1453 ई. में उस्मानी तुर्कों ने किस ऐतिहासिक व्यापारिक नगर पर अधिकार किया
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कुस्तुनतुनिया (कॉन्स्टेंटिनोपल)
| यूरोपीय शक्ति व संस्था | आगमन / स्थापना काल व प्रथम केंद्र | प्रमुख गतिविधियां एवं व्यापारिक स्वरूप |
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पुर्तगाली राज्य
(एस्तादो द इंडिया) |
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आगमन: 1498 ई.
प्रथम केंद्र: कोचीन (1503 ई.)
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शाही राज्य-नियंत्रित व्यापार; कार्टाज-अर्मेडा व्यवस्था; मसाला व्यापार पर एकाधिकार; हिंद महासागर की सर्वोच्चता
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डच ईस्ट इंडिया कंपनी
(VOC - नीदरलैंड) |
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कंपनी स्थापना: 1602 ई.
प्रथम केंद्र: मसूलीपट्टनम (1605 ई.)
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संयुक्त पूंजी कंपनी; इंडोनेशिया से मसाला व भारत से सूती वस्त्रों का निर्यात; स्वर्ण पैगोडा सिक्के जारी किए
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अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी
(द गवर्नर एंड कंपनी...) |
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कंपनी स्थापना: 31 दिसंबर 1600 ई.
प्रथम केंद्र: सूरत (1613 ई.)
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निजी व्यापारिक शेयरधारकों की कंपनी; 1617 व 1717 के शाही फरमान; व्यापार से राजनीतिक प्रभुत्व व क्षेत्रीय विजय
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डेनिश ईस्ट इंडिया कंपनी
(डेनमार्क) |
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कंपनी स्थापना: 1616 ई.
प्रथम केंद्र: ट्रैंकोबार (1620 ई.)
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सीमित वाणिज्यिक गतिविधियां; श्रीरामपुर (बंगाल) मुख्य केंद्र; 1845 ई. में अपनी सभी संपत्तियां अंग्रेजों को बेच दीं
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फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कंपनी
(कम्पनी देस इंडेस ओरिएंटल्स) |
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कंपनी स्थापना: 1664 ई.
प्रथम केंद्र: सूरत (1668 ई.)
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पूर्णतः राज्य-वित्तपोषित सरकारी कंपनी; पांडिचेरी मुख्य प्रशासनिक केंद्र; डूप्ले द्वारा साम्राज्य विस्तार की महत्वाकांक्षा
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| यूरोपीय शक्ति | प्रमुख व्यापारिक केंद्र / कोठियां | क्षेत्रीय एवं व्यापारिक महत्व |
|---|---|---|
पुर्तगाली केंद्र |
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कोचीन, गोवा (राजधानी), दीव, दमन, बेसिन, हुगली, सेंट थोमे
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मालाबार व कोंकण तट पर नौसैन्य प्रभुत्व; मसाला व्यापार पर एकाधिकार; कार्टाज द्वारा सुरक्षा वसूली
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डच केंद्र |
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मसूलीपट्टनम, पुलीकट (गैलड्रिया दुर्ग), चिनसुरा (गुस्तावस दुर्ग), सूरत, नागपट्टिनम, कोचीन
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कोरोमंडल तट से सूती वस्त्रों का निर्यात; पुलीकट में पैगोडा सिक्कों की ढलाई; मसालों के बदले वस्त्र विनिमय
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अंग्रेजी केंद्र |
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सूरत (प्रारंभिक), मद्रास (फोर्ट सेंट जॉर्ज), बंबई, कलकत्ता (फोर्ट विलियम), मसूलीपट्टनम
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तीनों प्रेसीडेंसी नगरों का सामरिक विकास; व्यापारिक कोठियों की सुदृढ़ किलेबंदी; राजनीतिक सत्ता प्राप्ति
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फ्रांसीसी केंद्र |
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सूरत, मसूलीपट्टनम, पांडिचेरी (फोर्ट लुई), चंद्रनगर (बंगाल), माहे (केरल), कराइकल
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पांडिचेरी राजनीतिक राजधानी; चंद्रनगर से रेशम व्यापार; दक्षिण भारत में राजनीतिक हस्तक्षेप व सैन्य छावनी
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| यूरोपीय शक्ति | आरंभिक व्यापारिक रणनीति | राजनीतिक विस्तार एवं औपनिवेशिक दिशा |
|---|---|---|
पुर्तगाली |
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मसाला व्यापार पर सीधा एकाधिकार; हिंद महासागर में गैर-पुर्तगाली जहाजों पर प्रतिबंध; कार्टाज कर व्यवस्था
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तटीय दुर्गों व बंदरगाहों पर कब्जा; धार्मिक असहिष्णुता व धर्मांतरण; क्षेत्रीय विस्तार के बजाय समुद्री साम्राज्य तक सीमित रहे
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डच (नीदरलैंड) |
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मसालों हेतु इंडोनेशिया पर ध्यान; भारत को सूती वस्त्र आपूर्ति का आधार बनाना; कम लागत व उच्च लाभांश पर जोर
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विशुद्ध वाणिज्यिक दृष्टिकोण; भारत में किसी बड़े भू-भाग पर राजनीतिक कब्जे का प्रयास नहीं किया; 1759 बेदरा में निष्कासित
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अंग्रेज (ब्रिटिश) |
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सूरत व तटीय केंद्रों से सूती वस्त्र, नील व शोरा व्यापार; मुगल सम्राटों से शाही व्यापारिक फरमान प्राप्त करना
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व्यापारिक केंद्रों की किलेबंदी; भारतीय रियासतों के आंतरिक झगड़ों में सैन्य हस्तक्षेप; 1757 प्लासी व 1764 बक्सर से संप्रभु शासक बने
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फ्रांसीसी |
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कोलबर्ट की सरकारी कंपनी; पांडिचेरी व चंद्रनगर से विलासिता व वस्त्र व्यापार; स्थानीय शासकों से मधुर संबंध
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गवर्नर डूप्ले द्वारा भारतीय राजाओं के उत्तराधिकार में सेना किराए पर देकर राजनीतिक प्रभुत्व का प्रयास; कर्नाटक युद्धों में पराजय
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| कर्नाटक युद्ध व वर्ष | शामिल पक्ष व प्रमुख सेनापति | मुख्य कारण, घटनाएं एवं समाप्ति की संधि |
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प्रथम कर्नाटक युद्ध
(1746–1748 ई.) |
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अंग्रेज (बार्नेट, पेटन)
बनाम
फ्रांसीसी (डूप्ले, ला बूर्दोने)
व नवाब अनवरुद्दीन
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कारण: यूरोप का ऑस्ट्रियाई उत्तराधिकार युद्ध; 1746 में सेंट थोमे का युद्ध (अड्यार नदी); ला बूर्दोने ने मद्रास जीता;
समाप्ति: 1748 में 'ए-ला-शापेल की संधि' (मद्रास अंग्रेजों को वापस)
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द्वितीय कर्नाटक युद्ध
(1749–1754 ई.) |
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अंग्रेज (क्लाइव, मुहम्मद अली, नासिरजंग)
बनाम
फ्रांसीसी (डूप्ले, चंदा साहिब, मुजफ्फरजंग)
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कारण: हैदराबाद व कर्नाटक का उत्तराधिकार विवाद; 1749 का अंबूर युद्ध; 1751 में क्लाइव का अर्काट घेरा;
समाप्ति: 1754 में 'पांडिचेरी की संधि' (गोदेहू द्वारा संधि; डूप्ले फ्रांस वापस)
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तृतीय कर्नाटक युद्ध
(1758–1763 ई.) |
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ब्रिटिश सेना (सर आयर कूट)
बनाम
फ्रांसीसी सेना (काउंट डी लाली व बुस्सी)
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कारण: यूरोप का सप्तवर्षीय युद्ध (1756–63); 22 जनवरी 1760 को निर्णायक वांडीवाश का युद्ध (लाली पराजित);
समाप्ति: 1763 की 'पेरिस की संधि' (फ्रांसीसी सैन्य विस्तार पूर्णतः समाप्त)
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