SC-ST Commission - ऑनलाइन प्रैक्टिस क्विज़

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SC-ST Commission - ऑनलाइन प्रैक्टिस क्विज़

National Commission for SCs and STs - Constitutional provisions, functions, powers, and 50 MCQs with detailed explanations for UPSC, SSC, State PCS and other competitive exams

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💡 व्याख्या

राष्ट्रीय अनुसूचित जाति एवं जनजाति आयोग - संपूर्ण अध्ययन गाइड

राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (NCSC) का संवैधानिक प्रावधान अनुच्छेद 338 में और राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) का प्रावधान अनुच्छेद 338A में है। मूल संविधान में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए विशेष अधिकारी (Commissioner) का प्रावधान अनुच्छेद 338 में था। संविधान (65वाँ संशोधन) अधिनियम, 1990 के बाद बहु-सदस्यीय राष्ट्रीय अनुसूचित जाति एवं जनजाति आयोग की व्यवस्था बनी और यह आयोग 12 मार्च 1992 को गठित हुआ। संविधान (89वाँ संशोधन) अधिनियम, 2003 के प्रभावी होने के बाद राष्ट्रीय अनुसूचित जाति एवं जनजाति आयोग को दो अलग संवैधानिक आयोगों—NCSC और NCST—में विभाजित किया गया; यह परिवर्तन 19 फरवरी 2004 से प्रभावी हुआ।

वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था में NCSC और NCST प्रत्येक में एक अध्यक्ष, एक उपाध्यक्ष और तीन अन्य सदस्य होते हैं। अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और सदस्य राष्ट्रपति द्वारा अपने हस्ताक्षर और मुहर सहित warrant के माध्यम से नियुक्त किए जाते हैं। उनकी सेवा-शर्तें और कार्यकाल राष्ट्रपति द्वारा बनाए गए नियमों के अधीन होते हैं। संबंधित Rules के अनुसार कार्यकाल सामान्यतः तीन वर्ष है और अध्यक्ष, उपाध्यक्ष तथा सदस्य दो से अधिक कार्यकाल के लिए नियुक्त नहीं किए जा सकते। महिला सदस्य से संबंधित शर्त भी सेवा-शर्तों के Rules में दी गई है।

NCSC अनुसूचित जातियों के संवैधानिक तथा अन्य वैधानिक सुरक्षा उपायों की निगरानी, उनसे संबंधित विशिष्ट शिकायतों की जांच, सामाजिक-आर्थिक विकास की योजना में भागीदारी और सलाह तथा राष्ट्रपति को रिपोर्ट प्रस्तुत करने का कार्य करता है। NCST अनुसूचित जनजातियों के लिए समान प्रकार के संवैधानिक कार्य करता है। NCST के कार्यों में जनजातीय क्षेत्रों और जनजातीय हितों से जुड़े विषयों पर विशेष ध्यान शामिल है। PESA Act, 1996 और Forest Rights Act, 2006 जैसे कानून जनजातीय अधिकारों और अनुसूचित क्षेत्रों के अध्ययन में महत्वपूर्ण हैं।

गठन और संवैधानिक पृष्ठभूमि

संविधान (65वाँ संशोधन) अधिनियम, 1990 के माध्यम से अनुच्छेद 338 में संशोधन कर अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए बहु-सदस्यीय राष्ट्रीय आयोग की संवैधानिक व्यवस्था की गई। यह संयुक्त आयोग 12 मार्च 1992 को गठित हुआ। बाद में संविधान (89वाँ संशोधन) अधिनियम, 2003 ने अनुच्छेद 338 में अनुसूचित जातियों के लिए अलग आयोग की व्यवस्था की और नया अनुच्छेद 338A जोड़कर अनुसूचित जनजातियों के लिए अलग राष्ट्रीय आयोग बनाया। यह संशोधन 19 फरवरी 2004 से प्रभावी हुआ।

अलग-अलग आयोगों के गठन के बाद प्रथम NCSC का गठन फरवरी 2004 में हुआ और उसके प्रथम अध्यक्ष डॉ. Suraj Bhan थे। प्रथम NCST के अध्यक्ष Kunwar Singh थे। इसलिए संयुक्त पूर्ववर्ती आयोग और 2004 के बाद बने अलग NCSC को एक ही संस्था मानना उचित नहीं है।

गठन, कार्य और शक्तियां

संरचना और नियुक्ति

NCSC और NCST प्रत्येक में एक Chairperson, एक Vice-Chairperson और तीन अन्य Members होते हैं। इनकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा warrant के माध्यम से की जाती है। संविधान सेवा-शर्तों और tenure को राष्ट्रपति द्वारा बनाए गए नियमों के अधीन रखता है। संबंधित Rules के अनुसार अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और सदस्य तीन वर्ष की अवधि के लिए पद धारण करते हैं तथा दो से अधिक terms के लिए नियुक्त नहीं किए जा सकते।

सेवा-शर्तों के Rules में संबंधित समुदाय से नियुक्ति और महिला सदस्य के संबंध में भी प्रावधान हैं। इसलिए 'हर स्थिति में कम से कम एक महिला सदस्य' और समुदाय संबंधी विवरण को संवैधानिक Article के बजाय संबंधित Rules के संदर्भ में समझना चाहिए।

मुख्य कार्य - NCSC

अनुच्छेद 338(5) के अनुसार NCSC का कर्तव्य अनुसूचित जातियों के लिए संविधान, किसी अन्य लागू कानून या सरकार के आदेश के तहत उपलब्ध सुरक्षा उपायों से संबंधित मामलों की जांच और निगरानी करना तथा उनके कार्यान्वयन का मूल्यांकन करना है। आयोग अनुसूचित जातियों के अधिकारों और सुरक्षा उपायों से वंचित किए जाने की विशिष्ट शिकायतों की जांच कर सकता है। यह अनुसूचित जातियों के सामाजिक-आर्थिक विकास की योजना प्रक्रिया में भाग लेता और सलाह देता है तथा उनके विकास की प्रगति का मूल्यांकन करता है।

मुख्य कार्य - NCST

अनुच्छेद 338A(5) के अनुसार NCST अनुसूचित जनजातियों के लिए उपलब्ध संवैधानिक तथा अन्य वैधानिक सुरक्षा उपायों की जांच और निगरानी करता है, विशिष्ट शिकायतों की जांच करता है तथा अनुसूचित जनजातियों के सामाजिक-आर्थिक विकास की योजना प्रक्रिया में भाग लेता और सलाह देता है। आयोग उनकी विकास-प्रगति का मूल्यांकन भी करता है। संविधान के अनुच्छेद 338A(9) के अनुसार संघ और प्रत्येक राज्य सरकार को अनुसूचित जनजातियों को प्रभावित करने वाले सभी प्रमुख नीति मामलों पर आयोग से परामर्श करना है।

सिविल न्यायालय जैसी शक्तियां

अनुच्छेद 338(8) और 338A(8) के तहत आयोग को अपनी जांच के दौरान कुछ मामलों में सिविल न्यायालय जैसी शक्तियां प्राप्त हैं। इनमें व्यक्ति को समन करना और उपस्थित होने के लिए बाध्य करना, शपथ पर परीक्षा करना, दस्तावेजों की खोज और पेशी की मांग करना, affidavit पर evidence लेना तथा public records या उनकी प्रतियां मांगना जैसी शक्तियां शामिल हैं। इन शक्तियों का अर्थ यह नहीं है कि आयोग सामान्य न्यायालय की तरह हर प्रकार का अंतिम न्यायिक दंडादेश दे सकता है।

रिपोर्ट और सरकारी कार्रवाई

NCSC और NCST अपने-अपने सुरक्षा उपायों के कार्यान्वयन से संबंधित रिपोर्ट राष्ट्रपति को प्रस्तुत करते हैं। संविधान के अनुच्छेद 338(5)(d) और 338A(5)(d) के अनुसार ये रिपोर्ट वार्षिक तथा आयोग द्वारा उचित समझे जाने वाले अन्य समय पर प्रस्तुत की जा सकती हैं। राष्ट्रपति इन रिपोर्टों को संसद के दोनों सदनों के समक्ष रखवाते हैं और उनके साथ action taken तथा जहां सिफारिशें स्वीकार नहीं की गई हों वहां non-acceptance के कारणों का memorandum भी रखा जाता है।

यदि रिपोर्ट का कोई भाग किसी राज्य से संबंधित है, तो संबंधित संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार उसकी प्रति राज्यपाल को भेजी जाती है और राज्यपाल उसे राज्य विधानमंडल के समक्ष रखवाते हैं। इसलिए केवल 'रिपोर्ट सीधे संसद में रखी जाती है' कहना अधूरा है; संघ और राज्य से संबंधित रिपोर्टों के लिए अलग संवैधानिक प्रक्रिया है।

सिफारिशों की प्रकृति

आयोग अपनी रिपोर्टों में सुरक्षा उपायों के प्रभावी कार्यान्वयन तथा अनुसूचित जातियों या अनुसूचित जनजातियों के संरक्षण, कल्याण और सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए आवश्यक उपायों की सिफारिश कर सकता है। इन सिफारिशों को सामान्यतः recommendations के रूप में समझना चाहिए; आयोग को सामान्य न्यायालय की तरह प्रत्येक मामले में बाध्यकारी judicial decree जारी करने की शक्ति नहीं है।

संबंधित मंत्रालय और कानून

NCSC के प्रशासनिक कार्यों का संबंध Ministry of Social Justice and Empowerment से तथा NCST का संबंध Ministry of Tribal Affairs से है। इसे आयोगों की संवैधानिक स्वतंत्रता समाप्त करने वाली 'मंत्रालय के अधीन संवैधानिक निकाय' जैसी भाषा में नहीं लिखना चाहिए।

NCST के अध्ययन में Panchayats (Extension to Scheduled Areas) Act, 1996 (PESA) तथा Scheduled Tribes and Other Traditional Forest Dwellers (Recognition of Forest Rights) Act, 2006 महत्वपूर्ण कानून हैं। ये कानून आयोग के संवैधानिक गठन का आधार नहीं हैं, बल्कि अनुसूचित जनजातियों और अनुसूचित क्षेत्रों से संबंधित व्यापक विधिक संदर्भ प्रदान करते हैं।

परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण बिंदु

NCSC - अनुच्छेद 338; NCST - अनुच्छेद 338A। 65वाँ संशोधन अधिनियम, 1990 ने संयुक्त बहु-सदस्यीय आयोग की संवैधानिक व्यवस्था को स्थापित किया और संयुक्त आयोग 12 मार्च 1992 को गठित हुआ। 89वाँ संशोधन अधिनियम, 2003 के प्रभावी होने पर 19 फरवरी 2004 से NCSC और NCST अलग संवैधानिक आयोग बने। दोनों में एक अध्यक्ष, एक उपाध्यक्ष और तीन अन्य सदस्य होते हैं। नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा warrant के माध्यम से होती है। Rules के अनुसार कार्यकाल तीन वर्ष और अधिकतम दो terms की व्यवस्था है। NCSC के प्रथम अलग आयोग के अध्यक्ष Suraj Bhan और NCST के प्रथम अध्यक्ष Kunwar Singh थे।

  • संवैधानिक आधार - NCSC अनुच्छेद 338 और NCST अनुच्छेद 338A।
  • 65वाँ संशोधन - संविधान (65वाँ संशोधन) अधिनियम, 1990; संयुक्त बहु-सदस्यीय आयोग की व्यवस्था; संयुक्त आयोग 12 मार्च 1992 को गठित हुआ।
  • 89वाँ संशोधन - संविधान (89वाँ संशोधन) अधिनियम, 2003; 19 फरवरी 2004 से अलग NCSC और NCST की संवैधानिक व्यवस्था प्रभावी हुई।
  • संरचना - प्रत्येक आयोग में Chairperson, Vice-Chairperson और तीन अन्य Members।
  • नियुक्ति - राष्ट्रपति द्वारा warrant के माध्यम से।
  • कार्यकाल - संबंधित Rules के अनुसार तीन वर्ष; दो से अधिक terms के लिए नियुक्ति नहीं।
  • NCSC का प्रथम अलग आयोग - फरवरी 2004 में गठित; प्रथम Chairperson Suraj Bhan।
  • NCST का प्रथम आयोग - 2004 में गठित; Chairperson Kunwar Singh।
  • NCSC कार्य - SC safeguards की जांच और निगरानी, शिकायतों की जांच, सामाजिक-आर्थिक विकास पर सलाह और रिपोर्ट।
  • NCST कार्य - ST safeguards की जांच और निगरानी, शिकायतों की जांच, सामाजिक-आर्थिक विकास पर सलाह और रिपोर्ट; प्रमुख नीति मामलों में Article 338A(9) के तहत consultation।
  • रिपोर्ट - राष्ट्रपति को वार्षिक तथा अन्य समय पर; राष्ट्रपति संसद के समक्ष रखवाते हैं और संबंधित memorandum भी प्रस्तुत किया जाता है।
  • राज्य से संबंधित रिपोर्ट - संबंधित संवैधानिक प्रक्रिया के अनुसार राज्यपाल द्वारा राज्य विधानमंडल के समक्ष रखी जाती है।
  • सिविल न्यायालय जैसी शक्तियां - समन, उपस्थिति, शपथ पर परीक्षा, दस्तावेज और public records मांगना तथा affidavit evidence आदि।
  • महिला सदस्य - संबंधित service and tenure Rules में प्रावधान।
  • आयु 70 वर्ष - कोई सामान्य संवैधानिक age limit के रूप में दावा नहीं किया जाना चाहिए।
  • संबंधित कानून - PESA Act, 1996 और Forest Rights Act, 2006 जनजातीय अधिकारों के अध्ययन में महत्वपूर्ण हैं।
विषयविवरण
अनुच्छेदNCSC - Article 338; NCST - Article 338A।
65वाँ संशोधन1990 में संयुक्त बहु-सदस्यीय संवैधानिक आयोग की व्यवस्था; आयोग 12 मार्च 1992 को गठित हुआ।
89वाँ संशोधन2003 का संशोधन; 19 फरवरी 2004 से NCSC और NCST की अलग संवैधानिक व्यवस्था प्रभावी हुई।
संरचनाप्रत्येक आयोग में Chairperson, Vice-Chairperson और तीन अन्य Members।
नियुक्तिराष्ट्रपति द्वारा warrant के माध्यम से।
कार्यकालसंबंधित Rules के अनुसार तीन वर्ष; अधिकतम दो terms।
NCSC प्रथम अलग आयोगफरवरी 2004 में गठित; Chairperson Suraj Bhan।
NCST प्रथम आयोग2004 में गठित; Chairperson Kunwar Singh।
मुख्य शक्तियांजांच के दौरान Article 338(8)/338A(8) के तहत सिविल न्यायालय जैसी निर्धारित शक्तियां।
रिपोर्टराष्ट्रपति को वार्षिक तथा अन्य समय पर; संसद में रखे जाने के साथ action taken/non-acceptance memorandum की संवैधानिक व्यवस्था।
राज्य संबंधी रिपोर्टराज्य से संबंधित रिपोर्ट संबंधित राज्यपाल द्वारा राज्य विधानमंडल के समक्ष रखी जाती है।
NCST consultationArticle 338A(9) के अनुसार ST को प्रभावित करने वाले सभी प्रमुख policy matters पर Union और State Governments द्वारा consultation।
संबंधित कानूनPESA Act, 1996 और Forest Rights Act, 2006 जनजातीय अधिकारों और अनुसूचित क्षेत्रों के संदर्भ में महत्वपूर्ण।

SC और ST आयोगों के अध्ययन में अनुच्छेद 338 और 338A, 65वाँ और 89वाँ संशोधन, आयोगों की संरचना, राष्ट्रपति द्वारा नियुक्ति, तीन वर्ष का Rules-based कार्यकाल, अधिकतम दो terms, संवैधानिक कार्य, सिविल न्यायालय जैसी शक्तियां और राष्ट्रपति को रिपोर्ट की प्रक्रिया विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं।