Family and Gram Courts - ऑनलाइन प्रैक्टिस क्विज़
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Family Courts and Gram Nyayalayas - Family Courts Act 1984, Gram Nyayalayas Act 2008, functions, powers, and 50 MCQs with detailed explanations for UPSC, SSC, State PCS and other competitive exams
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💡 व्याख्या
परिवार न्यायालय और ग्राम न्यायालय - संपूर्ण अध्ययन गाइड
परिवार न्यायालय और ग्राम न्यायालय भारतीय न्याय प्रणाली के दो महत्वपूर्ण अंग हैं। परिवार न्यायालय की स्थापना परिवार न्यायालय अधिनियम 1984 से हुई जबकि ग्राम न्यायालय की स्थापना ग्राम न्यायालय अधिनियम 2008 से हुई। दोनों का मुख्य उद्देश्य न्याय तक पहुंच को सरल सस्ता और त्वरित बनाना है। परिवार न्यायालय पारिवारिक विवादों जैसे तलाक भरण पोषण बाल कल्याण संपत्ति विवाद आदि की सुनवाई करता है। इसकी प्रक्रिया अनौपचारिक होती है और समझौते को प्राथमिकता दी जाती है। ग्राम न्यायालय ग्रामीण क्षेत्रों में स्थापित किए जाते हैं, छोटे सिविल और आपराधिक मामलों की सुनवाई करते हैं, कार्यवाही स्थानीय भाषा में होती है।
परिवार न्यायालय अधिनियम 1984 के तहत 10 लाख से अधिक जनसंख्या वाले शहर या कस्बे में राज्य सरकार के लिए परिवार न्यायालय स्थापित करना अनिवार्य है। राज्य सरकार उच्च न्यायालय की सहमति से अन्य क्षेत्रों में भी स्थापित कर सकती है। न्यायाधीश की नियुक्ति धारा 4 के तहत कम से कम 7 वर्ष न्यायिक पद पर अनुभव या कम से कम 7 वर्ष उच्च न्यायालय में अधिवक्ता रहने, अथवा केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित अन्य योग्यताओं वाले व्यक्ति को उच्च न्यायालय की सहमति से राज्य सरकार करती है। प्राथमिकता महिला न्यायाधीशों और समाज कल्याण में अनुभवी व्यक्तियों को देनी चाहिए धारा 4(4)। काउंसलर परामर्शदाता और कर्मचारियों की नियुक्ति धारा 5-6 में और सेवा शर्तें राज्य सरकार निर्धारित करती है।
परिवार न्यायालय की विशेषताएं और प्रक्रिया
अधिकार क्षेत्र धारा 7 में विवाह विच्छेद, दांपत्य अधिकार प्रत्यास्थापन, वैवाहिक संबंध शून्यता, संपत्ति, भरण पोषण, बाल संरक्षण, अभिभावकत्व शामिल हैं, यह नकारात्मक सूची नहीं। सामान्य न्यायालयों का अधिकार क्षेत्र समाप्त हो जाता है धारा 8 के तहत परिवार न्यायालय स्थापित होने पर। प्राथमिक कर्तव्य धारा 9 के तहत समझौता कराना है। प्रक्रिया धारा 10 में CPC 1908 के कड़े नियम लागू नहीं, स्वयं प्रक्रिया निर्धारित कर सकता है धारा 10(3)। भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धाराएँ परिवार न्यायालय की कार्यवाही में लागू होती हैं, जबकि मौखिक साक्ष्य के अभिलेखन के लिए अधिनियम में विशेष प्रक्रिया दी गई है। बंद कमरे में सुनवाई धारा 11 के तहत पक्षकार चाहें तो। विशेषज्ञ परामर्शदाता सहायता धारा 12 में चिकित्सा समाज कल्याण विशेषज्ञ। वकील प्रतिनिधित्व धारा 13 में अधिकार नहीं, न्यायालय अनुमति दे सकता है लेकिन सामान्यतः नहीं। विवाह परामर्शदाता समाज कल्याण एजेंसी नियुक्ति धारा 5। मौखिक साक्ष्य के अभिलेखन की विशेष व्यवस्था धारा 15 में है। निर्णय में संक्षिप्त तथ्य और कारण होने चाहिए धारा 17। निष्पादन धारा 18 में CPC या CrPC के अनुसार। अपील धारा 19 में उच्च न्यायालय में 30 दिन के भीतर, अंतरिम आदेश और सहमति डिक्री के विरुद्ध अपील नहीं धारा 19(2)। अधिनियम का प्रभाव अन्य कानूनों पर अध्यारोही धारा 20। संशोधन अधिनियम 2022 द्वारा हिमाचल और नागालैंड में पहले से स्थापित परिवार न्यायालयों को वैधता दी गई।
ग्राम न्यायालय अधिनियम 2008 का संवैधानिक आधार और संरचना
ग्राम न्यायालय अधिनियम 2008 संसद द्वारा अनुच्छेद 39A समान न्याय और निशुल्क विधिक सहायता के नीति निदेशक तत्व को क्रियान्वित करने हेतु पारित। विधि आयोग की 114वीं रिपोर्ट 1986 ने ग्राम न्यायालयों की रूपरेखा दी। स्थापना मध्यवर्ती स्तर पर प्रत्येक पंचायत या पंचायत समूह पर, राज्य सरकार उच्च न्यायालय से परामर्श कर अधिसूचना से। पीठासीन अधिकारी न्यायाधिकारी की नियुक्ति धारा 5 के तहत राज्य सरकार उच्च न्यायालय से परामर्श कर, वेतन भत्ते प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट के समकक्ष। मोबाइल कोर्ट भ्रमणशील अदालत अवधारणा धारा 9 में न्यायाधिकारी गांव गांव जाकर सुनवाई कर सकता है क्षेत्राधिकार के बाहर भी बैठक कर सकता है। वित्तीय प्रबंधन केंद्र और राज्य साझा, केंद्र प्रारंभिक 3 वर्ष तक सहायता। ग्राम न्यायालय की सिविल pecuniary jurisdiction उच्च न्यायालय द्वारा राज्य सरकार से परामर्श के बाद अधिसूचना से निर्धारित की जाती है। सुलहकर्ता चयन धारा 27 में प्रतिष्ठित स्थानीय व्यक्तियों में से। दीवानी में सुलह प्राथमिक पद्धति।
ग्राम न्यायालय की शक्तियां अपील और प्रक्रिया
आपराधिक में प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट की शक्तियां, प्रथम अनुसूची में वर्णित अपराधों का विचारण सक्षम, कुछ अधिनियमों के अपराधों का विचारण नहीं जैसे गंभीर अपराध। संक्षिप्त विचारण 6 माह में पूरा करने की सांकेतिक सीमा धारा 18। दोष स्वीकार पर सरल प्रक्रिया। अभिवाक सौदेबाजी धारा 20 के तहत लागू। सिविल में CPC के सभी कठोर नियम लागू नहीं, संक्षिप्त प्रक्रिया और सुलह पर जोर। साक्ष्य अभिलेखन धारा 21 में सारांश। दावा दायर करने में सुविधा धारा 25 में गरीब व्यक्ति सरल फार्म में। लंबित मामलों को ग्राम न्यायालय में स्थानांतरित करने का प्रावधान ग्राम न्यायालय अधिनियम की धारा 16 में है। आपराधिक अपील धारा 33 और सिविल अपील धारा 34 के अंतर्गत होती है।, आपराधिक अपील की प्रक्रिया धारा 33 में तथा सिविल अपील की प्रक्रिया धारा 34 में निर्धारित है। विधिक सहायता धारा 17 और 36 में जिला विधिक सेवा प्राधिकरण द्वारा। पक्षकारों को विधिक सहायता उपलब्ध। सुलहकर्ता की भूमिका मध्यस्थता। ग्राम न्यायालय और खाप पंचायत में अंतर ग्राम न्यायालय वैधानिक न्यायालय है जबकि खाप अनौपचारिक जाति पंचायत है जिसका कोई वैधानिक अधिकार नहीं।
- परिवार न्यायालय - अधिनियम 1984, 10 लाख जनसंख्या पर अनिवार्य स्थापना, न्यायाधीश अर्हता 7 वर्ष जिला न्यायाधीश या वकालत या विशेषज्ञ धारा 4, प्राथमिकता महिला धारा 4(4), काउंसलर नियुक्ति धारा 5-6 सेवा शर्त राज्य सरकार, अधिकार क्षेत्र धारा 7 विवाह तलाक भरण पोषण बाल संरक्षण संपत्ति, सामान्य न्यायालय अधिकार समाप्त धारा 8, समझौता प्राथमिक कर्तव्य धारा 9, प्रक्रिया स्वयं तय धारा 10(3) CPC साक्ष्य कड़े नियम नहीं, बंद कमरा धारा 11, विशेषज्ञ सहायता धारा 12, वकील अधिकार नहीं धारा 13 अनुमति से, साक्ष्य छूट धारा 15, निर्णय तथ्य कारण धारा 17, निष्पादन धारा 18, अपील उच्च न्यायालय 30 दिन धारा 19 अंतरिम और सहमति डिक्री पर अपील नहीं 19(2), अध्यारोही धारा 20, संशोधन 2022 हिमाचल नागालैंड वैधता
- ग्राम न्यायालय - अधिनियम 2008 आधार अनुच्छेद 39A, विधि आयोग 114 रिपोर्ट 1986, स्थापना मध्यवर्ती पंचायत स्तर पर, पीठासीन न्यायाधिकारी नियुक्ति राज्य सरकार उच्च न्यायालय परामर्श धारा 5 वेतन प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट समान, मोबाइल कोर्ट धारा 9 गांव गांव सुनवाई क्षेत्राधिकार बाहर भी, वित्तीय केंद्र राज्य साझा, प्रथम अनुसूची अपराध विचारण सक्षम, द्वितीय अनुसूची सिविल, सिविल सीमा राज्य तय, सुलहकर्ता प्रतिष्ठित स्थानीय धारा 27 सुलह प्राथमिक
- प्रक्रिया अपील - आपराधिक प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट शक्ति संक्षिप्त विचारण 6 माह सांकेतिक धारा 18, दोष स्वीकार सरल, अभिवाक सौदेबाजी धारा 20, सिविल CPC कठोर नहीं, साक्ष्य सारांश धारा 21, दावा सुविधा धारा 25, स्थानांतरण धारा 35, आपराधिक अपील सत्र न्यायालय सिविल अपील जिला न्यायालय धारा 33, सत्र को 6 माह में निस्तारण 33(3), विधिक सहायता धारा 17 36 DLSA द्वारा
| विषय | परिवार न्यायालय 1984 | ग्राम न्यायालय 2008 |
|---|---|---|
| उद्देश्य | पारिवारिक विवाद त्वरित समझौता | ग्रामीणों को सुलभ न्याय अनुच्छेद 39A |
| अनिवार्य जनसंख्या | 10 लाख से अधिक शहर में अनिवार्य | प्रत्येक मध्यवर्ती पंचायत पर राज्य अधिसूचना से |
| न्यायाधीश नियुक्ति अर्हता | 7 वर्ष जिला न्यायाधीश या वकालत या विशेषज्ञ, उच्च न्यायालय सहमति से राज्य सरकार, प्राथमिकता महिला धारा 4 | न्यायाधिकारी राज्य सरकार उच्च न्यायालय परामर्श से धारा 5, वेतन प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट समान |
| अधिकार क्षेत्र | विवाह तलाक भरण पोषण बाल संरक्षण संपत्ति धारा 7, सामान्य न्यायालय अधिकार समाप्त धारा 8 | प्रथम अनुसूची आपराधिक, द्वितीय अनुसूची सिविल, सिविल सीमा राज्य तय |
| प्रक्रिया | CPC साक्ष्य कठोर नहीं धारा 10, स्वयं प्रक्रिया धारा 10(3), बंद कमरा धारा 11, विशेषज्ञ सहायता धारा 12, वकील अधिकार नहीं धारा 13 | CPC कठोर नहीं सुलह प्राथमिक धारा 27, साक्ष्य सारांश धारा 21, मोबाइल कोर्ट धारा 9, दावा सुविधा धारा 25 |
| समझौता | प्राथमिक कर्तव्य धारा 9, काउंसलर धारा 5 | सुलहकर्ता प्रतिष्ठित स्थानीय धारा 27, अभिवाक सौदेबाजी धारा 20 |
| अपील | उच्च न्यायालय 30 दिन धारा 19, अंतरिम और सहमति पर अपील नहीं 19(2) | आपराधिक सत्र न्यायालय, सिविल जिला न्यायालय धारा 33, 6 माह में निस्तारण 33(3) |
| अन्य | निर्णय में तथ्य कारण धारा 17, निष्पादन धारा 18, अध्यारोही धारा 20, संशोधन 2022 | संक्षिप्त विचारण 6 माह धारा 18, स्थानांतरण धारा 35, विधिक सहायता धारा 17 36, 114 रिपोर्ट आधार |
परिवार और ग्राम न्यायालयों का अध्ययन सुलभ न्याय और अनुच्छेद 39A के क्रियान्वयन के रूप में परीक्षा में पूछा जाता है।