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Ras

रस: परिभाषा, अंग, भेद, स्थायी भाव एवं उदाहरण

रस: परिभाषा, व्युत्पत्ति, रस-सूत्र एवं संप्रदाय

रस शब्द का शाब्दिक अर्थ
आनंद
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रस शब्द की व्युत्पत्ति किस धातु से हुई है
'रस्' धातु से
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'रस्यते आस्वाद्यते इति रसः' परिभाषा का अर्थ
जिसका आस्वादन किया जाए
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काव्य को पढ़ने या सुनने से प्राप्त होने वाला आनंद
काव्यानंद या रस
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काव्य की आत्मा किसे माना जाता है
रस को
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'वाक्यं रसात्मकं काव्यम्' किस आचार्य का प्रसिद्ध लक्षण है
आचार्य विश्वनाथ
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आचार्य विश्वनाथ का प्रसिद्ध काव्यशास्त्रीय ग्रंथ
साहित्य दर्पण
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रस संप्रदाय के प्रथम प्रवर्तक आचार्य
आचार्य भरतमुनि
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भरतमुनि का विश्वविख्यात नाट्यशास्त्रीय ग्रंथ
नाट्यशास्त्र
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नाट्यशास्त्र को किस अन्य नाम से जाना जाता है
पंचम वेद
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भरतमुनि द्वारा प्रतिपादित सुप्रसिद्ध रस-सूत्र
विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः
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भरतमुनि के रस-सूत्र में किस अंग का प्रत्यक्ष उल्लेख नहीं है
स्थायी भाव का
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भरतमुनि के रस-सूत्र के प्रथम व्याख्याता आचार्य
भट्ट लोलट
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भट्ट लोलट का दार्शनिक मत या सिद्धांत
उत्पत्तिवाद या उपचयवाद
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रस-सूत्र के द्वितीय व्याख्याता आचार्य शंकुक का सिद्धांत
अनुमितिवाद
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आचार्य शंकुक का मत किस न्याय पर आधारित है
चित्र-तुरंग न्याय पर
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रस-सूत्र के तृतीय व्याख्याता भट्ट नायक का सिद्धांत
भुक्तिवाद या भोगवाद
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साधारणीकरण सिद्धांत के प्रथम उद्भावक आचार्य
भट्ट नायक
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रस-सूत्र के चतुर्थ व्याख्याता अभिनवगुप्त का सिद्धांत
अभिव्यक्तिवाद
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रस को 'ब्रह्मानंद सहोदर' सर्वप्रथम किसने कहा
भट्ट नायक ने
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भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र में मूलतः कितने रसों का उल्लेख किया
आठ (8) रस
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भरतमुनि ने किस रस को नाट्य प्रस्तुति में स्वीकार नहीं किया
शांत रस को
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शांत रस को नवें रस के रूप में प्रतिष्ठित करने वाले आचार्य
आचार्य उद्भट
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हिंदी काव्यशास्त्र में मूल रसों की कुल संख्या
नौ (नवरस)
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दसवें रस (वात्सल्य रस) के प्रतिष्ठापक आचार्य
आचार्य विश्वनाथ
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ग्यारहवें रस (भक्ति रस) के प्रतिष्ठापक आचार्य
रूप गोस्वामी
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रसराज या रसों का राजा किस रस को कहा जाता है
शृंगार रस को
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शृंगार रस को 'रसराज' की उपाधि देने वाले आचार्य
आचार्य भोजराज
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Quick Reference
रस के प्रमुख अंग एवं उनकी परिभाषा
Ras
रस का अंगभेद/प्रकारपरिभाषा/पहचान
स्थायी भाव
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मूलतः 9 (कुल 11)
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हृदय में सुप्तावस्था में स्थायी रहने वाले प्रधान मनोविकार
विभाव
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2 भेद (आलंबन, उद्दीपन)
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स्थायी भावों को जाग्रत या उद्दीप्त करने वाले कारण
अनुभाव
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4 भेद (कायिक, वाचिक, आहार्य, सात्विक)
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आश्रय के शरीर में प्रकट होने वाली बाह्य चेष्टाएँ
संचारी (व्यभिचारी) भाव
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कुल 33 भेद
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मन में पानी के बुलबुलों की तरह उठने-गिरने वाले अल्पकालिक भाव

रस के चार अंग: स्थायी भाव, विभाव, अनुभाव एवं संचारी भाव

रस के कुल कितने प्रमुख अंग माने गए हैं
चार अंग
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रस के चार अनिवार्य अंग
स्थायी भाव, विभाव, अनुभाव, संचारी भाव
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हृदय में संस्कार रूप में सदैव विद्यमान रहने वाले भाव
स्थायी भाव
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स्थायी भावों की सर्वमान्य संख्या
नौ (कुल ग्यारह)
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मन में स्थायी भावों को जाग्रत करने वाले कारण या साधन
विभाव
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विभाव के कुल कितने भेद होते हैं
दो भेद (आलंबन और उद्दीपन)
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जिस व्यक्ति या वस्तु के कारण भाव जाग्रत हो
आलंबन विभाव
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आलंबन विभाव के दो मुख्य उपभेद
आश्रय और विषय
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जिसके हृदय में भाव उत्पन्न होता है
आश्रय
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जिसको देखकर या जिसके प्रति भाव उत्पन्न हो
विषय
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राम के मन में सीता को देखकर प्रेम उत्पन्न हुआ, यहाँ आश्रय
श्रीराम
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राम के मन में सीता को देखकर प्रेम उत्पन्न हुआ, यहाँ विषय
सीता
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जाग्रत भाव को और अधिक तीव्र या उद्दीप्त करने वाली परिस्थितियाँ
उद्दीपन विभाव
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चाँदनी रात, कोकिल-कूजन, एकांत उपवन किस विभाव के उदाहरण हैं
उद्दीपन विभाव
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आश्रय के मनोगत भावों को व्यक्त करने वाली शारीरिक चेष्टाएँ
अनुभाव
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अनुभाव के मुख्य कितने भेद माने जाते हैं
चार भेद
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अनुभाव के चार मुख्य भेद
कायिक, वाचिक, आहार्य, सात्विक
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शरीर के अंगों द्वारा जान-बूझकर की गई चेष्टाएँ (जैसे आँख मारना)
कायिक अनुभाव
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वाणी द्वारा प्रकट किए जाने वाले अनुभाव
वाचिक अनुभाव
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कृत्रिम वेषभूषा या बनावटी रूप-रंग द्वारा भाव प्रदर्शन
आहार्य अनुभाव
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सत्व के योग से स्वतः उत्पन्न होने वाले अनिच्छुक शारीरिक विकार
सात्विक अनुभाव
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सात्विक अनुभावों की कुल संख्या
आठ (8)
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आठों सात्विक अनुभाव
स्तंभ, स्वेद, रोमांच, स्वरभंग, कंप, वैवर्ण्य, अश्रु, प्रलय
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भय या आश्चर्य के कारण जड़वत खड़े रह जाना
स्तंभ
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आश्रय के शरीर पर पसीना आ जाना
स्वेद
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रोंगटे खड़े हो जाना किस सात्विक अनुभाव का रूप है
रोमांच
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मुख का रंग उड़ जाना या पीला पड़ जाना
वैवर्ण्य
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चेतना शून्य होकर गिर पड़ना या मूर्च्छित होना
प्रलय
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मन में अल्पकाल तक संचरण कर लुप्त होने वाले भाव
संचारी या व्यभिचारी भाव
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काव्यशास्त्र में संचारी भावों की कुल संख्या
तैंतीस (33)
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हर्ष, विषाद, शंका, ग्लानि, लज्जा, मोह किस वर्ग के भाव हैं
संचारी भाव
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आचार्य देव ने 34वाँ संचारी भाव किसे माना
'छल' को
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पंडित रामचंद्र शुक्ल ने किस भाव को संचारी भाव माना
'चकपकाहट' को
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संचारी भावों की तुलना किससे की जाती है
जल के बुलबुलों से
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स्थायी भाव और संचारी भाव में मुख्य अंतर
स्थायित्व बनाम क्षणिकता
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Quick Reference
प्रमुख रस, स्थायी भाव एवं पहचान लक्षण
Ras
रसस्थायी भावपहचान
शृंगार रस
उत्तर देखें
रति (प्रेम)
उत्तर देखें
नायक-नायिका का मिलन अथवा विरह का चित्रण
हास्य रस
उत्तर देखें
हास
उत्तर देखें
विकृत वेष, वाणी, चेष्टा से हँसी उत्पन्न होना
करुण रस
उत्तर देखें
शोक
उत्तर देखें
प्रिय वस्तु या व्यक्ति के विनाश से उत्पन्न असीम दुख
वीर रस
उत्तर देखें
उत्साह
उत्तर देखें
युद्ध, दया, दान या धर्म हेतु अदम्य उत्साह
रौद्र रस
उत्तर देखें
क्रोध
उत्तर देखें
शत्रु या अन्यायी की चेष्टा से प्रतिशोध की तीव्र ज्वाला
भयानक रस
उत्तर देखें
भय
उत्तर देखें
डरावने दृश्य या जीव को देखकर मन में कंपन
वीभत्स रस
उत्तर देखें
जुगुप्सा (घृणा)
उत्तर देखें
शव, रक्त, मज्जा देखकर मन में तीव्र घिन उत्पन्न होना
अद्भुत रस
उत्तर देखें
विस्मय (आश्चर्य)
उत्तर देखें
अलौकिक या अकल्पनीय वस्तु देखकर चकित रह जाना
शांत रस
उत्तर देखें
निर्वेद (शम)
उत्तर देखें
संसार की असारता और वैराग्य से परम शांति मिलना
वात्सल्य रस
उत्तर देखें
वत्सलता (स्नेह)
उत्तर देखें
शिशु की बाललीलाओं पर माता-पिता का असीम प्रेम
भक्ति रस
उत्तर देखें
भगवद्विषयक रति
उत्तर देखें
ईश्वर के प्रति अनन्य समर्पण एवं परम प्रेम

प्रमुख रसों के भेद, लक्षण एवं स्थायी भाव

शृंगार रस का स्थायी भाव क्या है
रति (प्रेम)
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शृंगार रस के दो मुख्य भेद
संयोग शृंगार और वियोग (विप्रलंभ) शृंगार
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नायक-नायिका के परस्पर मिलन और आमोद-प्रमोद का वर्णन
संयोग शृंगार
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'बतरस लालच लाल की, मुरली धरी लुकाय' में रस
संयोग शृंगार रस
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परस्पर प्रेम में अनुरक्त नायक-नायिका के विरह का वर्णन
वियोग शृंगार रस
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'निसिदिन बरसत नैन हमारे, सदा रहति पावस ऋतु हम पै' में रस
वियोग शृंगार रस
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'हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी, तुम देखी सीता मृगनयनी' में रस
वियोग शृंगार रस
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हास्य रस का स्थायी भाव
हास
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'शीश पर गंगा हँसै, भुजनि भुजंगा हँसै, हास ही को दंगा भयो' में रस
हास्य रस
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'तंबूरा ले मंच पर बैठे प्रेमप्रताप, साज मिले पंद्रह मिनट...' में रस
हास्य रस
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करुण रस का स्थायी भाव
शोक
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वियोग शृंगार और करुण रस में मुख्य अंतर
पुनर्मिलन की आशा बनाम पूर्ण विनाश
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'शोक विकल सब रोवहिं रानी, रूपु सीलु बलु तेजु बखानी' में रस
करुण रस
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'दुख ही जीवन की कथा रही, क्या कहूँ आज जो नहीं कही' में रस
करुण रस
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वीर रस का स्थायी भाव
उत्साह
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वीर रस के चार मुख्य भेद
युद्धवीर, दानवीर, दयावीर, धर्मवीर
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'बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी...' में रस
वीर रस
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'वीर तुम बढ़े चलो, धीर तुम बढ़े चलो' में कौन-सा रस है
वीर रस
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रौद्र रस का स्थायी भाव
क्रोध
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'श्रीकृष्ण के सुन वचन अर्जुन क्षोभ से जलने लगे' में रस
रौद्र रस
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'रे नृपबालक कालबस बोलत तोहि न संभार' में कौन-सा रस है
रौद्र रस
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भयानक रस का स्थायी भाव
भय
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'एक ओर अजगरहि लखि, एक ओर मृगराय। विकल बटोही बीच ही...' में रस
भयानक रस
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'उधर गरजती सिंधु लहरियाँ कुटिल काल के जालों सी' में रस
भयानक रस
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वीभत्स रस का स्थायी भाव
जुगुप्सा (घृणा)
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'सिर पर बैठ्यो काग आँख दोउ खात निकारत, खींचत जीभहिं स्यार...' में रस
वीभत्स रस
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अद्भुत रस का स्थायी भाव
विस्मय (आश्चर्य)
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'अखिल भुवन चर-अचर सब, हरि मुख में लखि मातु' में रस
अद्भुत रस
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'देखि यशोदा शिशु के मुख में, सकल विश्व की माया' में रस
अद्भुत रस
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शांत रस का स्थायी भाव
निर्वेद या शम
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'मन रे तन कागद का पुतला, लागै बूँद बिनसि जाय छिन में' में रस
शांत रस
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'जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं' में रस
शांत रस
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वात्सल्य रस का स्थायी भाव
वत्सलता या स्नेह
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'किलकत कान्ह घुटुरुवनि आवत, मनिमय कनक नंद कैं आँगन...' में रस
वात्सल्य रस
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'मैया कबहिं बढ़ैगी चोटी, कितनी बार मोहि दूध पियत भई' में रस
वात्सल्य रस
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हिंदी में वात्सल्य रस के अद्वितीय सम्राट कवि
सूरदास
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भक्ति रस का स्थायी भाव
भगवद्विषयक रति या अनुराग
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'राम जपु, राम जपु, राम जपु बावरे' पंक्ति में रस
भक्ति रस
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रस निष्पत्ति, साधारणीकरण एवं परीक्षा-उपयोगी नियम

काव्य में विभाव, अनुभाव और संचारी भाव के संयोग से किसकी निष्पत्ति होती है
रस की
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साधारणीकरण का मूल अर्थ क्या है
व्यक्तिगत भाव का सार्वभौमिक होना
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साधारणीकरण की अवस्था में पाठक या दर्शक क्या बन जाता है
सहृदय
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आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार साधारणीकरण किसका होता है
आलंबनत्व धर्म का
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डॉ. नगेंद्र के अनुसार साधारणीकरण किसका होता है
कवि की अनुभूति का
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काव्य में माधुर्य गुण प्रायः किस रस में पाया जाता है
शृंगार, शांत और करुण में
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काव्य में ओज गुण प्रायः किन रसों में पाया जाता है
वीर, रौद्र और भयानक में
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काव्य में प्रसाद गुण की उपस्थिति
सभी रसों में संभव
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शृंगार रस का विरोधी रस कौन-सा माना जाता है
वीभत्स और करुण रस
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वीर रस का विरोधी रस किसे माना जाता है
भयानक रस को
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शांत रस का विरोधी रस किसे माना गया है
रौद्र और शृंगार को
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रस निष्पत्ति में मुख्य रूप से कौन-सा भाव रस दशा तक पहुँचता है
स्थायी भाव
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काव्य के पठन-श्रवण से उत्पन्न आंतरिक आह्लाद
रस
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हिंदी साहित्य में नवरस की अवधारणा किस परंपरा से आई
संस्कृत काव्यशास्त्र से
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रस की पहचान हेतु सबसे प्राथमिक आधार क्या है
काव्य का मूल स्थायी भाव
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करुण रस को एकमात्र मूल रस मानने वाले संस्कृत आचार्य
आचार्य भवभूति (एको रसः करुण एव)
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भवभूति का प्रसिद्ध नाटक जिसमें करुण रस की प्रधानता है
उत्तररामचरितम्
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नाट्यशास्त्र के अनुसार रसों के अधिष्ठाता देवता और वर्ण का विधान
भरतमुनि द्वारा निर्धारित
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शृंगार रस का वर्ण (रंग) क्या माना गया है
श्याम वर्ण
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वीर रस का वर्ण (रंग) क्या माना गया है
गौर वर्ण
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रौद्र रस का वर्ण (रंग) क्या माना गया है
रक्त वर्ण (लाल)
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हास्य रस का वर्ण (रंग) क्या माना गया है
श्वेत वर्ण
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वीभत्स रस का वर्ण (रंग) क्या माना गया है
नील वर्ण
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अद्भुत रस का वर्ण (रंग) क्या माना गया है
पीत वर्ण (पीला)
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भयानक रस का वर्ण (रंग) क्या माना गया है
कृष्ण वर्ण (काला)
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करुण रस का वर्ण (रंग) क्या माना गया है
कपोत वर्ण
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