सविनय अवज्ञा आंदोलन - ऑनलाइन प्रैक्टिस क्विज़

⌄
-- Questions History

सविनय अवज्ञा आंदोलन - ऑनलाइन प्रैक्टिस क्विज़

सविनय अवज्ञा आंदोलन पर आधारित 50 प्रश्नों का ऑनलाइन अभ्यास क्विज़। प्रत्येक प्रश्न के साथ सही उत्तर और संक्षिप्त व्याख्या दी गई है।

प्रश्न 1 / --
00:00
2%
प्रश्न 1

लोडिंग...

💡 व्याख्या

सविनय अवज्ञा आंदोलन: दांडी मार्च, नमक सत्याग्रह, गांधी-इरविन समझौता और आंदोलन का प्रभाव

सविनय अवज्ञा आंदोलन का परिचय

सविनय अवज्ञा आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष का एक महत्वपूर्ण जन आंदोलन था। 1930 में महात्मा गांधी के नेतृत्व में शुरू हुए इस आंदोलन का उद्देश्य अन्यायपूर्ण औपनिवेशिक कानूनों की अहिंसक अवज्ञा करके ब्रिटिश शासन पर राजनीतिक दबाव बनाना था। नमक कानून का विरोध इसका सबसे प्रसिद्ध प्रतीक बना।

आंदोलन की पृष्ठभूमि

1929 के लाहौर अधिवेशन में कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज्य को अपना लक्ष्य घोषित किया। 26 जनवरी 1930 को स्वतंत्रता दिवस मनाने के बाद गांधी ने ब्रिटिश सरकार के सामने कई मांगें रखीं। मांगों पर संतोषजनक प्रतिक्रिया न मिलने के बाद सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू करने का निर्णय लिया गया।

गांधी की 11 मांगें

गांधी ने वायसराय को पत्र लिखकर आर्थिक और राजनीतिक समस्याओं से संबंधित मांगें रखीं। इनमें नमक कर समाप्त करना, भू-राजस्व में राहत, सैन्य खर्च कम करना और राजनीतिक बंदियों की रिहाई जैसी मांगें शामिल थीं। इन मांगों का उद्देश्य औपनिवेशिक आर्थिक नीतियों के प्रभाव को उजागर करना भी था।

दांडी मार्च

12 मार्च 1930 को गांधी ने साबरमती आश्रम से दांडी की यात्रा शुरू की। उनके साथ चुने हुए स्वयंसेवक चले और यात्रा के दौरान बड़ी संख्या में लोग आंदोलन से जुड़े। लगभग 240 मील की यात्रा के बाद 6 अप्रैल 1930 को गांधी ने दांडी में नमक कानून तोड़ा।

नमक सत्याग्रह

नमक कानून को आंदोलन का केंद्र बनाने का कारण यह था कि नमक हर व्यक्ति की आवश्यकता थी। गांधी के नेतृत्व में नमक बनाकर कानून तोड़ना औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध व्यापक जनप्रतिरोध का प्रतीक बन गया। तटीय क्षेत्रों में लोगों ने नमक कानून का उल्लंघन किया।

आंदोलन का विस्तार

दांडी के बाद सविनय अवज्ञा आंदोलन देश के विभिन्न हिस्सों में फैल गया। विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार, शराब की दुकानों के सामने प्रदर्शन, नमक कानून तोड़ना और कुछ क्षेत्रों में कर न देने के अभियान इसके प्रमुख रूप रहे। आंदोलन में महिलाओं, विद्यार्थियों, किसानों और व्यापारियों की भागीदारी हुई।

महिलाओं की भागीदारी

सविनय अवज्ञा आंदोलन में महिलाओं की सार्वजनिक राजनीतिक भागीदारी उल्लेखनीय रूप से बढ़ी। सरोजिनी नायडू, कमलादेवी चट्टोपाध्याय और अनेक स्थानीय महिला कार्यकर्ताओं ने नमक सत्याग्रह तथा विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार में भाग लिया। इससे राष्ट्रीय आंदोलन का सामाजिक आधार विस्तृत हुआ।

धरासणा सत्याग्रह

दांडी मार्च के बाद धरासणा नमक कारखाने के विरुद्ध सत्याग्रह किया गया। गांधी की गिरफ्तारी के बाद सरोजिनी नायडू और अन्य नेताओं ने सत्याग्रहियों का नेतृत्व किया। इस घटना ने अहिंसक प्रतिरोध की शक्ति को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में ला दिया।

ब्रिटिश दमन

ब्रिटिश सरकार ने आंदोलन को दबाने के लिए गिरफ्तारियाँ, लाठीचार्ज और अन्य दमनकारी उपाय अपनाए। हजारों कार्यकर्ताओं को जेल भेजा गया। गांधी सहित कांग्रेस के अनेक नेताओं की गिरफ्तारी के बावजूद कई क्षेत्रों में आंदोलन जारी रहा।

उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत

खान अब्दुल गफ्फार खान के नेतृत्व में उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत में भी अहिंसक आंदोलन मजबूत हुआ। खुदाई खिदमतगार संगठन ने राष्ट्रीय आंदोलन के साथ सहयोग किया। पठानों की बड़ी संख्या में भागीदारी ने आंदोलन के व्यापक स्वरूप को दिखाया।

गांधी-इरविन समझौता

1931 में गांधी और वायसराय लॉर्ड इरविन के बीच समझौता हुआ। इसके तहत कांग्रेस ने सविनय अवज्ञा आंदोलन को अस्थायी रूप से स्थगित किया और गांधी दूसरे गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए लंदन गए। राजनीतिक बंदियों की रिहाई से संबंधित कुछ कदम भी उठाए गए।

दूसरा गोलमेज सम्मेलन

गांधी ने 1931 में लंदन में आयोजित दूसरे गोलमेज सम्मेलन में कांग्रेस के प्रतिनिधि के रूप में भाग लिया। सम्मेलन में भारत की संवैधानिक व्यवस्था और प्रतिनिधित्व के प्रश्नों पर चर्चा हुई, लेकिन कोई निर्णायक समझौता नहीं हो सका। गांधी भारत लौटने के बाद फिर से राजनीतिक संघर्ष की स्थिति में पहुँचे।

आंदोलन का पुनः आरंभ

गांधी की वापसी के बाद ब्रिटिश सरकार ने कांग्रेस और उसके कार्यकर्ताओं पर फिर से दमन बढ़ाया। 1932 में सविनय अवज्ञा आंदोलन का दूसरा चरण शुरू हुआ। कांग्रेस पर प्रतिबंध और व्यापक गिरफ्तारियों के कारण आंदोलन को कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा।

सामाजिक समूहों की भागीदारी

आंदोलन में शहरी मध्यम वर्ग, व्यापारी, महिलाएँ, विद्यार्थी और अनेक किसान समूह शामिल हुए। विभिन्न क्षेत्रों में भागीदारी का स्वरूप अलग था। इसलिए सविनय अवज्ञा आंदोलन को एक समान राष्ट्रीय अनुभव के बजाय अनेक स्थानीय आंदोलनों के व्यापक समुच्चय के रूप में भी समझा जा सकता है।

किसानों की भूमिका

कुछ क्षेत्रों में किसानों ने भूमि राजस्व और स्थानीय करों के विरोध में आंदोलन किया। लेकिन किसान भागीदारी पूरे देश में समान नहीं थी। स्थानीय आर्थिक परिस्थितियों और सामाजिक संरचना के अनुसार किसानों की भागीदारी का स्वरूप बदलता रहा।

व्यापारियों और उद्योगपतियों की भूमिका

कई भारतीय व्यापारियों और उद्योगपतियों ने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार तथा स्वदेशी उद्योगों के समर्थन में आंदोलन को सहयोग दिया। विदेशी कपड़ों के बहिष्कार से भारतीय वस्त्र उद्योग के लिए राष्ट्रीय बाजार की भावना मजबूत हुई।

सविनय अवज्ञा और असहयोग में अंतर

असहयोग आंदोलन में मुख्य जोर औपनिवेशिक संस्थाओं और वस्तुओं के बहिष्कार पर था, जबकि सविनय अवज्ञा आंदोलन में अन्यायपूर्ण कानूनों को खुले तौर पर तोड़ना भी शामिल था। नमक कानून का उल्लंघन इसका प्रमुख उदाहरण है। दोनों आंदोलनों का आधार व्यापक अहिंसक जनभागीदारी था।

पूना समझौता और आंदोलन का दौर

1932 में पृथक निर्वाचक मंडल के प्रश्न पर गांधी और डॉ. भीमराव आंबेडकर के बीच मतभेद सामने आए और पूना समझौता हुआ। यह घटनाक्रम सविनय अवज्ञा आंदोलन के व्यापक राजनीतिक संदर्भ का हिस्सा था, हालांकि इसका मुख्य विषय राजनीतिक प्रतिनिधित्व था।

आंदोलन की समाप्ति

1934 तक सविनय अवज्ञा आंदोलन का प्रभाव काफी कमजोर हो चुका था। कांग्रेस ने अंततः आंदोलन को वापस ले लिया। इसके बाद राष्ट्रीय आंदोलन में संवैधानिक राजनीति, संगठन निर्माण और आगे के जनसंघर्षों की तैयारी पर ध्यान बढ़ा।

आंदोलन की सीमाएँ

सविनय अवज्ञा आंदोलन व्यापक था, लेकिन सभी सामाजिक और क्षेत्रीय समूहों की भागीदारी समान नहीं रही। ब्रिटिश दमन, संगठनात्मक कठिनाइयों और विभिन्न वर्गों के अलग-अलग हितों ने आंदोलन की गति को प्रभावित किया। फिर भी यह ब्रिटिश शासन के विरुद्ध एक महत्वपूर्ण अखिल भारतीय चुनौती बना।

राष्ट्रीय आंदोलन पर प्रभाव

सविनय अवज्ञा आंदोलन ने भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष को व्यापक जनाधार दिया। नमक जैसे सामान्य विषय को राजनीतिक प्रतिरोध का प्रतीक बनाकर गांधी ने औपनिवेशिक शासन की आर्थिक और नैतिक वैधता को चुनौती दी। महिलाओं और अन्य सामाजिक समूहों की भागीदारी भी बढ़ी।

ऐतिहासिक महत्व

सविनय अवज्ञा आंदोलन ने यह स्पष्ट किया कि अहिंसक जनभागीदारी के माध्यम से औपनिवेशिक शासन को गंभीर राजनीतिक चुनौती दी जा सकती है। दांडी मार्च, नमक सत्याग्रह, गांधी-इरविन समझौता और दूसरे गोलमेज सम्मेलन इस आंदोलन के प्रमुख पड़ाव रहे।

संतुलित निष्कर्ष

सविनय अवज्ञा आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष का निर्णायक जनआंदोलन था। इसकी शक्ति व्यापक जनभागीदारी, अहिंसक प्रतिरोध और औपनिवेशिक कानूनों की सार्वजनिक अवज्ञा में थी। इसकी सीमाओं के बावजूद इसने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध राष्ट्रीय चेतना को मजबूत किया और स्वतंत्रता आंदोलन को नई राजनीतिक दिशा दी।

इस अध्याय की क्विज़ दांडी मार्च, नमक सत्याग्रह, गांधी की 11 मांगें, धरासणा सत्याग्रह, महिलाओं की भागीदारी, गांधी-इरविन समझौता, गोलमेज सम्मेलन, रॉलेट के बाद की राजनीति, किसानों और व्यापारियों की भूमिका तथा सविनय अवज्ञा आंदोलन के प्रभाव से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्यों की पुनरावृत्ति में सहायता करती है।