पेरिस समझौता क्या है? इतिहास, लक्ष्य, NDC और COP21 की पूरी जानकारी

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पेरिस समझौता क्या है? इतिहास, लक्ष्य, NDC और COP21 की पूरी जानकारी - ऑनलाइन प्रैक्टिस क्विज़

Paris Agreement 2015 का इतिहास, COP21, 1.5°C और 2°C लक्ष्य, NDC क्या है, Kyoto Protocol से अंतर, CBDR-RC और वैश्विक जलवायु कार्रवाई में भूमिका।

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💡 व्याख्या

📚 विस्तृत जानकारी

पेरिस समझौते की पृष्ठभूमि वैश्विक जलवायु वार्ता की विफलताओं और नई आशाओं से जुड़ी है। क्योटो प्रोटोकॉल 1997 में केवल विकसित देशों पर बाध्यकारी लक्ष्य लगाता था और अमेरिका जैसे बड़े उत्सर्जक इससे बाहर रहे थे। 2009 में कोपेनहेगन COP15 में कोई कानूनी रूप से बाध्यकारी वैश्विक समझौता नहीं हो सका था। इसलिए 2011 में डरबन COP17 में सभी देशों को शामिल करने वाले नए समझौते पर बातचीत शुरू हुई, जिसे Durban Platform कहा गया।

इसी प्रक्रिया के परिणामस्वरूप COP21 का आयोजन 30 नवंबर से 12 दिसंबर 2015 तक पेरिस, फ्रांस में हुआ। 195 देशों ने 12 दिसंबर 2015 को Paris Agreement को अपनाया। यह समझौता UNFCCC यानी संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क कन्वेंशन के तहत है। पेरिस समझौते पर 22 अप्रैल 2016 को न्यूयॉर्क में हस्ताक्षर समारोह हुआ और यह 4 नवंबर 2016 को लागू हो गया, जब कम से कम 55 देशों ने जिनका वैश्विक उत्सर्जन में 55 प्रतिशत हिस्सा था, इसका अनुसमर्थन कर दिया था। भारत ने 2 अक्टूबर 2016 को इसका अनुसमर्थन किया था।

पेरिस समझौते का मुख्य उद्देश्य जलवायु परिवर्तन के खतरे से निपटना है। अनुच्छेद 2 के अनुसार इसका लक्ष्य वैश्विक औसत तापमान वृद्धि को औद्योगिक पूर्व स्तर की तुलना में well below 2°C यानी 2 डिग्री सेल्सियस से काफी नीचे रखना है और प्रयास करना है कि इसे 1.5°C तक सीमित रखा जाए। Well below 2°C का अर्थ है कि 2 डिग्री को ऊपरी सीमा न मानकर उससे काफी नीचे रहने का प्रयास करना है। 1.5°C का लक्ष्य छोटे द्वीप देशों की मांग पर जोड़ा गया था क्योंकि 2 डिग्री पर भी उनके अस्तित्व को खतरा है। वैज्ञानिक रिपोर्टों के अनुसार 1.5 डिग्री पर जलवायु प्रभाव 2 डिग्री की तुलना में काफी कम होते हैं।

NDC यानी Nationally Determined Contributions पेरिस समझौते की केंद्रीय कार्यप्रणाली है। NDC का अर्थ है प्रत्येक देश द्वारा स्वयं निर्धारित जलवायु योगदान। क्योटो प्रोटोकॉल में लक्ष्य ऊपर से तय किए जाते थे, लेकिन पेरिस समझौते में हर देश खुद तय करता है कि वह उत्सर्जन कम करने, अनुकूलन और जलवायु वित्त के लिए क्या करेगा। NDC में mitigation यानी उत्सर्जन कटौती के लक्ष्य, adaptation यानी अनुकूलन के प्रयास और कुछ देशों में जलवायु वित्त की आवश्यकताएं शामिल होती हैं। NDC को legally binding emission target के रूप में नहीं समझना चाहिए। पेरिस समझौता कानूनी रूप से बाध्यकारी है लेकिन NDC के लक्ष्यों को प्राप्त करने की बाध्यता कानूनी दंड के साथ नहीं है। देशों पर NDC तैयार करने, उसे लागू करने और उसकी प्रगति रिपोर्ट करने की बाध्यता है, जिसे procedural obligation कहा जाता है।

NDC को समय-समय पर अपडेट करने की प्रक्रिया भी समझौते में तय है। अनुच्छेद 4 के अनुसार हर देश को हर 5 वर्ष में नया या अपडेटेड NDC प्रस्तुत करना है और प्रत्येक नया NDC पिछले NDC से अधिक महत्वाकांक्षी होना चाहिए, जिसे progression और highest possible ambition का सिद्धांत कहा जाता है। पहला NDC 2015 में INDC के रूप में आया था, दूसरा दौर 2020-21 में और तीसरा दौर 2025 में प्रस्तुत किया जा रहा है।

पेरिस समझौते में mitigation, adaptation और climate finance का संतुलित उल्लेख है। Mitigation के तहत सभी देशों से उत्सर्जन कम करने और इस सदी के उत्तरार्ध में carbon neutrality हासिल करने की बात है। Adaptation के तहत जलवायु प्रभावों से निपटने की क्षमता बढ़ाने की बात है। Climate finance के तहत विकसित देशों से विकासशील देशों को वित्तीय सहायता देने की बात है, जिसमें 100 बिलियन डॉलर प्रति वर्ष का लक्ष्य शामिल था।

Paris Agreement और Kyoto Protocol के बीच मुख्य अंतर यह है कि क्योटो प्रोटोकॉल में केवल विकसित देशों Annex I पर बाध्यकारी लक्ष्य थे और यह top-down दृष्टिकोण था, जबकि पेरिस समझौता सभी देशों पर लागू है और bottom-up दृष्टिकोण है जहां हर देश अपना NDC तय करता है। क्योटो में प्रवर्तन तंत्र था लेकिन भागीदारी सीमित थी, पेरिस में भागीदारी सार्वभौमिक है लेकिन प्रवर्तन विश्वास और पारदर्शिता पर आधारित है।

पारदर्शिता के लिए पेरिस समझौते में Enhanced Transparency Framework यानी ETF बनाया गया है, जिसके तहत सभी देश अपनी प्रगति रिपोर्ट करते हैं। Global Stocktake यानी वैश्विक समीक्षा हर 5 वर्ष में होती है, जिसमें सामूहिक प्रगति का आकलन होता है। पहला Global Stocktake 2023 में COP28 में पूरा हुआ।

पेरिस समझौते में Common but Differentiated Responsibilities and Respective Capabilities यानी CBDR-RC सिद्धांत को अनुच्छेद 2 में शामिल किया गया है, लेकिन इसे विकसित और विकासशील देशों की अलग-अलग परिस्थितियों और राष्ट्रीय परिस्थितियों के प्रकाश में लागू करने की बात कही गई है। इससे संतुलन बना है कि सभी देश कार्रवाई करेंगे लेकिन उनकी क्षमता और जिम्मेदारी के अनुसार।

वैश्विक महत्ता के संदर्भ में पेरिस समझौता climate diplomacy में ऐतिहासिक है क्योंकि यह पहली बार 195 देशों को एक कानूनी ढांचे में लाया और जलवायु कार्रवाई को स्वैच्छिक से सार्वभौमिक बनाया। निष्कर्ष में पेरिस समझौता वैश्विक climate action के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह well below 2°C और 1.5°C का स्पष्ट वैज्ञानिक लक्ष्य देता है और NDC इसकी केंद्रीय कार्यप्रणाली है क्योंकि NDC के माध्यम से ही हर देश अपनी राष्ट्रीय परिस्थितियों के अनुसार योगदान देता है और हर 5 वर्ष में महत्वाकांक्षा बढ़ाता है।

⚡ Quick Revision - मुख्य बिंदु

  • ✅ Paris Agreement को COP21 में 12 दिसंबर 2015 को अपनाया गया और 4 नवंबर 2016 को लागू हुआ, भारत ने 2 अक्टूबर 2016 को अनुसमर्थन किया।
  • ✅ मुख्य लक्ष्य तापमान वृद्धि को well below 2°C रखना और 1.5°C तक सीमित रखने का प्रयास करना है।
  • ✅ NDC यानी Nationally Determined Contributions प्रत्येक देश का स्वयं निर्धारित योगदान है जो पेरिस समझौते की केंद्रीय कार्यप्रणाली है।
  • ✅ NDC की प्रकृति procedural रूप से बाध्यकारी है, लक्ष्य प्राप्त न करने पर कानूनी दंड नहीं है।
  • ✅ Kyoto Protocol केवल विकसित देशों पर बाध्यकारी top-down था, Paris Agreement सभी देशों पर लागू bottom-up है।
  • ✅ Enhanced Transparency Framework और हर 5 वर्ष में Global Stocktake के माध्यम से सामूहिक प्रगति की समीक्षा होती है।
  • ✅ CBDR-RC सिद्धांत को राष्ट्रीय परिस्थितियों के साथ लागू किया गया है, जिससे सभी देशों की भागीदारी सुनिश्चित हुई है।

📊 Important Facts Table

TopicFact
COP21 और अपनानाParis Agreement को COP21 में 12 दिसंबर 2015 को पेरिस में 195 देशों द्वारा अपनाया गया था।
लागू होनायह समझौता 4 नवंबर 2016 को लागू हुआ, जब 55 देशों ने 55 प्रतिशत उत्सर्जन के साथ अनुसमर्थन किया, भारत ने 2 अक्टूबर 2016 को अनुसमर्थन किया।
तापमान लक्ष्यलक्ष्य वैश्विक तापमान वृद्धि को औद्योगिक पूर्व स्तर से well below 2°C रखना और 1.5°C तक सीमित रखने का प्रयास करना है।
NDC क्या हैNDC यानी Nationally Determined Contributions प्रत्येक देश द्वारा स्वयं निर्धारित जलवायु योगदान है, जो bottom-up दृष्टिकोण है।
NDC की प्रकृतिNDC तैयार करने और रिपोर्ट करने की बाध्यता है, लेकिन लक्ष्य प्राप्त न करने पर कानूनी दंड नहीं है, यह procedural obligation है।
NDC अपडेटहर 5 वर्ष में नया NDC देना होता है और नया NDC पिछले से अधिक महत्वाकांक्षी होना चाहिए, पहला INDC 2015 में आया था।
Kyoto से अंतरKyoto Protocol केवल विकसित देशों पर बाध्यकारी और top-down था, Paris Agreement सभी देशों पर लागू और bottom-up है।
Transparency FrameworkEnhanced Transparency Framework ETF के तहत सभी देश प्रगति रिपोर्ट करते हैं और Global Stocktake हर 5 वर्ष में होता है, पहला 2023 में हुआ।
CBDR-RCParis Agreement में CBDR-RC सिद्धांत को राष्ट्रीय परिस्थितियों के प्रकाश में लागू करने की बात कही गई है।
UNFCCC के तहतParis Agreement UNFCCC के तहत कानूनी रूप से बाध्यकारी समझौता है जिस पर 22 अप्रैल 2016 को हस्ताक्षर समारोह हुआ था।