भारत में ब्रिटिश उपनिवेशवाद को तीन चरणों में किसने वर्गीकृत किया
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रजनी पाम दत्त (आर. पी. दत्त)
| व्यवस्था व प्रवर्तक | लागू क्षेत्र व कुल भू-भाग (%) | राजस्वदाता व मुख्य विशेषताएं |
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स्थायी बंदोबस्त
(लॉर्ड कॉर्नवालिस, 1793) |
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बंगाल, बिहार, ओडिशा, बनारस व उत्तरी कर्नाटक
(ब्रिटिश भारत का 19% भू-भाग)
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जमींदार भूमि का स्थायी स्वामी; कर निर्धारण सदैव के लिए निश्चित; 10/11 भाग कंपनी का व 1/11 भाग जमींदार का; सूर्यास्त कानून लागू
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रैयतवाड़ी व्यवस्था
(थॉमस मुनरो व कैप्टन रीड, 1820) |
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मद्रास, बंबई, असम व कुर्ग
(ब्रिटिश भारत का 51% भू-भाग)
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किसान (रैयत) भूमि का वास्तविक स्वामी; सरकार से सीधा विधिक संबंध; उपज का 1/3 से 1/2 भाग कर; 30 वर्षों में दर संशोधन
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महालवाड़ी व्यवस्था
(हॉल्ट मैकेंजी व मार्टिन बर्ड, 1822/1833) |
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उत्तर प्रदेश (अवध/आगरा), मध्य प्रांत व पंजाब
(ब्रिटिश भारत का 30% भू-भाग)
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संपूर्ण ग्राम समुदाय (महाल) सामूहिक रूप से राजस्वदाता; ग्राम प्रधान (लंबरदार) द्वारा कर संग्रह; 50% से 66% तक अत्यधिक कर दर
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| व्यवस्था व भूमि संबंध | राजस्व निर्धारण व संशोधन अवधि | किसानों एवं ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर प्रभाव |
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स्थायी बंदोबस्त
(भूमि स्वामी: जमींदार) |
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1790 के राजस्व को स्थायी मानकर तय; कोई भविष्य संशोधन नहीं; 10/11 भाग कंपनी का
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किसान पूर्णतः अधिकारविहीन; अनुपस्थित जमींदारी व शोषण का चरम; 1857 में जमींदारों का अंग्रेजों को समर्थन
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रैयतवाड़ी व्यवस्था
(भूमि स्वामी: किसान) |
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भूमि सर्वेक्षण व उर्वरता आधार; उपज का 33% से 50%; प्रत्येक 20 से 30 वर्ष में दर का पुनरीक्षण
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जमींदार का स्थान स्वयं शोषक राज्य ने लिया; कठोर वसूली; सूखा-अकाल में भी जब्ती; साहुकारों का चंगुल बढ़ा
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महालवाड़ी व्यवस्था
(भूमि स्वामी: ग्राम समुदाय) |
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संपूर्ण गाँव की अनुमानित आय का 50% से 66%; समय-समय पर दरों में भारी वृद्धि
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पारंपरिक संयुक्त ग्रामीण संस्थाएं छिन्न-भिन्न; लंबरदारों का दबदबा; अत्यधिक लगान से किसान भूमिहीन बने
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| आर्थिक क्षेत्र | ब्रिटिश औपनिवेशिक नीति व स्वरूप | भारतीय अर्थव्यवस्था पर वास्तविक प्रभाव |
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कृषि क्षेत्र |
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अत्यधिक भू-राजस्व मांग; कठोर जब्ती नियम; नकदी फसलों की जबरन खेती; निजी भूमि स्वामित्व
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कृषि का अनपेक्षित व्यवसायीकरण; किसानों का भयानक ऋणजाल; बारंबार विनाशकारी अकाल; ग्रामीण दरिद्रता
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हस्तशिल्प व कुटीर उद्योग |
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ब्रिटिश निर्मित माल पर शून्य/न्यून आयात शुल्क; भारतीय माल पर ब्रिटेन में निषेधात्मक कर
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पारंपरिक हथकरघा व धातु शिल्प का पूर्ण विनाश (वि-औद्योगीकरण); लाखों कारीगरों का खेती की ओर पलायन
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व्यापार व वाणिज्य |
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मुक्त व्यापार (1813); ब्रिटिश जहाजरानी को एकाधिकार; आंतरिक चुंगी चौकियों का औपनिवेशिक नियंत्रण
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भारत तैयार माल का आयातक व कच्चे माल का निर्यातक बना; अनुकूल व्यापार संतुलन का लाभ ब्रिटेन को
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आधुनिक उद्योग व पूंजी |
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प्रारंभिक भारतीय उद्योगों को संरक्षण का अभाव; विदेशी पूंजी को 5% गारंटी व रेल रियायतें
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प्रबंध अभिकरण (Managing Agency) द्वारा विदेशी नियंत्रण; भारतीय पूंजीपतियों का सीमित व विलंबित विकास
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| विचारक / समर्थक | प्रमुख रचना व विचार प्रस्तुत वर्ष | मुख्य तर्क एवं उजागर किए गए प्रमाण |
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दादाभाई नौरोजी
('ग्रैंड ओल्ड मैन ऑफ इंडिया') |
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'पॉवर्टी एंड अन-ब्रिटिश रूल इन इंडिया' (1901);
शोध-पत्र: 'इंग्लैंड्स डेट टू इंडिया' (1867)
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सर्वप्रथम निष्कासन सिद्धांत दिया; इसे 'अनिष्टों का अनिष्ट' (Evil of all Evils) कहा; होम चार्जेज, विदेशी पूंजी पर ब्याज व अफसरों की बचत को शोषण का आधार बताया
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रमेश चंद्र दत्त (आर. सी. दत्त) |
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'द इकोनॉमिक हिस्ट्री ऑफ इंडिया' (1901-1906, दो खंड)
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ब्रिटिश राजस्व नीति को सूखे स्पंज की तरह बताया जो 'गंगा तट से जल सोखकर टेम्स नदी में निचोड़ता है'; कुल राजस्व का 1/2 भाग निष्कासित होने का तर्क
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महादेव गोविंद रानाडे |
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'एसेज इन इंडियन इकोनॉमिक्स' (1898 ई.)
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राष्ट्रीय आय के एक तिहाई से अधिक हिस्से के निरंतर दोहन का विश्लेषण; भारत की पूर्ण औपनिवेशिक परनिर्भरता को प्रमाणित किया
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विलियम डिग्बी |
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'प्रॉस्परस ब्रिटिश इंडिया' (Prosperous British India, 1901)
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सरकारी आंकड़ों द्वारा सिद्ध किया कि 19वीं सदी के उत्तरार्ध में औपनिवेशिक लूट के कारण भारतीय दरिद्रता और भुखमरी कई गुना बढ़ी
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भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस |
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कलकत्ता अधिवेशन (1896 ई., अध्यक्ष: रहीमतुल्ला सयानी)
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नौरोजी के 'धन के बहिर्गमन सिद्धांत' को औपचारिक रूप से स्वीकार किया; भारत की निर्धनता का मूल कारण घोषित
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