विश्व जलवायु वर्गीकरण - भाग 2

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विश्व जलवायु वर्गीकरण - भाग 2 - ऑनलाइन प्रैक्टिस क्विज़

मानसूनी जलवायु और ग्लोबल वार्मिंग पर आधारित 50 महत्वपूर्ण प्रश्न

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प्रश्न 1

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💡 व्याख्या

मानसूनी जलवायु और जलवायु परिवर्तन: भारतीय मानसून, अल-नीनो और ग्लोबल वार्मिंग

मानसूनी जलवायु उष्णकटिबंधीय जलवायु का सबसे महत्वपूर्ण उप-प्रकार है जहाँ वर्षा का मौसमी उत्क्रमण (Seasonal Reversal) होता है - ग्रीष्म में समुद्र से स्थल की ओर आर्द्र पवनें और शीतकाल में स्थल से समुद्र की ओर शुष्क पवनें। भारत इसका टाइप क्षेत्र है जहाँ दक्षिण-पश्चिम मानसून से 75% वर्षा होती है। पिछले 150 वर्षों में मानवीय कारणों से CO₂ 280 ppm से 420 ppm होने से वैश्विक तापमान 1.2°C बढ़ा है, जिससे मानसून की परिवर्तनशीलता, अल-नीनो की तीव्रता और समुद्र स्तर में वृद्धि हो रही है। IPCC, क्योटो प्रोटोकॉल और पेरिस समझौता इसी परिवर्तन को रोकने के प्रयास हैं। UPSC में मानसून की क्रियाविधि, अल-नीनो-ला नीना का भारतीय मानसून से संबंध और पेरिस समझौते का 1.5°C लक्ष्य प्रत्येक वर्ष पूछा जाता है।

🔥 UPSC Facts Box - मानसूनी जलवायु और जलवायु परिवर्तन
मानसूनी जलवायु (Am, Aw, Cwg): कोपेन में Am (उष्णकटिबंधीय मानसूनी, सबसे शुष्क महीना <6 सेमी पर वार्षिक >150 सेमी), Aw (सवाना, शीत शुष्क)। क्षेत्र - 10-25°N/S महाद्वीपों के पूर्वी तट - भारत, दक्षिण-पूर्व एशिया, उत्तरी ऑस्ट्रेलिया, पूर्वी अफ्रीका, ब्राजील तट। विशेषता - 3 ऋतु, ग्रीष्म में 75-90% वर्षा, तापमान 25-32°C, दैनिक तापांतर <10°C
भारतीय मानसून: आगमन - 1 जून केरल में, 15 जुलाई पूरे भारत में। 2 शाखाएँ - अरब सागर (पश्चिमी घाट, 250 सेमी) और बंगाल की खाड़ी (उत्तर-पूर्व, चेरापूंजी 11,777 मिमी)। क्रियाविधि - (i) स्थल-समुद्र तापांतर, (ii) ITCZ का उत्तर खिसकाव (मानसून गर्त), (iii) तिब्बत उच्च दाब और TEJ, (iv) STJ का उत्तर खिसकना, (v) सोमाली जेट (1.5 किमी, 40 किमी/घंटा)
अल-नीनो और ला नीना: अल-नीनो - पूर्वी प्रशांत (पेरू तट) में समुद्र सतह तापमान (SST) सामान्य से 2-5°C गर्म, SOI नकारात्मक, हवाएँ कमजोर, भारतीय मानसून कमजोर (सहसंबंध -0.6)। ला नीना - पूर्वी प्रशांत ठंडा, SOI सकारात्मक, भारतीय मानसून मजबूत। ENSO चक्र 3-7 वर्ष। भारतीय प्रभाव - अल-नीनो वर्ष में 70% सूखा, ला नीना में 60% अधिक वर्षा
IOD: Indian Ocean Dipole - पश्चिमी हिंद महासागर गर्म (Positive IOD) होने पर भारतीय मानसून मजबूत, Negative IOD पर कमजोर। 1997 Positive IOD ने अल-नीनो के बावजूद मानसून बचाया
ग्लोबल वार्मिंग: ग्रीनहाउस गैसें - CO₂ (76%, 420 ppm), CH₄ (16%, 1920 ppb, 80 गुना अधिक शक्तिशाली 20 वर्ष में), N₂O (6%), HFCs। वैश्विक तापमान 1850-1900 से 1.2°C वृद्धि (2024 तक), समुद्र स्तर 3.4 मिमी/वर्ष वृद्धि, आर्कटिक बर्फ 13% प्रति दशक कमी
IPCC और समझौते: IPCC - 1988 में WMO+UNEP द्वारा, AR6 (2021-2023) - 1.5°C 2030-2035 में पार होगा। क्योटो प्रोटोकॉल 1997, 2005 में लागू, 37 विकसित देशों को 1990 से 5% कमी (2008-12), बाध्यकारी। पेरिस समझौता 2015, 196 देश, लक्ष्य - 2°C से नीचे, प्रयास 1.5°C, NDC (राष्ट्रीय निर्धारित योगदान), 5 वर्ष में Global Stocktake, भारत का लक्ष्य - 2070 तक नेट-जीरो, 2030 तक 500 GW गैर-जीवाश्म

1. मानसूनी जलवायु - विशेषताएं, क्षेत्र और भारतीय मानसून की क्रियाविधि

विशेषताएं: मानसूनी जलवायु में 3 स्पष्ट ऋतुएँ - गर्म शुष्क ग्रीष्म (मार्च-जून, 35-45°C, लू), आर्द्र वर्षा ऋतु (जून-सितंबर, 75-90% वर्षा, 27°C), शीत शुष्क शीतकाल (अक्टूबर-फरवरी, 15-20°C)। वार्षिक वर्षा 100-250 सेमी, पर परिवर्तनशीलता 30-40% - बाढ़ और सूखा साथ-साथ। कोपेन में Am (पश्चिमी घाट, असम, वर्षा >200 सेमी, छोटा शुष्क मौसम) और Aw (अधिकांश भारत, वर्षा 50-150 सेमी, 6-8 महीने शुष्क)। वनस्पति - मानसूनी पर्णपाती (सागौन, साल, शीशम), मिट्टी - लैटेराइट और जलोढ़।

क्षेत्र: 10-25°N/S में महाद्वीपों के पूर्वी और मध्य भाग - भारत-पाकिस्तान-बांग्लादेश (टाइप क्षेत्र), म्यांमार-थाईलैंड-वियतनाम, दक्षिणी चीन, उत्तरी ऑस्ट्रेलिया, पूर्वी अफ्रीका (इथियोपिया-सोमालिया), पश्चिमी अफ्रीका, ब्राजील का उत्तर-पूर्वी तट। विश्व की 60% जनसंख्या इसी जलवायु में।

भारतीय मानसून की क्रियाविधि (UPSC Mains के लिए 5 कारक): (i) स्थल-समुद्र तापांतर: ग्रीष्म में थार और तिब्बत पठार 45°C तक गर्म, हिंद महासागर 30°C, इसलिए निम्न दाब (994 mb) बनता है और समुद्र से आर्द्र पवनें खिंचती हैं। (ii) ITCZ/मानसून गर्त: सूर्य के उत्तरायण से ITCZ जुलाई में 20-25°N (हिमालय तराई) तक खिसकता है, इसे मानसून गर्त कहते हैं, यही निम्न दाब का अक्ष है। (iii) तिब्बत उच्च और TEJ: तिब्बत पठार (5000 मी) ग्रीष्म में गर्म होकर ऊपरी क्षोभमंडल (14 किमी) में प्रतिचक्रवात बनाता है, उसके दक्षिणी किनारे पर उष्ण पूर्वी जेट (TEJ, 8-15°N, 150 किमी/घंटा) बनता है, TEJ के नीचे अपसरण से मानसून तीव्र होता है। (iv) STJ का उत्तर खिसकना: उपोष्ण पछुआ जेट (STJ) शीतकाल में 25°N पर भारत पर होता है, जून प्रथम सप्ताह में तिब्बत के उत्तर (35-40°N) खिसक जाने पर भारत पर से अवतलन हटता है और मानसून का प्रस्फोट (Burst) होता है। (v) सोमाली जेट और मेडागास्कर उच्च: मेडागास्कर के पास उच्च दाब से सोमाली तट से 1.5 किमी ऊँचाई पर 40-50 किमी/घंटा का निम्न स्तरीय जेट अरब सागर से आर्द्रता लाता है।

2. अल-नीनो, ला नीना और हिंद महासागर द्विध्रुव का मानसून से संबंध

सामान्य स्थिति: प्रशांत में दक्षिण-पूर्व व्यापारिक पवनें पूर्व से पश्चिम चलती हैं, गर्म जल (28-30°C) पश्चिमी प्रशांत (इंडोनेशिया) में जमा, ठंडा जल (22°C) पूर्वी प्रशांत (पेरू) में ऊपर आता है (Upwelling), पेरू में मत्स्य समृद्ध। पश्चिमी प्रशांत में निम्न दाब, पूर्वी में उच्च दाब - वाकर कोशिका (Walker Cell) बनती है, भारतीय मानसून मजबूत।

अल-नीनो (El Nino - The Child Christ): 3-7 वर्ष में व्यापारिक पवनें कमजोर, गर्म जल पूर्व की ओर फैलता है, पेरू तट पर SST 2-5°C बढ़कर 28°C, Upwelling बंद, मत्स्य समाप्त, पेरू में वर्षा, इंडोनेशिया-भारत में सूखा। दक्षिणी दोलन सूचकांक (SOI) नकारात्मक (ताहिती में दाब कम, डार्विन में अधिक)। भारतीय मानसून से सहसंबंध -0.6, अर्थात अल-नीनो वर्ष में 70% संभावना सामान्य से कम मानसून की - 2002, 2004, 2009, 2014-15 में सूखा अल-नीनो से। नाम - पेरू में क्रिसमस के आसपास दिखने से।

ला नीना (La Nina - The Little Girl): अल-नीनो के विपरीत, व्यापारिक पवनें तीव्र, गर्म जल और अधिक पश्चिम में, पेरू तट पर SST 2-3°C ठंडा, Upwelling तीव्र, SOI सकारात्मक। भारतीय मानसून मजबूत - 2010, 2020-22 में अधिक वर्षा, 60% बाढ़ की संभावना। ला नीना 1-3 वर्ष चलती है, अल-नीनो 1 वर्ष।

हिंद महासागर द्विध्रुव (IOD): 1999 में खोजा गया, हिंद महासागर का अल-नीनो। Positive IOD - पश्चिमी हिंद महासागर (अरब सागर) गर्म, पूर्वी (इंडोनेशिया) ठंडा, पश्चिमी में निम्न दाब, भारतीय मानसून मजबूत। Negative IOD - विपरीत, मानसून कमजोर। 1997 में तीव्र अल-नीनो के बावजूद Positive IOD (पश्चिमी हिंद महासागर गर्म) होने से भारतीय मानसून सामान्य रहा - IOD ने अल-नीनो के प्रभाव को काटा। 2019 में तीव्र Positive IOD से अत्यधिक वर्षा। UPSC में IOD को मानसून का स्वतंत्र नियंत्रक कहा जाता है।

3. जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग - कारण, प्रभाव, IPCC, क्योटो और पेरिस समझौता

कारण: (i) प्राकृतिक: सौर परिवर्तन (11 वर्षीय चक्र, 0.1%), ज्वालामुखी (एरोसोल से 0.5°C ठंडक, जैसे पिनातुबो 1991), महाद्वीपीय विस्थापन। (ii) मानवीय (मुख्य): जीवाश्म ईंधन दहन से CO₂ 280 ppm (1750) से 420 ppm (2024), CH₄ 720 ppb से 1920 ppb (धान, मवेशी, जीवाश्म), N₂O (उर्वरक), HFCs (AC)। CO₂ का जीवनकाल 100-1000 वर्ष, CH₄ 20 वर्ष में CO₂ से 80 गुना अधिक शक्तिशाली।

प्रभाव: (i) तापमान - वैश्विक औसत 1850-1900 से 1.2°C वृद्धि, 2023 सबसे गर्म वर्ष (1.48°C), 1.5°C सीमा 2030-35 में पार होगी (IPCC AR6)। (ii) समुद्र स्तर - 1901 से 20 सेमी वृद्धि, वर्तमान 3.4 मिमी/वर्ष, 2100 तक 0.3-1 मीटर। (iii) हिमनद - आर्कटिक बर्फ 13% प्रति दशक कमी, हिमालय 30% 2100 तक पिघलेगा। (iv) चरम घटनाएँ - हीटवेव 5 गुना अधिक, भारी वर्षा 30% अधिक, चक्रवात तीव्र, मानसून परिवर्तनशीलता 10% बढ़ी। (v) कृषि - गेहूँ उत्पादन 6% प्रति 1°C कमी, समुद्र अम्लीकरण pH 8.2 से 8.1।

समाधान - IPCC और समझौते: (i) IPCC (1988, WMO+UNEP): वैज्ञानिक आकलन, AR6 (2021-23) - मानव प्रभाव Unequivocal, 1.5°C के लिए 2025 तक उत्सर्जन शिखर और 2030 तक 43% कमी आवश्यक, नेट-जीरो 2050 तक। (ii) UNFCCC (1992): जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क, 197 देश। (iii) क्योटो प्रोटोकॉल (1997, लागू 2005): 37 विकसित देशों (Annex I) को 1990 से 2008-12 में 5% कमी, बाध्यकारी, कार्बन बाजार (CDM)। USA ने अनुसमर्थन नहीं किया, कनाडा बाहर, इसलिए विफल। (iv) पेरिस समझौता (2015, लागू 2016): 196 देश, लक्ष्य - वैश्विक तापमान वृद्धि 2°C से नीचे, प्रयास 1.5°C, सभी देशों के NDC (राष्ट्रीय निर्धारित योगदान), 5 वर्ष में Global Stocktake (पहला 2023), वित्त - विकसित देश 100 बिलियन डॉलर/वर्ष। भारत का NDC - 2030 तक GDP उत्सर्जन तीव्रता 45% कमी (2005 से), 500 GW गैर-जीवाश्म क्षमता, 2070 तक नेट-जीरो। किगाली संशोधन 2016 - HFCs 80% कमी।

तुलना बिंदु अल-नीनो ला नीना
प्रशांत SST / SOI पूर्वी प्रशांत गर्म (+2-5°C), SOI नकारात्मक पूर्वी प्रशांत ठंडा (-2-3°C), SOI सकारात्मक
व्यापारिक पवन / वाकर कोशिका कमजोर, वाकर कोशिका पूर्व खिसकती है तीव्र, वाकर कोशिका पश्चिम में मजबूत
भारतीय मानसून पर प्रभाव कमजोर, 70% सूखा संभावना, 2002, 2009, 2015 सूखा मजबूत, 60% अधिक वर्षा, 2010, 2020-22 बाढ़
तुलना - समझौता क्योटो प्रोटोकॉल (1997) पेरिस समझौता (2015)
प्रकृति / लक्ष्य बाध्यकारी, केवल विकसित देशों को 1990 से 5% कमी स्वैच्छिक NDC, सभी देश, लक्ष्य 2°C से नीचे, प्रयास 1.5°C
सफलता / भारत USA बाहर, कनाडा बाहर, सीमित सफलता 198 देश, भारत - 2070 नेट-जीरो, 2030 तक 500 GW गैर-जीवाश्म

Quick Revision - UPSC Prelims/Mains के लिए

  • मानसूनी जलवायु Am/Aw - 10-25° में, 3 ऋतु, 75-90% वर्षा ग्रीष्म में, भारत टाइप क्षेत्र - अरब सागर और बंगाल की खाड़ी 2 शाखाएँ।
  • भारतीय मानसून के 5 कारक - स्थल-समुद्र तापांतर, ITCZ/मानसून गर्त, तिब्बत उच्च+TEJ, STJ का उत्तर खिसकना, सोमाली जेट - 1 जून केरल, 15 जुलाई पूरे भारत।
  • अल-नीनो - पूर्वी प्रशांत गर्म (+2-5°C), SOI नकारात्मक, व्यापारिक पवन कमजोर, भारतीय मानसून कमजोर (-0.6 सहसंबंध)। ला नीना - पूर्वी प्रशांत ठंडा, SOI सकारात्मक, मानसून मजबूत।
  • IOD - पश्चिमी हिंद महासागर गर्म = Positive IOD = मानसून मजबूत, 1997 में अल-नीनो के बावजूद Positive IOD ने मानसून बचाया - स्वतंत्र नियंत्रक।
  • ग्लोबल वार्मिंग - CO₂ 280 से 420 ppm, CH₄ 80 गुना अधिक शक्तिशाली, तापमान +1.2°C, समुद्र स्तर 3.4 मिमी/वर्ष, आर्कटिक -13%/दशक।
  • IPCC AR6 - 1.5°C 2030-35 में पार, 43% कमी 2030 तक आवश्यक, नेट-जीरो 2050। क्योटो बाध्यकारी पर केवल विकसित, पेरिस स्वैच्छिक NDC पर सभी देश, लक्ष्य 2°C से नीचे, प्रयास 1.5°C।
  • UPSC ट्रिक - अल-नीनो वर्ष में भारत में सूखा 70%, ला नीना में बाढ़ 60%; Positive IOD मानसून के लिए अच्छा, Negative बुरा; भारत का लक्ष्य 2070 नेट-जीरो, 2030 तक 500 GW गैर-जीवाश्म।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Q1. भारतीय मानसून में STJ, TEJ और सोमाली जेट की भूमिका क्या है?
A. STJ (उपोष्ण पछुआ जेट, 25°N, 12 किमी) शीतकाल में भारत पर होता है और अवतलन से उच्च दाब बनाए रखता है, मानसून को रोकता है। जून प्रथम सप्ताह में जब STJ तिब्बत के उत्तर (35-40°N) खिसक जाता है तो भारत पर से अवतलन हटता है और मानसून का प्रस्फोट होता है - आगमन का ट्रिगर। TEJ (उष्ण पूर्वी जेट, 8-15°N, 14 किमी) तिब्बत पठार के गर्म होने से बनता है, उसके नीचे ऊपरी अपसरण से नीचे का मानसून निम्न दाब तीव्र होता है - तीव्रता का कारक। सोमाली जेट (1.5 किमी, निम्न स्तरीय) मेडागास्कर उच्च से अरब सागर होते हुए आर्द्रता लाता है - आर्द्रता का वाहक। तीनों जेट के मजबूत होने पर मानसून मजबूत।

Q2. अल-नीनो भारतीय मानसून को कमजोर कैसे करता है और क्या हर अल-नीनो में सूखा होता है?
A. सामान्य में वाकर कोशिका पश्चिमी प्रशांत में उठती है, भारत में आर्द्रता लाती है। अल-नीनो में पूर्वी प्रशांत गर्म होने से वाकर कोशिका पूर्व खिसक जाती है, पश्चिमी प्रशांत में अवतलन होता है, भारत में उच्च दाब और शुष्क। सहसंबंध -0.6 है, अर्थात हर अल-नीनो में सूखा नहीं - 1997 तीव्र अल-नीनो में भी मानसून सामान्य रहा क्योंकि Positive IOD ने साथ दिया। 70% अल-नीनो वर्षों में सूखा, 30% में सामान्य। ला नीना में 60% वर्षों में अधिक वर्षा। इसलिए IMD अल-नीनो के साथ IOD और बर्फ आवरण भी देखता है।

Q3. क्योटो प्रोटोकॉल और पेरिस समझौते में क्या अंतर है और भारत के लिए कौन अधिक महत्वपूर्ण है?
A. क्योटो (1997, लागू 2005) बाध्यकारी था - 37 विकसित देशों को 1990 से 2008-12 में 5% कमी, विकासशील देशों पर कोई लक्ष्य नहीं, कार्बन बाजार (CDM) था। USA ने अनुसमर्थन नहीं किया, कनाडा बाहर निकल गया, इसलिए विफल। पेरिस (2015) स्वैच्छिक है - सभी 196 देशों के NDC (राष्ट्रीय निर्धारित योगदान), लक्ष्य 2°C से नीचे, प्रयास 1.5°C, 5 वर्ष में Global Stocktake, वित्त 100 बिलियन डॉलर/वर्ष। भारत के लिए पेरिस अधिक महत्वपूर्ण क्योंकि इसमें CBDR (समान पर विभेदित जिम्मेदारी) है, भारत को 2070 तक नेट-जीरो का समय मिला, 2030 तक 500 GW गैर-जीवाश्म और 45% उत्सर्जन तीव्रता कमी का NDC दिया, जो विकास के साथ जलवायु न्याय देता है।

Q4. ग्लोबल वार्मिंग से भारतीय मानसून पर क्या प्रभाव पड़ रहा है?
A. 4 प्रभाव - (i) परिवर्तनशीलता बढ़ी - 1950-80 में मानसून विचलन 10% था, अब 15% - बाढ़ और सूखा साथ-साथ। (ii) तीव्र वर्षा घटनाएँ 30% बढ़ीं - 2018 केरल बाढ़, 2023 हिमाचल बाढ़। (iii) मानसून अवधि छोटी पर तीव्र - जून-सितंबर में 75% वर्षा अब 60 दिन में। (iv) उत्तर-पश्चिम भारत में वर्षा 10% बढ़ी, उत्तर-पूर्व में 10% घटी - मानसून का पश्चिम विस्तार। IPCC AR6 के अनुसार 2°C वार्मिंग पर भारतीय मानसून 10-20% अधिक वर्षा देगा पर सूखा और बाढ़ दोनों बढ़ेंगे। समाधान - जल संचयन, सूखा-प्रतिरोधी फसलें, पूर्वानुमान में सुधार।