भी दिया गया है।
इसी अधिनियम के तहत पिछले चार दशकों में भारत की पूरी पर्यावरणीय नियामक व्यवस्था विकसित हुई है। प्रमुख अधिसूचनाओं में पर्यावरण प्रभाव आकलन यानी EIA अधिसूचना सबसे महत्वपूर्ण है। पहली EIA अधिसूचना 27 जनवरी 1994 को जारी हुई थी और इसे पूरी तरह से संशोधित कर नई EIA अधिसूचना 14 सितंबर 2006 को लाई गई। इसके अनुसार 39 प्रकार की परियोजनाओं जैसे खनन, ताप विद्युत, बुनियादी ढांचा और उद्योग को पर्यावरणीय स्वीकृति लेना अनिवार्य है, जिसे श्रेणी A के लिए MoEFCC और श्रेणी B के लिए SEIAA द्वारा दिया जाता है। इसी प्रकार तटीय विनियमन क्षेत्र यानी CRZ अधिसूचना पहली बार 1991 में आई, फिर 2011 में और वर्तमान में CRZ अधिसूचना 2019 लागू है, जो समुद्र के ज्वार रेखा से 500 मीटर तक और खाड़ी, ज्वारीय जल निकायों में 100 मीटर तक निर्माण गतिविधियों को चार श्रेणियों CRZ-I से CRZ-IV में नियंत्रित करती है।
अपशिष्ट प्रबंधन के क्षेत्र में इस अधिनियम के तहत 2016 में एक बड़ा सुधार किया गया। 2016 में एक साथ कई नियमों का पुनर्गठन हुआ। इसमें परिसंकटमय और अन्य अपशिष्ट प्रबंधन नियम 2016, जैव चिकित्सा अपशिष्ट प्रबंधन नियम 2016, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम 2016, निर्माण और विध्वंस अपशिष्ट प्रबंधन नियम 2016, प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियम 2016 और ई-अपशिष्ट प्रबंधन नियम शामिल हैं। प्लास्टिक अपशिष्ट नियम में 2022 में महत्वपूर्ण संशोधन कर 1 जुलाई 2022 से 19 प्रकार के सिंगल यूज प्लास्टिक जैसे प्लास्टिक स्टिक, पॉलीस्टाइरीन और PVC बैनर पर प्रतिबंध लगाया गया। ई-अपशिष्ट के लिए नया ई-अपशिष्ट प्रबंधन नियम 2022 नवंबर 2022 में अधिसूचित हुआ जो विस्तारित उत्पादक दायित्व यानी EPR और EPR सर्टिफिकेट ट्रेडिंग पर आधारित है। ध्वनि प्रदूषण विनियमन और नियंत्रण नियम 2000 भी इसी अधिनियम के तहत बना है।
प्रवर्तन की प्रशासनिक व्यवस्था बहु-स्तरीय है। शीर्ष स्तर पर पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय यानी MoEFCC नीति बनाता है, मानक तय करता है और बड़ी परियोजनाओं को पर्यावरणीय स्वीकृति देता है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड यानी CPCB धारा 3 के तहत गठित एक तकनीकी निकाय के रूप में पूरे देश में मानकों के कार्यान्वयन की निगरानी, राज्यों को निर्देश और अखिल भारतीय पर्यावरण गुणवत्ता की निगरानी करता है। राज्य स्तर पर राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड यानी SPCB और केंद्र शासित प्रदेशों में प्रदूषण नियंत्रण समितियां जल अधिनियम 1974 और वायु अधिनियम 1981 के तहत सहमति तंत्र यानी Consent to Establish और Consent to Operate के माध्यम से इस अधिनियम को भी लागू करती हैं। यदि कोई उद्योग मानकों का पालन नहीं करता तो SPCB और CPCB धारा 5 के तहत उद्योग को बंद करने, बिजली-पानी रोकने और सुधारात्मक उपाय करने का निर्देश दे सकते हैं।
अब दंड व्यवस्था को दो स्पष्ट भागों में समझना आवश्यक है ताकि पुराने और वर्तमान प्रावधानों में भ्रम न हो। मूल अधिनियम में दंड का प्रावधान धारा 15 में दिया गया था, जो एक आपराधिक प्रावधान था। मूल धारा 15 के अनुसार किसी भी प्रावधान, नियम या निर्देश का उल्लंघन करने पर पांच साल तक का कारावास या एक लाख रुपये तक का जुर्माना या दोनों का प्रावधान था। यदि उल्लंघन दोषसिद्धि के बाद भी जारी रहता है तो अतिरिक्त पांच हजार रुपये प्रतिदिन का जुर्माना, और यदि उल्लंघन दोषसिद्धि के एक वर्ष बाद भी जारी रहता है तो सात साल तक का कारावास। धारा 16 कंपनियों द्वारा अपराध और धारा 17 सरकारी विभागों द्वारा अपराध के लिए जिम्मेदारी तय करती थी। धारा 19 के अनुसार न्यायालय इस अधिनियम के तहत मामला केवल केंद्र सरकार या उसके द्वारा अधिकृत व्यक्ति की शिकायत पर ही संज्ञान ले सकता था।
इस दंड व्यवस्था में बड़ा परिवर्तन जन विश्वास (प्रावधानों का संशोधन) अधिनियम, 2023 द्वारा किया गया, जो 2024 से प्रभावी हुआ। इस संशोधन ने आपराधिक दंड को नागरिक दंड में बदल दिया है ताकि व्यापार करने में आसानी बनी रहे। वर्तमान कानूनी स्थिति के अनुसार नई धारा 15 के तहत कारावास का प्रावधान हटा दिया गया है और इसे पेनल्टी में बदल दिया गया है। अब धारा 15(1) के अनुसार उल्लंघन पर कम से कम दस हजार रुपये और अधिकतम पंद्रह लाख रुपये तक की पेनल्टी लगाई जा सकती है। निरंतर उल्लंघन पर अतिरिक्त पेनल्टी का प्रावधान है। इस संशोधन द्वारा दो नई धाराएं जोड़ी गई हैं - धारा 15A जो निर्णय अधिकारी यानी Adjudicating Officer की नियुक्ति का प्रावधान करती है, जो संयुक्त सचिव स्तर से कम का अधिकारी नहीं होगा और पेनल्टी की मात्रा तय करेगा, और धारा 15B जो पर्यावरण संरक्षण निधि यानी Environmental Protection Fund की स्थापना करती है, जिसमें वसूली गई पेनल्टी जमा होगी और इसका उपयोग पर्यावरण संरक्षण के लिए होगा। गंभीर और आदतन अपराधों के लिए भारतीय न्याय संहिता के तहत आपराधिक कार्रवाई का विकल्प अभी भी उपलब्ध है।
⚡ Quick Revision - मुख्य बिंदु
- ✅ पर्यावरण (संरक्षण) नियम, 1986 इस अधिनियम का मदर रूल है, जिसमें 4 अनुसूचियों में 100 से अधिक उद्योगों के मानक तय हैं।
- ✅ EIA अधिसूचना 2006 और CRZ अधिसूचना 2019 इसी अधिनियम के तहत बनी सबसे महत्वपूर्ण नियामक अधिसूचनाएं हैं।
- ✅ 2016 में 6 प्रमुख अपशिष्ट प्रबंधन नियम और 2022 में EPR आधारित ई-अपशिष्ट नियम इसी अधिनियम के तहत अधिसूचित हुए हैं।
- ✅ प्रवर्तन MoEFCC द्वारा नीति, CPCB द्वारा तकनीकी निगरानी और SPCB द्वारा सहमति तंत्र के माध्यम से किया जाता है।
- ✅ मूल धारा 15 में 5 साल तक कारावास और 1 लाख जुर्माने का आपराधिक दंड था, जो धारा 16 और 17 के साथ लागू होता था।
- ✅ जन विश्वास अधिनियम 2023 के बाद नई धारा 15 में कारावास हटाकर 15 लाख रुपये तक की नागरिक पेनल्टी और निर्णय अधिकारी की व्यवस्था लागू हुई है।
- ✅ अधिनियम के तहत धारा 5 में उद्योग बंद करने तक का निर्देश देने की शक्ति प्रवर्तन को सबसे प्रभावी बनाती है।
📊 Important Facts Table
| Topic | Fact |
|---|---|
| आधारभूत नियम | पर्यावरण (संरक्षण) नियम, 1986 को 19 नवंबर 1986 को अधिसूचित किया गया, यह अधिनियम के तहत बना पहला और मदर रूल है। |
| नियमों की संरचना | इन नियमों में 4 अनुसूचियां हैं, अनुसूची-1 में 100 से अधिक उद्योगों के लिए उत्सर्जन और बहिःस्राव के मानक निर्धारित हैं। |
| EIA अधिसूचना | EIA अधिसूचना 2006 के अनुसार 39 प्रकार की परियोजनाओं को पर्यावरणीय स्वीकृति लेना अनिवार्य है, श्रेणी A को MoEFCC और B को SEIAA स्वीकृति देता है। |
| CRZ अधिसूचना | वर्तमान CRZ अधिसूचना 2019 लागू है, जो ज्वार रेखा से 500 मीटर तक और ज्वारीय क्षेत्रों में 100 मीटर तक निर्माण को CRZ-I से IV में वर्गीकृत कर नियंत्रित करती है। |
| अपशिष्ट प्रबंधन नियम 2016 | अधिनियम के तहत 2016 में 6 प्रमुख अपशिष्ट नियम एक साथ लाए गए - खतरनाक, जैव चिकित्सा, ठोस, प्लास्टिक, ई-अपशिष्ट और निर्माण-विध्वंस अपशिष्ट नियम। |
| प्लास्टिक प्रतिबंध | प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन संशोधन नियम 2022 के तहत 1 जुलाई 2022 से 19 प्रकार के सिंगल यूज प्लास्टिक पर प्रतिबंध लागू किया गया। |
| प्रवर्तन एजेंसी | केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड CPCB धारा 3(3) के तहत गठित शीर्ष तकनीकी निकाय है जो मानकों के प्रवर्तन और निगरानी के लिए जिम्मेदार है। |
| मूल दंड धारा 15 | मूल धारा 15 के तहत उल्लंघन पर 5 साल तक कारावास या 1 लाख जुर्माना, जारी उल्लंघन पर 5000 रुपये प्रतिदिन और 1 साल से अधिक जारी रहने पर 7 साल तक कारावास का प्रावधान था। |
| जन विश्वास संशोधन 2023 | जन विश्वास अधिनियम 2023 ने धारा 15 को असैन्य बनाया, अब कारावास हटाकर 10 हजार से 15 लाख रुपये तक की पेनल्टी का प्रावधान है। |
| नई धाराएं 15A और 15B | संशोधन द्वारा धारा 15A में निर्णय अधिकारी की नियुक्ति और धारा 15B में पर्यावरण संरक्षण निधि की स्थापना का प्रावधान जोड़ा गया है। |