कांग्रेस की स्थापना - ऑनलाइन प्रैक्टिस क्विज़

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कांग्रेस की स्थापना - ऑनलाइन प्रैक्टिस क्विज़

कांग्रेस की स्थापना पर आधारित 50 प्रश्नों का ऑनलाइन अभ्यास क्विज़। प्रत्येक प्रश्न के साथ सही उत्तर और संक्षिप्त व्याख्या दी गई है।

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भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस: स्थापना, विकास, प्रमुख चरण और स्वतंत्रता आंदोलन में भूमिका

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस आधुनिक भारत के राजनीतिक इतिहास का एक प्रमुख संगठन था। इसकी स्थापना 1885 में हुई और धीरे-धीरे यह भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का सबसे व्यापक राजनीतिक मंच बन गया। प्रारंभिक वर्षों में कांग्रेस ने संवैधानिक सुधारों और प्रशासन में भारतीय भागीदारी की मांग की, जबकि 20वीं शताब्दी में स्वदेशी, असहयोग, सविनय अवज्ञा और भारत छोड़ो जैसे जन आंदोलनों के माध्यम से स्वतंत्रता संघर्ष को व्यापक बनाया। कांग्रेस का इतिहास एकरूप नहीं था; इसमें नरमपंथी, गरमपंथी, गांधीवादी और विभिन्न वैचारिक धाराओं के बीच बहस और मतभेद भी रहे।

कांग्रेस की स्थापना की पृष्ठभूमि

19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में आधुनिक शिक्षा, प्रेस, सामाजिक सुधार और राजनीतिक जागरूकता के प्रसार से भारतीयों के बीच अखिल भारतीय राजनीतिक संगठन की आवश्यकता महसूस हुई। भारतीय संघों और सार्वजनिक संस्थाओं ने पहले से ही राजनीतिक प्रश्नों पर चर्चा शुरू कर दी थी। भारतीय सिविल सेवा, आर्थिक नीतियों और प्रशासन में भारतीय प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दे सार्वजनिक बहस का हिस्सा बन रहे थे।

1885 में स्थापना

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का पहला अधिवेशन दिसंबर 1885 में बंबई में हुआ। इसकी अध्यक्षता डब्ल्यू. सी. बनर्जी ने की। ए. ओ. ह्यूम ने संगठन के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जबकि दादाभाई नौरोजी, सुरेंद्रनाथ बनर्जी और अन्य भारतीय नेताओं ने प्रारंभिक राष्ट्रीय राजनीति के विकास में योगदान दिया। कांग्रेस के शुरुआती अधिवेशनों में विभिन्न प्रांतों के शिक्षित भारतीय नेताओं को एक साझा मंच मिला।

प्रारंभिक कांग्रेस और नरमपंथी चरण

कांग्रेस के शुरुआती नेताओं को प्रायः नरमपंथी या उदारवादी कहा जाता है। वे संवैधानिक तरीकों, याचिकाओं, सार्वजनिक बहस और प्रतिनिधिमंडलों के माध्यम से प्रशासनिक सुधार प्राप्त करना चाहते थे। उनकी मांगों में विधान परिषदों का विस्तार, भारतीयों की प्रशासन में अधिक भागीदारी और आर्थिक नीतियों में सुधार शामिल थे।

दादाभाई नौरोजी का योगदान

दादाभाई नौरोजी कांग्रेस के प्रमुख प्रारंभिक नेताओं में थे। उन्होंने ब्रिटिश शासन की आर्थिक नीतियों की आलोचना करते हुए धन-निकासी के सिद्धांत को विकसित किया। उनके अनुसार भारत की संपत्ति का एक हिस्सा विभिन्न माध्यमों से ब्रिटेन चला जाता था। उनकी आर्थिक आलोचना ने भारतीय राष्ट्रवाद को मजबूत बौद्धिक आधार प्रदान किया।

गरमपंथी राष्ट्रवाद का उदय

20वीं शताब्दी के प्रारंभ में कांग्रेस के भीतर अधिक सक्रिय और assertive राजनीतिक दृष्टिकोण विकसित हुआ। बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय और बिपिन चंद्र पाल जैसे नेताओं ने स्वराज, स्वदेशी और बहिष्कार जैसे विचारों को अधिक जोर से उठाया। 1905 में बंगाल विभाजन के विरोध ने इस नई राजनीतिक शैली को व्यापक जनसमर्थन दिया।

बंगाल विभाजन और स्वदेशी आंदोलन

1905 में लॉर्ड कर्जन ने बंगाल का विभाजन किया। इसके विरोध में स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन शुरू हुआ। विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार तथा भारतीय उद्योग और उत्पादों के समर्थन को राजनीतिक आंदोलन से जोड़ा गया। स्वदेशी आंदोलन ने विद्यार्थियों, महिलाओं, व्यापारियों और अन्य सामाजिक समूहों को भी राष्ट्रीय राजनीति से जोड़ने में योगदान दिया।

सूरत विभाजन

1907 के सूरत अधिवेशन में कांग्रेस के नरमपंथी और गरमपंथी नेताओं के बीच गंभीर मतभेद सामने आए। संगठन में विभाजन हो गया और कुछ समय तक दोनों धाराएँ अलग-अलग रहीं। बाद में राजनीतिक परिस्थितियों ने दोनों पक्षों के बीच सहयोग की आवश्यकता को फिर बढ़ाया।

लखनऊ समझौता

1916 का लखनऊ अधिवेशन कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच सहयोग के लिए महत्वपूर्ण था। दोनों संगठनों के बीच समझौते ने कुछ संवैधानिक मांगों पर साझा राजनीतिक रुख बनाया। इसी अधिवेशन में कांग्रेस के नरमपंथी और गरमपंथी नेताओं के बीच पुनः एकता भी हुई।

गांधी का कांग्रेस में उदय

महात्मा गांधी 1915 में दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे। चंपारण, खेड़ा और अहमदाबाद के स्थानीय आंदोलनों में उनके अनुभवों ने भारतीय राजनीति में उनके प्रभाव को बढ़ाया। 1919 के रॉलेट एक्ट और जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद राष्ट्रीय आंदोलन का स्वरूप अधिक व्यापक हुआ। गांधी ने सत्याग्रह और अहिंसा को जन राजनीतिक संघर्ष का प्रमुख माध्यम बनाया।

असहयोग आंदोलन

1920 में कांग्रेस ने असहयोग आंदोलन को स्वीकार किया। सरकारी संस्थाओं, विदेशी वस्तुओं और औपनिवेशिक संस्थानों के बहिष्कार के माध्यम से ब्रिटिश शासन के प्रति असहयोग का कार्यक्रम चलाया गया। आंदोलन ने राष्ट्रीय राजनीति को शहरों से बाहर ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1922 में चौरी-चौरा की हिंसक घटना के बाद गांधी ने आंदोलन वापस ले लिया।

पूर्ण स्वराज्य का लक्ष्य

1929 के लाहौर अधिवेशन में जवाहरलाल नेहरू कांग्रेस के अध्यक्ष बने और पूर्ण स्वराज्य को लक्ष्य के रूप में स्वीकार किया गया। 26 जनवरी 1930 को स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया। इसके बाद सविनय अवज्ञा आंदोलन के लिए राजनीतिक वातावरण तैयार हुआ।

सविनय अवज्ञा आंदोलन और दांडी मार्च

1930 में गांधी ने नमक कानून के विरोध में साबरमती से दांडी तक मार्च किया। नमक सत्याग्रह ने औपनिवेशिक कानूनों के विरुद्ध सविनय अवज्ञा को व्यापक जन आंदोलन का रूप दिया। महिलाओं, किसानों, विद्यार्थियों और व्यापारियों सहित विभिन्न समूहों ने अलग-अलग क्षेत्रों में आंदोलन में भाग लिया।

भारत सरकार अधिनियम 1935 और प्रांतीय शासन

भारत सरकार अधिनियम 1935 के बाद 1937 में प्रांतीय चुनाव हुए। कांग्रेस ने कई प्रांतों में सरकारें बनाई। इन सरकारों के अनुभव ने भारतीय नेताओं को प्रशासन चलाने का व्यावहारिक अनुभव दिया। 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध के संदर्भ में राजनीतिक मतभेदों के कारण कांग्रेस मंत्रिमंडलों ने इस्तीफा दे दिया।

भारत छोड़ो आंदोलन

अगस्त 1942 में कांग्रेस ने भारत छोड़ो आंदोलन शुरू किया। गांधी ने “करो या मरो” का संदेश दिया। ब्रिटिश सरकार ने कांग्रेस के शीर्ष नेताओं को तुरंत गिरफ्तार कर लिया, लेकिन देश के कई हिस्सों में आंदोलन जारी रहा। भूमिगत गतिविधियों और स्थानीय आंदोलनों ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध व्यापक असंतोष को प्रदर्शित किया।

कांग्रेस और स्वतंत्रता की अंतिम प्रक्रिया

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ब्रिटिश सरकार और भारतीय राजनीतिक संगठनों के बीच सत्ता हस्तांतरण पर बातचीत तेज हुई। कैबिनेट मिशन, अंतरिम सरकार और 1947 की माउंटबेटन योजना इस प्रक्रिया के महत्वपूर्ण चरण थे। कांग्रेस ने अंततः विभाजन की योजना को स्वीकार किया और 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ।

कांग्रेस की भूमिका और सीमाएँ

कांग्रेस ने राष्ट्रीय आंदोलन को व्यापक राजनीतिक मंच प्रदान किया, लेकिन इसके भीतर हमेशा मतभेद और विविध विचारधाराएँ मौजूद रहीं। संगठन में शिक्षित मध्यम वर्ग, किसान, मजदूर, व्यापारी, महिलाएँ और विभिन्न सामाजिक समूह अलग-अलग समय पर जुड़े। फिर भी कांग्रेस का प्रभाव पूरे भारत में समान नहीं था और कई राजनीतिक समूह उससे अलग भी रहे। मुस्लिम लीग के साथ उसके संबंध विशेष रूप से जटिल रहे और अंततः विभाजन की राजनीति ने भारतीय स्वतंत्रता की प्रक्रिया को प्रभावित किया।

संतुलित निष्कर्ष

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का इतिहास 1885 से 1947 तक भारतीय राष्ट्रवाद के विकास की एक लंबी और बहुआयामी यात्रा है। प्रारंभिक संवैधानिक मांगों से शुरू होकर संगठन स्वदेशी, असहयोग, सविनय अवज्ञा और भारत छोड़ो जैसे व्यापक आंदोलनों तक पहुँचा। गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने जन भागीदारी का विस्तार किया, जबकि नेहरू, पटेल, राजेंद्र प्रसाद और अनेक अन्य नेताओं ने राजनीतिक तथा प्रशासनिक निर्माण में योगदान दिया। साथ ही कांग्रेस के भीतर वैचारिक मतभेद और अन्य राजनीतिक संगठनों के साथ संघर्ष भी रहे। इसलिए कांग्रेस को भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का एक प्रमुख, लेकिन अकेला नहीं, राजनीतिक मंच मानना अधिक ऐतिहासिक रूप से संतुलित है।

इस अध्याय की क्विज़ कांग्रेस की स्थापना, डब्ल्यू. सी. बनर्जी, ए. ओ. ह्यूम, दादाभाई नौरोजी, नरमपंथी और गरमपंथी, बंगाल विभाजन, स्वदेशी आंदोलन, सूरत अधिवेशन, लखनऊ समझौता, गांधी युग, असहयोग, पूर्ण स्वराज्य, सविनय अवज्ञा, भारत छोड़ो आंदोलन और स्वतंत्रता की अंतिम प्रक्रिया से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्यों की पुनरावृत्ति में सहायता करती है।