मध्यकालीन चोल राजवंश के संस्थापक
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विजयालय
| शासक एवं शासनकाल | उपाधियां व प्रमुख केंद्र | प्रमुख सैन्य, प्रशासनिक व वास्तुकला उपलब्धियां |
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विजयालय
(850–871 ई.) |
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नरकेसरी
राजधानी: तंजौर
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मुत्तरैयरों को हराकर तंजौर पर अधिकार; चोल साम्राज्य की पुनर्स्थापना; निशुम्भसूदिनी मंदिर का निर्माण
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आदित्य प्रथम
(871–907 ई.) |
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कोदंडराम
राजधानी: तंजौर
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पल्लव नरेश अपराजित का वध कर पल्लव साम्राज्य का विलय; कावेरी तट पर अनेक पाषाण शिव मंदिरों का निर्माण
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परांतक प्रथम
(907–955 ई.) |
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मदुरैकोंड
राजधानी: तंजौर
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पांड्यों पर विजय; चिदंबरम मंदिर की छत स्वर्णमंडित की; प्रसिद्ध उत्तरमेरुर अभिलेख जारी; तक्कोलम् युद्ध में पराजय
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राजराज प्रथम
(985–1014 ई.) |
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मम्मुडीचोल, शिवपादशेखर
राजधानी: तंजौर
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चेर-पांड्य विजय; उत्तरी श्रीलंका पर अधिकार (मम्मुडीचोलमंडलम्); भूमि सर्वेक्षण; तंजौर का विशाल बृहदेश्वर मंदिर
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राजेंद्र प्रथम
(1014–1044 ई.) |
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गंगैकोंडचोल, मुडिकोंड
राजधानी: गंगैकोंडचोलपुरम
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संपूर्ण श्रीलंका पर विजय; गंगा घाटी अभियान; श्रीविजय साम्राज्य पर सफल नौसैन्य विजय; चोलगंगम झील निर्माण
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राजाधिराज प्रथम
(1044–1054 ई.) |
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जयंगोंड, कल्याणपुरमगोंड
राजधानी: गंगैकोंडचोलपुरम
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कल्याणी के चालुक्यों से संघर्ष; 1054 ई. में कोप्पम के युद्धक्षेत्र में लड़ते हुए वीरगति (रणरंग में मृत्यु)
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कुलोत्तुंग प्रथम
(1070–1120 ई.) |
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शुंगमतविर्त (करों को हटाने वाला)
राजधानी: गंगैकोंडचोलपुरम
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चोल-चालुक्य वंश का विलय; भूमि का पुनः सर्वेक्षण; व्यापारिक चुंगी व कर हटाए; 1077 ई. में चीन में 72 सदस्यीय व्यापारिक दूत भेजा
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| मंदिर एवं अवस्थिति | निर्माता / संरक्षक शासक | प्रमुख स्थापत्य एवं कलात्मक विशेषताएं |
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बृहदेश्वर (राजराजेश्वर) मंदिर
(तंजौर, तमिलनाडु) |
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राजराज प्रथम
(1010 ई.)
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द्रविड़ शैली का सर्वोच्च शिखर; 216 फीट ऊंचा 13 मंजिला विमान; 80 टन का एकाश्मक पाषाण शीर्ष; विशाल एकाश्मक नंदी
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बृहदेश्वर मंदिर
(गंगैकोंडचोलपुरम, तमिलनाडु) |
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राजेंद्र प्रथम
(1035 ई.)
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तंजौर जैसा भव्य स्वरूप; विमान में सौम्य व वक्राकार रेखाएं; विशाल प्रांगण एवं महीन पाषाण शिल्प मूर्तिकला
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ऐरावतेश्वर मंदिर
(दारासुरम, तमिलनाडु) |
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राजराज द्वितीय
(12वीं सदी)
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रथ के आकार का मंडप जिसमें पत्थर के पहिए व घोड़े बने हैं; लघु व अत्यंत उत्कृष्ट नक्काशीयुक्त स्तंभ
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कंपहरेश्वर (त्रिभुवनम) मंदिर
(त्रिभुवनम, तमिलनाडु) |
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कुलोत्तुंग तृतीय
(12वीं सदी का अंत)
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उत्तर चोल स्थापत्य का अंतिम महान प्रतिमान; सारंगधर रूप में शिव; विशाल गोपुरम व अलंकृत मूर्तियां
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कोरुंगनाथ मंदिर
(श्रीनिवासनाल्लूर, तमिलनाडु) |
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परांतक प्रथम
(10वीं सदी का आरंभ)
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प्रारंभिक चोल वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण; सादगीपूर्ण विमान एवं भित्ति पर सुंदर अर्धनारीश्वर मूर्तियां
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| अभियान / विजित क्षेत्र | संबंधित चोल सम्राट | प्रमुख उद्देश्य, ऐतिहासिक घटना एवं परिणाम |
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उत्तरी श्रीलंका (अनुराधापुर)
(993 ई.) |
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राजराज प्रथम
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सिंहली शक्ति का दमन; अनुराधापुर ध्वस्त कर पोलन्नरुवा को राजधानी बनाया; मम्मुडीचोलमंडलम् नामकरण
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मालदीव द्वीप समूह
(लगभग 1012 ई.) |
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राजराज प्रथम
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अरब सागर के व्यापारिक मार्गों पर प्रभुत्व; पश्चिमी हिंद महासागर में चोल नौसेना की सर्वोच्चता स्थापित
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संपूर्ण श्रीलंका (रोहण सहित)
(1017 ई.) |
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राजेंद्र प्रथम
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राजा महेंद्र पंचम बंदी बनाए गए; संपूर्ण सिंहल द्वीप चोल साम्राज्य का अभिन्न प्रांत बना
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श्रीविजय एवं कडारम
(मलाया व सुमात्रा, 1025 ई.) |
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राजेंद्र प्रथम
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मलक्का जलडमरूमध्य पर आधिपत्य; राजा संग्राम विजयोत्तुंगवर्मन पराजित; चीन व्यापारिक मार्ग का खुला एकाधिकार
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चीन (सांग साम्राज्य) दूत-मंडल
(1015, 1033, 1077 ई.) |
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राजराज प्रथम, राजेंद्र प्रथम, कुलोत्तुंग प्रथम
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व्यापारिक रियायतें प्राप्त करना; रेशम, कांच व मसालों के द्विपक्षीय व्यापार का अत्यधिक संवर्धन
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| प्रशासनिक इकाई | विभाजन व स्वरूप | प्रशासनिक सभा / नियंत्रक अधिकारी |
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मंडलम् (Mandalam) |
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प्रांत; संपूर्ण साम्राज्य 8-9 मंडलों में विभक्त था
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राजपुत्र, राजकुमार या उच्च सामंती वायसराय
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वलनाडु (Valanadu) |
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कमिश्नरी स्तर की इकाई; कई नाडु मिलकर एक वलनाडु बनाते थे
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पेरुंदनम् श्रेणी के वरिष्ठ शाही अधिकारी
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नाडु (Nadu) |
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जिला स्तर की प्रशासनिक इकाई; कृषि बस्तियों का समूह
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नाट्टार (स्थानीय भूस्वामी कुलीनों की प्रशासनिक सभा)
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कुर्रम / कोट्टम (Kurram) |
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गाँवों का समूह या तहसील स्तर की उप-इकाई
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ग्राम प्रतिनिधियों एवं स्थानीय सामंतों का समूह
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ग्राम / तनियूर (Village/Taniyur) |
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सबसे छोटी प्रशासनिक इकाई; तनियूर स्वतंत्र रूप से अलग होता था
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उर, सभा (महासभा) और नगरम् जैसी स्थानीय संस्थाएं
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| संस्था / निकाय | स्वरूप एवं प्रमुख कार्य | प्रतिनिधित्व एवं संबंधित स्रोत |
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उर (Ur) |
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सर्वसाधारण करदाता किसानों का गाँव; सार्वजनिक तालाब, पथ निर्माण, कर संग्रह व स्थानीय व्यवस्था
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गाँव के समस्त भूस्वामी किसान; तिरुवालंगाडु व स्थानीय चोल ताम्रपत्र
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सभा / महासभा (Sabha) |
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अग्रहार (ब्राह्मण) बस्तियों की स्वायत्त संस्था; समितियां बनाकर शिक्षा, मंदिर, भूमि व न्याय संचालन
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वेद ज्ञाता व भूस्वामी ब्राह्मण (पेरुमक्कल); उत्तरमेरुर अभिलेख (परांतक प्रथम)
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नगरम् (Nagaram) |
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व्यापारिक केंद्रों व मंडियों की प्रबंधकारी सभा; चुंगी, माप-तौल, बाजार नियंत्रण व व्यापारियों का संरक्षण
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श्रेष्ठी, चेत्ती व नगरत्तार (व्यापारी वर्ग); नागपट्टिनम एवं मामल्लपुरम अभिलेख
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| समिति / विषय | पात्रता एवं चुनाव पद्धति (कुडुवोलाइ) | प्रमुख कार्य एवं प्रशासनिक अधिकार |
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निर्वाचन पद्धति (कुडुवोलाइ) |
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30 वार्डों से पर्चियों को घड़े में डालकर अबोध बालक द्वारा निष्पक्ष चयन
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ग्राम के 30 योग्य प्रतिनिधियों का चयन कर विभिन्न समितियों में विभाजन
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सदस्यता की योग्यताएं |
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आयु 35–70 वर्ष; 1/4 वेली कर-युक्त भूमि; निजी मकान; वेद एवं मंत्र ब्राह्मण का ज्ञान
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संवत्सर (12), तोट्ट (12) एवं एरि (6) समितियों में नियुक्ति की पात्रता
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सदस्यता की अयोग्यताएं |
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लेखा-जोखा न देना; विगत 3 वर्ष में सदस्य रहा होना; नैतिक भ्रष्टाचार व महापातक
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प्रत्याशी और उसके निकट संबंधियों को चुनाव लड़ने से पूर्ण निष्कासन
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एरि वरियम (तड़ाग समिति) |
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अनुभवी एवं जल-प्रबंधन में दक्ष 6 सम्मानित सदस्यों का चयन
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तालाबों की सफाई, तटबंध मरम्मत, नहरों से जल वितरण व जल कर संग्रह
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पोन वरियम (स्वर्ण समिति) |
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स्वर्ण व धातुओं के पारखी अनुभवी वरिष्ठ सदस्यों का मनोनयन
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मुद्रा की शुद्धता, तोल, स्वर्ण आभूषणों की गुणवत्ता का परीक्षण व प्रमाणीकरण
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| व्यापारिक निगम (गिल्ड) | कार्यक्षेत्र एवं प्रभाव | प्रमुख व्यापारिक गतिविधियां व वस्तुएं |
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मणिक्रामम (Manigramam) |
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दक्षिण भारत के प्रमुख तटीय व आंतरिक नगर; अंतर्देशीय व्यापार
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अन्न, वस्त्र, मसाले, धातु एवं स्थानीय कृषि उत्पादों का थोक व खुदरा क्रय-विक्रय
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नानादेशी (Nanadesi) |
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विभिन्न राज्यों एवं समुद्रपार (श्रीलंका, मलाया, सुमात्रा, बर्मा)
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हाथी-दांत, कीमती रत्न, मसाले, विदेशी घोड़े और सुगंधित द्रव्यों का आयात-निर्यात
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अय्यावोल / 500 (Ayyavole) |
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मूल केंद्र ऐहोल (कर्नाटक); संपूर्ण प्रायद्वीप एवं दक्षिण-पूर्व एशिया
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सशस्त्र सुरक्षा दस्ते (वीरकोडि) सहित विशाल व्यापारिक कारवां; विदेशी विनिमय
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अंजुवन्नम (Anjuvannam) |
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पश्चिमी व पूर्वी तटीय बंदरगाह (अरब, यहूदी, ईसाई व्यापारी संगठन)
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पश्चिमी एशिया व चीन के साथ समुद्री जहाजरानी, घोड़ों का व्यापार व विदेशी विनिमय
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वालंजियर (Valanjiyar) |
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दक्षिण भारतीय बंदरगाह एवं सीलोन (श्रीलंका)
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समुद्री माल परिवहन, जहाजी गोदामों का प्रबंधन व कीमती पत्थरों का विपणन
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