संवैधानिक विकास - ऑनलाइन प्रैक्टिस क्विज़
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संवैधानिक विकास पर आधारित 50 प्रश्नों का ऑनलाइन अभ्यास क्विज़। प्रत्येक प्रश्न के साथ सही उत्तर और संक्षिप्त व्याख्या दी गई है।
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💡 व्याख्या
भारत में संवैधानिक विकास: 1773 से 1935 तक
भारत में संवैधानिक विकास ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रशासन पर नियंत्रण स्थापित करने से शुरू होकर धीरे-धीरे प्रतिनिधित्व, विधायी सुधार और भारतीय भागीदारी के विस्तार तक पहुँचा। 1773 के रेगुलेटिंग एक्ट से 1935 के भारत सरकार अधिनियम तक अनेक महत्वपूर्ण कानूनों ने भारत की प्रशासनिक और राजनीतिक व्यवस्था को प्रभावित किया। संवैधानिक सुधारों की शुरुआत का प्रमुख कारण कंपनी के प्रशासन में भ्रष्टाचार और ब्रिटिश संसद द्वारा नियंत्रण की आवश्यकता थी। समग्र दिशा केंद्रीय नियंत्रण से प्रांतीय स्वायत्तता और सीमित प्रतिनिधित्व की ओर बढ़ती दिखाई देती है।
रेगुलेटिंग एक्ट 1773 ब्रिटिश संसद द्वारा कंपनी के प्रशासन पर नियंत्रण बढ़ाने की दिशा में पहला महत्वपूर्ण कदम था। इसने बंगाल के गवर्नर को गवर्नर-जनरल के रूप में स्थापित किया, कलकत्ता में सुप्रीम कोर्ट की स्थापना की और प्रशासनिक व्यवस्था को नियंत्रित करने की नई प्रक्रिया शुरू की। पिट्स इंडिया एक्ट 1784 ने कंपनी के राजनीतिक मामलों पर ब्रिटिश सरकार के नियंत्रण को मजबूत किया। इसमें बोर्ड ऑफ कंट्रोल की स्थापना हुई और कंपनी के वाणिज्यिक तथा राजनीतिक कार्यों के बीच स्पष्ट अंतर किया गया। चार्टर एक्ट और विधायी परिवर्तन के तहत 1813, 1833 और 1853 के चार्टर एक्टों ने कंपनी के व्यापारिक अधिकारों में महत्वपूर्ण परिवर्तन किए। 1813 में चीन व्यापार को छोड़कर एकाधिकार समाप्त, 1833 में प्रशासनिक केंद्रीकरण मजबूत हुआ और गवर्नर-जनरल ऑफ बंगाल को गवर्नर-जनरल ऑफ इंडिया बनाया गया, 1853 में विधायी परिषद का विस्तार और प्रशासनिक सुधार हुए।
1858 का भारत शासन अधिनियम और परिषद अधिनियम 1861 तथा 1892
1858 का भारत शासन अधिनियम 1857 के विद्रोह के बाद निर्णायक घटना थी। इसके द्वारा भारत का शासन ईस्ट इंडिया कंपनी से ब्रिटिश क्राउन के हाथों में चला गया, भारत सचिव का पद और इंडिया काउंसिल बनी। भारतीय परिषद अधिनियम 1861 का महत्वपूर्ण प्रावधान विधायी परिषदों में भारतीयों की सीमित भागीदारी के लिए अवसर प्रदान करना और बॉम्बे तथा मद्रास को विधायी शक्तियाँ पुनः देना था। इसने पोर्टफोलियो प्रणाली की शुरुआत भी की। भारतीय परिषद अधिनियम 1892 ने परिषदों के विस्तार और प्रतिनिधित्व की दिशा में कुछ और कदम बढ़ाए। सदस्यों को बजट पर चर्चा और प्रश्न पूछने का अतिरिक्त अधिकार मिला, लेकिन बहुमत सरकारी ही रहा। इन सुधारों ने प्रतिनिधित्व की मांगों को अधिक स्पष्ट किया।
1909, 1919 के सुधार और साइमन कमीशन से नेहरू रिपोर्ट तक
भारतीय परिषद अधिनियम 1909 को मॉर्ले-मिंटो सुधार कहा जाता है। इसकी सबसे महत्वपूर्ण विशेषता मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल की व्यवस्था लागू करना था। केंद्रीय और प्रांतीय विधान परिषदों में सदस्यों की संख्या बढ़ाई गई। भारत सरकार अधिनियम 1919 को मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार कहा जाता है। इसके तहत प्रांतों में द्वैध शासन व्यवस्था लागू की गई। प्रांतीय विषयों को दो वर्गों में बाँटा गया, आरक्षित और हस्तांतरित। आरक्षित विषय गवर्नर और उसकी कार्यकारी परिषद के नियंत्रण में रहते थे, हस्तांतरित विषयों का प्रशासन भारतीय मंत्रियों द्वारा किया जाता था जो विधान परिषद के प्रति उत्तरदायी थे। केंद्रीय स्तर पर द्विसदनीय विधानमंडल की प्रकृति बनी और प्रत्यक्ष निर्वाचन का विस्तार हुआ। साइमन कमीशन की नियुक्ति 1927 में हुई और वह 1928 में भारत पहुँचा, इसमें सभी सदस्य श्वेत होने के कारण विरोध हुआ। नेहरू रिपोर्ट 1928 के अध्यक्ष मोतीलाल नेहरू थे और इसमें डोमिनियन स्टेटस की माँग की गई थी। 1930 के दशक में गोलमेज सम्मेलनों का प्रमुख उद्देश्य भारतीय संवैधानिक सुधारों पर चर्चा करना था, दूसरे गोलमेज में कांग्रेस का प्रतिनिधित्व महात्मा गांधी ने किया था। 1932 का सामुदायिक निर्णय ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्जे मैकडोनाल्ड से संबंधित था और पूना समझौते का संबंध दलित वर्ग के प्रतिनिधित्व से था।
1935 का भारत सरकार अधिनियम और प्रांतीय स्वायत्तता
भारत सरकार अधिनियम 1935 की प्रमुख विशेषता प्रांतीय स्वायत्तता और संघीय व्यवस्था से संबंधित प्रावधान थे। इसने प्रांतों में द्वैध शासन समाप्त किया और प्रांतीय स्वायत्तता लागू की। प्रांतीय मंत्रियों की स्थिति में परिवर्तन आया और वे विधानमंडल के प्रति उत्तरदायी बने। संघीय व्यवस्था ब्रिटिश प्रांतों और देशी रियासतों पर आधारित प्रस्तावित थी। संघीय योजना पूरी तरह लागू नहीं हो सकी क्योंकि रियासतें शामिल नहीं हुईं। इस अधिनियम में संघीय न्यायालय की स्थापना का प्रावधान संघ और प्रांतों के बीच विवादों के निपटारे के उद्देश्य से था और संघीय न्यायालय की स्थापना 1937 में हुई। मताधिकार के क्षेत्र में विस्तार हुआ लेकिन वह सीमित और संपत्ति आधारित था। प्रांतीय स्वायत्तता का वास्तविक प्रयोग 1937 के चुनावों के बाद शुरू हुआ जब प्रांतीय प्रावधान व्यवहार में आए। दीर्घकालीन महत्व यह है कि 1935 का अधिनियम स्वतंत्र भारत के संविधान का प्रमुख स्रोत बना। भारतीय संवैधानिक विकास का समग्र ऐतिहासिक महत्व यह है कि इसने धीरे-धीरे प्रतिनिधि संस्थाओं और स्वशासन की नींव रखी।
- 1773 रेगुलेटिंग एक्ट - कंपनी पर संसदीय नियंत्रण की शुरुआत, गवर्नर-जनरल, सुप्रीम कोर्ट कलकत्ता
- 1784 पिट्स इंडिया एक्ट - बोर्ड ऑफ कंट्रोल, राजनीतिक नियंत्रण मजबूत, वाणिज्यिक और राजनीतिक कार्य अलग
- चार्टर एक्ट 1813, 1833, 1853 - व्यापारिक एकाधिकार समाप्त, केंद्रीयकरण, गवर्नर-जनरल ऑफ इंडिया, विधायी परिषद विस्तार
- 1858 भारत शासन अधिनियम - कंपनी शासन अंत, क्राउन शासन, भारत सचिव
- 1861 अधिनियम - विधायी परिषदों में सीमित भारतीय भागीदारी, बॉम्बे मद्रास को विधायी शक्ति, पोर्टफोलियो प्रणाली
- 1892 अधिनियम - परिषद विस्तार, बजट पर चर्चा और प्रश्न पूछने का अधिकार
- 1909 मॉर्ले-मिंटो - पृथक निर्वाचक मंडल मुसलमानों के लिए, परिषदों की संख्या वृद्धि
- 1919 मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड - प्रांतों में द्वैध शासन, आरक्षित विषय गवर्नर के नियंत्रण में, हस्तांतरित विषय मंत्री के अधीन जो विधान परिषद के प्रति उत्तरदायी, केंद्रीय द्विसदनीय, प्रांतीय विषय दो वर्गों में बँटे
- साइमन कमीशन की नियुक्ति 1927, भारत आगमन 1928, श्वेत सदस्य होने से विरोध, नेहरू रिपोर्ट 1928 अध्यक्ष मोतीलाल नेहरू डोमिनियन स्टेटस, गोलमेज सम्मेलन सुधारों पर चर्चा, गांधीजी ने द्वितीय में कांग्रेस का प्रतिनिधित्व किया
- 1935 अधिनियम - प्रांतीय स्वायत्तता, प्रांतों में द्वैध शासन समाप्त, प्रस्तावित संघीय व्यवस्था प्रांतों और रियासतों पर आधारित, संघीय योजना रियासतों के न जुड़ने से लागू नहीं, संघीय न्यायालय 1937, मताधिकार सीमित विस्तार, प्रांतीय प्रावधान 1937 चुनावों के बाद लागू, स्वतंत्र संविधान का आधार
| अधिनियम | मुख्य महत्त्व | प्रमुख प्रावधान |
|---|---|---|
| 1773 रेगुलेटिंग एक्ट | कंपनी पर संसदीय नियंत्रण की शुरुआत | गवर्नर-जनरल, सुप्रीम कोर्ट कलकत्ता, प्रशासन पर नियंत्रण |
| 1784 पिट्स इंडिया एक्ट | ब्रिटिश सरकार का राजनीतिक नियंत्रण मजबूत | बोर्ड ऑफ कंट्रोल, वाणिज्यिक और राजनीतिक कार्य अलग |
| चार्टर एक्ट 1833 | प्रशासनिक केंद्रीकरण | गवर्नर-जनरल ऑफ इंडिया, व्यापारिक एकाधिकार समाप्त |
| 1858 भारत शासन अधिनियम | कंपनी शासन का अंत, क्राउन शासन | भारत सचिव, इंडिया काउंसिल, क्राउन के अधीन शासन |
| 1861 और 1892 परिषद अधिनियम | विधायी परिषदों में सीमित भारतीय भागीदारी | 1861 में भारतीयों को शामिल, 1892 में बजट पर चर्चा और प्रश्न का अधिकार, परिषद विस्तार |
| 1909 मॉर्ले-मिंटो | पृथक निर्वाचक मंडल | मुसलमानों के लिए अलग निर्वाचन, केंद्रीय और प्रांतीय परिषदों में वृद्धि |
| 1919 मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड | प्रांतों में द्वैध शासन | आरक्षित विषय गवर्नर के पास, हस्तांतरित विषय मंत्रियों के पास जो विधान परिषद के प्रति उत्तरदायी, द्विसदनीय केंद्र |
| 1935 भारत सरकार अधिनियम | प्रांतीय स्वायत्तता और संघीय प्रस्ताव | प्रांतों में द्वैध शासन समाप्त, प्रांतीय मंत्रिमंडल उत्तरदायी, संघीय व्यवस्था प्रांतों और रियासतों पर आधारित, संघीय न्यायालय 1937, सीमित मताधिकार विस्तार, संघीय योजना लागू नहीं, प्रांतीय भाग 1937 से लागू |
भारत के संवैधानिक विकास को कालक्रम में पढ़ना सबसे उपयोगी है और प्रत्येक अधिनियम के वर्ष, प्रमुख प्रावधान और उसके ऐतिहासिक महत्व को समझने से प्रतियोगी परीक्षाओं में तथ्यात्मक प्रश्नों को हल करना आसान होता है।