अकबर का पूरा नाम
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जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर
| सैन्य अभियान व वर्ष | क्षेत्र व विरोधी पक्ष | रणनीतिक परिणाम एवं ऐतिहासिक प्रभाव |
|---|---|---|
मालवा अभियान
(1561–62 ई.) |
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मालवा (सारंगपुर)
विरोधी: बाजबहादुर
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आधम खां व पीर मुहम्मद; बाजबहादुर पराजित; रानी रूपमती का विषपान; मालवा का मुगल साम्राज्य में विलय
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गोंडवाना अभियान
(1564 ई.) |
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गढ़-कटंगा (मध्य प्रदेश)
विरोधी: रानी दुर्गावती व वीर नारायण
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आसफ खां का नेतृत्व; रानी दुर्गावती ने वीरतापूर्वक लड़ते हुए आत्मोत्सर्ग किया; अकूत स्वर्ण व हाथियों की प्राप्ति
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चित्तौड़ अभियान
(1567–68 ई.) |
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मेवाड़ (चित्तौड़गढ़)
विरोधी: राणा उदयसिंह
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अकबर द्वारा स्वयं घेराबंदी; जयमल व पत्ता वीरगति; राजपूत जौहर; अकबर ने जयमल-पत्ता की पाषाण मूर्तियां आगरा में लगवाईं
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रणथंभौर व कालिंजर
(1569 ई.) |
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राजस्थान व बुंदेलखंड
विरोधी: सुरजन हाड़ा व रामचंद्र
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भगवान दास व मानसिंह की मध्यस्थता से आत्मसमर्पण; दोनों अभेद्य पहाड़ी दुर्गों पर मुगलों का कब्जा
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गुजरात अभियान
(1572–73 ई.) |
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अहमदाबाद, सूरत, खंभात
विरोधी: मुजफ्फर शाह तृतीय
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अकबर ने पहली बार समुद्र देखा; पुर्तगालियों से संपर्क; विद्रोह दमन हेतु 11 दिन में द्रुतगामी अभियान; बुलंद दरवाजा निर्माण
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बंगाल-बिहार अभियान
(1574–76 ई.) |
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पटना, गौड़, तुकारोई
विरोधी: दाऊद खां कररानी
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मुनीम खां व अकबर; तुकारोई व राजमहल के युद्धों में अफगान पराजित; पूर्वी भारत का मुगल साम्राज्य में पूर्ण विलय
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हल्दीघाटी का युद्ध
(18 जून 1576) |
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गोगुंदा के पास (मेवाड़)
विरोधी: महाराणा प्रताप
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मानसिंह व आसफ खां; प्रताप का अदम्य शौर्य; अनिर्णायक रणनीतिक परिणाम; प्रताप ने चावंड से संघर्ष जारी रखा
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काबुल व कश्मीर विजय
(1581 व 1586 ई.) |
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अफगानिस्तान व कश्मीर घाटी
विरोधी: मिर्जा हकीम व यूसुफ चक
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काबुल में सौतेले भाई का दमन; कासिम खां व भगवान दास द्वारा कश्मीर जीतकर मुगल सूबा बनाया गया
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असीरगढ़ अभियान
(1601 ई.) |
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खानदेश (दक्कन का प्रवेश द्वार)
विरोधी: मीरन बहादुर
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अकबर का जीवन का अंतिम सैन्य अभियान; रिश्वत देकर 'सोने की कुंजियों से किला खोला गया'; दक्षिण का मार्ग प्रशस्त
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| राजपूत राज्य व शासक | संबंध का स्वरूप व वैवाहिक संधि | मुगल सेवा में भूमिका व ऐतिहासिक प्रभाव |
|---|---|---|
आमेर (कछवाहा वंश)
राजा भारमल (बिहारीमल) |
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1562 ई. में स्वेच्छा से प्रथम अधीनता स्वीकार; पुत्री हरखा बाई (मरियम-उज-जमानी) का विवाह
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कछवाहा मुगलों के सबसे विश्वस्त स्तंभ बने; भगवान दास व मानसिंह को 5000 व 7000 का सर्वोच्च मनसब मिला
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बीकानेर (राठौड़ वंश)
राव कल्याणमल |
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1570 ई. के नागौर दरबार में अधीनता स्वीकार; अपनी पुत्री का विवाह अकबर से किया
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पुत्र रायसिंह मुगलों के प्रमुख सेनापति बने; गुजरात व दक्कन अभियानों में मुगलों को निर्णायक सहयोग दिया
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जैसलमेर (भाटी वंश)
रावल हरराय |
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1570 ई. के नागौर दरबार में मुगलों की संप्रभुता स्वीकारी; राजकुमारी का विवाह
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पश्चिमी थार मरुस्थल व सिंध व्यापारिक मार्ग पर मुगलों का निर्विवाद सुरक्षा नियंत्रण स्थापित हुआ
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मारवाड़ (राठौड़ वंश)
राव चंद्रसेन व मोटा राजा उदयसिंह |
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चंद्रसेन ने आजीवन मुगलों का विरोध किया ('मारवाड़ का प्रताप'); 1583 में उदयसिंह ने अधीनता मानी
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उदयसिंह की पुत्री जोधाबाई (जगत गोसाईं) का विवाह जहांगीर से; मारवाड़ मुगल प्रशासन का अभिन्न अंग बना
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मेवाड़ (सिसोदिया वंश)
महाराणा प्रताप व अमरसिंह |
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वैवाहिक संबंध व व्यक्तिगत दरबारी हाजिरी कभी स्वीकार नहीं की; निरंतर सशस्त्र प्रतिरोध
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1576 हल्दीघाटी युद्ध के बाद भी प्रताप ने छापामार युद्ध जारी रखा; मेवाड़ की स्वतंत्रता का अमर प्रतीक बना
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| केंद्रीय पद / विभाग | प्रमुख कार्य एवं अधिकार | संबंधित अधिकारी व स्वरूप |
|---|---|---|
वकील (वकील-ए-मुतलक) |
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सम्राट के बाद सर्वोच्च प्रशासनिक पद; आरंभ में असीमित अधिकार, बाद में शक्तिहीन
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बैरम खां व मुनीम खां; अकबर ने इसकी वित्तीय शक्तियां छीनकर वजीर को सौंप दीं
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दीवान / वजीर
(दीवान-ए-कुल) |
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साम्राज्य का सर्वोच्च वित्त एवं राजस्व प्रधान; समस्त आय-व्यय, जागीर व खालसा का नियंत्रण
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मुजफ्फर खां तुर्बती, राजा टोडरमल, ख्वाजा शाह मंसूर; सम्राट के सीधे नियंत्रण में कार्य
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मीर बख्शी
(सैन्य विभाग) |
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सैन्य प्रशासन, मनसबदारों की भर्ती, घोड़ों की दाग-हुलिया, वेतन प्रमाण पत्र (सरखत) जारी करना
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सैन्य प्रमुख किंतु युद्ध सेनापति होना अनिवार्य नहीं; खुफिया बरीदों की रिपोर्ट एकत्र करना
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मीर सामां / खान-ए-सामां |
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शाही घराने, अंतःपुर, हरम व शाही कारखानों (36 कारखाने) का सर्वोच्च प्रबंधक
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सम्राट का अत्यंत विश्वासपात्र अधिकारी; शाही भंडार, भोजन, वस्त्र व अस्त्र-शस्त्र का संधारण
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सद्र-उस-सुदूर
(धार्मिक विभाग) |
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धार्मिक मामलों, इस्लामी शिक्षा, वक्फ संपत्तियों एवं कर-मुक्त भूमि (मदद-ए-माश/सुयूरगल) का अध्यक्ष
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काजी-उल-कुजात (मुख्य न्यायाधीश) का दायित्व भी प्रायः इसी के पास रहता था
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मुहतसिब व मीर-ए-अदल |
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मुहतसिब: सार्वजनिक आचरण व नैतिकता का रक्षक; मीर-ए-अदल: काजी के निर्णय को लागू करने वाला
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नगरों में नाप-तौल की जांच, जुआ व मद्यपान पर रोक तथा निष्पक्ष न्यायिक क्रियान्वयन
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| घटक / आयाम | प्रशासनिक स्वरूप एवं नियम | ऐतिहासिक प्रभाव व उद्देश्य |
|---|---|---|
उत्पत्ति व स्वरूप
(1577 ई. में संस्थागत) |
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चंगेज खां की दशमलव सैन्य व्यवस्था से प्रेरित; प्रत्येक अधिकारी को एक विशिष्ट 'मनसब' (दर्जा/पद) प्रदान करना
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नागरिक एवं सैन्य अधिकारियों का एकीकृत ढांचा; वंशानुगत पदों की समाप्ति; सम्राट के प्रति व्यक्तिगत निष्ठा
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जात पद
(व्यक्तिगत प्रतिष्ठा) |
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अधिकारी के व्यक्तिगत ओहदे, प्रशासनिक वरीयता और नकद/जागीर वेतन का निर्धारक अंक
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दरबार में बैठने का स्थान, प्रतिष्ठा व वेतन का मापदंड; 10 से 10,000 तक के मनसब
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सवार पद
(सैन्य दायित्व) |
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मनसबदार द्वारा अनिवार्य रूप से रखे जाने वाले घुड़सवारों और घोड़ों की वास्तविक संख्या का सूचक
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सवार पद कभी भी जात पद से अधिक नहीं हो सकता था; युद्ध काल में त्वरित सैन्य आपूर्ति
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मनसबदारों की 3 श्रेणियां
(जात-सवार अनुपात) |
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प्रथम श्रेणी: जात = सवार; द्वितीय श्रेणी: सवार संख्या जात के आधे से अधिक; तृतीय श्रेणी: सवार आधे से कम
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वेतन व भत्तों का सूक्ष्म वैज्ञानिक निर्धारण; मनसबदार की कार्यकुशलता के आधार पर पदोन्नति
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दाग व चेहरा तथा जागीर
(भ्रष्टाचार नियंत्रण) |
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घोड़ों पर दोहरी शाही मोहर (दाग) व सैनिकों का हुलिया (चेहरा); वेतन नकद (नकदी) अथवा जागीर के रूप में
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सेना में फर्जी हाजिरी व कमजोर घोड़ों पर पूर्ण रोक; जागीरों का नियमित स्थानांतरण ताकि सामंती जड़े न जमें
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| राजस्व तत्व / घटक | प्रक्रिया, स्वरूप एवं नियम | संबंधित अधिकारी व आर्थिक प्रभाव |
|---|---|---|
आईन-ए-दहसाला
(1580 ई.) |
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विगत 10 वर्षों (1571–1580) की औसत उपज व औसत मूल्य निकालकर लगान निर्धारण; उपज का 1/3 भाग कर
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राजा टोडरमल व ख्वाजा शाह मंसूर; कर निर्धारण में अनिश्चितता व वार्षिक सर्वेक्षण की झंझट समाप्त
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भूमि मापन सुधार
(इलाही गज व जरीब) |
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सिकंदरी गज के स्थान पर 41 अंगुल (33.5 इंच) का इलाही गज; सन की रस्सी की जगह लोहे की कड़ियों वाली बांस की जरीब
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अमीन व कानूनगो; नमी व खिंचाव से होने वाली माप त्रुटियों का अंत; सटीक बीघा क्षेत्रफल (3600 वर्ग गज)
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पोलज व परौती भूमि
(नियमित कृषि) |
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पोलज: जिस पर प्रतिवर्ष बिना नागा नियमित खेती हो; परौती: भूमि की उर्वरा शक्ति हेतु 1-2 वर्ष परती छोड़ी गई
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अमल-गुजार; सर्वाधिक राजस्व प्राप्ति; उत्तम, मध्यम व निकृष्ट का औसत निकालकर 1/3 लगान नकद या जिंस में
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चाचर व बंजर भूमि
(अल्पकृषि भूमि) |
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चाचर: जो 3-4 वर्ष खाली रही हो; बंजर: जो 5 या अधिक वर्षों से कृषि विहीन रही हो; रियायती आरंभिक दरें
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किसानों को बंजर भूमि आबाद करने हेतु तकावी ऋण; चौथे/पांचवें वर्ष में पूर्ण दर लागू कर कृषि विस्तार
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करोड़ी व्यवस्था
(1573 ई.) |
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साम्राज्य को ऐसे हलकों में बांटना जिनसे प्रतिवर्ष 1 करोड़ दाम (2.5 लाख रु.) भू-राजस्व प्राप्त हो
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करोड़ी अधिकारी; भूमि के वास्तविक उत्पादन आंकड़ों का संकलन, जिसने 1580 के दहसाला की आधारशिला रखी
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| धार्मिक संस्था / नीति व वर्ष | उद्देश्य एवं स्वरूप | युगीन प्रभाव व ऐतिहासिक महत्व |
|---|---|---|
तीर्थयात्रा व जजिया कर समाप्ति
(1563 व 1564 ई.) |
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गैर-मुस्लिम हिंदू प्रजा पर लगे सदियों पुराने भेदभावपूर्ण धार्मिक करों का पूर्ण उन्मूलन
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हिंदू प्रजा में सम्राट के प्रति निष्ठा व विश्वास का उदय; राष्ट्रीय साम्राज्य की आधारशिला
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इबादतखाना की स्थापना
(1575 ई., फतेहपुर सीकरी) |
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प्रारंभ में केवल सुन्नी उलेमाओं के धार्मिक विचार-विमर्श हेतु पूजा-गृह; 1578 में सभी धर्मों हेतु खोला गया
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उलेमाओं के पाखंड व संकीर्ण मतभेदों का पर्दाफाश; अकबर का रूढ़िवादी इस्लाम से मोहभंग
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महजरनामा की घोषणा
(सितंबर 1579 ई.) |
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शेख मुबारक द्वारा प्रारूप तैयार; अकबर को 'इमाम-ए-आदिल' (धार्मिक मामलों का अंतिम मध्यस्थ) घोषित किया
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धार्मिक राजनीति पर उलेमाओं का एकाधिकार समाप्त; राज्यहित को शरीयत की संकीर्ण व्याख्या पर वरीयता
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सुलह-ए-कुल का सिद्धांत
(सार्वभौमिक शांति) |
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सभी धर्मों के प्रति पूर्ण सहिष्णुता, सम्मान एवं भेदभाव-रहित सद्भाव; अबुल फजल द्वारा दार्शनिक आधार
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मुगल राजव्यवस्था का मूल मंत्र; विविध संस्कृतियों, जातियों व संप्रदायों का सफल एकीकरण
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तौहीद-ए-इलाही / दीन-ए-इलाही
(1582 ई.) |
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सभी धर्मों के उदात्त नैतिक तत्वों का समन्वय; कोई नया संप्रदाय या पैगंबर नहीं, बल्कि नैतिक आचार-संहिता
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रविवार को दीक्षा; केवल 18 प्रमुख दरबारियों ने स्वीकारा; बीरबल एकमात्र हिंदू सदस्य; कोई जबरन धर्मांतरण नहीं
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