भारत में वर्षा वितरण और जलवायु क्षेत्र
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भारत में वर्षा के भौगोलिक वितरण, वर्षा के प्रकार तथा जलवायु क्षेत्रों का विस्तृत विवरण, जो यूपीएससी और राज्य पीसीएस परीक्षाओं के लिए उपयोगी है।
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💡 व्याख्या
भारत में वर्षा वितरण और जलवायु क्षेत्र
भारत की जलवायु विविधता का प्रमुख कारण यहाँ का वर्षा वितरण और भौगोलिक विस्तार है। भारत में वर्षा का वितरण अत्यंत असमान है, कहीं अत्यधिक वर्षा होती है तो कहीं अत्यल्प। यही असमानता देश के विभिन्न भागों में भिन्न-भिन्न जलवायु क्षेत्रों का निर्माण करती है। यूपीएससी और राज्य पीसीएस की दृष्टि से भारत के वर्षा वितरण तथा जलवायु क्षेत्रों का अध्ययन अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
वर्षा वितरण की प्रमुख विशेषताएँ
भारत में औसत वार्षिक वर्षा लगभग एक सौ पंद्रह सेंटीमीटर मानी जाती है, परंतु इसका भौगोलिक वितरण अत्यंत असमान है। पश्चिमी घाट का पश्चिमी ढाल, पूर्वोत्तर भारत तथा मेघालय का पठार अत्यधिक वर्षा वाले क्षेत्र हैं। इसके विपरीत राजस्थान का पश्चिमी भाग, लद्दाख, दक्षिणी पंजाब तथा तमिलनाडु का कुछ भाग अत्यल्प वर्षा वाले क्षेत्रों में सम्मिलित हैं। वर्षा के वितरण को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारकों में मानसूनी पवनों की दिशा, पर्वतों की स्थिति, समुद्र से दूरी तथा स्थानीय उच्चावच शामिल हैं।
अरब सागर की ओर से आने वाली पवनें पश्चिमी घाट से टकराकर अत्यधिक वर्षा करती हैं, जबकि इसके पूर्वी ढाल पर वर्षा छाया क्षेत्र बन जाता है। यही कारण है कि महाराष्ट्र का तटीय भाग अत्यधिक वर्षा प्राप्त करता है जबकि उसी अक्षांश पर स्थित मध्य महाराष्ट्र अपेक्षाकृत कम वर्षा पाता है। बंगाल की खाड़ी की ओर से आने वाली पवनें पूर्वोत्तर भारत तथा ओडिशा के तटीय भागों में भारी वर्षा करती हैं।
वर्षा के प्रकार
भारत में मुख्य रूप से तीन प्रकार की वर्षा होती है। संवहन वर्षा ग्रीष्म ऋतु में स्थानीय ताप के कारण होती है और यह प्रायः अल्पकालिक तथा तीव्र होती है। पर्वतीय वर्षा पर्वतों की ढाल पर नमीयुक्त पवनों के उठने के कारण होती है, जैसे पश्चिमी घाट तथा हिमालय के दक्षिणी ढाल पर। चक्रवातीय वर्षा उष्णकटिबंधीय चक्रवातों तथा पश्चिमी विक्षोभ के कारण होती है और यह शीत ऋतु में उत्तर-पश्चिम भारत तथा ग्रीष्म ऋतु में पूर्वी तट पर देखी जाती है।
भारत के जलवायु क्षेत्र
भारत को जलवायु के आधार पर विभिन्न क्षेत्रों में विभाजित किया जाता है। कोपेन के वर्गीकरण के अनुसार भारत में उष्णकटिबंधीय आर्द्र, उष्णकटिबंधीय सवाना, अर्ध-शुष्क स्टेपी, शुष्क मरुस्थलीय, आर्द्र उपोष्ण तथा उच्चभूमि जलवायु पाई जाती है। तमिलनाडु तथा केरल के तटीय भाग उष्णकटिबंधीय आर्द्र जलवायु के अंतर्गत आते हैं। मध्य भारत का अधिकांश भाग उष्णकटिबंधीय सवाना जलवायु में सम्मिलित है। राजस्थान का पश्चिमी भाग शुष्क मरुस्थलीय जलवायु का उदाहरण है।
उत्तर भारत के मैदानी भाग में आर्द्र उपोष्ण जलवायु पाई जाती है जहाँ ग्रीष्म में अत्यधिक गर्मी तथा शीत में कड़ाके की ठंड पड़ती है। हिमालय के ऊँचे भागों में उच्चभूमि जलवायु पाई जाती है जहाँ तापमान वर्षभर कम रहता है तथा हिमपात होता है। यह विविधता भारत को कृषि, वनस्पति तथा जीव-जंतुओं की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध बनाती है।
यूपीएससी तथ्य बॉक्स
- भारत की औसत वार्षिक वर्षा लगभग एक सौ पंद्रह सेंटीमीटर मानी जाती है।
- विश्व का सर्वाधिक वर्षा वाला स्थान मावसिनराम मेघालय में स्थित है।
- पश्चिमी घाट का पूर्वी ढाल वर्षा छाया क्षेत्र का उदाहरण है।
- कोपेन वर्गीकरण भारत की जलवायु विविधता को समझने का प्रमुख आधार है।
- राजस्थान का पश्चिमी भाग शुष्क मरुस्थलीय जलवायु का प्रमुख उदाहरण है।
जलवायु क्षेत्रों की तुलनात्मक तालिका
| जलवायु क्षेत्र | प्रमुख भौगोलिक विस्तार | वार्षिक वर्षा |
|---|---|---|
| उष्णकटिबंधीय आर्द्र | केरल तथा तमिलनाडु का तटीय भाग | अत्यधिक वर्षा |
| उष्णकटिबंधीय सवाना | मध्य भारत का अधिकांश भाग | मध्यम वर्षा |
| अर्ध-शुष्क स्टेपी | दक्षिणी पंजाब तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश | अल्प वर्षा |
| शुष्क मरुस्थलीय | पश्चिमी राजस्थान तथा कच्छ क्षेत्र | अत्यल्प वर्षा |
| आर्द्र उपोष्ण | उत्तर भारत के मैदानी भाग | मध्यम वर्षा |
| उच्चभूमि | हिमालय के ऊँचे भाग | हिमपात सहित वर्षा |
निष्कर्ष
भारत में वर्षा वितरण तथा जलवायु क्षेत्रों की विविधता देश की कृषि, अर्थव्यवस्था तथा जनजीवन को सीधे प्रभावित करती है। वर्षा की असमानता के कारण ही कुछ भाग सूखे की समस्या से जूझते हैं तो कुछ भाग बाढ़ से प्रभावित होते हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं में इन विषयों से संबंधित प्रश्न नियमित रूप से पूछे जाते हैं और इसलिए इनका गहन अध्ययन आवश्यक माना जाता है।