भू-आकृतिक प्रक्रियाएं - भाग 2
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पवन स्थलाकृतियां और कार्स्ट स्थलाकृति पर आधारित 50 महत्वपूर्ण प्रश्न
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💡 व्याख्या
पवन और कार्स्ट प्रक्रम: बालुका स्तूप, लोयस और कार्स्ट स्थलाकृतियाँ
नदी और हिमनद के बाद पवन और भूमिगत जल दो महत्वपूर्ण बहिर्जात कारक हैं जो शुष्क और चूना-पत्थर क्षेत्रों में विशिष्ट स्थलाकृतियाँ बनाते हैं। पवन का कार्य शुष्क मरुस्थलों में अपवाहन (Deflation), अपघर्षण (Abrasion) और सन्निघर्षण (Attrition) द्वारा होता है, जबकि कार्स्ट प्रक्रम आर्द्र चूना-पत्थर क्षेत्रों में घोलीकरण (Solution) द्वारा होता है। दोनों ही प्रक्रम निक्षेपण की तुलना में अपरदन से अधिक जुड़े हैं और भारत में थार मरुस्थल तथा मेघालय-बोर्रा गुफाएँ इनके उत्कृष्ट उदाहरण हैं, जिनसे UPSC में प्रत्येक वर्ष प्रश्न बनते हैं।
पवन कार्य की शर्तें: शुष्क जलवायु (<25 सेमी वर्षा), वनस्पति विहीन, तीव्र पवन (>15 किमी/घंटा), शुष्क रेत की प्रचुरता। थार मरुस्थल में पवन वेग 20-30 किमी/घंटा
पवन अपरदनात्मक: अपवाहन गर्त (Deflation Hollow), छत्रक शिला (Mushroom Rock/Gara), यारडांग (Yardang - कठोर-मुलायम का कटाव), ज्यूगेन (Zeugen - मेज जैसी), ड्राइकैंटर (Dreikanter - तीन फलक वाला कंकड़)
बालुका स्तूप (Sand Dune): पवन निक्षेपण से। प्रकार - बरखान (Barchan - अर्धचंद्राकार, 15-30 मी ऊँचा), अनुप्रस्थ (Transverse - पवन के लंबवत), अनुदैर्ध्य/सीफ (Longitudinal/Seif - पवन के समानांतर, 100 मी ऊँचा, 100 किमी लंबा), परवलयिक (Parabolic - U-आकार, वनस्पति से स्थिर), तारा (Star - बहुदिशीय पवन से)
लोयस (Loess): पवन द्वारा उड़ाकर लाई गई महीन धूल (Silt - 0.01-0.05 मिमी) का निक्षेप, असंस्तरित (Unstratified), अत्यधिक सरंध्र, पीला। विश्व का सबसे बड़ा लोयस पठार - चीन में ह्वांगहो बेसिन (6,35,000 किमी², मोटाई 100-300 मी), भारत में कश्मीर के करेवा (Karewa) में
कार्स्ट प्रक्रम: नाम - यूगोस्लाविया के कार्स्ट क्षेत्र से (सर्बो-क्रोएशियाई में Kras = बंजर पथरीली भूमि)। प्रक्रिया - कार्बोनेशन: CaCO₃ + CO₂ + H₂O → Ca(HCO₃)₂ (घुलनशील), चूना पत्थर में 80% CaCO₃ होने पर कार्स्ट विकसित
कार्स्ट स्थलाकृतियाँ: अपरदनात्मक - लैपीज (Lapies - नुकीली कटक), घोलरंध्र/डोलाइन (Sinkhole/Doline - 5-100 मी व्यास), युवाला (Uvala - कई डोलाइन मिलकर), पोल्जे (Polje - विशाल, 10 किमी तक), गुफा। निक्षेपात्मक - स्टैलेक्टाइट (छत से लटकता), स्टैलेग्माइट (फर्श से उठता), स्तंभ (Column)
भारतीय उदाहरण: पवन - थार में जैसलमेर के बरखान (30 मी ऊँचे), सम के टिब्बे। कार्स्ट - मेघालय (चेरापूंजी-मॉसिनराम विश्व में सबसे अधिक वर्षा वाला कार्स्ट), बोर्रा गुफा (आंध्र प्रदेश), कुटुमसर गुफा (छत्तीसगढ़), पचमढ़ी (MP)
1. पवन निर्मित स्थलाकृतियां - अपरदनात्मक और निक्षेपात्मक
अपरदनात्मक स्थलाकृतियाँ: पवन के पास जल जैसी घुलन क्षमता नहीं, इसलिए यह यांत्रिक रूप से कार्य करती है। (i) अपवाहन गर्त (Deflation Hollow): पवन रेत को उड़ाकर गर्त बना देती है, थार में इन्हें ढांढ (Dhand) कहते हैं, मंगोलिया में 200 मीटर गहरे गर्त। (ii) छत्रक शिला (Mushroom Rock / Gara): नीचे मुलायम और ऊपर कठोर चट्टान होने पर नीचे अधिक कटाव से छत्रक जैसी आकृति, थार में ग्रेनाइट पर। (iii) यारडांग (Yardang): कठोर और मुलायम चट्टानें एकांतर में लंबवत हों तो पवन मुलायम को काटकर नुकीली कटक बना देती है, 10-50 मीटर ऊँची, पवन की दिशा के समानांतर। (iv) ज्यूगेन (Zeugen): कठोर-मुलायम परतें क्षैतिज हों तो मेज जैसी आकृति।
निक्षेपात्मक स्थलाकृति का आधार: पवन की वहन क्षमता वेग के घन के समानुपाती होती है, इसलिए वेग घटते ही रेत निक्षेपित होती है। रेत का संचलन कूद (Saltation - 75%), सतह विसर्पण (Surface Creep - 20%) और निलंबन (Suspension - 5%) द्वारा होता है।
2. बालुका स्तूप के प्रकार और लोयस का निर्माण
बालुका स्तूप (Sand Dunes): शुष्क क्षेत्र में रेत का टीला। पवन की दिशा और रेत की आपूर्ति के आधार पर वर्गीकरण UPSC का मुख्य टॉपिक है।
(i) बरखान (Barchan): सबसे प्रसिद्ध, अर्धचंद्राकार, पवन की दिशा में उत्तल और विपरीत दिशा में अवतल, दो सींग (Horns) पवन की दिशा में। ऊँचाई 15-30 मीटर, चौड़ाई 100 मीटर तक। एकल दिशा पवन और सीमित रेत में बनता है, 10-15 मीटर/वर्ष आगे खिसकता है। भारतीय उदाहरण - जैसलमेर के सम क्षेत्र में 30 मीटर ऊँचे बरखान, थार में सबसे अधिक। मरुस्थलीय मार्गों और बस्तियों के लिए खतरा।
(ii) अनुप्रस्थ स्तूप (Transverse Dunes): पवन के लंबवत, लहर जैसी लंबी कटक, अधिक रेत आपूर्ति में। बरखान आपस में मिलकर अनुप्रस्थ बनाते हैं।
(iii) अनुदैर्ध्य / सीफ स्तूप (Longitudinal / Seif Dunes): पवन के समानांतर, 100 मीटर ऊँचे, 100 किमी लंबे, दो पवनों के मिलने से। थार में इनकी लंबाई 20-50 किमी। सीफ (तलवार) प्रकार में घुमावदार शिखर।
(iv) परवलयिक स्तूप (Parabolic Dunes): बरखान का उल्टा, U-आकार, वनस्पति द्वारा सींग स्थिर होने से बनता है, आर्द्र मरुस्थल में। थार के पूर्वी भाग में।
(v) तारा स्तूप (Star Dunes): बहुदिशीय पवनों से, केंद्र से कई भुजाएँ, स्थिर, सबसे ऊँचे - थार में 150 मीटर तक।
लोयस (Loess): पवन द्वारा हजारों किमी उड़ाकर लाई गई सिल्ट (0.01-0.05 मिमी) का परतहीन, पीला, अत्यधिक सरंध्र निक्षेप। उत्पत्ति - हिमनदों द्वारा पीसी गई शैल चूर्ण (Rock Flour) जो मरुस्थलों से उड़कर जमा होती है। विशेषता - असंस्तरित, ऊर्ध्वाधर खड़े रहने की क्षमता (खड्ड बनते हैं), अत्यंत उपजाऊ पर कृषि। विश्व का सबसे बड़ा लोयस पठार - चीन का ह्वांगहो बेसिन (6,35,000 किमी², मोटाई 100-300 मीटर, ह्वांगहो नदी का पीला रंग इसी से)। यूरोप में राइन घाटी में लोयस। भारत में कश्मीर घाटी के करेवा (Karewa) - 1300 मीटर मोटे हिमनदीय-लोयस निक्षेप, केसर की खेती इसी पर होती है। थार के पूर्व में लोयस जैसा महीन निक्षेप मिलता है।
3. कार्स्ट स्थलाकृति - घोलीकरण प्रक्रम और रूप
प्रक्रिया: चूना पत्थर (CaCO₃) में CO₂ युक्त जल से रासायनिक अपक्षय - CaCO₃ + CO₂ + H₂O → Ca(HCO₃)₂ जो जल में घुलकर बह जाता है। शर्तें - (i) 80% से अधिक शुद्ध चूना पत्थर, मोटी परत, (ii) अधिक वर्षा (>100 सेमी), (iii) जोड़ों वाला (Jointed) चूना पत्थर। इसलिए आर्द्र उष्णकटिबंध में सर्वाधिक विकसित।
अपरदनात्मक स्थलाकृतियाँ: (i) लैपीज (Lapies): सतह पर नुकीली कटक और गर्त, 1-2 मीटर ऊँची, चलना कठिन, फ्रांस में इन्हें Lapies, जर्मनी में Karren कहते हैं। (ii) घोलरंध्र / डोलाइन (Sinkhole/Doline): सतह पर गोल गर्त, व्यास 5-100 मीटर, गहराई 2-20 मीटर, वर्षा जल अंदर जाता है। (iii) युवाला (Uvala): कई डोलाइन मिलकर बड़ा गर्त। (iv) पोल्जे (Polje): सबसे बड़ा, 10 किमी तक लंबा, समतल तल, मेघालय में पोल्जे में धान की खेती। (v) गुफा और पोनोर: भूमिगत जल द्वारा गुफा निर्माण, जहाँ सतही नदी गायब होती है उसे पोनोर कहते हैं।
निक्षेपात्मक स्थलाकृतियाँ: गुफा की छत से टपकते Ca(HCO₃)₂ युक्त जल से CO₂ निकलने पर CaCO₃ पुनः जमा होता है। (i) स्टैलेक्टाइट (Stalactite): छत से लटकता, खोखला, हाथी की सूंड जैसा, ऊपर से नीचे बढ़ता है। (ii) स्टैलेग्माइट (Stalagmite): फर्श से उठता, ठोस, मोटा, नीचे से ऊपर बढ़ता है। (iii) स्तंभ (Column/Pillar): दोनों मिलने पर स्तंभ बनता है। (iv) ड्रिपस्टोन: पर्दे जैसी आकृति।
भारतीय और विश्व उदाहरण: विश्व - यूगोस्लाविया का कार्स्ट (टाइप क्षेत्र), पोस्टोज्ना गुफा (स्लोवेनिया, 24 किमी लंबी), मैमथ गुफा (USA, विश्व की सबसे लंबी 675 किमी)। भारत - मेघालय (विश्व का सबसे आर्द्र कार्स्ट, चेरापूंजी में 11,777 मिमी वर्षा, क्रेम लिआट प्राह विश्व की सबसे लंबी बलुआ पत्थर गुफा 31 किमी), बोर्रा गुफा (आंध्र प्रदेश, 80 मीटर गहरी, स्टैलेक्टाइट-स्टैलेग्माइट), कुटुमसर गुफा (छत्तीसगढ़, कांकेर), पचमढ़ी (MP, जटाशंकर गुफा), सहर (राजस्थान में सीमित)।
| विशेषता | पवन प्रक्रम (शुष्क) | कार्स्ट प्रक्रम (आर्द्र चूना क्षेत्र) |
|---|---|---|
| मुख्य प्रक्रिया | यांत्रिक - अपवाहन, अपघर्षण | रासायनिक - घोलीकरण (कार्बोनेशन) |
| जलवायु शर्त | <25 सेमी वर्षा, वनस्पति विहीन | >100 सेमी वर्षा, आर्द्र |
| अपरदनात्मक रूप | छत्रक शिला, यारडांग, अपवाहन गर्त | लैपीज, डोलाइन, युवाला, पोल्जे, गुफा |
| निक्षेपात्मक रूप | बरखान, सीफ, लोयस | स्टैलेक्टाइट, स्टैलेग्माइट, स्तंभ |
| भारतीय उदाहरण | थार के बरखान (जैसलमेर), कश्मीर करेवा लोयस | मेघालय कार्स्ट, बोर्रा गुफा, कुटुमसर |
Quick Revision - UPSC Prelims/Mains के लिए
- पवन अपरदन - नीचे कठोर ऊपर मुलायम = छत्रक शिला; कठोर-मुलायम लंबवत = यारडांग; क्षैतिज = ज्यूगेन।
- बरखान = अर्धचंद्राकार, सींग पवन की दिशा में, एकल पवन + कम रेत; सीफ = पवन के समानांतर, 100 किमी लंबे; परवलयिक = U-आकार, वनस्पति से स्थिर।
- लोयस = पवन निर्मित सिल्ट, असंस्तरित, पीला, उपजाऊ, ऊर्ध्वाधर खड़ा रहता है - चीन लोयस पठार विश्व में सबसे बड़ा, भारत में कश्मीर करेवा में केसर।
- कार्स्ट = चूना पत्थर + अधिक वर्षा + जोड़। प्रक्रिया CaCO₃ → Ca(HCO₃)₂ घुलना। 80% शुद्ध चूना आवश्यक।
- कार्स्ट क्रम - लैपीज (सतह कंटीली) → डोलाइन (छोटा गर्त) → युवाला (कई डोलाइन) → पोल्जे (विशाल मैदान) → गुफा।
- स्टैलेक्टाइट छत से (Tight to ceiling), स्टैलेग्माइट फर्श से (Might grow from floor) - याद करने की ट्रिक।
- भारत में थार बरखान 30 मीटर ऊँचे, 15 मी/वर्ष खिसकते हैं - इंदिरा गांधी नहर ने इन्हें स्थिर किया। मेघालय कार्स्ट विश्व का सबसे आर्द्र कार्स्ट है।
FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
Q1. बरखान और सीफ स्तूप में क्या अंतर है और थार में दोनों कहाँ मिलते हैं?
A. बरखान अर्धचंद्राकार, पवन के लंबवत, सींग पवन दिशा में, एकल दिशा पवन और कम रेत में बनता है, ऊँचाई 15-30 मी, गति 10-15 मी/वर्ष। सीफ (तलवार) अनुदैर्ध्य, पवन के समानांतर, 100 मी ऊँचा, 100 किमी लंबा, दो दिशाओं की पवन से बनता है, स्थिर। थार में जैसलमेर के सम क्षेत्र में बरखान (सक्रिय, बस्तियों के लिए खतरा), जैसलमेर-बाड़मेर में सीफ (स्थिर, लंबे)। बरखान रेगिस्तान के पूर्वी भाग में अधिक क्योंकि वहाँ रेत कम।
Q2. लोयस क्या है और कश्मीर के करेवा तथा चीन के लोयस पठार में क्या समानता है?
A. लोयस पवन द्वारा उड़ाकर लाई गई महीन सिल्ट (0.01-0.05 मिमी) का असंस्तरित, पीला, सरंध्र निक्षेप है, जो बिना परतों के ऊर्ध्वाधर खड़ा रह सकता है और अत्यंत उपजाऊ होता है। चीन का ह्वांगहो लोयस पठार (6,35,000 किमी², 100-300 मी मोटा) हिमनदों द्वारा पीसी गई धूल से बना, ह्वांगहो नदी का पीला रंग इसी से। कश्मीर के करेवा (1300 मी मोटे) भी हिमनदीय-लोयस हैं, झेलम के प्राचीन झील निक्षेप, जिन पर केसर, बादाम की खेती होती है। दोनों हिमनद-मरुस्थल संपर्क के प्रमाण हैं।
Q3. कार्स्ट स्थलाकृति मेघालय में ही इतनी विकसित क्यों है, राजस्थान में क्यों नहीं?
A. कार्स्ट के लिए 3 शर्तें - शुद्ध चूना पत्थर (>80% CaCO₃), अधिक वर्षा (>100 सेमी), जोड़ों वाला चूना। मेघालय में जैंथिया-खासी पहाड़ियों में शुद्ध चूना पत्थर, वर्षा 11,000 मिमी (विश्व में सर्वाधिक), जोड़ों वाला - इसलिए लैपीज, डोलाइन, 1,500 से अधिक गुफाएँ (क्रेम लिआट प्राह 31 किमी)। राजस्थान में चूना पत्थर कम, वर्षा 20 सेमी, शुष्क - इसलिए घोलीकरण नहीं, पवन प्रक्रम प्रभावी। इसलिए बोर्रा गुफा आंध्र में आर्द्र तट पर और कुटुमसर छत्तीसगढ़ में आर्द्र क्षेत्र में हैं।
Q4. स्टैलेक्टाइट और स्टैलेग्माइट कैसे बनते हैं और दोनों में अंतर कैसे पहचानें?
A. गुफा की छत से Ca(HCO₃)₂ युक्त जल टपकते समय CO₂ निकलने से CaCO₃ जमा होता है। छत पर जमा होकर नीचे लटकता है - स्टैलेक्टाइट (ग्रीक Stalaktos = टपकना, C = Ceiling से लटकता, खोखला)। फर्श पर गिरकर ऊपर उठता है - स्टैलेग्माइट (Stalagmos = उठना, M = Might rise from floor, ठोस)। दोनों मिलने पर स्तंभ (Column) बनता है। बोर्रा गुफा में 10-15 मीटर ऊँचे स्तंभ हैं। पहचान - स्टैलेक्टाइट पतला, खोखला, छत से; स्टैलेग्माइट मोटा, ठोस, फर्श से।