भारत की प्रथम राजनीतिक संस्था होने का गौरव किसे प्राप्त है
उत्तर देखें
बंगभाषा प्रकाशिका सभा (1836 ई.)
| संस्था व स्थापना वर्ष | संस्थापक व प्रमुख नेता | मुख्य उद्देश्य व कार्यक्षेत्र |
|---|---|---|
लैंडहोल्डर्स सोसाइटी
(1838 ई., कलकत्ता) |
उत्तर देखें
द्वारकानाथ टैगोर, प्रसन्न कुमार टैगोर, राधाकांत देव
|
उत्तर देखें
बंगाल, बिहार व ओडिशा के जमींदारों के हितों की रक्षा; संवैधानिक विरोध का प्रथम प्रयोग
|
ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन
(1851 ई., कलकत्ता) |
उत्तर देखें
राधाकांत देव (अध्यक्ष) व देवेंद्रनाथ टैगोर (सचिव)
|
उत्तर देखें
1853 के चार्टर में भारतीयों हेतु पृथक विधायिका व उच्च पदों पर भर्ती की प्रथम संगठित मांग
|
ईस्ट इंडिया एसोसिएशन
(1866 ई., लंदन) |
उत्तर देखें
दादाभाई नौरोजी (ग्रैंड ओल्ड मैन)
|
उत्तर देखें
ब्रिटिश संसद व जनता में भारतीय समस्याओं, शोषण व प्रशासनिक सुधारों हेतु जनमत निर्माण
|
पूना सार्वजनिक सभा
(1870 ई., पुणे) |
उत्तर देखें
एम. जी. रानाडे, जी. वी. जोशी, एस. एच. चिपलूणकर
|
उत्तर देखें
सरकार और जनता के मध्य मध्यस्थता; दक्कन कृषक समस्याओं व अकाल राहत का आधिकारिक प्रतिनिधित्व
|
इंडियन एसोसिएशन
(1876 ई., कलकत्ता) |
उत्तर देखें
सुरेंद्रनाथ बनर्जी एवं आनंदमोहन बोस
|
उत्तर देखें
मध्यम वर्ग का राजनीतिक संगठन; सिविल सेवा आयु सीमा बहाली हेतु राष्ट्रव्यापी आंदोलन; कांग्रेस का अग्रदूत
|
मद्रास महाजन सभा
(1884 ई., मद्रास) |
उत्तर देखें
एम. वी. राघवाचारी, जी. सुब्रह्मण्यम अय्यर, आनंद चार्लू
|
उत्तर देखें
दक्षिण भारत में स्थानीय स्वायत्त संस्थाओं के अधिकारों व कर-सुधारों हेतु जनमत तैयार करना
|
बॉम्बे प्रेसीडेंसी एसोसिएशन
(1885 ई., बंबई) |
उत्तर देखें
फिरोजशाह मेहता, बदरुद्दीन तैयबजी, के. टी. तैलंग
|
उत्तर देखें
लॉर्ड लिटन की प्रतिक्रियावादी नीतियों व इल्बर्ट बिल विरोधियों के विरुद्ध बंबई में सशक्त मोर्चा
|
| अधिवेशन वर्ष व स्थान | निर्वाचित अध्यक्ष | प्रमुख ऐतिहासिक घटना व निर्णय |
|---|---|---|
प्रथम अधिवेशन (1885)
स्थान: बंबई |
उत्तर देखें
व्योमेश चंद्र बनर्जी
(डब्ल्यू. सी. बनर्जी)
|
उत्तर देखें
72 प्रतिनिधियों की उपस्थिति; 9 प्रस्ताव पारित; सिविल सेवा परीक्षा में सुधार व व्यय कटौती की मांग
|
द्वितीय अधिवेशन (1886)
स्थान: कलकत्ता |
उत्तर देखें
दादाभाई नौरोजी
(प्रथम पारसी अध्यक्ष)
|
उत्तर देखें
436 प्रतिनिधि; सुरेंद्रनाथ बनर्जी की नेशनल कॉन्फ्रेंस का कांग्रेस में औपचारिक विलय; डफरिन द्वारा गार्डन पार्टी
|
तृतीय अधिवेशन (1887)
स्थान: मद्रास |
उत्तर देखें
बदरुद्दीन तैयबजी
(प्रथम मुस्लिम अध्यक्ष)
|
उत्तर देखें
607 प्रतिनिधि; 'कांग्रेसी बनो' का प्रसिद्ध नारा; तमिल भाषा में प्रथम भाषण; विषय निर्धारण समिति का गठन
|
चतुर्थ अधिवेशन (1888)
स्थान: इलाहाबाद |
उत्तर देखें
जॉर्ज यूल
(प्रथम यूरोपीय / ब्रिटिश अध्यक्ष)
|
उत्तर देखें
सरकारी अधिकारियों के शामिल होने पर रोक; दरभंगा के राजा ने 'लोथर काउंसिल' खरीदकर अधिवेशन हेतु दिया
|
पांचवां अधिवेशन (1889)
स्थान: बंबई |
उत्तर देखें
सर विलियम वेडरबर्न
(ब्रिटिश सांसद)
|
उत्तर देखें
प्रथम बार 10 महिला प्रतिनिधियों ने भाग लिया; मताधिकार की न्यूनतम आयु 21 वर्ष रखने का प्रस्ताव पारित
|
बारहवां अधिवेशन (1896)
स्थान: कलकत्ता |
उत्तर देखें
रहीमतुल्ला एम. सयानी
|
उत्तर देखें
बंकिमचंद्र चटर्जी द्वारा रचित राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम्' का प्रथम बार गायन; नौरोजी का धन निष्कासन सिद्धांत स्वीकृत
|
इक्कीसवां अधिवेशन (1905)
स्थान: बनारस |
उत्तर देखें
गोपाल कृष्ण गोखले
|
उत्तर देखें
बंगाल विभाजन (कर्जन) की कटु भर्त्सना; 'स्वदेशी' एवं 'बहिष्कार' आंदोलन का प्रथम बार औपचारिक समर्थन
|
| उदारवादी नेता व काल | उपाधियां एवं कार्यपद्धति | प्रमुख योगदान, संस्थाएं व साहित्य |
|---|---|---|
दादाभाई नौरोजी
(1825–1917 ई.) |
उत्तर देखें
'ग्रैंड ओल्ड मैन ऑफ इंडिया'; ब्रिटिश संसद के प्रथम भारतीय सदस्य (1892); संवैधानिक आंदोलन
|
उत्तर देखें
धन के निष्कासन का सिद्धांत; 'पॉवर्टी एंड अन-ब्रिटिश रूल इन इंडिया'; तीन बार कांग्रेस अध्यक्ष (1886, 1893, 1906)
|
सुरेंद्रनाथ बनर्जी
(1848–1925 ई.) |
उत्तर देखें
'राष्ट्रगुरु' व 'बिना ताज का बादशाह'; सिविल सेवा आंदोलन के जनक; वाग्मी वक्ता
|
उत्तर देखें
इंडियन एसोसिएशन (1876); नेशनल कॉन्फ्रेंस; 'द बंगाली' पत्र; आत्मकथा: 'ए नेशन इन मेकिंग'; 1895 व 1902 में अध्यक्ष
|
गोपाल कृष्ण गोखले
(1866–1915 ई.) |
उत्तर देखें
गांधीजी के राजनीतिक गुरु; बजट के प्रखर विश्लेषक; सौम्य व तथ्यपरक विरोध की शैली
|
उत्तर देखें
भारत सेवक समाज (1905); बनारस अधिवेशन (1905) अध्यक्ष; वेल्बी आयोग के समक्ष गवाही; 1909 मार्ले-मिंटो सुधारों में भूमिका
|
सर फिरोजशाह मेहता
(1845–1915 ई.) |
उत्तर देखें
'बॉम्बे का बेताज बादशाह'; कानून व संविधान के ज्ञाता; बंबई नगर निगम के पिता
|
उत्तर देखें
बॉम्बे प्रेसीडेंसी एसोसिएशन (1885); कलकत्ता अधिवेशन (1890) अध्यक्ष; 'बॉम्बे क्रॉनिकल' समाचार पत्र के संस्थापक
|
दिनशा एडुलजी वाचा
(1844–1936 ई.) |
उत्तर देखें
आर्थिक व वाणिज्यिक विशेषज्ञ; कांग्रेस के प्रारंभिक वित्तीय प्रबंधक
|
उत्तर देखें
कई वर्षों तक कांग्रेस के महासचिव; कलकत्ता अधिवेशन (1901) अध्यक्ष; भारतीय रेलवे के अंधाधुंध व्यय के प्रखर आलोचक
|
| मांग का आयाम / क्षेत्र | प्रारंभिक कांग्रेस की प्रमुख मांगें | ब्रिटिश सरकार का रुख व प्रतिक्रिया |
|---|---|---|
संवैधानिक व विधायी मांगें |
उत्तर देखें
केंद्रीय व प्रांतीय विधान परिषदों का विस्तार; निर्वाचित भारतीय सदस्यों का प्रवेश; बजट पर बहस व मतदान का अधिकार
|
उत्तर देखें
1892 का भारतीय परिषद अधिनियम पारित; बजट पर केवल सीमित बहस की अनुमति दी, पूरक प्रश्न व मतदान का अधिकार नकारा
|
प्रशासनिक व सैन्य मांगें |
उत्तर देखें
आईसीएस परीक्षा का भारत व इंग्लैंड में एक साथ आयोजन; आयु सीमा बढ़ाकर 23 वर्ष करना; सेना व्यय में 50% कटौती
|
उत्तर देखें
1893 में ब्रिटिश संसद ने एक साथ परीक्षा का प्रस्ताव पारित किया किंतु लागू नहीं किया; सैन्य व्यय घटाने से पूर्ण इनकार
|
आर्थिक व वित्तीय मांगें |
उत्तर देखें
नमक कर की समाप्ति; भू-राजस्व की दरें सीमित करना; भारतीय उद्योगों को संरक्षण; धन के निष्कासन पर तत्काल रोक
|
उत्तर देखें
मांगों की पूर्ण उपेक्षा; 1895 में वेल्बी आयोग का गठन कर दिखावटी जांच की; मुक्त व्यापार द्वारा औपनिवेशिक दोहन जारी रखा
|
न्यायिक व नागरिक मांगें |
उत्तर देखें
न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग करना; जूरी प्रथा का विस्तार; 1878 के शस्त्र अधिनियम व प्रेस नियंत्रण की समाप्ति
|
उत्तर देखें
दमनकारी कानूनों का संधारण; तिलक जैसे नेताओं पर 1897 में राजद्रोह (124A) का मुकदमा चलाकर 18 माह की कठोर जेल
|