Supreme Court - ऑनलाइन प्रैक्टिस क्विज़

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Supreme Court - ऑनलाइन प्रैक्टिस क्विज़

Supreme Court of India - 50 MCQs with detailed explanations for UPSC, SSC, State PCS and other competitive exams

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💡 व्याख्या

भारत का सर्वोच्च न्यायालय - संपूर्ण अध्ययन गाइड

भारत का सर्वोच्च न्यायालय भारतीय संविधान के भाग V के अध्याय IV में स्थापित संघ की सर्वोच्च न्यायिक संस्था है। अनुच्छेद 124 में इसके गठन का प्रावधान है और अनुच्छेद 141 के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय द्वारा घोषित कानून भारत के सभी न्यायालयों पर बाध्यकारी है। सर्वोच्च न्यायालय 26 जनवरी 1950 को संविधान के लागू होने के साथ अस्तित्व में आया और 28 जनवरी 1950 को इसका औपचारिक उद्घाटन पुराने संसद भवन के Chamber of Princes में हुआ। प्रारंभ में यह पुराने संसद भवन में कार्य करता था और 1958 में तिलक मार्ग, नई दिल्ली स्थित वर्तमान भवन में स्थानांतरित हुआ। यह 1937 से 1950 तक कार्यरत Federal Court of India का उत्तराधिकारी बना।

सर्वोच्च न्यायालय संविधान की व्याख्या, मौलिक अधिकारों की रक्षा और न्यायिक समीक्षा के माध्यम से संवैधानिक शासन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। अनुच्छेद 32 के तहत मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए सीधे सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया जा सकता है। अनुच्छेद 142 सर्वोच्च न्यायालय को लंबित cause or matter में complete justice के लिए आवश्यक आदेश देने की शक्ति देता है।

सर्वोच्च न्यायालय के पहले मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति हरिलाल जे. कानिया थे। न्यायमूर्ति एम. फातिमा बीवी 6 अक्टूबर 1989 को सर्वोच्च न्यायालय की पहली महिला न्यायाधीश बनीं। न्यायाधीशों की संवैधानिक सेवानिवृत्ति आयु 65 वर्ष है। संसद कानून द्वारा न्यायाधीशों की संख्या बढ़ा सकती है; सर्वोच्च न्यायालय की sanctioned strength 2019 में 34 न्यायाधीशों तक बढ़ाई गई थी, जिसमें मुख्य न्यायाधीश भी शामिल हैं।

सर्वोच्च न्यायालय की आधिकारिक वेबसाइट पर judgments, case status, cause lists तथा live-streaming से संबंधित सुविधाएं उपलब्ध हैं। 27 सितंबर 2022 से Constitution Bench proceedings की live streaming शुरू हुई और न्यायालय की वेबसाइट पर इसके archived proceedings भी उपलब्ध हैं।

न्यायाधीशों की नियुक्ति, योग्यता और कार्यकाल

अनुच्छेद 124(2) के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा warrant under his hand and seal से होती है। वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था में Supreme Court Collegium न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए सिफारिश करता है। Supreme Court में किसी नए न्यायाधीश की नियुक्ति के लिए Collegium में भारत के मुख्य न्यायाधीश और चार वरिष्ठतम Supreme Court judges शामिल होते हैं। यह व्यवस्था Second Judges Case (1993) और Third Judges Case (1998) के बाद विकसित हुई। 99वें संविधान संशोधन और National Judicial Appointments Commission (NJAC) से संबंधित व्यवस्था को Supreme Court ने 2015 में असंवैधानिक ठहराया, जिसके बाद Collegium system जारी रहा।

अनुच्छेद 124(3) के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के लिए व्यक्ति भारत का नागरिक होना चाहिए और उसने कम-से-कम 5 वर्ष तक किसी High Court के न्यायाधीश के रूप में कार्य किया हो, या कम-से-कम 10 वर्ष तक किसी High Court का अधिवक्ता रहा हो, या राष्ट्रपति की राय में distinguished jurist हो। संविधान में नियुक्ति के लिए कोई न्यूनतम आयु निर्धारित नहीं है।

मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति भी राष्ट्रपति करते हैं। वरिष्ठता की convention महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे संविधान में लिखी हुई अनिवार्य "seniority rule" के रूप में नहीं प्रस्तुत करना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश 65 वर्ष की आयु तक पद पर रहता है और अपना resignation राष्ट्रपति को देता है।

न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया

अनुच्छेद 124(4) के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को केवल proved misbehaviour or incapacity के आधार पर राष्ट्रपति के आदेश से हटाया जा सकता है। इसके लिए संसद के प्रत्येक सदन में उस सदन की total membership के बहुमत तथा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम-से-कम दो-तिहाई बहुमत से address पारित होना आवश्यक है। इसके बाद राष्ट्रपति removal order जारी करते हैं।

Removal motion को संसद में initiate करने के लिए Judges (Inquiry) Act, 1968 के तहत लोकसभा में कम-से-कम 100 सदस्यों या राज्यसभा में कम-से-कम 50 सदस्यों के हस्ताक्षर की आवश्यकता होती है। 100 और 50 की संख्या संविधान के Article 124(4) में नहीं, बल्कि statutory procedure में आती है।

वेतन और सेवा शर्तें

अनुच्छेद 125 सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन, allowances, leave और pension से संबंधित प्रावधान करता है। वेतन और सेवा संबंधी प्रमुख प्रावधान संसद द्वारा बनाए गए कानूनों तथा संविधान की लागू व्यवस्थाओं के अधीन हैं। दूसरे Schedule में भी न्यायाधीशों के वेतन आदि से संबंधित संवैधानिक प्रावधान दिए गए हैं।

सर्वोच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार

सर्वोच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार को broadly original, appellate और advisory jurisdiction सहित विभिन्न संवैधानिक तथा वैधानिक jurisdictions में समझा जाता है। इसके अतिरिक्त Article 136 की Special Leave Petition jurisdiction, Article 32 की writ jurisdiction और Article 142 की complete justice power भी महत्वपूर्ण हैं।

मूल क्षेत्राधिकार - अनुच्छेद 131

अनुच्छेद 131 के तहत सर्वोच्च न्यायालय को कुछ संघ-राज्य और अंतर-राज्य विवादों में exclusive original jurisdiction प्राप्त है। इसमें भारत सरकार और एक या अधिक राज्यों के बीच, भारत सरकार तथा एक या अधिक राज्यों के एक पक्ष और अन्य राज्यों के दूसरे पक्ष के बीच, तथा दो या अधिक राज्यों के बीच ऐसे विवाद शामिल हो सकते हैं जिनमें किसी legal right के existence या extent से संबंधित प्रश्न हो। इसे केवल "केंद्र बनाम राज्य के हर विवाद" के रूप में नहीं समझना चाहिए; Article 131 में संवैधानिक शर्तें और सीमाएं हैं।

अपीलीय क्षेत्राधिकार - अनुच्छेद 132 से 136

अनुच्छेद 132 संवैधानिक व्याख्या से जुड़े substantial question of law वाले मामलों में High Court से अपील का प्रावधान करता है। अनुच्छेद 133 civil matters में appeals से संबंधित है और अनुच्छेद 134 criminal matters में appeals से। अनुच्छेद 134A High Court certificate से संबंधित है। अनुच्छेद 136 सर्वोच्च न्यायालय को भारत के क्षेत्र में किसी court या tribunal के judgment, decree, determination, sentence या order के विरुद्ध Special Leave to Appeal देने की विशेष शक्ति देता है, हालांकि Armed Forces से संबंधित कुछ न्यायाधिकरणों के संबंध में संवैधानिक अपवाद हैं।

सलाहकार क्षेत्राधिकार - अनुच्छेद 143

अनुच्छेद 143 के तहत राष्ट्रपति किसी ऐसे question of law or fact को सर्वोच्च न्यायालय के विचार के लिए refer कर सकते हैं जो public importance का हो और जिस पर Supreme Court की opinion लेना उचित समझा जाए। सर्वोच्च न्यायालय इस पर अपनी opinion राष्ट्रपति को report कर सकता है। इसे सामान्य judicial appeal या binding judgment के समान नहीं समझना चाहिए।

संविधान पीठ और Benches

अनुच्छेद 145(3) के अनुसार संविधान की व्याख्या से संबंधित substantial question of law वाले किसी मामले की सुनवाई के लिए कम-से-कम 5 न्यायाधीशों की Constitution Bench आवश्यक है। Supreme Court की official history के अनुसार न्यायाधीश सामान्यतः दो या तीन न्यायाधीशों की Benches में बैठते हैं और बड़े संवैधानिक या अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नों के लिए 5 या अधिक न्यायाधीशों की larger Benches गठित की जा सकती हैं। इसलिए Supreme Court के लिए "एकल न्यायाधीश, 2, 3 और 5+" को एक सामान्य संवैधानिक bench classification के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं है।

अनुच्छेद 32 और पाँच रिट

अनुच्छेद 32 स्वयं एक मौलिक अधिकार है और मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए सर्वोच्च न्यायालय जाने का संवैधानिक अधिकार देता है। डॉ. बी. आर. आंबेडकर ने अनुच्छेद 32 को संविधान की "heart and soul" कहा था। इसके तहत सर्वोच्च न्यायालय Habeas Corpus, Mandamus, Prohibition, Certiorari और Quo Warranto जैसे writs जारी कर सकता है।

  • बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus): अवैध हिरासत या detention के विरुद्ध व्यक्ति को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कराने का आदेश।
  • परमादेश (Mandamus): सार्वजनिक कर्तव्य के निर्वहन के लिए संबंधित public authority को निर्देश देने वाली रिट।
  • प्रतिषेध (Prohibition): अधीनस्थ न्यायिक या quasi-judicial authority को उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर कार्यवाही आगे बढ़ाने से रोकने की रिट।
  • उत्प्रेषण (Certiorari): उच्च न्यायालय/सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अधीनस्थ न्यायिक या quasi-judicial authority के आदेश की समीक्षा करके, उपयुक्त परिस्थितियों में उसे quash करने की रिट।
  • अधिकार-पृच्छा (Quo Warranto): किसी व्यक्ति द्वारा public office धारण करने के कानूनी अधिकार को चुनौती देने की रिट।

अनुच्छेद 32 के तहत सर्वोच्च न्यायालय मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के संदर्भ में प्रभावी constitutional remedies दे सकता है। किसी कानून को केवल इस कारण अनुच्छेद 32 के तहत रद्द नहीं किया जाता कि वह कानून पसंद नहीं है; judicial review में यह देखा जाता है कि संबंधित कानून संविधान, विशेषकर लागू मौलिक अधिकारों और अन्य संवैधानिक सीमाओं के अनुरूप है या नहीं।

न्यायिक समीक्षा और मूल ढांचा

न्यायिक समीक्षा के माध्यम से न्यायालय यह जांच सकते हैं कि legislative और executive action संविधान के अनुरूप है या नहीं। संविधान में "judicial review" शब्द को एक ही अनुच्छेद में समाहित नहीं किया गया है; इसकी संवैधानिक शक्ति विभिन्न provisions और न्यायिक व्याख्याओं से विकसित हुई है।

Kesavananda Bharati v. State of Kerala (1973) के निर्णय में Basic Structure doctrine विकसित हुआ। इस doctrine के अनुसार संसद की संविधान संशोधन शक्ति Article 368 के अंतर्गत है, लेकिन संविधान के basic structure को नष्ट करने वाला संशोधन न्यायिक समीक्षा में असंवैधानिक ठहराया जा सकता है। Judicial review, rule of law, separation of powers और judicial independence जैसे तत्वों को Supreme Court ने basic structure doctrine के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना है।

जनहित याचिका (PIL)

भारत में Public Interest Litigation ने traditional locus standi को अधिक flexible बनाया, जिससे public-spirited persons और organisations कुछ परिस्थितियों में ऐसे लोगों या समूहों के अधिकारों के लिए न्यायालय का रुख कर सके जो स्वयं न्यायालय तक पहुंचने में सक्षम नहीं थे। इस क्षेत्र के विकास में Justice V.R. Krishna Iyer और Justice P.N. Bhagwati सहित कई न्यायाधीशों के निर्णय महत्वपूर्ण रहे।

Hussainara Khatoon cases (1979-80) को भारत में PIL और prisoners' rights jurisprudence के महत्वपूर्ण प्रारंभिक मामलों में गिना जाता है। Justice P.N. Bhagwati के दौर में पत्रों और communications को भी कुछ परिस्थितियों में writ proceedings के रूप में स्वीकार करने की न्यायिक प्रवृत्ति विकसित हुई। इसलिए PIL की शुरुआत को केवल एक व्यक्ति या केवल एक case से जोड़ना अधिक सरलीकरण होगा।

कॉलेजियम व्यवस्था

Supreme Court judges की नियुक्ति के वर्तमान Collegium framework का विकास तीन Judges Cases से हुआ। First Judges Case (S.P. Gupta v. Union of India, 1981), Second Judges Case (Supreme Court Advocates-on-Record Association v. Union of India, 1993) और Third Judges Case (Presidential Reference, 1998) इस संवैधानिक-न्यायिक विकास के प्रमुख पड़ाव हैं। Second और Third Judges Cases के बाद Supreme Court Collegium में CJI और चार senior-most Supreme Court judges शामिल होते हैं।

2014 में National Judicial Appointments Commission (NJAC) के लिए 99वाँ संविधान संशोधन और संबंधित कानून बनाए गए थे। Supreme Court ने 2015 के निर्णय में NJAC व्यवस्था को असंवैधानिक ठहराया और Collegium system को जारी रखा। नियुक्ति प्रक्रिया में executive की भूमिका समाप्त नहीं होती; वर्तमान व्यवस्था में सरकार और संवैधानिक प्राधिकारों की प्रक्रिया-संबंधी भूमिकाएं भी रहती हैं।

अभिलेख न्यायालय और अवमानना - अनुच्छेद 129

अनुच्छेद 129 के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय Court of Record है और उसे अपने contempt के लिए दंड देने सहित ऐसे Court of Record की शक्तियां प्राप्त हैं। यह शक्ति संविधान में निहित है।

समीक्षा - अनुच्छेद 137

अनुच्छेद 137 सर्वोच्च न्यायालय को संसद द्वारा बनाए गए किसी कानून या अनुच्छेद 145 के अधीन बनाए गए नियमों के अधीन अपने द्वारा दिए गए judgment या order की review करने की शक्ति देता है। Review और appeal अलग-अलग remedies हैं। Review का अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक मामले में पूरा मामला सामान्य appeal की तरह दोबारा खुल जाता है।

पूर्ण न्याय - अनुच्छेद 142

अनुच्छेद 142 के तहत सर्वोच्च न्यायालय अपने समक्ष लंबित cause या matter में complete justice के लिए आवश्यक decree या order पारित कर सकता है। ऐसे orders पूरे भारत के क्षेत्र में enforceable होते हैं, संविधान और लागू कानूनों के अधीन। Article 142 को "सर्वोच्च न्यायालय को किसी भी परिस्थिति में कोई भी आदेश देने की असीम शक्ति" के रूप में नहीं समझना चाहिए।

सर्वोच्च न्यायालय का आदर्श वाक्य

सर्वोच्च न्यायालय की आधिकारिक वेबसाइट पर इसका motto "यतो धर्मस्ततो जयः" प्रदर्शित है। इसका सामान्य अर्थ है—जहां धर्म/न्याय है, वहां विजय है।

महत्वपूर्ण तथ्य

  • सर्वोच्च न्यायालय का संवैधानिक आधार - अनुच्छेद 124।
  • संविधान लागू होने के साथ सर्वोच्च न्यायालय 26 जनवरी 1950 को अस्तित्व में आया।
  • औपचारिक उद्घाटन - 28 जनवरी 1950, Chamber of Princes, पुराने संसद भवन में।
  • वर्तमान भवन - तिलक मार्ग, नई दिल्ली; न्यायालय 1958 में यहां स्थानांतरित हुआ।
  • प्रथम मुख्य न्यायाधीश - न्यायमूर्ति हरिलाल जे. कानिया।
  • पहली महिला Supreme Court judge - न्यायमूर्ति एम. फातिमा बीवी, नियुक्ति 6 अक्टूबर 1989।
  • सर्वोच्च न्यायालय की sanctioned strength - 34 न्यायाधीश, 2019 से।
  • सेवानिवृत्ति आयु - 65 वर्ष।
  • न्यायाधीश की संवैधानिक योग्यता - Article 124(3)।
  • न्यायाधीश का resignation - राष्ट्रपति को।
  • न्यायाधीश removal - Article 124(4) के अनुसार proved misbehaviour या incapacity तथा दोनों सदनों में विशेष बहुमत के बाद राष्ट्रपति का आदेश।
  • मूल क्षेत्राधिकार - Article 131।
  • अपीलीय क्षेत्राधिकार - Articles 132-136।
  • Special Leave to Appeal - Article 136।
  • Review - Article 137।
  • Binding law - Article 141।
  • Complete justice - Article 142।
  • President's consultation - Article 143।
  • Court of Record और contempt - Article 129।
  • Constitution Bench - Article 145(3) के तहत कम-से-कम 5 न्यायाधीश, जब संविधान की व्याख्या से संबंधित substantial question of law हो।
  • Constitutional remedies - Article 32।
  • Basic Structure doctrine - Kesavananda Bharati judgment, 1973।
  • Collegium system का प्रमुख न्यायिक विकास - Second Judges Case 1993 और Third Judges Case 1998।
  • NJAC को Supreme Court ने 2015 में असंवैधानिक ठहराया।
  • Constitution Bench proceedings की live streaming - 27 सितंबर 2022 से।
  • आदर्श वाक्य - "यतो धर्मस्ततो जयः"।
अनुच्छेदमुख्य विषयपरीक्षा उपयोगी तथ्य
124स्थापना और न्यायाधीशSupreme Court का गठन, नियुक्ति, योग्यता और सेवा से संबंधित मुख्य प्रावधान।
125वेतन आदिJudges के salaries, allowances आदि से संबंधित प्रावधान।
129Court of Recordअभिलेख न्यायालय और contempt power।
131मूल क्षेत्राधिकारनिर्दिष्ट संघ-राज्य तथा अंतर-राज्य legal-right disputes।
132संवैधानिक अपीलConstitution interpretation से जुड़े substantial question of law वाले मामलों में अपील।
133दीवानी अपीलCivil matters में Supreme Court appeal का constitutional provision।
134फौजदारी अपीलCriminal matters में Supreme Court appeal।
136Special LeaveSupreme Court की discretionary Special Leave to Appeal jurisdiction।
137Reviewअपने judgment/order की review की संवैधानिक शक्ति।
141Binding lawSupreme Court द्वारा declared law सभी courts पर binding।
142Complete justicePending cause or matter में complete justice के लिए आवश्यक orders/decrees।
143Advisory jurisdictionPresident द्वारा public importance के question पर opinion के लिए reference।
145(3)Constitution Benchसंविधान की व्याख्या से जुड़े substantial question of law के लिए कम-से-कम 5 judges।
32संवैधानिक उपचारमौलिक अधिकारों के enforcement के लिए Supreme Court जाने का अधिकार और writ jurisdiction।

सर्वोच्च न्यायालय से संबंधित अध्ययन में Article 124, न्यायाधीशों की नियुक्ति और योग्यता, Article 131 का original jurisdiction, Articles 132-136 का appellate jurisdiction, Article 32 की writ jurisdiction, Article 141 की binding precedent व्यवस्था, Article 142 की complete justice power, Article 143 की advisory jurisdiction और Article 145(3) की Constitution Bench व्यवस्था विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं।