स्वराज पार्टी और साइमन कमीशन - ऑनलाइन प्रैक्टिस क्विज़
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स्वराज पार्टी और साइमन कमीशन पर आधारित 50 प्रश्नों का ऑनलाइन अभ्यास क्विज़। प्रत्येक प्रश्न के साथ सही उत्तर और संक्षिप्त व्याख्या दी गई है।
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💡 व्याख्या
स्वराज पार्टी: गठन, चित्तरंजन दास, मोतीलाल नेहरू, परिषद राजनीति और उपलब्धियाँ
स्वराज पार्टी का परिचय
स्वराज पार्टी का गठन 1923 में असहयोग आंदोलन की वापसी के बाद कांग्रेस के भीतर उत्पन्न राजनीतिक मतभेदों की पृष्ठभूमि में हुआ। चित्तरंजन दास और मोतीलाल नेहरू इसके प्रमुख नेताओं में थे। इसका उद्देश्य विधान परिषदों में प्रवेश करके औपनिवेशिक शासन की नीतियों का भीतर से विरोध करना और स्वराज की मांग को मजबूत करना था।
गठन की पृष्ठभूमि
1922 में चौरी-चौरा की घटना के बाद गांधी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया। इसके बाद कांग्रेस में आगे की रणनीति को लेकर मतभेद पैदा हुए। एक समूह रचनात्मक कार्यक्रमों पर जोर देता था, जबकि दूसरे समूह का विचार था कि विधान परिषदों में प्रवेश करके सरकार का विरोध किया जाना चाहिए।
चित्तरंजन दास और मोतीलाल नेहरू
चित्तरंजन दास और मोतीलाल नेहरू परिषद प्रवेश के प्रमुख समर्थक थे। उनका मानना था कि परिषदों के भीतर जाकर बजट, नीतियों और सरकारी प्रस्तावों का विरोध किया जा सकता है तथा औपनिवेशिक शासन की सीमाओं को जनता के सामने उजागर किया जा सकता है।
1923 के चुनाव
स्वराज पार्टी ने 1923 के चुनावों में भाग लिया और कई विधान परिषदों में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की। केंद्रीय विधान सभा तथा बंगाल और मध्य प्रांतों में स्वराजवादियों की प्रभावशाली उपस्थिति बनी। इससे परिषदों के भीतर संगठित विपक्ष की भूमिका मजबूत हुई।
‘अंदर से बाधा’ की नीति
स्वराजवादियों ने परिषदों के भीतर सरकारी नीतियों का विरोध करने, प्रश्न पूछने, प्रस्ताव रखने और बजट पर बहस करने की रणनीति अपनाई। इसे औपनिवेशिक शासन में ‘अंदर से बाधा’ की नीति के रूप में समझा जाता है।
गांधी और स्वराजवादी
गांधी परिषद प्रवेश की रणनीति के प्रति प्रारंभ में सहमत नहीं थे, लेकिन कांग्रेस के भीतर मतभेद को संगठनात्मक विभाजन में बदलने से रोकने के लिए समझौते का रास्ता अपनाया गया। स्वराजवादी और गांधी समर्थक दोनों स्वराज के लक्ष्य से जुड़े थे, लेकिन उनकी कार्यपद्धति अलग थी।
स्वराज पार्टी की उपलब्धियाँ
स्वराज पार्टी ने विधान परिषदों में औपनिवेशिक सरकार की नीतियों की आलोचना की और संसदीय प्रक्रियाओं का उपयोग राजनीतिक संघर्ष के लिए किया। इससे भारतीय नेताओं को संसदीय कार्यप्रणाली का अनुभव मिला और सरकार की नीतियों पर सार्वजनिक बहस को बल मिला।
पार्टी की सीमाएँ
विधान परिषदों की शक्तियाँ सीमित थीं और गवर्नर तथा वायसराय के पास व्यापक अधिकार बने रहे। इसलिए स्वराजवादी अपनी सभी राजनीतिक मांगें लागू नहीं करा सके। पार्टी के भीतर भी रणनीति को लेकर मतभेद बढ़े।
चित्तरंजन दास की मृत्यु
1925 में चित्तरंजन दास की मृत्यु स्वराज पार्टी के लिए बड़ा राजनीतिक नुकसान थी। उनके बाद पार्टी की एकता और प्रभाव प्रभावित हुआ तथा उसके भीतर रणनीतिक मतभेद अधिक स्पष्ट होने लगे।
विठ्ठलभाई पटेल
विठ्ठलभाई पटेल स्वराज पार्टी से जुड़े प्रमुख नेताओं में थे। वे 1925 में केंद्रीय विधान सभा के अध्यक्ष चुने गए। उनका निर्वाचन भारतीय प्रतिनिधियों के बढ़ते संसदीय प्रभाव का महत्वपूर्ण उदाहरण था।
साइमन कमीशन और बदलती राजनीति
1927 में साइमन कमीशन की घोषणा और 1928 में उसके भारत आगमन के विरोध ने राष्ट्रीय आंदोलन को नए राजनीतिक संघर्ष की ओर मोड़ा। इस समय कांग्रेस के विभिन्न समूह ब्रिटिश संवैधानिक नीतियों के विरोध में अधिक निकट आए।
नेहरू रिपोर्ट
1928 में मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में नेहरू रिपोर्ट तैयार हुई। इसमें भारत के लिए संवैधानिक सुधारों का प्रस्ताव रखा गया। यह भारतीय नेताओं के संवैधानिक अनुभव और स्वशासन की मांग के विकास का महत्वपूर्ण चरण था।
पूर्ण स्वराज की ओर
1929 के लाहौर अधिवेशन में कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज को अपना लक्ष्य घोषित किया। इसके बाद राष्ट्रीय आंदोलन का केंद्र परिषदों के भीतर सीमित संघर्ष से हटकर व्यापक जन आंदोलन और पूर्ण स्वतंत्रता की मांग की ओर चला गया।
ऐतिहासिक महत्व
स्वराज पार्टी ने असहयोग आंदोलन के बाद कांग्रेस के भीतर उत्पन्न रणनीतिक प्रश्न का एक महत्वपूर्ण उत्तर दिया। उसने विधान परिषदों को राजनीतिक संघर्ष के मंच के रूप में इस्तेमाल किया और भारतीय नेताओं को संसदीय विरोध की कार्यपद्धति का अनुभव दिया।
संतुलित निष्कर्ष
स्वराज पार्टी का गठन 1923 में चित्तरंजन दास और मोतीलाल नेहरू जैसे नेताओं के नेतृत्व में हुआ। 1923 के चुनावों में सफलता के बाद उसने विधान परिषदों के भीतर औपनिवेशिक सरकार की नीतियों का विरोध किया। सीमित संवैधानिक शक्तियों, आंतरिक मतभेदों और बदलती राष्ट्रीय राजनीति के कारण उसका प्रभाव धीरे-धीरे कम हुआ, लेकिन भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष में उसकी संसदीय भूमिका महत्वपूर्ण रही।
इस अध्याय की क्विज़ स्वराज पार्टी का गठन, चित्तरंजन दास, मोतीलाल नेहरू, 1923 के चुनाव, विधान परिषदों में प्रवेश, ‘अंदर से बाधा’ की नीति, विठ्ठलभाई पटेल, गांधी और स्वराजवादियों के संबंध, नेहरू रिपोर्ट और पूर्ण स्वराज की ओर बढ़ते राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्यों की पुनरावृत्ति में सहायता करती है।