भारत का अपवाह तंत्र - भाग 1
⌄भारत का अपवाह तंत्र - भाग 1 - ऑनलाइन प्रैक्टिस क्विज़
हिमालयी नदियां (सिंधु, गंगा, ब्रह्मपुत्र) और प्रायद्वीपीय नदियों (गोदावरी, कृष्णा, कावेरी) के अपवाह तंत्र पर आधारित महत्वपूर्ण प्रश्न।
लोडिंग...
💡 व्याख्या
भारत का अपवाह तंत्र: हिमालयी और प्रायद्वीपीय नदियों का समग्र विश्लेषण
भारत का अपवाह तंत्र एक अत्यंत विशाल और जटिल जल प्रणाली है, जो न केवल देश की कृषि और अर्थव्यवस्था का मूल आधार है, बल्कि इसकी सांस्कृतिक विरासत का भी अभिन्न अंग है। आदिकाल से ही भारत की महान नदियों के किनारे विशाल सभ्यताओं का विकास हुआ है। भारतीय अपवाह तंत्र को उसकी उत्पत्ति, जल स्रोत और भौगोलिक विशेषताओं के आधार पर मुख्य रूप से दो प्रमुख भागों में विभाजित किया जाता है: हिमालयी अपवाह तंत्र और प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र। इन दोनों तंत्रों का विस्तृत अध्ययन सिविल सेवा परीक्षाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इनसे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से अनेक प्रश्न पूछे जाते हैं। भूगोल के इस अध्याय में नदियों के बेसिन, उनकी सहायक जलधाराओं और डेल्टा निर्माण की प्रक्रिया को समझना एक मजबूत पकड़ बनाने के लिए बहुत आवश्यक है।
हिमालयी नदियां: सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र
हिमालयी नदियां मुख्य रूप से सदानीरा होती हैं, क्योंकि उन्हें केवल मानसून की वर्षा से ही नहीं, बल्कि ऊंचे पर्वतों पर जमी बर्फ के पिघलने से भी वर्ष भर जल प्राप्त होता रहता है। सिंधु नदी तंत्र विश्व के सबसे बड़े नदी तंत्रों में से एक माना जाता है। इसका उद्गम तिब्बत के मानसरोवर झील के निकट बोखर चू हिमनद से होता है। यह नदी भारत में केवल लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश से होकर बहती है और अंततः पाकिस्तान होते हुए अरब सागर में गिरती है। गंगा नदी तंत्र भारत का सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण अपवाह तंत्र है। गंगा का मुख्य उद्गम उत्तराखंड के गंगोत्री हिमनद से भागीरथी के रूप में होता है। देवप्रयाग में भागीरथी और अलकनंदा के पवित्र संगम के बाद ही इसे गंगा के नाम से जाना जाता है। वहीं, ब्रह्मपुत्र नदी का उद्गम भी तिब्बत के मानसरोवर झील के पास चेमायुंगडुंग हिमनद से होता है, जहाँ इसे सांगपो कहा जाता है। यह नदी भारत में अरुणाचल प्रदेश से प्रवेश करती है और असम की विशाल घाटी में बहते हुए बंगाल की खाड़ी में जाकर गंगा के साथ मिलकर विश्व के सबसे बड़े सुंदरवन डेल्टा का निर्माण करती है।
प्रायद्वीपीय नदियां: पूर्व और पश्चिम की ओर बहने वाली जलधाराएं
हिमालयी नदियों के विपरीत, प्रायद्वीपीय नदियां मुख्य रूप से वर्षा पर निर्भर होती हैं, इसलिए वे मौसमी प्रकृति की होती हैं और गर्मियों में इनका जल स्तर काफी कम हो जाता है। प्रायद्वीपीय भारत का सामान्य भौगोलिक ढलान पश्चिम से पूर्व की ओर है, जिसके कारण अधिकांश विशाल नदियां बंगाल की खाड़ी में जाकर गिरती हैं और बड़े डेल्टा का निर्माण करती हैं। गोदावरी नदी प्रायद्वीपीय भारत की सबसे लंबी नदी है, जिसे उसकी विशालता के कारण दक्षिण गंगा भी कहा जाता है। इसका उद्गम महाराष्ट्र के नासिक जिले के त्र्यंबकेश्वर से होता है। कृष्णा नदी महाबलेश्वर से निकलती है और आंध्र प्रदेश के तट पर एक बड़ा डेल्टा बनाती है। कावेरी नदी कर्नाटक के ब्रह्मगिरी पहाड़ियों से निकलती है और अपनी पवित्रता के कारण इसे दक्षिण भारत की गंगा के रूप में भी सम्मानित किया जाता है। इसके ठीक विपरीत, नर्मदा और ताप्ती नदियां अपनी गहरी भ्रंश घाटियों से होकर पूर्व से पश्चिम की ओर बहती हैं और अरब सागर में गिरने से पहले ज्वारनदमुख का निर्माण करती हैं।
प्रारंभिक परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण नदी तथ्य
| नदी का नाम | उद्गम स्थल एवं प्रमुख भौगोलिक विशेषताएँ |
|---|---|
| सिंधु नदी | मानसरोवर के निकट बोखर चू हिमनद, भारत में केवल लद्दाख में प्रवाह |
| गंगा नदी | गंगोत्री हिमनद से भागीरथी के रूप में उद्गम, भारत का सबसे बड़ा नदी बेसिन |
| ब्रह्मपुत्र नदी | चेमायुंगडुंग हिमनद, तिब्बत में सांगपो और असम में ब्रह्मपुत्र के नाम से प्रसिद्ध |
| गोदावरी नदी | त्र्यंबकेश्वर (नासिक, महाराष्ट्र), प्रायद्वीपीय भारत की सबसे लंबी नदी |
| कृष्णा नदी | महाबलेश्वर (महाराष्ट्र), तुंगभद्रा और भीमा इसकी प्रमुख सहायक नदियां हैं |
| कावेरी नदी | ब्रह्मगिरी पहाड़ियां (कर्नाटक), शिवसमुद्रम जलप्रपात का निर्माण करती है |
नदियों का यह विशाल तंत्र भारत के विभिन्न राज्यों में सिंचाई, जलविद्युत उत्पादन और अंतर्देशीय जल परिवहन के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण है। नदियों के जल बंटवारे को लेकर कई राज्यों के मध्य विवाद भी रहते हैं, जिनका समाधान संवैधानिक और वैधानिक तंत्रों के माध्यम से किया जाता है। अतः इन नदियों की भौगोलिक स्थिति का सूक्ष्म ज्ञान प्रत्येक अभ्यर्थी के लिए अनिवार्य है।