चट्टानें - भाग 2

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चट्टानें - भाग 2 - ऑनलाइन प्रैक्टिस क्विज़

शैल चक्र और भारत की प्रमुख चट्टानों पर आधारित 50 महत्वपूर्ण प्रश्न

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💡 व्याख्या

शैल चक्र और भारत की प्रमुख चट्टान प्रणालियाँ - धारवाड़ से दक्कन ट्रैप तक

शैल चक्र (Rock Cycle) पृथ्वी की भू-गतिकी का मूल सिद्धांत है जिसे जेम्स हटन ने 1788 में प्रतिपादित किया था। यह बताता है कि कोई भी चट्टान स्थायी नहीं है, बल्कि मैग्मा से आग्नेय, अपरदन से अवसादी और ताप-दाब से रूपांतरित चट्टान में निरंतर बदलती रहती है। भारत का भूवैज्ञानिक इतिहास 3.6 अरब वर्षों का है और यहाँ विश्व की सबसे प्राचीन से लेकर नवीनतम चट्टान प्रणालियाँ मौजूद हैं। UPSC में धारवाड़, कुडप्पा, विंध्यन, गोंडवाना और दक्कन ट्रैप का क्रम, आयु और आर्थिक महत्व से प्रत्येक वर्ष प्रश्न पूछा जाता है।

🔥 UPSC Facts Box - शैल चक्र और भारतीय चट्टान प्रणालियाँ
शैल चक्र के चालक: आंतरिक - पृथ्वी की आंतरिक ऊष्मा और प्लेट विवर्तनिकी (मैग्मा निर्माण, कायांतरण), बाह्य - सौर ऊर्जा (अपक्षय, अपरदन, निक्षेपण)
भारतीय भूवैज्ञानिक कालक्रम (GSI के अनुसार): आर्कियन बेसमेंट (4000-2500 Ma) → धारवाड़ (3500-2500 Ma) → कुडप्पा (1400-1000 Ma) → विंध्यन (1300-600 Ma) → गोंडवाना (360-180 Ma) → दक्कन ट्रैप (66 Ma) → शिवालिक (23-0.5 Ma)
धारवाड़ क्रम: सबसे प्राचीन अवसादी-ज्वालामुखी क्रम, धात्विक खनिजों का भंडार - कर्नाटक, झारखंड, ओडिशा में, आयु 3.2-2.5 अरब वर्ष
कुडप्पा क्रम: पुराना I (Purana I), अर्द्धचंद्राकार बेसिन, चूना पत्थर-शेल-क्वार्टजाइट, आयु 1400-1000 Ma, आंध्र प्रदेश के कुडप्पा जिले के नाम पर
विंध्यन क्रम: पुराना II (Purana II), बालुकाश्म-चूना पत्थर-शेल, हीरा, भवन सामग्री, आयु 1300-600 Ma, कैमूर-भांडेर-रीवा श्रृंखलाएँ
गोंडवाना क्रम: भारत का 98% कोयला, परमो-कार्बोनिफेरस से जुरासिक, दामोदर, सोन, महानदी घाटी में, आयु 360-180 Ma
दक्कन ट्रैप: 5 लाख किमी², 3000 मीटर मोटा, बेसाल्टिक लावा पठार, 66 Ma पर K-Pg सीमा पर, काली मिट्टी का जनक

1. शैल चक्र - प्रक्रियाएँ और चरण

शैल चक्र कभी न रुकने वाला चक्र है जिसमें तीन मुख्य प्रक्रियाएँ कार्य करती हैं।

(a) मैग्मा से आग्नेय चट्टान (Crystallization): मेंटल में 1200°C पर मैग्मा ठंडा होकर रवेदार आग्नेय चट्टान बनता है। गहराई पर धीरे ठंडा होकर ग्रेनाइट (बुंदेलखंड नाइस 2.5 Ga) और सतह पर तेजी से ठंडा होकर बेसाल्ट (दक्कन ट्रैप 66 Ma)। ये प्राथमिक चट्टानें हैं।

(b) आग्नेय से अवसादी चट्टान (Weathering-Erosion-Deposition-Lithification): सौर ऊर्जा से अपक्षय - भौतिक और रासायनिक। नदी, पवन, हिमनद द्वारा परिवहन और निक्षेपण। फिर शिलीभवन - संपीडन (Compaction) से आयतन घटता है और सीमेंटेशन (Cementation) - सिलिका, कैल्साइट, लौह ऑक्साइड द्वारा कण जुड़ते हैं। उदाहरण - विंध्यन बालुकाश्म दक्कन के ग्रेनाइट के अपरदन से बना। अवसादी चट्टानें जीवाश्म और परतें संरक्षित रखती हैं।

(c) अवसादी/आग्नेय से रूपांतरित चट्टान (Metamorphism): पर्वत निर्माण के दौरान 200-800°C ताप और 1000-8000 बार दाब पर खनिज पुनर्व्यवस्थित होते हैं। शेल → स्लेट → फाइलाइट → शिस्ट → नाइस, चूना पत्थर → संगमरमर (मकराना), बालुकाश्म → क्वार्टजाइट (दिल्ली क्वार्टजाइट)। अंत में 800°C से अधिक पर पुनः पिघलकर मैग्मा बनता है और चक्र पूरा होता है। यह चक्र लाखों वर्षों में प्लेट विवर्तनिकी द्वारा नियंत्रित होता है।

2. भारत की भूवैज्ञानिक संरचना का वैज्ञानिक कालक्रम

भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) ने भारत को चार प्रमुख युगों में बाँटा है। आर्कियन (Archean - 4000-2500 Ma): प्रायद्वीपीय भारत का बेसमेंट, नाइस और ग्रेनाइट - बुंदेलखंड नाइस, सिंहभूम ग्रेनाइट, अरावली का बांडेड नाइस। यह भारत की सबसे प्राचीन चट्टान है। पुराना महासमूह (Purana Group - 1400-600 Ma): इसमें कुडप्पा और विंध्यन आते हैं, जो आर्कियन पर असंबद्धता (Unconformity) से टिके हैं। द्रविड़ महासमूह (Dravidian - 600-300 Ma): कम विकसित, कश्मीर, शिमला, स्पीति में जीवाश्म युक्त अवसादी। आर्य महासमूह (Aryan Group - 360 Ma से वर्तमान): इसमें गोंडवाना, दक्कन ट्रैप, शिवालिक आते हैं। UPSC में पूछा जाता है - धारवाड़ आर्कियन में, कुडप्पा-विंध्यन पुराना में, गोंडवाना-दक्कन आर्य में।

3. भारत की प्रमुख चट्टान प्रणालियाँ - वितरण और आर्थिक महत्व

(i) धारवाड़ क्रम (Dharwar System - 3500-2500 Ma): कर्नाटक के धारवाड़ जिले के नाम पर। आर्कियन बेसमेंट पर स्थित सबसे प्राचीन रूपांतरित अवसादी-ज्वालामुखी क्रम। वितरण - कर्नाटक (धारवाड़, शिमोगा, बेल्लारी), झारखंड-ओडिशा (सिंहभूम, केंदुझर, बोनाई), मध्य प्रदेश (जबलपुर), अरावली में। चट्टानें - फाइलाइट, शिस्ट, क्वार्टजाइट, हॉर्नब्लेंड शिस्ट, लावा। आर्थिक महत्व - भारत का सबसे बड़ा धात्विक भंडार। कर्नाटक की कोलार और हट्टी स्वर्ण खानें, बाबाबूदन पहाड़ी की लौह अयस्क (हेमेटाइट), मैंगनीज, तांबा, क्रोमाइट। 95% भारतीय लौह अयस्क और सोना इसी क्रम से।

(ii) कुडप्पा क्रम (Cuddapah System - 1400-1000 Ma): आंध्र प्रदेश के कुडप्पा जिले के नाम पर, अर्द्धचंद्राकार बेसिन। धारवाड़ के बाद, विंध्यन से पहले। वितरण - आंध्र प्रदेश (कुडप्पा बेसिन 42,000 किमी²), छत्तीसगढ़ (रायपुर), दिल्ली (पापाघनी), राजस्थान (अजमेर)। चट्टानें - निचले भाग में शेल-क्वार्टजाइट, ऊपरी भाग में चूना पत्थर (पापाघनी, वेम्पल्ले), स्लेट, जेस्पर। आर्थिक महत्व - कुडप्पा चूना पत्थर सीमेंट उद्योग, एस्बेस्टस, स्टीटाइट, बैराइट्स। हीरे की मातृ चट्टान किम्बरलाइट इसी में मिलती है। जीवाश्म रहित।

(iii) विंध्यन क्रम (Vindhyan System - 1300-600 Ma): विंध्य पर्वत के नाम पर, कुडप्पा के बाद, सबसे विस्तृत पुराना अवसादी क्रम। वितरण - 1,04,000 किमी² में, सोन घाटी से राजस्थान तक - कैमूर (बिहार-UP), भांडेर (MP), रीवा, सेमरी श्रृंखलाएँ। चट्टानें - बालुकाश्म (लाल बलुआ पत्थर - लाल किला, चित्तौड़गढ़), चूना पत्थर (चूना, सीमेंट), शेल। विशेषता - हीरा युक्त कांग्लोमरेट, पन्ना (MP) और गोलकुंडा हीरे इसी में। भवन सामग्री का सबसे बड़ा स्रोत। जीवाश्म - नगण्य पर सबसे प्राचीन नीली-हरित शैवाल के जीवाश्म।

(iv) गोंडवाना क्रम (Gondwana System - 360-180 Ma): दक्षिण गोलार्ध के गोंडवानालैंड के नाम पर, कार्बोनिफेरस से जुरासिक तक। वितरण - रिफ्ट घाटियों में - दामोदर घाटी (रानीगंज-झरिया), सोन घाटी, महानदी घाटी (तलचर-इब), गोदावरी घाटी (सिंगरेनी), कश्मीर, सिक्किम। चट्टानें - टिलाइट (हिमानी गोलाश्म - आधार में), बालुकाश्म, शेल, कोयला सीम। आर्थिक महत्व - भारत का 98% कोयला (बिटुमिनस), दामोदर घाटी भारत की रूर घाटी कहलाती है। ग्लोसोप्टेरिस वनस्पति जीवाश्म।

(v) दक्कन ट्रैप (Deccan Trap - 66 Ma): ट्रैप = स्वीडिश शब्द Trappa = सीढ़ी, सीढ़ीनुमा स्थलाकृति के कारण। क्रिटेशियस के अंत में रीयूनियन हॉटस्पॉट से 5 लाख किमी² में 3000 मीटर मोटा बेसाल्टिक लावा प्रवाह। वितरण - महाराष्ट्र, गुजरात, MP, कर्नाटक, आंध्र का उत्तरी भाग। चट्टानें - बेसाल्ट, डोलेराइट डाइक। महत्व - K-Pg महाविलुप्ति (डायनासोर विलुप्ति) से संबंध, काली कपास मिट्टी (रेगुर) का जनक, सबसे उपजाऊ कपास क्षेत्र।

प्रणाली आयु मुख्य वितरण चट्टान प्रकार आर्थिक महत्व
धारवाड़ 3500-2500 Ma कर्नाटक, झारखंड, ओडिशा शिस्ट, फाइलाइट, क्वार्टजाइट लोहा, सोना, मैंगनीज, तांबा
कुडप्पा 1400-1000 Ma आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़ चूना पत्थर, शेल, क्वार्टजाइट सीमेंट, एस्बेस्टस, बैराइट्स
विंध्यन 1300-600 Ma MP, UP, बिहार, राजस्थान बालुकाश्म, चूना पत्थर भवन पत्थर, हीरा (पन्ना)
गोंडवाना 360-180 Ma दामोदर, महानदी, गोदावरी घाटी बालुकाश्म, शेल, कोयला 98% कोयला, ताप विद्युत
दक्कन ट्रैप 66 Ma महाराष्ट्र, गुजरात, MP बेसाल्ट काली मिट्टी, जलभृत

Quick Revision - UPSC Prelims/Mains के लिए

  • कालक्रम याद रखें - D-C-V-G-D (धारवाड़ → कुडप्पा → विंध्यन → गोंडवाना → दक्कन ट्रैप) - आयु घटती जाती है।
  • धारवाड़ = धात्विक खनिज (लोहा-सोना), कुडप्पा = रासायनिक खनिज (चूना-एस्बेस्टस), विंध्यन = भवन सामग्री + हीरा, गोंडवाना = कोयला, दक्कन = काली मिट्टी।
  • कुडप्पा और विंध्यन दोनों पुराना महासमूह हैं पर कुडप्पा पुराना I और विंध्यन पुराना II है - विंध्यन कुडप्पा के बाद।
  • गोंडवाना का नाम ऑस्ट्रिया के वैज्ञानिक एच.बी. मेडलिकोट ने 1872 में दिया, गोंड जनजाति के क्षेत्र के नाम पर।
  • दक्कन ट्रैप की मोटाई मुंबई में 3000 मीटर, नागपुर में 800 मीटर - उत्तर-पूर्व की ओर मोटाई घटती है।
  • शैल चक्र में - आग्नेय → अवसादी में अपक्षय सबसे धीमा (हजारों वर्ष), रूपांतरित → मैग्मा में पिघलना सबसे तेज (पर्वत निर्माण में)।
  • भारत का सबसे बड़ा कोयला क्षेत्र - झरिया (झारखंड), सबसे बड़ा लौह क्षेत्र - बेल्लारी-हॉस्पेट (कर्नाटक) दोनों क्रमशः गोंडवाना और धारवाड़ में।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Q1. धारवाड़ और कुडप्पा क्रम में क्या अंतर है और धारवाड़ आर्थिक रूप से अधिक महत्वपूर्ण क्यों है?
A. धारवाड़ आर्कियन (3500-2500 Ma) का रूपांतरित ज्वालामुखी-अवसादी क्रम है, जबकि कुडप्पा प्रोटेरोजोइक (1400-1000 Ma) का अवसादी क्रम है। धारवाड़ में तीव्र कायांतरण से लौह, सोना, मैंगनीज जैसे धात्विक खनिज सांद्रित हो गए, क्योंकि यह हरे पत्थर पट्टी (Greenstone Belt) है। कुडप्पा में रासायनिक अवसादन से चूना, एस्बेस्टस जैसे अधात्विक खनिज बने। इसलिए धारवाड़ धात्विक खनिजों का और कुडप्पा अधात्विक खनिजों का भंडार है। UPSC में धारवाड़ को भारत का धात्विक खजाना कहा जाता है।

Q2. विंध्यन क्रम में हीरा क्यों मिलता है और पन्ना की खदानें इसी में क्यों हैं?
A. विंध्यन क्रम में निचले भाग में कांग्लोमरेट (गोलाश्म) है जिसमें आर्कियन किम्बरलाइट पाइपों से बहकर आए हीरे के टुकड़े (Detrital Diamond) फंसे हैं। ऊपरी विंध्यन में समुद्री अतिक्रमण से हीरे युक्त बजरी जमा हुई। पन्ना (MP) में मझगवां किम्बरलाइट पाइप विंध्यन को काटता है, इसलिए हीरे विंध्यन कांग्लोमरेट में द्वितीयक निक्षेप के रूप में मिलते हैं। कुडप्पा में प्राथमिक किम्बरलाइट और विंध्यन में द्वितीयक प्लेसर हीरे - यही कारण है कि पन्ना और गोलकुंडा (कृष्णा घाटी) हीरे के क्षेत्र हैं।

Q3. गोंडवाना कोयला दामोदर घाटी में ही क्यों केंद्रित है?
A. गोंडवाना कोयला परमो-कार्बोनिफेरस हिमयुग के बाद बने रिफ्ट बेसिनों में जमा हुआ। दामोदर, सोन, महानदी घाटियाँ भ्रंश घाटियाँ (Rift Valleys) हैं जो गोंडवानालैंड के टूटने के समय बनीं। इनमें विशाल दलदली वन (ग्लोसोप्टेरिस वनस्पति) दब गए और लाखों वर्षों में कोयले में बदले। दामोदर घाटी में 6 कोयला परतें (Seams) 300 मीटर मोटी हैं, जबकि अन्यत्र 1-2 ही हैं। इसलिए झरिया-रानीगंज-तलचर भारत के 80% कोयले का स्रोत हैं।

Q4. दक्कन ट्रैप और शिवालिक में क्या संबंध है?
A. दोनों आर्य महासमूह के हैं पर आयु और निर्माण में भिन्न। दक्कन ट्रैप 66 Ma पर ज्वालामुखीय (बेसाल्टिक) है और पठारी, जबकि शिवालिक 23-0.5 Ma पर हिमालय से आए अवसादों (बालुकाश्म-कांग्लोमरेट) से बना है और मोड़दार है। दक्कन ट्रैप K-Pg विलुप्ति और काली मिट्टी से जुड़ा है, शिवालिक मानव पूर्वज (रामापिथेकस) और जीवाश्म हाथियों के लिए प्रसिद्ध है। UPSC में दक्कन ट्रैप को लावा पठार और शिवालिक को अवसादी मोड़दार पर्वत के उदाहरण के रूप में पूछा जाता है।