क्योटो प्रोटोकॉल क्या है? इतिहास, उद्देश्य, तंत्र और भारत की भूमिका
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क्योटो प्रोटोकॉल का इतिहास, UNFCCC से संबंध, उद्देश्य, पहली और दूसरी प्रतिबद्धता अवधि, 3 तंत्र CDM, JI, Emissions Trading और CBDR सिद्धांत की पूरी जानकारी।
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💡 व्याख्या
📚 विस्तृत जानकारी
क्योटो प्रोटोकॉल की पृष्ठभूमि जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन यानी UNFCCC से जुड़ी है। UNFCCC 1992 में रियो पृथ्वी सम्मेलन में अपनाया गया था और 1994 में लागू हुआ था। UNFCCC का उद्देश्य ग्रीनहाउस गैसों की सांद्रता को खतरनाक स्तर से नीचे रखना था, लेकिन इसमें विकसित देशों के लिए कोई बाध्यकारी कटौती लक्ष्य नहीं था। इस कमी को पूरा करने के लिए 1995 में बर्लिन मैंडेट अपनाया गया, जिसमें तय हुआ कि विकसित देशों के लिए कानूनी रूप से बाध्यकारी लक्ष्य तय किए जाएंगे। इसी पृष्ठभूमि में क्योटो प्रोटोकॉल का जन्म हुआ।
क्योटो प्रोटोकॉल को 11 दिसंबर 1997 को जापान के क्योटो शहर में COP-3 सम्मेलन में अपनाया गया था। यह UNFCCC से जुड़ा पहला कानूनी रूप से बाध्यकारी समझौता है। यह प्रोटोकॉल 16 फरवरी 2005 को लागू हुआ, जब रूस द्वारा अनुसमर्थन के बाद 55 देशों द्वारा 55 प्रतिशत उत्सर्जन की शर्त पूरी हुई। यह प्रोटोकॉल जलवायु न्याय के मूल सिद्धांत Common but Differentiated Responsibilities and Respective Capabilities यानी CBDR-RC पर आधारित है, जिसका अर्थ है कि जलवायु परिवर्तन की समस्या में सभी देशों की साझा जिम्मेदारी है लेकिन विकसित देशों की ऐतिहासिक उत्सर्जन में अधिक भूमिका के कारण उनकी जिम्मेदारी अधिक है।
क्योटो प्रोटोकॉल का मुख्य उद्देश्य वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों की सांद्रता को कम करना था। इसके तहत 6 ग्रीनहाउस गैसों को शामिल किया गया - कार्बन डाइऑक्साइड CO2, मीथेन CH4, नाइट्रस ऑक्साइड N2O, हाइड्रोफ्लोरोकार्बन HFCs, परफ्लोरोकार्बन PFCs और सल्फर हेक्साफ्लोराइड SF6। प्रोटोकॉल ने केवल विकसित देशों यानी Annex I देशों के लिए बाध्यकारी लक्ष्य तय किए। विकासशील देशों जैसे भारत और चीन के लिए कोई बाध्यकारी लक्ष्य नहीं रखा गया, क्योंकि CBDR सिद्धांत के अनुसार उनकी प्रति व्यक्ति ऐतिहासिक उत्सर्जन कम था।
पहली प्रतिबद्धता अवधि 2008 से 2012 तक थी। इस अवधि में 37 औद्योगिक देशों और यूरोपीय संघ ने 1990 के स्तर से औसतन 5.2 प्रतिशत उत्सर्जन कम करने का बाध्यकारी लक्ष्य लिया था। यूरोपीय संघ ने 8 प्रतिशत, जापान ने 6 प्रतिशत और रूस ने 1990 के स्तर को बनाए रखने का लक्ष्य लिया था। यह अवधि प्रोटोकॉल के अनुच्छेद 3 के तहत तय की गई थी।
दूसरी प्रतिबद्धता अवधि 2013 से 2020 तक थी। इसे 8 दिसंबर 2012 को दोहा, कतर में COP-18 में अपनाए गए दोहा संशोधन द्वारा तय किया गया। इसमें 37 विकसित देशों ने 1990 के स्तर से 18 प्रतिशत उत्सर्जन कम करने का लक्ष्य लिया। दोहा संशोधन 31 दिसंबर 2020 को लागू हुआ, जब आवश्यक संख्या में देशों ने इसका अनुसमर्थन किया। अमेरिका ने क्योटो प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर किए लेकिन कभी अनुसमर्थन नहीं किया, और कनाडा 2011 में प्रोटोकॉल से बाहर हो गया।
क्योटो प्रोटोकॉल ने उत्सर्जन कटौती को लचीला और किफायती बनाने के लिए तीन बाजार आधारित तंत्रों का परिचय दिया। पहला Emissions Trading यानी उत्सर्जन व्यापार, अनुच्छेद 17 के तहत, जिसमें Annex I देश आपस में उत्सर्जन इकाइयों का व्यापार कर सकते हैं। दूसरा Joint Implementation यानी JI, अनुच्छेद 6 के तहत, जिसमें एक विकसित देश दूसरे विकसित देश में उत्सर्जन कटौती परियोजना लगाकर क्रेडिट प्राप्त कर सकता है। तीसरा Clean Development Mechanism यानी CDM, अनुच्छेद 12 के तहत, जिसमें विकसित देश विकासशील देशों में स्वच्छ परियोजना लगाकर Certified Emission Reduction यानी CER प्राप्त कर सकते हैं। इन तंत्रों को क्योटो फ्लेक्सिबिलिटी मैकेनिज्म कहा जाता है।
Annex I की भूमिका केंद्रीय थी। Annex I में 41 औद्योगिक देश शामिल थे, जिनमें OECD और परिवर्तनशील अर्थव्यवस्था वाले देश थे। Annex II में केवल OECD देश थे जिन्हें वित्तीय सहायता देनी थी। Non-Annex I में भारत सहित विकासशील देश थे। भारत की भूमिका Non-Annex I देश के रूप में थी। भारत ने क्योटो प्रोटोकॉल का अनुसमर्थन 26 अगस्त 2002 को किया। चूंकि भारत पर कोई बाध्यकारी लक्ष्य नहीं था, इसलिए भारत CDM परियोजनाओं का एक प्रमुख मेजबान बना। भारत ने इस प्रोटोकॉल को CBDR सिद्धांत के अनुरूप विकासशील देशों के हितों की रक्षा के रूप में देखा।
क्योटो प्रोटोकॉल और पेरिस समझौते में मूलभूत अंतर है। क्योटो टॉप-डाउन दृष्टिकोण था जिसमें केवल विकसित देशों पर बाध्यकारी लक्ष्य थे, जबकि पेरिस समझौता 2015 बॉटम-अप दृष्टिकोण है जिसमें सभी देश स्वेच्छा से NDC देते हैं। क्योटो में लक्ष्य 1990 के आधार पर तय थे, जबकि पेरिस में प्रत्येक देश अपना लक्ष्य खुद तय करता है। 2020 के बाद क्योटो प्रोटोकॉल की ऐतिहासिक भूमिका समाप्त हो गई और अब पेरिस समझौता मुख्य वैश्विक जलवायु व्यवस्था है, लेकिन क्योटो ने कार्बन बाजार और CDM जैसे तंत्रों की नींव रखी जो आज भी आर्टिकल 6 के रूप में जारी हैं।
⚡ Quick Revision - मुख्य बिंदु
- ✅ क्योटो प्रोटोकॉल 11 दिसंबर 1997 को COP-3 क्योटो में अपनाया गया और 16 फरवरी 2005 को लागू हुआ।
- ✅ यह UNFCCC का पहला बाध्यकारी प्रोटोकॉल है जो CBDR-RC सिद्धांत पर आधारित है।
- ✅ पहली अवधि 2008-2012 में विकसित देशों ने 1990 से 5.2 प्रतिशत कटौती का लक्ष्य लिया था।
- ✅ दोहा संशोधन द्वारा दूसरी अवधि 2013-2020 में 18 प्रतिशत कटौती लक्ष्य तय किया गया।
- ✅ 3 प्रमुख तंत्र हैं - Emissions Trading, Joint Implementation और Clean Development Mechanism।
- ✅ भारत Non-Annex I देश है, पर कोई बाध्यकारी लक्ष्य नहीं था और भारत CDM का प्रमुख मेजबान बना।
- ✅ क्योटो टॉप-डाउन और केवल विकसित देशों पर बाध्यकारी था, जबकि पेरिस समझौता बॉटम-अप और सभी देशों पर लागू है।
📊 Important Facts Table
| Topic | Fact |
|---|---|
| अपनाया गया | क्योटो प्रोटोकॉल 11 दिसंबर 1997 को COP-3 में जापान के क्योटो में अपनाया गया था। |
| लागू होने की तिथि | यह प्रोटोकॉल 16 फरवरी 2005 को लागू हुआ, जब रूस के अनुसमर्थन से 55 प्रतिशत उत्सर्जन की शर्त पूरी हुई। |
| UNFCCC से संबंध | यह UNFCCC 1992 का प्रोटोकॉल है, जो बर्लिन मैंडेट 1995 के आधार पर बाध्यकारी लक्ष्य तय करने के लिए बना। |
| 6 गैसें | प्रोटोकॉल में 6 गैसें शामिल हैं - CO2, CH4, N2O, HFCs, PFCs और SF6। |
| पहली प्रतिबद्धता अवधि | 2008-2012 में 37 औद्योगिक देशों ने 1990 के स्तर से औसतन 5.2 प्रतिशत कटौती का बाध्यकारी लक्ष्य लिया। |
| दूसरी प्रतिबद्धता अवधि | दोहा संशोधन 8 दिसंबर 2012 द्वारा 2013-2020 के लिए 18 प्रतिशत कटौती लक्ष्य तय किया गया। |
| 3 लचीले तंत्र | 3 तंत्र हैं - Emissions Trading अनुच्छेद 17, Joint Implementation अनुच्छेद 6 और CDM अनुच्छेद 12। |
| CBDR-RC सिद्धांत | प्रोटोकॉल CBDR-RC सिद्धांत पर आधारित है, यानी साझा लेकिन अलग-अलग जिम्मेदारी और क्षमता। |
| भारत की स्थिति | भारत Non-Annex I देश है, भारत ने 26 अगस्त 2002 को अनुसमर्थन किया और पर कोई बाध्यकारी लक्ष्य नहीं था। |
| अमेरिका और कनाडा | अमेरिका ने हस्ताक्षर किए लेकिन अनुसमर्थन नहीं किया, कनाडा 2011 में क्योटो प्रोटोकॉल से बाहर हो गया। |