महासागरीय जलधाराएं - भाग 2
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हिंद महासागर की जलधाराएं, लवणता और ज्वार-भाटा पर आधारित 50 महत्वपूर्ण प्रश्न
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💡 व्याख्या
हिंद महासागर की जलधाराएं, लवणता, ज्वार-भाटा और प्रवाल भित्तियां
हिंद महासागर एकमात्र महासागर है जिसकी उत्तरी सीमा स्थल से घिरी है, इसलिए इसकी जलधाराएं मानसून के साथ दिशा बदलती हैं - शीतकाल में उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम और ग्रीष्म में दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व, जो विश्व में अद्वितीय है। महासागरीय जल की लवणता औसत 35‰ है पर वाष्पीकरण, वर्षा और नदियों के कारण लाल सागर में 41‰ और भूमध्य रेखा पर 34‰ तक भिन्न होती है। चंद्रमा और सूर्य के गुरुत्वाकर्षण से ज्वार-भाटा उत्पन्न होता है जो बंदरगाहों और मत्स्य के लिए महत्वपूर्ण है, जबकि 20-28°C गर्म, स्वच्छ, उथले जल में प्रवाल जीव कॉलोनी बनाकर भित्तियां बनाते हैं - ग्रेट बैरियर रीफ विश्व की सबसे बड़ी जैव संरचना है। UPSC में मानसून धारा का उत्क्रमण, लवणता का अक्षांशीय वितरण, वृहत-लघु ज्वार और प्रवाल के प्रकार प्रत्येक वर्ष पूछे जाते हैं।
हिंद महासागर की धाराएं: विशेषता - मानसून से प्रभावित, दिशा उत्क्रमित। शीतकालीन (उत्तर-पूर्व मानसून) - उत्तर-पूर्व मानसून धारा (ठंडी, बंगाल की खाड़ी से अरब सागर), सोमाली धारा उत्तर से दक्षिण (ठंडी)। ग्रीष्मकालीन (दक्षिण-पश्चिम मानसून) - दक्षिण-पश्चिम मानसून धारा (गर्म, 28°C, अरब सागर से बंगाल की खाड़ी, तीव्र 2 मी/से), सोमाली धारा दक्षिण से उत्तर (ठंडी Upwelling, 14°C)। दक्षिणी हिंद महासागर चक्र (वामावर्त) - दक्षिणी विषुवतीय धारा (गर्म), मोजाम्बिक धारा (गर्म, 24°C), अगुलहास धारा (गर्म, 24°C, अफ्रीका के दक्षिण में, तेज 2.5 मी/से), पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया धारा (ठंडी, 16°C)
लवणता (Salinity): औसत 35‰ (35 ग्राम/1000 ग्राम जल)। कारक - वाष्पीकरण > वर्षा = अधिक लवणता, नदी जल = कम लवणता, हिम पिघलन = कम। वितरण - कर्क-मकर रेखा पर अधिकतम 36-37‰ (उपोष्ण उच्च में वाष्पीकरण अधिक), विषुवत पर 34-35‰ (वर्षा अधिक), ध्रुव पर 30-32‰ (हिम पिघलन)। सर्वाधिक - वॉन झील (तुर्की) 330‰, मृत सागर 240‰, लाल सागर 41‰, फारस की खाड़ी 38‰, भूमध्य सागर 39‰। हिंद महासागर औसत 35‰, बंगाल की खाड़ी में 32‰ (गंगा-ब्रह्मपुत्र से), अरब सागर में 36‰
ज्वार-भाटा (Tides): कारण - चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण (70%) और सूर्य का (30%), अपकेंद्रीय बल। प्रकार - (i) अर्ध-दैनिक (Semi-diurnal, 2 उच्च-2 निम्न, 12 घंटे 25 मिनट अंतर, अधिकांश विश्व में), (ii) दैनिक (Diurnal, 1 उच्च-1 निम्न, 24 घंटे, मैक्सिको की खाड़ी), (iii) मिश्रित (Mixed, असमान ऊँचाई, प्रशांत तट)। वृहत ज्वार (Spring Tide) - अमावस्या-पूर्णिमा को सूर्य-चंद्रमा-पृथ्वी एक सीध में, ज्वार 20% अधिक, 3-5 मीटर। लघु ज्वार (Neap Tide) - सप्तमी-अष्टमी को सूर्य-चंद्रमा 90° पर, ज्वार 20% कम
प्रवाल भित्ति (Coral Reef): निर्माण - प्रवाल पॉलिप (Coelenterata) के कैल्शियम कार्बोनेट कंकाल से, कॉलोनी में। शर्तें - तापमान 20-28°C, लवणता 27-40‰, गहराई <60 मीटर (सूर्य प्रकाश), स्वच्छ, उथला, अवसाद रहित जल, ऑक्सीजन युक्त। प्रकार - (i) तटीय/अनुतट (Fringing, तट से लगी), (ii) अवरोधक (Barrier, तट से दूर, लैगून बीच में, ग्रेट बैरियर रीफ 2300 किमी), (iii) एटॉल (Atoll, वलयाकार, बीच में लैगून, लक्षद्वीप, मालदीव)। सिद्धांत - डार्विन का अवतलन सिद्धांत
1. हिंद महासागर की जलधाराएं - मानसून का प्रभाव और मौसमी उत्क्रमण
विशेषता: हिंद महासागर उत्तर में एशिया से घिरा है, इसलिए उत्तरी हिंद महासागर (0-20°N) की धाराएं स्थायी पवनों से नहीं बल्कि मानसून पवनों से नियंत्रित होती हैं और 6 महीने में दिशा बदलती हैं - विश्व में अद्वितीय। दक्षिणी हिंद महासागर (0-40°S) खुला है, इसलिए अटलांटिक-प्रशांत के समान स्थायी उपोष्ण चक्र बनता है।
(i) शीतकालीन धाराएं (नवंबर-मार्च, उत्तर-पूर्व मानसून): उत्तर-पूर्वी मानसून पवनें स्थल से समुद्र की ओर चलती हैं। (a) उत्तर-पूर्व मानसून धारा (ठंडी): बंगाल की खाड़ी से अरब सागर की ओर पश्चिम दिशा में, 1 मी/से, 27°C। (b) सोमाली धारा: सोमालिया तट पर उत्तर से दक्षिण की ओर, ठंडी नहीं पर कमजोर। (c) विषुवतीय प्रतिधारा (गर्म): पश्चिम से पूर्व की ओर 5°N पर, मानसून के कारण शीतकाल में ही दिखती है।
(ii) ग्रीष्मकालीन धाराएं (जून-सितंबर, दक्षिण-पश्चिम मानसून): दक्षिण-पश्चिम मानसून तीव्र, समुद्र से स्थल की ओर। (a) दक्षिण-पश्चिम मानसून धारा (गर्म, सबसे शक्तिशाली): अरब सागर से बंगाल की खाड़ी की ओर पूर्व दिशा में, 28°C, 2 मी/से, 20 Sv प्रवाह, आर्द्रता लाती है, भारतीय मानसून का समुद्री भाग। (b) सोमाली धारा (ठंडी, Upwelling): दक्षिण से उत्तर की ओर, 14°C, तीव्र Upwelling से ठंडा, पोषक तत्वों से भरपूर जल ऊपर आता है, इसलिए सोमालिया तट मत्स्य समृद्ध पर मरुस्थल तट (सोमाली मरुस्थल का कारण), गति 3.5 मी/से, विश्व की सबसे तेज ठंडी धाराओं में। (c) विषुवतीय प्रतिधारा लुप्त - तीव्र दक्षिण-पश्चिम धारा उसे ढक लेती है।
(iii) दक्षिणी हिंद महासागर चक्र (वामावर्त, स्थायी): (a) दक्षिणी विषुवतीय धारा (गर्म) ऑस्ट्रेलिया से अफ्रीका तक पश्चिम की ओर, 24°C। (b) मोजाम्बिक धारा (गर्म) मेडागास्कर और अफ्रीका के बीच दक्षिण की ओर, 24°C। (c) अगुलहास धारा (गर्म, विश्व की सबसे तेज गर्म धाराओं में): मोजाम्बिक के दक्षिण में अफ्रीका के दक्षिणी सिरे तक, 24°C, 2.5 मी/से, 100 Sv, फिर अटलांटिक में मुड़कर बेंगुएला से मिलती है। (d) पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया धारा (ठंडी) ऑस्ट्रेलिया के पश्चिमी तट पर उत्तर की ओर, 16°C, पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया मरुस्थल का कारण, मत्स्य समृद्ध।
2. लवणता और ज्वार-भाटा - वितरण, कारण और प्रकार
लवणता का अर्थ और कारक: 1000 ग्राम समुद्री जल में घुले लवणों की मात्रा ग्राम में, औसत 35‰। 90% लवण NaCl (27.2‰) और MgCl₂, MgSO₄, CaSO₄, KCl। कारक - (i) वाष्पीकरण-वर्षा संतुलन: वाष्पीकरण > वर्षा होने पर लवणता अधिक - कर्क-मकर रेखा (30°) पर उपोष्ण उच्च में वाष्पीकरण अधिक, वर्षा कम, इसलिए 36-37‰ अधिकतम, विषुवत पर वर्षा अधिक होने से 34-35‰ कम। (ii) नदी जल: नदियाँ मीठा जल लाती हैं, इसलिए गंगा-ब्रह्मपुत्र के कारण बंगाल की खाड़ी में 32‰, अमेजन के कारण अटलांटिक में 33‰। (iii) हिम पिघलन-निर्माण: हिम पिघलने से मीठा जल - ध्रुवों पर 30-32‰ कम, हिम बनने से लवणता बढ़ती है। (iv) पवन और धाराएं: पवनें लवणीय जल को अन्यत्र ले जाती हैं।
क्षैतिज वितरण: अटलांटिक में सबसे अधिक औसत 36‰ (वाष्पीकरण अधिक, नदियाँ कम), प्रशांत में 34‰, हिंद महासागर में 35‰। अधिकतम - कर्क-मकर पर 36-37‰, विषुवत पर 34‰, ध्रुव पर 30‰। बंद सागरों में - लाल सागर 41‰ (वाष्पीकरण अधिक, नदी नहीं), फारस की खाड़ी 38‰, भूमध्य सागर 39‰, मृत सागर 240‰ (झील), वॉन झील 330‰ (विश्व में सर्वाधिक)। लंबवत वितरण: सतह पर अधिक, 200 मीटर तक तेजी से कमी (हैलोक्लाइन), फिर स्थिर।
ज्वार-भाटा के कारण: चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण (चंद्रमा पृथ्वी के सबसे निकट, इसलिए 70% प्रभाव) और सूर्य का (30%), साथ ही अपकेंद्रीय बल। चंद्रमा के सामने वाला जल ऊपर खिंचता है - प्रत्यक्ष ज्वार, पीछे वाला अपकेंद्रीय बल से - अप्रत्यक्ष ज्वार, इसलिए दिन में 2 उच्च ज्वार। पृथ्वी 24 घंटे में घूमती है पर चंद्रमा भी आगे बढ़ता है, इसलिए ज्वार 24 घंटे 50 मिनट में 2 बार - प्रत्येक ज्वार 12 घंटे 25 मिनट बाद।
ज्वार के प्रकार: (i) अर्ध-दैनिक (Semi-diurnal): 2 उच्च-2 निम्न, ऊँचाई समान, अंतर 12 घंटे 25 मिनट, अधिकांश अटलांटिक तट, मुंबई में। (ii) दैनिक (Diurnal): 1 उच्च-1 निम्न, 24 घंटे 50 मिनट, मैक्सिको की खाड़ी, बंगाल की खाड़ी के उत्तरी भाग। (iii) मिश्रित (Mixed): 2 उच्च-2 निम्न पर ऊँचाई असमान, प्रशांत तट, अमेरिका के पश्चिमी तट। (iv) वृहत ज्वार (Spring Tide): अमावस्या-पूर्णिमा को सूर्य-चंद्रमा-पृथ्वी एक सीध (Syzygy) में, गुरुत्वाकर्षण जुड़ जाता है, ज्वार 20% अधिक, 3-5 मीटर, सबसे ऊँचा - कनाडा के फंडी की खाड़ी में 15 मीटर। (v) लघु ज्वार (Neap Tide): सप्तमी-अष्टमी को सूर्य-चंद्रमा 90° पर (Quadrature), गुरुत्वाकर्षण विपरीत, ज्वार 20% कम। (vi) उपभू-उच्च ज्वार: चंद्रमा पृथ्वी के निकट (Perigee, 3,56,000 किमी) होने पर 15% अधिक।
3. प्रवाल भित्तियां - प्रकार, निर्माण और डार्विन का सिद्धांत
प्रवाल जीव: सीलेन्टरेटा संघ का पॉलिप, 2-3 सेमी, कॉलोनी में रहता है, कैल्शियम कार्बोनेट (CaCO₃) का कंकाल स्रावित करता है, मृत्यु के बाद कंकाल पर नया पॉलिप बनता है, हजारों वर्षों में भित्ति बनती है। जूजैंथेली शैवाल (Zooxanthellae) के साथ सहजीवन - शैवाल प्रकाश संश्लेषण से भोजन देता है, प्रवाल घर देता है।
निर्माण की शर्तें (UPSC में 6 शर्तें पूछी जाती हैं): (i) तापमान 20-28°C (21°C से कम पर मृत्यु), (ii) लवणता 27-40‰ (औसत 35‰, मीठे जल में मृत्यु), (iii) गहराई <60 मीटर (सूर्य प्रकाश आवश्यक, शैवाल के लिए), (iv) स्वच्छ, अवसाद रहित जल (अवसाद से पॉलिप बंद हो जाता है), (v) ऑक्सीजन युक्त, तीव्र तरंग वाला जल, (vi) कठोर आधार (चट्टान)। इसलिए प्रवाल 30°N/S के बीच, पूर्वी तटों पर गर्म धारा वाले क्षेत्रों में अधिक - ग्रेट बैरियर रीफ, लक्षद्वीप।
प्रकार (डार्विन के अनुसार 3): (i) तटीय/अनुतट भित्ति (Fringing Reef): तट से लगी, 1-2 किमी चौड़ी, कोई लैगून नहीं या छोटा, सबसे सरल, जैसे - मन्नार की खाड़ी, अंडमान। (ii) अवरोधक भित्ति (Barrier Reef): तट से 10-100 किमी दूर, बीच में चौड़ा लैगून (खाड़ी), सबसे बड़ी - ग्रेट बैरियर रीफ (ऑस्ट्रेलिया, 2300 किमी लंबी, 150 किमी चौड़ी, विश्व की सबसे बड़ी जैव संरचना, अंतरिक्ष से दिखती है, 400 प्रकार के प्रवाल, 1500 मछली प्रजातियाँ)। (iii) एटॉल (Atoll): वलयाकार, बीच में लैगून, तट नहीं, जैसे - लक्षद्वीप (36 द्वीप एटॉल पर), मालदीव (26 एटॉल), प्रशांत में बिकिनी एटॉल।
डार्विन का अवतलन सिद्धांत (1837): तटीय भित्ति पहले ज्वालामुखी द्वीप के चारों ओर बनती है, द्वीप धीरे-धीरे अवतलित (Subsidence) होता है, भित्ति ऊपर बढ़ती रहती है, तटीय से अवरोधक बनती है, द्वीप डूबने पर एटॉल बन जाता है - इसलिए एटॉल के बीच में लैगून ज्वालामुखी द्वीप का स्थान है। डेली का हिमनद नियंत्रण सिद्धांत भी - हिम युग में समुद्र स्तर 100 मीटर कम होने पर भित्ति नीचे बनी, हिम पिघलने पर ऊपर बढ़ी। प्रवाल विरंजन (Bleaching) - तापमान 1°C बढ़ने पर जूजैंथेली निकल जाती है, प्रवाल सफेद होकर मर जाता है - 2016 में ग्रेट बैरियर रीफ का 30% विरंजित।
| विषय | प्रकार / वितरण | कारण / विशेषता | उदाहरण / महत्व |
|---|---|---|---|
| लवणता | कर्क-मकर पर 36-37‰ अधिक, विषुवत पर 34‰ कम, ध्रुव पर 30‰ कम | वाष्पीकरण > वर्षा पर अधिक, नदी-हिम से कम | लाल सागर 41‰, मृत सागर 240‰, बंगाल की खाड़ी 32‰ (गंगा से) |
| ज्वार-भाटा | वृहत (Spring) - अमावस्या-पूर्णिमा, 20% अधिक; लघु (Neap) - सप्तमी-अष्टमी, 20% कम | चंद्रमा 70% + सूर्य 30% गुरुत्वाकर्षण, अर्ध-दैनिक 12घं25मि | फंडी की खाड़ी 15 मी सबसे ऊँचा, मुंबई में अर्ध-दैनिक, ज्वारीय ऊर्जा |
| प्रवाल भित्ति | तटीय (तट से लगी), अवरोधक (तट से दूर, लैगून बीच में), एटॉल (वलयाकार, लैगून बीच में) | तापमान 20-28°C, लवणता 27-40‰, गहराई <60 मी, स्वच्छ जल | ग्रेट बैरियर रीफ 2300 किमी (अवरोधक), लक्षद्वीप-मालदीव एटॉल, मन्नार तटीय |
| हिंद महासागर धारा | शीत में उत्तर-पूर्व मानसून धारा पश्चिम की ओर, ग्रीष्म में दक्षिण-पश्चिम मानसून धारा पूर्व की ओर | मानसून पवनों से दिशा उत्क्रमण, विश्व में अद्वितीय | सोमाली धारा Upwelling, अगुलहास गर्म तेज, बंगाल में 32‰ लवणता |
Quick Revision - UPSC Prelims/Mains के लिए
- हिंद महासागर की धाराएं मानसून से दिशा बदलती हैं - शीत में उत्तर-पूर्व मानसून धारा (बंगाल से अरब), ग्रीष्म में दक्षिण-पश्चिम मानसून धारा (अरब से बंगाल) - विश्व में अद्वितीय। सोमाली धारा ग्रीष्म में ठंडी Upwelling, दक्षिण से उत्तर।
- लवणता औसत 35‰, कर्क-मकर पर अधिकतम 36-37‰ (वाष्पीकरण अधिक), विषुवत पर 34‰ (वर्षा अधिक), ध्रुव पर 30‰ (हिम पिघलन) - कारक वाष्पीकरण-वर्षा, नदी, हिम।
- सर्वाधिक लवणता - वॉन झील 330‰, मृत सागर 240‰, लाल सागर 41‰, बंगाल की खाड़ी 32‰ (गंगा से कम), अरब सागर 36‰।
- ज्वार-भाटा - चंद्रमा 70% + सूर्य 30% गुरुत्वाकर्षण, अर्ध-दैनिक 12घं25मि, वृहत ज्वार अमावस्या-पूर्णिमा को 20% अधिक (Syzygy), लघु ज्वार सप्तमी-अष्टमी को 20% कम (Quadrature)। फंडी की खाड़ी 15 मी सबसे ऊँचा।
- प्रवाल - 20-28°C, लवणता 27-40‰, गहराई <60 मी, स्वच्छ जल, 3 प्रकार - तटीय (तट से लगी, मन्नार), अवरोधक (तट से दूर, लैगून बीच में, ग्रेट बैरियर रीफ 2300 किमी), एटॉल (वलयाकार, लक्षद्वीप-मालदीव)।
- डार्विन सिद्धांत - ज्वालामुखी द्वीप के चारों ओर तटीय भित्ति → द्वीप अवतलन → अवरोधक → द्वीप डूबने पर एटॉल, बीच में लैगून द्वीप का स्थान।
- UPSC ट्रिक - हिंद महासागर की धाराएं मानसून से उत्क्रमित, लवणता कर्क-मकर पर अधिक, ज्वार में चंद्रमा 70%, प्रवाल विरंजन तापमान 1°C वृद्धि से - 2016 में ग्रेट बैरियर रीफ 30% विरंजित।
FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
Q1. हिंद महासागर की धाराएं दिशा क्यों बदलती हैं जबकि अटलांटिक-प्रशांत की नहीं?
A. अटलांटिक-प्रशांत उत्तर में खुले हैं, इसलिए व्यापारिक और पछुआ पवनें स्थायी हैं, धाराएं स्थायी उपोष्ण चक्र बनाती हैं। हिंद महासागर उत्तर में एशिया से घिरा है, इसलिए शीतकाल में स्थल से समुद्र की ओर उत्तर-पूर्व मानसून (शुष्क) और ग्रीष्म में समुद्र से स्थल की ओर दक्षिण-पश्चिम मानसून (आर्द्र) चलती हैं। उत्तरी हिंद महासागर (0-20°N) उथला और पवनों से सीधे प्रभावित, इसलिए पवनों के साथ धाराएं भी 6 महीने में दिशा बदलती हैं - शीत में पश्चिम की ओर उत्तर-पूर्व मानसून धारा, ग्रीष्म में पूर्व की ओर दक्षिण-पश्चिम मानसून धारा। दक्षिणी हिंद महासागर खुला होने से स्थायी वामावर्त चक्र बनाता है। यह उत्क्रमण विश्व में केवल हिंद महासागर में है।
Q2. लवणता कर्क और मकर रेखा पर सबसे अधिक क्यों होती है, विषुवत पर कम क्यों?
A. लवणता वाष्पीकरण-वर्षा संतुलन पर निर्भर। कर्क-मकर (25-35°) पर उपोष्ण उच्च दाब में वायु अवतलन से वर्षा <25 सेमी, वाष्पीकरण 200 सेमी से अधिक, इसलिए लवणता 36-37‰ अधिकतम। विषुवत पर वर्षा 200 सेमी, वाष्पीकरण 100 सेमी, इसलिए 34-35‰ कम। ध्रुव पर हिम प
िघलने से मीठा जल मिलने से 30-32‰ सबसे कम। इसलिए मानचित्र पर लवणता का अधिकतम कर्क-मकर पर, न्यूनतम विषुवत और ध्रुव पर। बंद सागरों में वाष्पीकरण अधिक और नदी नहीं होने से लाल सागर 41‰, भूमध्य सागर 39‰ अधिक।
Q3. वृहत ज्वार और लघु ज्वार में क्या अंतर है और फंडी की खाड़ी में 15 मीटर ज्वार क्यों आता है?
A. वृहत ज्वार (Spring Tide) अमावस्या-पूर्णिमा को सूर्य-चंद्रमा-पृथ्वी एक सीध (Syzygy) में होने से दोनों का गुरुत्वाकर्षण जुड़ जाता है, ज्वार 20% अधिक, 3-5 मीटर। लघु ज्वार (Neap Tide) सप्तमी-अष्टमी को सूर्य-चंद्रमा 90° पर (Quadrature) होने से गुरुत्वाकर्षण विपरीत दिशा में, ज्वार 20% कम। फंडी की खाड़ी (कनाडा) में खाड़ी की आकृति कीप जैसी, लंबाई 300 किमी, चौड़ाई मुहाने पर 100 किमी से शीर्ष पर 1 किमी, इसलिए ज्वारीय तरंग अंदर आकर संकरी होने से ऊँची हो जाती है - अनुनाद (Resonance) से 15 मीटर, विश्व में सबसे ऊँचा, ज्वारीय ऊर्जा के लिए आदर्श।
Q4. प्रवाल भित्तियां 30°N/S से अधिक क्यों नहीं बनतीं और एटॉल तथा अवरोधक में क्या अंतर है?
A. प्रवाल को 20-28°C तापमान, 27-40‰ लवणता, <60 मीटर गहराई और स्वच्छ जल चाहिए। 30°N/S से अधिक तापमान 20°C से कम, इसलिए प्रवाल मर जाता है। साथ ही ठंडी धाराएं (कैलिफोर्निया, कनारी) तट को ठंडा रखती हैं। इसलिए प्रवाल 30°N/S के बीच, गर्म धारा वाले पूर्वी तटों पर अधिक - ग्रेट बैरियर रीफ 15-25°S पर। अवरोधक भित्ति तट से 10-100 किमी दूर, बीच में चौड़ा लैगून, आकार बड़ा (ग्रेट बैरियर रीफ 2300 किमी), जैसे ऑस्ट्रेलिया। एटॉल वलयाकार, तट नहीं, बीच में लैगून, आकार छोटा (लक्षद्वीप 10 किमी), ज्वालामुखी द्वीप डूबने से बनता है - डार्विन सिद्धांत। अवरोधक में तट रहता है, एटॉल में तट डूब जाता है।