भारतीय सामंतवाद (Indian Feudalism) सिद्धांत के प्रमुख प्रतिपादक
उत्तर देखें
प्रो. रामशरण शर्मा
| भूमि अनुदान / पारिभाषिक पद | अनुदान का स्वरूप एवं धारक | सामाजिक, प्रशासनिक व आर्थिक प्रभाव |
|---|---|---|
ब्रह्मदेय (Brahmadeya) |
उत्तर देखें
विद्वान ब्राह्मणों को व्यक्तिगत रूप से दिया गया कर-मुक्त भूमि अनुदान
|
उत्तर देखें
ब्राह्मणों का भूस्वामी वर्ग के रूप में उदय; कृषि का नए क्षेत्रों में विस्तार
|
अग्रहार (Agrahara) |
उत्तर देखें
ब्राह्मणों के संपूर्ण गाँव अथवा समूह को सामूहिक रूप से प्रदत्त कर-मुक्त भूमि
|
उत्तर देखें
स्वायत्त ग्रामीण बस्तियों का निर्माण; वैदिक शिक्षा एवं मंदिर संस्कृति का सुदृढ़ीकरण
|
देवदान / देवदेय (Devadana) |
उत्तर देखें
मंदिरों, मठों और देवस्थानों के नित्य पूजन व संधारण हेतु स्थायी अनुदान
|
उत्तर देखें
मंदिरों का शक्तिशाली आर्थिक बैंक एवं विशाल भूस्वामी केंद्र के रूप में रूपांतरण
|
पल्लीच्चंदम (Pallichchandam) |
उत्तर देखें
जैन मंदिरों, वसतियों और बौद्ध विहारों को दिया गया भूमि अनुदान
|
उत्तर देखें
गैर-ब्राह्मणीय श्रमण संप्रदायों का आर्थिक संवर्धन एवं संस्थागत संरक्षण
|
भोग / जीविका (Bhoga/Jivika) |
उत्तर देखें
सैन्य व प्रशासनिक अधिकारियों को वेतन के बदले दी गई राजस्व-अधिकार भूमि
|
उत्तर देखें
सामंती संप्रभुता का विकास; प्रशासनिक विकेंद्रीकरण एवं केंद्रीय नियंत्रण का क्षय
|
भूमिछिद्रविधान (Bhumichhidra) |
उत्तर देखें
जंगली या बंजर भूमि को आबाद करने वाले को दी गई कर-मुक्त/रियायती भूमि
|
उत्तर देखें
कृषि योग्य भूमि का भौगोलिक विस्तार एवं जनजातीय क्षेत्रों का मुख्यधारा में समावेशन
|
| सामाजिक वर्ग / समुदाय | सामाजिक स्थिति व आधार | प्रमुख आर्थिक व सामाजिक भूमिका |
|---|---|---|
सामंत / महामंडलेश्वर |
उत्तर देखें
सर्वोच्च शासक एवं सैन्य अभिजात वर्ग; विशाल भूमि क्षेत्रों के स्वामी
|
उत्तर देखें
सैन्य बल संधारण, स्थानीय न्याय, कर वसूली एवं केंद्रीय सत्ता को चुनौती
|
पुरोहित / ब्राह्मण वर्ग |
उत्तर देखें
सर्वोच्च सामाजिक प्रतिष्ठा; अग्रहारों एवं ब्रह्मदेय भूमि के स्वामी
|
उत्तर देखें
धार्मिक अनुष्ठान, शिक्षा, राजनैतिक परामर्श एवं कृषि विस्तार का नेतृत्व
|
कायस्थ वर्ग |
उत्तर देखें
लेखक, लिपिक एवं राजस्व प्रबंधक; स्वतंत्र प्रभावशाली जाति के रूप में उदय
|
उत्तर देखें
राजकीय अभिलेख संधारण, भूमि कर निर्धारण एवं प्रशासनिक मध्यस्थता
|
कृषक समुदाय (शूद्र/वेल्लाल) |
उत्तर देखें
विशाल उत्पादक वर्ग; शूद्रों का मुख्य रूप से कृषक स्थिति में रूपांतरण
|
उत्तर देखें
अन्न उत्पादन, बेगार एवं राज्य व सामंतों को भू-राजस्व अदायगी
|
वैश्य व व्यापारिक गिल्ड |
उत्तर देखें
शहरी व तटीय व्यापारी; आर्थिक रूप से अत्यंत समृद्ध व प्रभावशाली
|
उत्तर देखें
अंतर्देशीय व समुद्री व्यापार, नगर प्रशासन एवं मंदिरों को अकूत दान
|
अंत्यज / अस्पृश्य वर्ग |
उत्तर देखें
गाँवों व नगरों की परिधि से बाहर बसे सामाजिक रूप से बहिष्कृत समूह
|
उत्तर देखें
चर्मशिल्प, सफाई, शवदाह, शिकार एवं अत्यधिक कठिन श्रम कार्य
|
| व्यापारिक निगम (गिल्ड) | प्रभाव क्षेत्र व संरचना | प्रमुख व्यापारिक एवं आर्थिक गतिविधियां |
|---|---|---|
मणिग्रामम (Manigramam) |
उत्तर देखें
दक्षिण भारत के प्रमुख तटीय व आंतरिक व्यापारिक नगर
|
उत्तर देखें
अंतर्देशीय थोक व्यापार; खाद्यान्न, वस्त्र, मसाले व स्थानीय कृषि उत्पादों का विपणन
|
नानादेशी (Nanadesi) |
उत्तर देखें
विभिन्न राज्यों एवं समुद्रपार (श्रीलंका, सुमात्रा, मलाया व बर्मा)
|
उत्तर देखें
हाथी-दांत, कीमती रत्न, मसाले, विदेशी घोड़े और सुगंधित द्रव्यों का आयात-निर्यात
|
अय्यावोल / 500 (Ayyavole) |
उत्तर देखें
मूल केंद्र ऐहोल (कर्नाटक); संपूर्ण प्रायद्वीप एवं दक्षिण-पूर्व एशिया
|
उत्तर देखें
सशस्त्र अंगरक्षकों (वीरकोडि) सहित कारवां व्यापार; व्यापक बैंकिंग व विनिमय
|
अंजुवन्नम (Anjuvannam) |
उत्तर देखें
पश्चिमी व पूर्वी तटीय बंदरगाह (अरब, यहूदी, सीरियाई ईसाई व्यापारी)
|
उत्तर देखें
पश्चिमी एशिया व चीन के साथ समुद्री जहाजरानी, घोड़ों का व्यापार व विदेशी मुद्रा विनिमय
|
सार्थवाह संगठन (Sarthavaha) |
उत्तर देखें
उत्तर भारत, मध्य भारत एवं सिल्क रूट से जुड़े अंतर्देशीय मार्ग
|
उत्तर देखें
सशस्त्र काफिलों के साथ दूरस्थ अंतर-क्षेत्रीय मंडपिकाओं (मंडियों) में व्यापारिक माल परिवहन
|
| आचार्य एवं काल | दर्शन एवं संप्रदाय | प्रमुख ग्रंथ व ऐतिहासिक योगदान |
|---|---|---|
आदि शंकराचार्य
(788–820 ई.) |
उत्तर देखें
अद्वैत वेदांत
(स्मार्त संप्रदाय)
|
उत्तर देखें
शारीरिकभाष्य (ब्रह्मसूत्र भाष्य), गीताभाष्य, उपनिषद भाष्य; प्रस्थानत्रयी पर भाष्य व चार दिशाओं में चार मठों की स्थापना
|
रामानुजाचार्य
(1017–1137 ई.) |
उत्तर देखें
विशिष्टाद्वैत
(श्री संप्रदाय)
|
उत्तर देखें
श्रीभाष्य, वेदार्थसंग्रह, गीताभाष्य; सगुण ईश्वर (नारायण) की भक्ति व प्रपत्ति (शरणागति) का सिद्धांत
|
माध्वाचार्य
(1199–1278 ई.) |
उत्तर देखें
द्वैतवाद
(ब्रह्म संप्रदाय)
|
उत्तर देखें
अणुभाष्य, तत्वविवेक; जीव और ईश्वर में शाश्वत व वास्तविक भेद; विष्णु सर्वोच्च स्वतंत्र तत्व
|
निम्बार्काचार्य
(12वीं सदी) |
उत्तर देखें
द्वैताद्वैत (भेदाभेद)
(सनक संप्रदाय)
|
उत्तर देखें
वेदांत पारिजात सौरभ; जीव व ब्रह्म में भेद और अभेद दोनों का सह-अस्तित्व; राधा-कृष्ण उपासना
|
कुमारिल भट्ट व प्रभाकर
(8वीं सदी) |
उत्तर देखें
पूर्व मीमांसा दर्शन
|
उत्तर देखें
श्लोकवार्तिक, तंत्रवार्तिक; वेदों की अपौरुषेयता व वैदिक कर्मकांडों की दार्शनिक पुनर्स्थापना
|
| दार्शनिक आधार / तत्व | आदि शंकराचार्य (अद्वैत वेदांत) | रामानुजाचार्य (विशिष्टाद्वैत) |
|---|---|---|
ब्रह्म का मूल स्वरूप |
उत्तर देखें
निर्गुण, निराकार, निर्विशेष एवं अनिर्वचनीय विशुद्ध चैतन्य
|
उत्तर देखें
सगुण, साकार, अनंत कल्याणकारी गुणों से युक्त सविशेष पुरुषोत्तम (विष्णु)
|
जगत की वास्तविकता |
उत्तर देखें
जगत माया (अविद्या) जनित प्रातिभासिक सत्य है; पारमार्थिक स्तर पर मिथ्या
|
उत्तर देखें
जगत वास्तविक और सत्य है; यह ब्रह्म का ही प्रत्यक्ष शरीर (प्रकार) है
|
जीव और ब्रह्म का संबंध |
उत्तर देखें
जीव और ब्रह्म मूलतः एक ही हैं (अद्वैत); 'तत्त्वमसि', 'अहं ब्रह्मास्मि'
|
उत्तर देखें
जीव ब्रह्म का अभिन्न अंश व शरीर है, किंतु व्यक्तित्व में भिन्न रहता है
|
मोक्ष प्राप्ति का साधन |
उत्तर देखें
विशुद्ध ज्ञान (ज्ञानमार्ग); अविद्या के नाश से आत्मज्ञान ही मुक्ति
|
उत्तर देखें
भक्ति और प्रपत्ति (शरणागति); ईश्वरानुग्रह से वैकुंठ धाम की प्राप्ति
|
सामाजिक व व्यावहारिक दृष्टि |
उत्तर देखें
पारमार्थिक स्तर पर संन्यास व ज्ञान; व्यावहारिक स्तर पर वर्ण-व्यवस्था मान्य
|
उत्तर देखें
भक्ति का मार्ग सभी वर्णों व अंत्यजों हेतु सुलभ; सामाजिक समन्वय का प्रसार
|