अलंकार की परिभाषा, भेद और उदाहरण - सम्पूर्ण जानकारी
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अलंकार किसे कहते हैं, अलंकार के प्रकार शब्दालंकार, अर्थालंकार, अनुप्रास, यमक, श्लेष, उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, अतिशयोक्ति की परिभाषा और उदाहरण।
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💡 व्याख्या
अलंकार की परिभाषा
काव्य की शोभा बढ़ाने वाले तत्वों को अलंकार कहा जाता है। जिस प्रकार आभूषण शरीर की शोभा बढ़ाते हैं, उसी प्रकार अलंकार काव्य की शोभा बढ़ाते हैं। अलंकार शब्द का अर्थ है आभूषण। काव्य में शब्द और अर्थ की सुंदरता बढ़ाने के लिए अलंकारों का प्रयोग किया जाता है। अलंकार के बिना काव्य फीका लगता है। इसलिए कवि अपने काव्य को सुंदर बनाने के लिए अलंकारों का प्रयोग करते हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं में अलंकार से प्रश्न अनिवार्य रूप से पूछे जाते हैं, इसलिए इसका ज्ञान आवश्यक है।
अलंकार के मुख्य भेद
हिंदी व्याकरण में अलंकार के तीन मुख्य भेद माने गए हैं। प्रत्येक भेद की अपनी अलग पहचान और विशेषता होती है।
1. शब्दालंकार
जहाँ शब्दों के प्रयोग से काव्य में चमत्कार उत्पन्न होता है, वहाँ शब्दालंकार होता है। शब्दालंकार में शब्द विशेष का महत्व होता है। यदि उस शब्द के स्थान पर उसका पर्यायवाची रख दिया जाए तो अलंकार समाप्त हो जाता है। शब्दालंकार के प्रमुख भेद अनुप्रास, यमक और श्लेष हैं। अनुप्रास में वर्णों की आवृत्ति होती है, यमक में एक ही शब्द दो बार आता है और अलग अर्थ देता है, श्लेष में एक शब्द के दो अर्थ होते हैं।
2. अर्थालंकार
जहाँ अर्थ के कारण काव्य में चमत्कार उत्पन्न होता है, वहाँ अर्थालंकार होता है। अर्थालंकार में अर्थ की प्रधानता होती है। यदि शब्द बदल भी दिया जाए तो भी अलंकार बना रहता है। अर्थालंकार के प्रमुख भेद उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, अतिशयोक्ति, उपमेय, उपमान जैसे हैं। उपमा में दो वस्तुओं की समानता दिखाई जाती है, रूपक में एक वस्तु पर दूसरी का आरोप होता है और उत्प्रेक्षा में संभावना व्यक्त की जाती है।
3. उभयालंकार
जहाँ शब्द और अर्थ दोनों में चमत्कार होता है, वहाँ उभयालंकार होता है। उभयालंकार में शब्द और अर्थ दोनों का महत्व होता है। यह अलंकार शब्दालंकार और अर्थालंकार का मिला जुला रूप होता है। उभयालंकार में शब्द और अर्थ दोनों से काव्य की शोभा बढ़ती है। इसलिए इसे उभयालंकार कहा जाता है। यह भेद परीक्षा में कभी कभी पूछा जाता है और इसका ज्ञान होना चाहिए।
शब्दालंकार के प्रमुख भेद
1. अनुप्रास अलंकार
जहाँ एक ही वर्ण या वर्ण समूह की आवृत्ति बार-बार होती है, वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है। जैसे चारु चंद्र की चंचल किरणें, यहाँ च वर्ण की आवृत्ति हुई है। अनुप्रास में वर्णों की आवृत्ति से काव्य में संगीतात्मकता आती है। अनुप्रास के पाँच भेद होते हैं, छेकानुप्रास, वृत्यनुप्रास, लाटानुप्रास, श्रुत्यनुप्रास और अंत्यानुप्रास। प्रत्येक भेद में वर्णों की आवृत्ति अलग प्रकार से होती है।
2. यमक अलंकार
जहाँ एक ही शब्द दो या दो से अधिक बार आता है और हर बार अलग अर्थ देता है, वहाँ यमक अलंकार होता है। जैसे कनक कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय, यहाँ पहले कनक का अर्थ सोना और दूसरे कनक का अर्थ धतूरा है। यमक में शब्द की आवृत्ति होती है और अर्थ अलग होता है। यमक शब्द का अर्थ है दो और यह अलंकार शब्द की आवृत्ति पर आधारित है।
3. श्लेष अलंकार
जहाँ एक ही शब्द से दो या दो से अधिक अर्थ निकलते हैं, वहाँ श्लेष अलंकार होता है। जैसे रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून, यहाँ पानी के तीन अर्थ हैं, जल, इज्जत और चमक। श्लेष में एक शब्द के अनेक अर्थ होते हैं और एक ही बार शब्द आता है। श्लेष शब्द का अर्थ है चिपका हुआ और यह अलंकार चतुराई पर आधारित है।
अर्थालंकार के प्रमुख भेद
1. उपमा अलंकार
जहाँ एक वस्तु की दूसरी वस्तु से समानता दिखाई जाए, वहाँ उपमा अलंकार होता है। उपमा में चार तत्व होते हैं, उपमेय, उपमान, साधारण धर्म और वाचक शब्द। जैसे मुख चंद्रमा के समान सुंदर है, यहाँ मुख उपमेय है, चंद्रमा उपमान है, सुंदर साधारण धर्म है और समान वाचक शब्द है। उपमा अर्थालंकार का सबसे प्रमुख भेद है।
2. रूपक अलंकार
जहाँ उपमेय पर उपमान का आरोप किया जाए और दोनों में अभेद दिखाया जाए, वहाँ रूपक अलंकार होता है। जैसे मुख चंद्र है, यहाँ मुख पर चंद्रमा का आरोप किया गया है। रूपक में उपमेय और उपमान में एकरूपता दिखाई जाती है। रूपक में वाचक शब्द नहीं होता है और दोनों में अभेद होता है। यह उपमा से अलग है।
3. उत्प्रेक्षा अलंकार
जहाँ उपमेय में उपमान की संभावना की जाए, वहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार होता है। जैसे मुख मानो चंद्रमा है, यहाँ मुख में चंद्रमा की संभावना की गई है। उत्प्रेक्षा में मानो, मानहु, जानो जैसे शब्दों का प्रयोग होता है। उत्प्रेक्षा में कल्पना की प्रधानता होती है और संभावना व्यक्त की जाती है। यह अर्थालंकार का महत्वपूर्ण भेद है।
4. अतिशयोक्ति अलंकार
जहाँ किसी वस्तु का वर्णन बहुत बढ़ा चढ़ाकर किया जाए, वहाँ अतिशयोक्ति अलंकार होता है। जैसे हनुमान की पूँछ में लगन न पाई आग, लंका सिगरी जल गई गए निशाचर भाग, यहाँ पूँछ में आग लगने से पहले ही लंका जलने की बात कही गई है। अतिशयोक्ति में लोक सीमा से अधिक वर्णन होता है।
अलंकार के भेद और उदाहरण तालिका
| अलंकार का नाम | पहचान | उदाहरण |
|---|---|---|
| अनुप्रास अलंकार | वर्णों की आवृत्ति | चारु चंद्र की चंचल किरणें |
| यमक अलंकार | एक शब्द दो बार, अलग अर्थ | कनक कनक ते सौ गुनी |
| श्लेष अलंकार | एक शब्द के दो अर्थ | रहिमन पानी राखिए |
| उपमा अलंकार | दो वस्तुओं में समानता, सा, समान शब्द | मुख चंद्रमा के समान सुंदर |
| रूपक अलंकार | उपमेय पर उपमान का आरोप | मुख चंद्र है |
| उत्प्रेक्षा अलंकार | संभावना, मानो, मानहु शब्द | मुख मानो चंद्रमा है |
| अतिशयोक्ति अलंकार | बढ़ा चढ़ाकर वर्णन | हनुमान की पूँछ में आग, लंका जल गई |
परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण सुझाव
अलंकार की पहचान के लिए चमत्कार के कारण को समझना आवश्यक है। यदि वर्णों की आवृत्ति हो तो अनुप्रास, यदि एक शब्द दो बार अलग अर्थ में आए तो यमक, यदि एक शब्द के दो अर्थ हों तो श्लेष, यदि समानता दिखाई जाए तो उपमा, यदि आरोप हो तो रूपक, यदि संभावना हो तो उत्प्रेक्षा और यदि बढ़ा चढ़ाकर वर्णन हो तो अतिशयोक्ति समझना चाहिए। प्रतिदिन पाँच अलंकारों के उदाहरणों का अभ्यास करने से अलंकार में दक्षता प्राप्त होती है।