भारत की मृदाएँ: जलोढ़, काली तथा लाल मृदा

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भारत की मृदाएँ: जलोढ़, काली तथा लाल मृदा - ऑनलाइन प्रैक्टिस क्विज़

भारत की प्रमुख मृदाओं का विस्तृत विवरण, जिसमें जलोढ़ मृदा, काली मृदा तथा लाल मृदा की विशेषताएँ, वितरण तथा उपयोग सम्मिलित हैं। यह विषय यूपीएससी और राज्य पीसीएस परीक्षाओं के लिए उपयोगी है।

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💡 व्याख्या

भारत की मृदाएँ: जलोढ़, काली तथा लाल मृदा

भारत की मृदा विविधता देश की कृषि तथा अर्थव्यवस्था का आधार मानी जाती है। जलवायु, उच्चावच, वनस्पति तथा मातृ शैल के भिन्न-भिन्न प्रभावों के कारण देश में अनेक प्रकार की मृदाएँ पाई जाती हैं। इनमें जलोढ़ मृदा, काली मृदा तथा लाल मृदा प्रमुख हैं। यूपीएससी तथा राज्य पीसीएस की दृष्टि से इन मृदाओं का अध्ययन अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

जलोढ़ मृदा

जलोढ़ मृदा भारत में सर्वाधिक विस्तृत क्षेत्र में पाई जाने वाली मृदा मानी जाती है। यह मृदा नदियों द्वारा लाए गए अवसादों से बनती है और उत्तर भारत के विशाल मैदानों, तटीय मैदानों तथा डेल्टा क्षेत्रों में पाई जाती है। इस मृदा में पोटाश, फॉस्फोरिक अम्ल तथा चूने की मात्रा पर्याप्त होती है परंतु नाइट्रोजन तथा जैविक पदार्थ की मात्रा अपेक्षाकृत कम रहती है।

जलोढ़ मृदा को दो प्रमुख भागों में विभाजित किया जाता है। खादर मृदा नदियों के बाढ़ मैदानों में पाई जाती है और इसमें रेत, सिल्ट तथा मिट्टी का मिश्रण होता है। बांगर मृदा नदियों से दूर स्थित उच्च भागों में पाई जाती है और इसमें चूने की गाँठें पाई जाती हैं। जलोढ़ मृदा गेहूँ, धान, गन्ना तथा दलहन जैसी फसलों के लिए अत्यंत उपजाऊ मानी जाती है।

काली मृदा

काली मृदा को रेगुर मृदा के नाम से भी जाना जाता है। यह मुख्यतः दक्कन के पठार के उत्तर-पश्चिमी भाग, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश तथा गुजरात के कुछ भागों में पाई जाती है। इसका निर्माण बेसाल्ट चट्टान के अपक्षय से होता है और इसमें लोहे तथा चूने की मात्रा अधिक होती है।

काली मृदा की सर्वाधिक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यह नमी को अधिक मात्रा में धारण कर सकती है। शुष्क ऋतु में इसमें गहरी दरारें पड़ जाती हैं और वर्षा ऋतु में यह फूल जाती है। इस मृदा में स्वतः जुताई की क्षमता पाई जाती है जिसके कारण इसे कपास के लिए सर्वाधिक उपयुक्त माना जाता है। काली मृदा में कपास, ज्वार, गेहूँ तथा तिलहन जैसी फसलें उगाई जाती हैं।

लाल मृदा

लाल मृदा भारत के प्रायद्वीपीय पठार के पूर्वी तथा दक्षिणी भागों में पाई जाती है। इसका लाल रंग लोहे के आक्साइड की उपस्थिति के कारण होता है। यह मृदा कम उपजाऊ मानी जाती है और इसमें नाइट्रोजन तथा जैविक पदार्थ की मात्रा सीमित रहती है। लाल मृदा का विस्तार तमिलनाडु, ओडिशा, छत्तीसगढ़ तथा झारखंड के कुछ भागों में देखा जाता है।

लाल मृदा में मोटे अनाज, दलहन तथा कुछ प्रकार के तिलहन उगाए जाते हैं। उर्वरकों तथा जैविक खाद के उपयोग से इस मृदा की उत्पादकता बढ़ाई जा सकती है। जल-धारण क्षमता कम होने के कारण इस मृदा में सिंचाई की आवश्यकता अधिक होती है। इसी कारण कृषि योजना बनाते समय इस मृदा की विशेषताओं का ध्यान रखना आवश्यक माना जाता है।

यूपीएससी तथ्य बॉक्स

  • जलोढ़ मृदा भारत में सर्वाधिक विस्तृत क्षेत्र में पाई जाती है।
  • काली मृदा को रेगुर मृदा भी कहा जाता है और यह कपास के लिए उपयुक्त है।
  • लाल मृदा का रंग लोहे के आक्साइड के कारण होता है।
  • खादर मृदा बाढ़ मैदानों में तथा बांगर मृदा उच्च भागों में पाई जाती है।
  • काली मृदा में स्वतः जुताई की विशेषता पाई जाती है।

प्रमुख मृदाओं की तुलनात्मक तालिका

मृदा का प्रकारमुख्य क्षेत्रप्रमुख फसलें
जलोढ़ मृदाउत्तर भारत के मैदान तथा तटीय क्षेत्रगेहूँ, धान, गन्ना
काली मृदादक्कन का पठार तथा महाराष्ट्रकपास, ज्वार, तिलहन
लाल मृदाप्रायद्वीपीय पठार के पूर्वी भागमोटे अनाज, दलहन
खादर मृदानदियों के बाढ़ मैदानधान, गन्ना
बांगर मृदानदियों से दूर उच्च भागगेहूँ, दलहन

निष्कर्ष

भारत की मृदाएँ देश की कृषि तथा खाद्य सुरक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। जलोढ़, काली तथा लाल मृदा की विशेषताओं तथा उनके भौगोलिक वितरण को समझना कृषि योजना तथा फसल चयन के लिए आवश्यक माना जाता है। प्रतियोगी परीक्षाओं में इन मृदाओं से संबंधित प्रश्न नियमित रूप से पूछे जाते हैं और इसलिए इनका गहन अध्ययन आवश्यक है।