भारत की जलवायु - भाग 1

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भारत की जलवायु - भाग 1 - ऑनलाइन प्रैक्टिस क्विज़

भारतीय मानसून प्रणाली, भारत की प्रमुख ऋतुओं और अल नीनो तथा ला नीना के प्रभावों पर आधारित अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न और संपूर्ण विश्लेषण।

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💡 व्याख्या

भारत की जलवायु: मानसून प्रणाली और ऋतुओं का विस्तृत विश्लेषण

भारत की जलवायु मुख्य रूप से उष्ण कटिबंधीय मानसूनी प्रकार की है। यह विशिष्ट जलवायु देश की भौगोलिक अवस्थिति, विशेषकर उत्तर में स्थित विशाल हिमालय पर्वतमाला और दक्षिण में फैले हुए विशाल हिंद महासागर की उपस्थिति से अत्यधिक प्रभावित होती है। हिमालय पर्वतमाला मध्य एशिया से आने वाली अत्यंत ठंडी और बर्फीली हवाओं को रोककर भारतीय उपमहाद्वीप को अत्यधिक ठंड से बचाती है, जबकि विशाल हिंद महासागर नमी का एक प्रमुख स्रोत बनकर देश भर में वर्षा का मुख्य कारण बनता है। भारत की कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था के लिए यह मानसूनी जलवायु किसी जीवनरेखा से कम नहीं है, क्योंकि देश की साठ प्रतिशत से अधिक कृषि आज भी सीधे तौर पर वर्षा जल पर निर्भर करती है।

भारतीय मानसून प्रणाली की उत्पत्ति और जटिल कार्यप्रणाली

मानसून शब्द की उत्पत्ति मूल रूप से अरबी भाषा के शब्द 'मौसिम' से हुई है, जिसका शाब्दिक अर्थ है ऋतुओं के अनुसार पवनों की दिशा में पूर्ण उलटफेर होना। ग्रीष्म ऋतु में सूर्य के उत्तरायण होने के कारण उत्तर-पश्चिमी भारत और तिब्बत के पठारी भागों में अत्यधिक भीषण गर्मी पड़ती है, जिससे वहां एक गहरा निम्न वायुदाब का केंद्र विकसित हो जाता है। इसके ठीक विपरीत, इस समय दक्षिणी हिंद महासागर में तापमान कम होने के कारण उच्च वायुदाब बना रहता है। प्रकृति का यह नियम है कि हवाएं हमेशा उच्च वायुदाब से निम्न वायुदाब की ओर चलती हैं, इसलिए हिंद महासागर से नमी युक्त भारी हवाएं भूमध्य रेखा को पार कर भारत की ओर तेजी से बहने लगती हैं। पृथ्वी के घूर्णन के कारण उत्पन्न होने वाला कोरिओलिस बल इन हवाओं को दाईं ओर मोड़ देता है और ये दक्षिण-पश्चिम मानसून के रूप में भारतीय भूभाग में प्रवेश करती हैं। इस पूरी प्रक्रिया में पूर्वी जेट स्ट्रीम की भूमिका भी मानसून को सक्रिय करने में अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।

भारत की प्रमुख ऋतुएं और उनका वार्षिक चक्र

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग ने देश की जलवायु को अध्ययन की सुविधा के लिए चार प्रमुख ऋतुओं में विभाजित किया है। पहली शीत ऋतु है, जो मध्य दिसंबर से फरवरी तक रहती है। इस दौरान भूमध्य सागर से उठने वाले पश्चिमी विक्षोभ के कारण उत्तर भारत के मैदानी भागों में हल्की वर्षा और पहाड़ों पर हिमपात होता है, जो रबी की फसल के लिए अत्यंत लाभदायक है। दूसरी ग्रीष्म ऋतु है, जो मार्च से मई तक चलती है। इस ऋतु में उत्तर भारत में लू जैसी अत्यंत गर्म और शुष्क हवाएं चलती हैं, जबकि देश के कुछ हिस्सों में काल बैसाखी और आम्र वर्षा जैसी स्थानीय वर्षा भी होती है। तीसरी दक्षिण-पश्चिम मानसून की ऋतु है, जो जून से मध्य सितंबर तक रहती है और देश की कुल वर्षा का पचहत्तर प्रतिशत से अधिक हिस्सा इसी दौरान प्राप्त होता है। चौथी लौटते हुए मानसून की ऋतु (शरद ऋतु) है, जो अक्टूबर और नवंबर में आती है, जिससे मुख्य रूप से पूर्वी तट और विशेषकर तमिलनाडु राज्य में भारी वर्षा दर्ज की जाती है।

अल नीनो और ला नीना का भारतीय मानसून पर गहरा प्रभाव

भारतीय मानसून की तीव्रता और वर्षा की मात्रा सुदूर प्रशांत महासागर में होने वाले तापमान परिवर्तनों से गहरे स्तर पर जुड़ी हुई है। अल नीनो एक अत्यंत गर्म समुद्री जलधारा है जो दक्षिण अमेरिका के पेरू तट पर उत्पन्न होती है। इसके प्रभाव से प्रशांत महासागर का तापमान असामान्य रूप से बढ़ जाता है, जिससे वैश्विक वायुदाब पेटियों में परिवर्तन होता है। परिणामस्वरूप भारतीय मानसून कमजोर पड़ जाता है और देश में सूखे या अल्पवृष्टि की गंभीर स्थिति उत्पन्न हो जाती है। इसके ठीक विपरीत, ला नीना एक ठंडी जलधारा है, जो भारतीय मानसून के लिए अत्यंत अनुकूल साबित होती है। ला नीना के सक्रिय होने पर हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के बीच तापांतर बढ़ जाता है, जिससे भारत में सामान्य से अधिक भारी वर्षा होती है।

प्रारंभिक परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण जलवायु तथ्य

जलवायु संबंधी परिघटनाभौगोलिक प्रभाव एवं मुख्य विशेषताएं
भारतीय जलवायु का प्रकारउष्ण कटिबंधीय मानसूनी जलवायु की प्रधानता
सर्वाधिक वर्षा वाला स्थानमौसिनराम (मेघालय राज्य की खासी पहाड़ियों में स्थित)
अल नीनो का सीधा प्रभावभारतीय मानसून का कमजोर होना और सूखे की भयंकर स्थिति
ला नीना का सीधा प्रभावभारतीय मानसून का अत्यंत मजबूत होना और अत्यधिक भारी वर्षा
लौटते हुए मानसून से वर्षाकोरोमंडल तट पर भारी वर्षा (मुख्य रूप से तमिलनाडु में)
सर्दियों में उत्तर भारत में वर्षाभूमध्य सागर से उठने वाले पश्चिमी विक्षोभ के कारण

जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग के वर्तमान दौर में मानसूनी वर्षा की बढ़ती अनिश्चितता और अल नीनो की बढ़ती आवृत्ति ने भारतीय कृषि तथा खाद्य सुरक्षा के समक्ष गंभीर चुनौतियां उत्पन्न कर दी हैं। अतः जल संरक्षण, वनीकरण और जलवायु अनुकूल कृषि पद्धतियों को अपनाना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बन गया है।