18वीं सदी में भारत का सर्वाधिक संपन्न एवं समृद्ध मुगल सूबा
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बंगाल
| युद्ध व वर्ष | शामिल पक्ष एवं सेनापति | मुख्य कारण, घटनाएं एवं निर्णायक परिणाम |
|---|---|---|
प्लासी का युद्ध
(23 जून 1757) |
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सिराजुद्दौला (बंगाल)
बनाम
रॉबर्ट क्लाइव (अंग्रेज)
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कारण: नवाब की अनुमति बिना किलेबंदी व दस्तक का दुरुपयोग; मीर जाफर व रायदुर्लभ का विश्वासघात; नवाब पराजित व वध; मीर जाफर कठपुतली नवाब बना; 24 परगना की जमींदारी अंग्रेजों को मिली
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बक्सर का युद्ध
(22 अक्टूबर 1764) |
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त्रिगुट: मीर कासिम, शुजाउद्दौला (अवध), शाहआलम द्वितीय (मुगल)
बनाम
हेक्टर मुनरो (अंग्रेज सेना)
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कारण: मीर कासिम द्वारा आंतरिक व्यापार कर समाप्त करना व मुंगेर किलेबंदी; मुनरो की अनुशासित सेना की पूर्ण विजय; 1765 में इलाहाबाद की संधि; बंगाल, बिहार व ओडिशा की दीवानी अंग्रेजों को मिली
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| विस्तार का चरण व काल | प्रमुख क्षेत्र व युद्ध/संधि | सामरिक परिणाम एवं ब्रिटिश प्रभुत्व |
|---|---|---|
प्रथम चरण (1757–1765)
[बंगाल विजय] |
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बंगाल, बिहार व ओडिशा;
प्लासी (1757), बक्सर (1764), इलाहाबाद संधि (1765)
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व्यापारिक कंपनी का संप्रभु शासक में रूपांतरण; अकूत वित्तीय संसाधनों (दीवानी) पर अधिकार; भारत विजय का आर्थिक आधार निर्मित
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द्वितीय चरण (1767–1799)
[दक्षिण भारत विजय] |
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मैसूर व दक्कन;
चार आंग्ल-मैसूर युद्ध (1767–99); श्रीरंगपट्टनम की संधि (1792)
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हैदर अली व टीपू सुल्तान की चुनौती समाप्त; 1799 में टीपू वीरगति; दक्षिण भारत में अंग्रेजों का निर्विवाद नियंत्रण
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तृतीय चरण (1798–1818)
[मराठा व मध्य भारत] |
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मराठा परिसंघ व राजपूताना;
तीन आंग्ल-मराठा युद्ध; बसीन संधि (1802); वेलेजली की सहायक संधि
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पेशवा पद समाप्त; मराठा शक्ति का पूर्ण उन्मूलन; समस्त उत्तर व मध्य भारत में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी सर्वोच्च शक्ति बनी
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चतुर्थ चरण (1843–1856)
[पश्चिमोत्तर व विलय] |
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सिंध (1843), पंजाब (1849) व अवध (1856);
दो आंग्ल-सिख युद्ध; डलहौजी की हड़प नीति
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भारत की भौगोलिक सीमाओं का सिंधु नदी व खैबर तक विस्तार; सहायक राज्यों का प्रत्यक्ष ब्रिटिश साम्राज्य में पूर्ण विलय
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| युद्ध व काल | संबंधित गवर्नर-जनरल व पक्ष | समाप्ति की संधि व निर्णायक परिणाम |
|---|---|---|
प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध
(1767–1769 ई.) |
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गवर्नर: वेरेल्स्ट;
हैदर अली बनाम अंग्रेज व निजाम
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मद्रास की संधि (1769); हैदर अली की कूटनीतिक विजय; अंग्रेजों को सुरक्षा संधि हेतु विवश किया
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द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध
(1780–1784 ई.) |
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गवर्नर-जनरल: वारेन हेस्टिंग्स;
हैदर अली व टीपू बनाम सर आयर कूट
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मंगलौर की संधि (1784); 1782 में हैदर अली की मृत्यु; विजित क्षेत्रों की परस्पर वापसी
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तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध
(1790–1792 ई.) |
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गवर्नर-जनरल: लॉर्ड कॉर्नवालिस;
टीपू सुल्तान बनाम अंग्रेज-निजाम-मराठा
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श्रीरंगपट्टनम की संधि (1792); टीपू का आधा राज्य छिन गया; दो राजकुमार बंधक रखे गए
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चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध
(1799 ई.) |
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गवर्नर-जनरल: लॉर्ड वेलेजली;
टीपू सुल्तान बनाम वेलेजली व हैरिस
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कोई संधि नहीं; 4 मई 1799 को टीपू वीरगति; वाडियार वंश से सहायक संधि; मैसूर पर पूर्ण नियंत्रण
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प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध
(1775–1782 ई.) |
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गवर्नर-जनरल: वारेन हेस्टिंग्स;
मराठा (नाना फड़नवीस) बनाम अंग्रेज
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सालबाई की संधि (1782); 20 वर्षों की शांति; पेशवा के रूप में माधवराव नारायण को मान्यता
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द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध
(1803–1805 ई.) |
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गवर्नर-जनरल: लॉर्ड वेलेजली;
सिंधिया, भोंसले, होलकर बनाम अंग्रेज
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देवगाँव (भोंसले) व सुरजी-अर्जुनगाँव (सिंधिया) संधि; दोनों ने सहायक संधि स्वीकारी; दिल्ली पर कब्जा
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तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध
(1817–1818 ई.) |
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गवर्नर-जनरल: लॉर्ड हेस्टिंग्स;
बाजीराव द्वितीय, होलकर व भोंसले
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मंदसौर संधि; पेशवा पद पूर्ण समाप्त; बाजीराव द्वितीय बिठूर निर्वासित; मराठा संघ नष्ट
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प्रथम आंग्ल-सिख युद्ध
(1845–1846 ई.) |
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गवर्नर-जनरल: लॉर्ड हार्डिंग प्रथम;
दलीप सिंह व लालसिंह बनाम अंग्रेज
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लाहौर की संधि (1846); जालंधर दोआब अंग्रेजों को मिला; कश्मीर 1 करोड़ में गुलाब सिंह को बेचा
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द्वितीय आंग्ल-सिख युद्ध
(1848–1849 ई.) |
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गवर्नर-जनरल: लॉर्ड डलहौजी;
सिख सेना बनाम लॉर्ड गफ
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गुजरात का तोपों का युद्ध (1849); 29 मार्च 1849 को पंजाब का पूर्ण ब्रिटिश विलय; कोहिनूर महारानी को भेजा
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| राज्य व संधि का वर्ष | हस्ताक्षरकर्ता भारतीय शासक | प्रमुख शर्तें एवं भू-राजनीतिक परिणाम |
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हैदराबाद
(1798 व 1800 ई.) |
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निजाम अली खां
(आसफजाह द्वितीय)
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सर्वप्रथम संधि स्वीकारी; फ्रांसीसी सेना भंग की; ब्रिटिश रेजीडेंट रखा; खर्च हेतु बेल्लारी व कुडप्पा जिले सौंपे
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मैसूर
(1799 ई.) |
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महाराजा कृष्णराज तृतीय
(वाडियार वंश)
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टीपू की मृत्यु उपरांत संधि थोपी गई; आंतरिक व बाह्य सुरक्षा ब्रिटिश नियंत्रण में; वार्षिक भारी सब्सिडी
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तंजौर व सूरत
(1799 व 1800 ई.) |
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सरफोजी (तंजौर) व
नवाब (सूरत)
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प्रशासनिक अधिकार कंपनी के हाथ में; शासकों को केवल सीमित पेंशनभोगी बना दिया गया
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अवध
(नवंबर 1801 ई.) |
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नवाब सआदत अली खां द्वितीय
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सुरक्षा व्यय के बदले रुहेलखंड व दक्षिणी दोआब (आधा राज्य) कंपनी को सौंपा; सेना में भारी कटौती
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मराठा पेशवा
(दिसंबर 1802 ई.) |
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पेशवा बाजीराव द्वितीय
(बसीन की संधि)
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पुणे में 6000 ब्रिटिश सैनिक तैनात; खर्च हेतु 26 लाख का क्षेत्र दिया; मराठा संघ के विघटन की शुरुआत
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भोंसले व सिंधिया
(1803 ई.) |
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रघूजी भोंसले (देवगाँव) व
दौलतराव सिंधिया (सुरजी)
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कटक, गंगा-यमुना दोआब व बुंदेलखंड अंग्रेजों को दिया; दरबारों में ब्रिटिश रेजीडेंट रखना अनिवार्य हुआ
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| राज्य व विलय वर्ष | तत्कालीन शासक व स्थिति | विलय का आधार एवं नीतिगत स्वरूप |
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सतारा
(1848 ई.) |
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अप्पा साहिब
(दत्तक पुत्र: आनंदराव)
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हड़प नीति (Doctrine of Lapse) का प्रथम शिकार; निसंतान मृत्यु पर दत्तक पुत्र का दावा अमान्य घोषित
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जैतपुर व संबलपुर
(1849 ई.) |
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छत्रसाल (जैतपुर, बुंदेलखंड) व
नारायण सिंह (संबलपुर, ओडिशा)
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हड़प नीति; दोनों शासकों की निसंतान मृत्यु; वैध उत्तराधिकारी न होने के आधार पर प्रत्यक्ष विलय
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बघाट
(1850 ई.) |
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राणा विजय सिंह
(हिमाचल प्रदेश की पहाड़ी रियासत)
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हड़प नीति; निसंतान मृत्यु; (कालांतर में 1856 में लॉर्ड कैनिंग ने कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स के आदेश से लौटाया)
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उदयपुर
(1852 ई.) |
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शिवराज सिंह
(मध्य प्रांत / छत्तीसगढ़)
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हड़प नीति; निसंतान मृत्यु; (बाद में 1854 में कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स ने विलय रद्द कर वापस किया)
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झांसी
(1853 ई.) |
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गंगाधर राव
(रानी लक्ष्मीबाई; दत्तक पुत्र: दामोदर)
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हड़प नीति; गंगाधर राव की मृत्यु पर रानी लक्ष्मीबाई के दत्तक पुत्र दामोदर राव को उत्तराधिकारी मानने से इनकार
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नागपुर
(1854 ई.) |
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राघूजी भोंसले तृतीय
(दत्तक पुत्र: यशवंतराव)
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हड़प नीति; निसंतान मृत्यु; राजमहल के जवाहरात व हाथियों-घोड़ों की कलकत्ता में सार्वजनिक नीलामी कराई गई
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अवध
(फरवरी 1856 ई.) |
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नवाब वाजिद अली शाह
(राजधानी: लखनऊ)
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हड़प नीति नहीं, बल्कि 'कुशासन का आरोप' (जेम्स आउट्रम रिपोर्ट); नवाब निर्वासित; 1857 विद्रोह का प्रमुख केंद्र
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