क्योटो प्रोटोकॉल के तंत्र: उत्सर्जन व्यापार, CDM, JI और सफलता-असफलता
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क्योटो प्रोटोकॉल के 3 तंत्र Emissions Trading, CDM, JI की कार्यप्रणाली, AAUs, CERs, ERUs, भारत में CDM और पहली-दूसरी अवधि की सफलता-असफलता का विश्लेषण।
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💡 व्याख्या
📚 विस्तृत जानकारी
क्योटो प्रोटोकॉल की सबसे बड़ी नवाचार इसकी तीन लचीली बाजार आधारित व्यवस्थाएं थीं, जिन्हें Flexible Mechanisms कहा जाता है। इनका उद्देश्य उत्सर्जन कटौती को जहां सबसे सस्ता हो वहां करना था।
पहला तंत्र Emissions Trading है, जो अनुच्छेद 17 के तहत आता है। इसमें प्रत्येक Annex I देश को एक निश्चित मात्रा में उत्सर्जन की अनुमति दी जाती थी, जिसे Assigned Amount कहा जाता था। इस Assigned Amount को इकाइयों में बांटा जाता था, जिसे Assigned Amount Units यानी AAUs कहते हैं, एक AAU एक टन CO2 समकक्ष के बराबर होता है। क्योटो प्रोटोकॉल में चार प्रकार की Kyoto Units थीं - AAUs, Removal Units RMUs जो वनीकरण से बनती हैं, Emission Reduction Units ERUs जो JI से बनती हैं और Certified Emission Reductions CERs जो CDM से बनती हैं। यदि कोई देश अपना लक्ष्य पूरा करने के बाद अतिरिक्त AAUs बचा लेता है तो वह उसे दूसरे Annex I देश को बेच सकता है। यह Cap and Trade का अंतरराष्ट्रीय रूप था, जिसने यूरोपीय संघ उत्सर्जन व्यापार प्रणाली यानी EU ETS जैसी क्षेत्रीय व्यवस्थाओं की नींव रखी।
दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण तंत्र Clean Development Mechanism यानी CDM है, जो अनुच्छेद 12 के तहत आता है। इसमें विकसित देश यानी Annex I देश विकासशील देशों यानी Non-Annex I देशों में ऐसी परियोजनाएं लगाते हैं जो ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कम करती हैं। इससे जो उत्सर्जन कमी होती है उसे Certified Emission Reductions यानी CERs कहा जाता है, एक CER एक टन CO2e कटौती के बराबर होता है। विकसित देश इन CERs को खरीदकर अपने घरेलू लक्ष्य को पूरा कर सकते हैं। CDM के लिए दो शर्तें अनिवार्य थीं - additionality यानी यह परियोजना CDM के बिना नहीं लगती, और sustainable development यानी मेजबान देश को सतत विकास का लाभ मिले। CDM परियोजनाओं को Designated National Authority और CDM Executive Board से अनुमोदन लेना पड़ता था।
तीसरा तंत्र Joint Implementation यानी JI है, जो अनुच्छेद 6 के तहत आता है। इसमें एक विकसित देश दूसरे विकसित देश में उत्सर्जन कटौती परियोजना लगाता है। उदाहरण के लिए जापान रूस में ऊर्जा दक्षता परियोजना लगाए। इससे जो क्रेडिट बनते हैं उन्हें Emission Reduction Units यानी ERUs कहा जाता है। JI और CDM में मुख्य अंतर यह है कि JI केवल विकसित देशों के बीच होता है जबकि CDM विकसित और विकासशील देशों के बीच होता है।
भारत के संदर्भ में CDM का विशेष महत्व था। भारत Non-Annex I देश होने के कारण पर कोई बाध्यकारी लक्ष्य नहीं था, लेकिन CDM का प्रमुख मेजबान बना। भारत में CDM परियोजनाओं के प्रमुख उदाहरणों में पवन ऊर्जा परियोजनाएं, बायोमास आधारित ऊर्जा, ऊर्जा दक्षता में सुधार, सीमेंट और स्टील उद्योग में अपशिष्ट ऊष्मा का उपयोग और छोटे पनबिजली संयंत्र शामिल थे। CDM ने भारत में स्वच्छ तकनीक के हस्तांतरण, विदेशी निवेश और सतत विकास को बढ़ावा देने में भूमिका निभाई। भारत में CDM के लिए राष्ट्रीय CDM प्राधिकरण पर्यावरण मंत्रालय के तहत कार्य करता था।
क्योटो प्रोटोकॉल की उपलब्धियों में पहली बार बाध्यकारी उत्सर्जन लक्ष्यों की व्यवस्था, वैश्विक कार्बन बाजार की शुरुआत और मजबूत Monitoring, Reporting and Verification यानी MRV प्रणाली की स्थापना शामिल है। पहली प्रतिबद्धता अवधि 2008-2012 में भाग लेने वाले Annex I देशों ने सामूहिक रूप से अपने लक्ष्य को पूरा किया, कई यूरोपीय देशों ने 1990 की तुलना में 20 प्रतिशत से अधिक कटौती की। CDM के माध्यम से हजारों परियोजनाओं से अरबों CERs जारी हुए और विकासशील देशों में स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा मिला।
हालांकि इसकी सीमाएं और आलोचनाएं भी महत्वपूर्ण हैं। अमेरिका विश्व का उस समय सबसे बड़ा उत्सर्जक था लेकिन उसने प्रोटोकॉल का अनुसमर्थन नहीं किया क्योंकि विकासशील देशों पर बाध्यकारी लक्ष्य नहीं थे। कनाडा 2011 में अपने लक्ष्य को पूरा न कर पाने के कारण प्रोटोकॉल से बाहर हो गया। केवल Annex I देशों पर लक्ष्य होने से वैश्विक उत्सर्जन का केवल लगभग 14 प्रतिशत हिस्सा ही कवर हुआ, जबकि चीन, भारत और अन्य विकासशील देशों का उत्सर्जन तेजी से बढ़ रहा था। कार्बन बाजार में अतिरिक्तता को लेकर चिंताएं थीं, कई परियोजनाएं ऐसी थीं जो वैसे भी लग जातीं और CERs की अधिकता से कार्बन मूल्य बहुत कम हो गया। दूसरी प्रतिबद्धता अवधि 2013-2020 में केवल यूरोपीय संघ और कुछ ही देशों ने भाग लिया, इसलिए इसका वैश्विक प्रभाव सीमित रहा।
संतुलित निष्कर्ष यह है कि क्योटो प्रोटोकॉल जलवायु कूटनीति में एक ऐतिहासिक प्रयोग था जिसने यह सिखाया कि केवल कुछ देशों पर बाध्यकारी लक्ष्य से वैश्विक समस्या हल नहीं होती। इसने कार्बन बाजार, MRV और CDM जैसी संस्थाओं की नींव रखी। पेरिस समझौते के Article 6 में जो कार्बन बाजार के नियम हैं, वे क्योटो के CDM और JI से ही विकसित हुए हैं। Article 6.4 का नया तंत्र CDM का उत्तराधिकारी माना जाता है। वर्तमान में क्योटो प्रोटोकॉल कानूनी रूप से समाप्त हो चुका है लेकिन इसकी विरासत आज के कार्बन क्रेडिट बाजार और स्वैच्छिक कार्बन बाजार में जीवित है।
⚡ Quick Revision - मुख्य बिंदु
- ✅ Emissions Trading अनुच्छेद 17 में AAUs का व्यापार है, 1 AAU एक टन CO2e के बराबर Cap and Trade प्रणाली है।
- ✅ CDM अनुच्छेद 12 में विकसित देश विकासशील देशों में परियोजना लगाकर CERs प्राप्त करते हैं, additionality अनिवार्य है।
- ✅ JI अनुच्छेद 6 में दो विकसित देशों के बीच परियोजना से ERUs बनते हैं, CDM विकासशील देशों के साथ होता है।
- ✅ भारत Non-Annex I देश के रूप में CDM का प्रमुख मेजबान रहा, पवन, बायोमास और ऊर्जा दक्षता मुख्य परियोजनाएं थीं।
- ✅ पहली अवधि 2008-2012 में Annex I देशों ने लक्ष्य पूरा किया, दूसरी अवधि 2013-2020 में भागीदारी सीमित रही।
- ✅ मुख्य आलोचना अमेरिका का बाहर रहना, कनाडा का 2011 में निकलना और वैश्विक उत्सर्जन का केवल छोटा हिस्सा कवर होना था।
- ✅ क्योटो ने कार्बन बाजार और MRV की नींव रखी, पेरिस समझौते का Article 6 उसी का विकसित रूप है।
📊 Important Facts Table
| Topic | Fact |
|---|---|
| Emissions Trading | अनुच्छेद 17 के तहत Annex I देश AAUs का व्यापार करते हैं, 1 AAU = 1 टन CO2e, यह Cap and Trade प्रणाली है। |
| Kyoto Units | 4 Kyoto Units हैं - AAUs, RMUs वनीकरण से, ERUs JI से और CERs CDM से बनती हैं। |
| CDM का अनुच्छेद | CDM अनुच्छेद 12 के तहत आता है, इसमें विकसित देश विकासशील देशों में परियोजना लगाकर CERs प्राप्त करते हैं। |
| CERs | 1 CER = 1 टन CO2e कटौती, CDM को Executive Board और Designated National Authority से अनुमोदन लेना पड़ता है। |
| Additionality | CDM के लिए additionality अनिवार्य है, यानी परियोजना CDM के बिना संभव नहीं होनी चाहिए और सतत विकास को लाभ देना चाहिए। |
| JI और ERUs | JI अनुच्छेद 6 के तहत केवल विकसित देशों के बीच होता है, इससे ERUs बनते हैं, 1 ERU = 1 टन CO2e। |
| भारत में CDM | भारत CDM का प्रमुख मेजबान रहा, पवन ऊर्जा, बायोमास, ऊर्जा दक्षता और अपशिष्ट ऊष्मा उपयोग प्रमुख परियोजना प्रकार थे। |
| पहली अवधि की सफलता | 2008-2012 में भाग लेने वाले Annex I देशों ने सामूहिक रूप से 5.2 प्रतिशत कटौती लक्ष्य को पूरा किया, EU ने अधिक कटौती की। |
| सीमाएं | अमेरिका ने अनुसमर्थन नहीं किया, कनाडा 2011 में बाहर हुआ, प्रोटोकॉल में वैश्विक उत्सर्जन का केवल लगभग 14 प्रतिशत कवर हुआ। |
| पेरिस Article 6 से संबंध | पेरिस समझौते का Article 6.4 तंत्र CDM का उत्तराधिकारी है, क्योटो की MRV और कार्बन बाजार विरासत आज भी जारी है। |