Lokpal-Lokayukta - ऑनलाइन प्रैक्टिस क्विज़
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Lokpal and Lokayukta - Lokpal Act 2013, establishment, composition, functions, powers, and 50 MCQs with detailed explanations for UPSC, SSC, State PCS and other competitive exams
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💡 व्याख्या
लोकपाल और लोकायुक्त - इतिहास, संरचना, अधिकार क्षेत्र और कार्यप्रणाली
लोकपाल और लोकायुक्त भारत में भ्रष्टाचार से संबंधित शिकायतों की जांच और लोक सेवकों में जवाबदेही को मजबूत करने की व्यवस्था से जुड़े महत्वपूर्ण संस्थागत तंत्र हैं। केंद्र स्तर पर लोकपाल और राज्यों में लोकायुक्त की अवधारणा का उद्देश्य ऐसी शिकायतों के लिए एक स्वतंत्र और निर्धारित वैधानिक व्यवस्था उपलब्ध कराना है। लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम, 2013 ने केंद्र स्तर पर लोकपाल की वैधानिक व्यवस्था स्थापित की। राज्यों में लोकायुक्त की संरचना, नियुक्ति और अधिकार क्षेत्र मुख्यतः संबंधित राज्य के कानूनों पर निर्भर करते हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं में इस विषय से इतिहास, संरचना, नियुक्ति, अधिकार क्षेत्र, जांच प्रक्रिया और महत्वपूर्ण वैधानिक प्रावधानों पर प्रश्न पूछे जाते हैं।
लोकपाल की अवधारणा का संबंध Ombudsman व्यवस्था से जोड़ा जाता है। स्वीडन में 1809 में स्थापित Ombudsman संस्था को आधुनिक Ombudsman व्यवस्था का प्रमुख प्रारंभिक उदाहरण माना जाता है। भारत में भ्रष्टाचार-निरोधी लोकपाल की मांग कई दशकों तक राजनीतिक और प्रशासनिक बहस का विषय रही। प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग ने 1966 में केंद्र में Lokpal और राज्यों में Lokayukta जैसी संस्थाओं की सिफारिश की। 1968 में पहला Lokpal Bill संसद में पेश किया गया। बाद के दशकों में कई विधायी प्रयास हुए और 2011 के जन लोकपाल आंदोलन ने इस विषय को राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक चर्चा का विषय बनाया।
लोकपाल की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और संरचना
लोकपाल की अवधारणा और विधायी विकास
भारत में लोकपाल की अवधारणा प्रशासन में भ्रष्टाचार की शिकायतों की स्वतंत्र जांच की आवश्यकता से विकसित हुई। 1960 के दशक में इस व्यवस्था को संस्थागत रूप देने पर गंभीर विचार हुआ। प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग की सिफारिशों में केंद्र और राज्य स्तर पर अलग-अलग लोक शिकायत एवं भ्रष्टाचार-निरोधी संस्थाओं की अवधारणा महत्वपूर्ण थी। संसद में 1968 में लोकपाल विधेयक पेश किया गया, लेकिन वह कानून का रूप नहीं ले सका। इसके बाद भी लोकपाल से संबंधित विधायी प्रयास विभिन्न समय पर होते रहे।
2011 में अन्ना हजारे के नेतृत्व वाले जन लोकपाल आंदोलन ने एक मजबूत और स्वतंत्र भ्रष्टाचार-निरोधी संस्था तथा जन लोकपाल विधेयक की मांग को व्यापक जनचर्चा में ला दिया। इसके बाद विधायी प्रक्रिया आगे बढ़ी और लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम, 2013 पारित हुआ। अधिनियम 16 जनवरी 2014 से लागू हुआ। केंद्र में पहले लोकपाल के रूप में न्यायमूर्ति पिनाकी चंद्र घोष की नियुक्ति मार्च 2019 में हुई। इस ऐतिहासिक क्रम को समझना परीक्षा की दृष्टि से उपयोगी है, क्योंकि इसमें 1966 की प्रशासनिक सुधार आयोग की सिफारिश, 1968 का विधेयक, 2011 का आंदोलन और 2013 का अधिनियम एक क्रम में जुड़े हुए हैं।
लोकपाल की संरचना, योग्यता और कार्यकाल
लोकपाल में एक Chairperson और अधिकतम आठ Members हो सकते हैं। अधिनियम के अनुसार सदस्यों में कम-से-कम 50 प्रतिशत Judicial Members होने का प्रावधान है। इसके अतिरिक्त अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक और महिलाओं के प्रतिनिधित्व से जुड़े प्रावधान भी अधिनियम में शामिल हैं। इसलिए लोकपाल की संरचना को हमेशा अधिनियम में निर्धारित अधिकतम संख्या और सदस्यता संबंधी शर्तों के संदर्भ में समझना चाहिए, न कि हर परिस्थिति में नौ व्यक्तियों की निश्चित संरचना के रूप में।
- लोकपाल केंद्र स्तर की एक वैधानिक संस्था है और इसका कानूनी आधार लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम, 2013 है।
- लोकपाल में एक Chairperson तथा अधिकतम आठ Members का प्रावधान है।
- Members में Judicial और Non-Judicial दोनों प्रकार की सदस्यता का प्रावधान है; कम-से-कम 50 प्रतिशत Judicial Members अनिवार्य हैं।
- सदस्यों की नियुक्ति और योग्यता अधिनियम में निर्धारित प्रक्रिया तथा शर्तों के अधीन होती है।
- लोकपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा चयन समिति की सिफारिश के आधार पर की जाती है।
- लोकपाल की व्यवस्था में शिकायत, प्रारंभिक जांच, जांच और अभियोजन से जुड़े अलग-अलग संस्थागत चरण हैं।
- राज्यों में लोकायुक्त की व्यवस्था का स्वरूप संबंधित राज्य के कानूनों के अनुसार अलग-अलग हो सकता है।
लोकपाल की नियुक्ति, अधिकार क्षेत्र और शिकायत प्रक्रिया
चयन समिति और नियुक्ति प्रक्रिया
लोकपाल के Chairperson और Members की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा उस चयन समिति की सिफारिश पर की जाती है जिसकी संरचना लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम में निर्धारित की गई है। चयन समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष, लोकसभा में विपक्ष के नेता, भारत के मुख्य न्यायाधीश या उनके द्वारा नामित सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश तथा राष्ट्रपति द्वारा नामित प्रख्यात विधिवेत्ता से संबंधित प्रावधान हैं। अधिनियम में ऐसी स्थिति के लिए भी व्यवस्था है जब लोकसभा में विपक्ष के नेता का पद उस समय रिक्त हो और कोई नेता मान्यता प्राप्त न हो, तब चयन समिति में उस सदस्य का स्थान भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा मनोनीत सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश द्वारा भरा जाता है। नियुक्ति प्रक्रिया में Search Committee की भी भूमिका है, जो उपयुक्त नामों के चयन में सहायता करती है।
लोकपाल के पद के लिए योग्यता और अयोग्यता से संबंधित शर्तें भी अधिनियम में निर्धारित हैं। पद की गरिमा और संस्थागत स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए राजनीतिक पद, कुछ अन्य सार्वजनिक पदों तथा राजनीतिक संबद्धता से संबंधित प्रतिबंध लागू होते हैं। Chairperson और Members के कार्यकाल, आयु सीमा तथा पद से हटाने की प्रक्रिया भी कानून में निर्धारित है। इस कारण लोकपाल की नियुक्ति को केवल सामान्य सरकारी नियुक्ति के रूप में नहीं, बल्कि विधि द्वारा निर्धारित चयन और संवैधानिक पदाधिकारियों की भागीदारी वाली प्रक्रिया के रूप में समझना चाहिए।
अधिकार क्षेत्र - प्रधानमंत्री से लोक सेवकों तक
लोकपाल का अधिकार क्षेत्र अधिनियम की धारा 14 में निर्धारित है। इसके अंतर्गत प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्री, संसद सदस्य तथा केंद्र सरकार से संबंधित विभिन्न श्रेणियों के लोक सेवकों और कुछ संस्थाओं के संबंध में भ्रष्टाचार से जुड़ी शिकायतों का प्रावधान है। प्रधानमंत्री के संबंध में अधिकार क्षेत्र पूर्णतः सामान्य नहीं है। अधिनियम के अनुसार अंतरराष्ट्रीय संबंध, बाह्य तथा आंतरिक सुरक्षा, लोक व्यवस्था, परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष जैसे विषयों से संबंधित शिकायतों पर लोकपाल के अधिकार क्षेत्र में विशेष अपवाद हैं, और ऐसी शिकायतों पर विचार की अलग प्रक्रिया निर्धारित है। इसलिए परीक्षा में यह कहना अधिक उपयुक्त है कि प्रधानमंत्री लोकपाल के अधिकार क्षेत्र में निर्धारित अपवादों और विशेष प्रक्रिया के अधीन आते हैं।
संसद सदस्यों के संबंध में भी संवैधानिक सुरक्षा का ध्यान रखना आवश्यक है। संसद में दिए गए भाषण या किए गए मतदान के संबंध में संविधान के अनुच्छेद 105(2) के अंतर्गत प्राप्त विशेषाधिकार को लोकपाल के सामान्य भ्रष्टाचार-अधिकार क्षेत्र के साथ नहीं मिलाना चाहिए। इसी तरह, कुछ सरकारी निकायों, सार्वजनिक उपक्रमों, स्वायत्त संस्थाओं और निर्धारित शर्तों को पूरा करने वाली संस्थाओं के संबंध में अधिनियम का क्षेत्र लागू हो सकता है। NGO से संबंधित प्रावधानों में सरकारी वित्तपोषण और विदेशी स्रोत से प्राप्त दान जैसी निर्धारित कानूनी शर्तें महत्वपूर्ण हैं।
जांच प्रक्रिया और लोकपाल की प्रमुख शक्तियां
शिकायत से जांच तक की प्रक्रिया
लोकपाल के समक्ष भ्रष्टाचार से संबंधित शिकायत आने के बाद कानून में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार प्रारंभिक जांच और आवश्यकता होने पर आगे की जांच की व्यवस्था है। लोकपाल शिकायत की प्रकृति और उपलब्ध सामग्री के आधार पर संबंधित जांच एजेंसी को जांच सौंप सकता है। केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को किसी मामले की जांच सौंपे जाने की स्थिति में अधिनियम की धारा 20 के अंतर्गत लोकपाल को CBI की जांच पर निर्धारित पर्यवेक्षण (superintendence) की शक्ति प्रदान की गई है। जांच और अभियोजन की संस्थागत व्यवस्था को अलग-अलग कार्यों के रूप में समझना चाहिए।
प्रक्रिया में शिकायतकर्ता और संबंधित लोक सेवक के अधिकारों तथा प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का भी ध्यान रखा जाता है। प्रारंभिक जांच के बाद मामला बंद करने या आगे बढ़ाने का निर्णय निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के अनुसार किया जाता है। गंभीर भ्रष्टाचार के मामलों में जांच, अभियोजन और विशेष न्यायालय की व्यवस्था महत्वपूर्ण हो जाती है। अधिनियम में लोकपाल को जांच से जुड़े मामलों में निर्धारित शक्तियां प्रदान की गई हैं, जबकि अंतिम आपराधिक न्यायिक निर्णय का प्रश्न सक्षम न्यायालय से संबंधित रहता है।
| विषय | मुख्य प्रावधान | परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण बिंदु |
|---|---|---|
| कानूनी आधार | लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम, 2013 | केंद्र में लोकपाल की वैधानिक व्यवस्था |
| लोकपाल की संरचना | एक Chairperson और अधिकतम आठ Members | अधिकतम सदस्य संख्या को निश्चित संख्या न समझें |
| नियुक्ति | राष्ट्रपति द्वारा चयन समिति की सिफारिश पर | चयन समिति की संरचना महत्वपूर्ण है |
| अधिकार क्षेत्र | धारा 14 में निर्धारित विभिन्न श्रेणियां | PM, Ministers, MPs और निर्धारित लोक सेवक आदि |
| प्रधानमंत्री | विशेष अपवाद और प्रक्रिया के अधीन | प्रधानमंत्री को बिना किसी अपवाद के सामान्य दायरे में बताना गलत होगा |
| शिकायत प्रक्रिया | प्रारंभिक जांच और आवश्यकतानुसार जांच | धारा 20 की प्रक्रिया महत्वपूर्ण है |
| CBI | लोकपाल द्वारा सौंपे गए मामलों में धारा 20 के अंतर्गत पर्यवेक्षण की शक्ति | लोकपाल और जांच एजेंसी की भूमिकाओं को अलग समझें |
| जांच शक्तियां | अधिनियम में निर्धारित जांच संबंधी शक्तियां | Search, seizure और Civil Court जैसी powers को अलग-अलग प्रावधानों से जोड़ें |
| संपत्ति | अपराध से संबंधित संपत्ति पर कानून में निर्धारित कार्रवाई | Search और provisional attachment को एक ही प्रावधान न मानें |
| विशेष न्यायालय | भ्रष्टाचार के मामलों के लिए Special Courts से संबंधित व्यवस्था | विशेष न्यायालय की स्थापना संबंधी प्रावधान महत्वपूर्ण है |
| झूठी शिकायत | जानबूझकर झूठी, तुच्छ या दुर्भावनापूर्ण शिकायत पर दंड का प्रावधान | शिकायतकर्ता के लिए दंडात्मक प्रावधान भी अधिनियम में हैं |
| वार्षिक रिपोर्ट | लोकपाल की वार्षिक रिपोर्ट राष्ट्रपति को प्रस्तुत की जाती है | रिपोर्ट को संसद के समक्ष रखने की प्रक्रिया महत्वपूर्ण है |
| संपत्ति घोषणा | लोक सेवकों की assets declaration से संबंधित प्रावधान | धारा 44 से संबंधित विषय |
लोकायुक्त: राज्य स्तर पर व्यवस्था
लोकायुक्त की भूमिका और राज्यों में अंतर
लोकायुक्त राज्य स्तर पर भ्रष्टाचार संबंधी शिकायतों से निपटने वाली संस्था है। प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग ने केंद्र में Lokpal और राज्यों में Lokayukta की दो-स्तरीय व्यवस्था की सिफारिश की थी। हालांकि अलग-अलग राज्यों में लोकायुक्त की संरचना, नियुक्ति, अधिकार क्षेत्र और जांच शक्तियां एक समान नहीं हैं। इसलिए किसी एक राज्य की व्यवस्था को पूरे भारत के सभी राज्यों पर लागू मानना उचित नहीं है। राज्य-विशिष्ट प्रश्नों के लिए संबंधित राज्य के लोकायुक्त कानून को देखना आवश्यक होता है।
महाराष्ट्र में लोकायुक्त की स्थापना 1971 में हुई और इसे भारत में शुरुआती प्रभावी राज्य लोकायुक्त व्यवस्थाओं में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। ओडिशा ने इससे पहले 1970 में लोकायुक्त संबंधी कानून बनाया था। राजस्थान सहित अन्य राज्यों में भी अलग-अलग समय पर लोकायुक्त संस्थाएं स्थापित हुईं। राज्यों के बीच अधिकार क्षेत्र में अंतर होने के कारण परीक्षा में राज्य-विशिष्ट तथ्यों को अलग-अलग याद करना उपयोगी है।
लोकपाल और लोकायुक्त को समझने के महत्वपूर्ण तथ्य
लोकपाल और लोकायुक्त की अवधारणा का मूल उद्देश्य सार्वजनिक पदों पर भ्रष्टाचार से संबंधित शिकायतों की जांच और जवाबदेही को मजबूत करना है। केंद्र स्तर पर लोकपाल का कानूनी आधार 2013 का अधिनियम है, जबकि राज्यों में लोकायुक्त की व्यवस्था संबंधित राज्य के कानूनों और लागू प्रावधानों पर निर्भर करती है। लोकपाल के अधिकार क्षेत्र, प्रधानमंत्री के लिए विशेष प्रावधान, संसद सदस्यों की संवैधानिक सुरक्षा, शिकायत की प्रक्रिया, जांच एजेंसियों की भूमिका और विशेष न्यायालयों से जुड़े प्रावधान इस अध्याय के प्रमुख अध्ययन क्षेत्र हैं।
परीक्षा की दृष्टि से इस विषय को केवल घटनाओं की सूची के रूप में पढ़ने के बजाय ऐतिहासिक विकास और वर्तमान वैधानिक संरचना को साथ समझना चाहिए। 1966 की प्रशासनिक सुधार आयोग की सिफारिश, 1968 का पहला लोकपाल विधेयक, 2011 का जन लोकपाल आंदोलन, 2013 का अधिनियम और 2019 में पहले लोकपाल की नियुक्ति इसके महत्वपूर्ण पड़ाव हैं। इसी प्रकार Lokpal की अधिकतम सदस्य संख्या, चयन समिति, अधिकार क्षेत्र, जांच प्रक्रिया तथा Lokayukta की राज्य-स्तरीय विविधता ऐसे तथ्य हैं जो वस्तुनिष्ठ प्रश्नों में उपयोगी होते हैं।