मराठा साम्राज्य के संस्थापक
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छत्रपति शिवाजी महाराज
| किला व भौगोलिक क्षेत्र | विस्तार व निर्माण/अधिकार | सामरिक एवं ऐतिहासिक महत्व |
|---|---|---|
शिवनेरी दुर्ग
(जुन्नार, पुणे) |
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यादव कालीन प्राचीन गिरि दुर्ग; शाहजी की जागीर
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छत्रपति शिवाजी महाराज का जन्म स्थल; माता जीजाबाई द्वारा आरंभिक संस्कार व शिक्षा का केंद्र
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तोरणा दुर्ग (प्रचंडगढ़)
(पुणे जिला) |
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1646 ई. में मात्र 16 वर्ष की आयु में बीजापुर से विजित
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शिवाजी की प्रथम सैन्य विजय; दुर्ग से प्राप्त गुप्त खजाने से स्वराज्य विस्तार की नींव रखी गई
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राजगढ़ दुर्ग
(पुणे के दक्षिण-पश्चिम) |
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मुरुमदेव पहाड़ी पर शिवाजी द्वारा स्वयं निर्मित दुर्ग
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1647 से 1674 ई. तक लगभग 25 वर्षों तक मराठा साम्राज्य की पहली सक्रिय राजधानी रहा
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प्रतापगढ़ दुर्ग
(महाबलेश्वर, सतारा) |
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1656 ई. में मोरपंत पिंगले के निर्देशन में निर्मित
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1659 ई. में अफजल खां के वध का ऐतिहासिक स्थल; बीजापुर के विरुद्ध मराठा संप्रभुता का प्रतीक
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रायगढ़ दुर्ग (रायरी)
(कोंकण, महाड) |
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1656 ई. में चंद्रराव मोरे से जीता; विस्तृत प्राचीर
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1674 ई. में शिवाजी का भव्य राज्याभिषेक स्थल; मराठा साम्राज्य की स्थायी राजधानी व शिवाजी की समाधि
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सिंहगढ़ (कोंडाणा)
(पुणे के समीप) |
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1670 ई. में तानाजी मालुसरे द्वारा मुगलों से पुनः विजित
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तानाजी के बलिदान पर शिवाजी का प्रसिद्ध कथन: 'गढ़ आला पण सिंह गेला' (गढ़ आया पर सिंह गया)
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सिंधुदुर्ग व विजयदुर्ग
(कोंकण समुद्रतट) |
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मालवण की चट्टान पर निर्मित अभेद्य नौसैन्य जल दुर्ग
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मराठा नौसेना (आर्मडा) का प्रमुख नौसैनिक अड्डा; पुर्तगालियों, अंग्रेजों व सिद्दी समुद्री डाकुओं पर नियंत्रण
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| पद (अष्टप्रधान) | कार्य एवं उत्तरदायित्व | प्रशासनिक व दरबारी स्थिति |
|---|---|---|
पेशवा (मुख्य प्रधान) |
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समस्त प्रशासनिक कार्यों का संचालन, राजा की अनुपस्थिति में शासन संभालना, सेना का नेतृत्व
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अष्टप्रधान में सर्वोच्च स्थान; छत्रपति के बाद साम्राज्य का प्रधान कार्यपालक
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अमात्य (मजूमदार) |
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साम्राज्य के आय-व्यय की जांच, वित्त विभाग का संचालन, जमा-खर्च का वार्षिक लेखा संधारण
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आधुनिक वित्त मंत्री के समकक्ष; समस्त वित्तीय व राजस्व फरमानों पर हस्ताक्षर अनिवार्य
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वाकियानवीश (मंत्री) |
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राजा के दैनिक कार्यों, दरबार की गतिविधियों, सुरक्षा व्यवस्था व निजी गुप्तचरों का संधारण
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आधुनिक गृह मंत्री के समकक्ष; राजा के दैनिक जीवन व दरबारी अनुशासन का रक्षक
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शुरुनवीस / चिटनिस (सचिव) |
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शाही पत्राचार, फरमानों का प्रारूप तैयार करना, परगनों के हिसाब-किताब की जांच
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गृह व पत्राचार सचिव; सरकारी आदेशों पर 'स्वीकृत' (सम्मत) की मुहर अंकित करना
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सुमंत (डबीर) |
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विदेशी राज्यों से संबंध, राजदूतों का स्वागत, युद्ध व संधि के मामलों में कूटनीतिक सलाह
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आधुनिक विदेश मंत्री के समकक्ष; पड़ोसी रियासतों की गुप्त राजनीतिक सूचनाएं एकत्र करना
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सर-ए-नौबत (सेनापति) |
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समस्त सेना की भर्ती, अनुशासन, अस्त्र-शस्त्र संधारण, रसद व युद्धक्षेत्र में सैन्य संचालन
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सर्वोच्च सैन्य कमांडर; हंसाजी मोहिते (हम्बीरराव) व प्रतापराव गूजर प्रमुख सेनापति रहे
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पंडितराव (दानाध्यक्ष) |
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धार्मिक अनुष्ठान, विद्वानों व ब्राह्मणों को दान वितरण, सामाजिक धर्म-व्यवस्था का नियमन
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धार्मिक व सांस्कृतिक मामलों का प्रधान; इसे युद्धक्षेत्र में जाने से पूर्ण छूट थी
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न्यायाधीश |
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दीवानी एवं फौजदारी मुकदमों की सर्वोच्च अपील सुनना, स्मृति कानूनों के आधार पर न्याय
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छत्रपति के बाद सर्वोच्च न्यायिक प्राधिकारी; इसे भी युद्धक्षेत्र में जाने की छूट थी
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| कर / राजस्व स्रोत | दर एवं निर्धारण का आधार | वसूलने का क्षेत्र एवं प्रभाव |
|---|---|---|
भू-राजस्व (स्वराज्य) |
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आरंभ में 33%, बाद में 40%; काठी द्वारा भूमि पैमाइश; नकद व अनाज दोनों में मान्य
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स्वराज्य (मूल मराठा राज्य); किसानों को सुरक्षा, तकावी ऋण व पट्टे; बिचौलियों का दमन
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चौथ (Chauth) |
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पड़ोसी राज्यों की कुल आय का 1/4 भाग (25%); सुरक्षा गारंटी कर
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मुगल व दक्कनी सल्तनतों के सीमावर्ती क्षेत्र; मराठा लूट व बाहरी आक्रमण से रक्षा का आश्वासन
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सरदेशमुखी (Sardeshmukhi) |
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कुल राजस्व का 1/10 भाग (10%); वंशानुगत सरदेशमुख होने का वैधानिक दावा
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महाराष्ट्र व दक्कन के 6 सूबे; छत्रपति का वंशानुगत अधिपति अधिकार स्थापित करने का आधार
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मोकासा (Mokasa) |
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चौथ का 66% भाग जो मराठा सरदारों को अपनी सेना संधारण हेतु दिया जाता था
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मराठा सेनापतियों की जागीर व सैन्य व्यय; कालांतर में पेशवाओं द्वारा सामंती विस्तार का साधन
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बाबती व सहोत्रा |
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बाबती: चौथ का 25% (छत्रपति का हिस्सा); सहोत्रा: चौथ का 6% (सचिव/पंत सचिव का हिस्सा)
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राजकोषीय केंद्रीय निधि एवं अष्टप्रधान के मंत्रियों के भत्ते संधारण हेतु प्रयुक्त अंश
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| युद्ध अथवा संधि व वर्ष | शामिल पक्ष | प्रमुख घटनाक्रम एवं परिणाम |
|---|---|---|
प्रतापगढ़ का युद्ध
(10 नवंबर 1659) |
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शिवाजी
बनाम
अफजल खां (बीजापुर)
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अफजल खां का बघनखे से वध; बीजापुरी सेना में भगदड़; मराठों को अपार तोपें, घोड़े व खजाना मिला
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पुरंदर की संधि
(11 जून 1665) |
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शिवाजी
बनाम
मिर्जा राजा जयसिंह (मुगल)
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शिवाजी ने 23 दुर्ग मुगलों को सौंपे; शंभाजी को 5000 का मनसब; आगरा दरबार में जाने की सहमति
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सूरत की लूट
(1664 व 1670 ई.) |
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शिवाजी
बनाम
मुगल सूबेदार व व्यापारी
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मुगलों के प्रमुख व्यापारिक केंद्र पर दो बार भीषण प्रहार; करोड़ों की संपत्ति स्वराज्य कोष में जुड़ी
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पालखेड़ का युद्ध
(28 फरवरी 1728) |
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बाजीराव प्रथम
बनाम
निजाम-उल-मुल्क (हैदराबाद)
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बाजीराव की तीव्र गतिशीलता; निजाम जलविहीन क्षेत्र में घिरा; मुंशी शिवगाँव की संधि; चौथ स्वीकारी
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भोपाल का युद्ध
(दिसंबर 1737) |
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बाजीराव प्रथम
बनाम
निजाम व मुगल सेना
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निजाम भोपाल में पूर्णतः घिर गया; 1738 में दुर्राह सराय की संधि; मालवा व चंबल-नर्मदा क्षेत्र मराठों को मिला
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पानीपत का तृतीय युद्ध
(14 जनवरी 1761) |
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सदाशिवराव भाऊ (मराठा)
बनाम
अहमद शाह अब्दाली (अफगान)
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मराठों की भीषण पराजय; 28,000 प्रमुख मराठा वीर हताहत; मराठा साम्राज्य का अखिल भारतीय विस्तार रुका
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| पेशवा व कार्यकाल | प्रमुख सैन्य अभियान व नीतियां | मराठा साम्राज्य पर प्रभाव |
|---|---|---|
बालाजी विश्वनाथ
(1713–1720 ई.) |
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शाहूजी का पक्ष समर्थन; 1719 की दिल्ली संधि; फर्रुखसियर को पदच्युत करने में मदद; दक्कन में चौथ-सरदेशमुखी अधिकार
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पेशवा पद वंशानुगत बना; मराठा साम्राज्य का द्वितीय संस्थापक माना जाता है; वित्तीय सुदृढ़ीकरण
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बाजीराव प्रथम
(1720–1740 ई.) |
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'हिंदू पद पादशाही'; पालखेड़ (1728) व भोपाल (1737) में निजाम पराजित; दिल्ली पर धावा (1737); बेसिन विजय (1739)
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मराठा शक्ति का अखिल भारतीय विस्तार; मालवा, गुजरात, बुंदेलखंड पर नियंत्रण; गनिमी कावा का चरमोत्कर्ष
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बालाजी बाजीराव (नाना साहेब)
(1740–1761 ई.) |
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संगोला संधि (1750); रघुनाथराव द्वारा पंजाब-अटक विजय (1758); उदगीर युद्ध (1760); 1761 पानीपत तृतीय युद्ध
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पेशवा वास्तविक शासक बने; साम्राज्य का भौगोलिक विस्तार शिखर पर, किंतु पानीपत में भारी जन-धन हानि से पतन प्रारंभ
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माधवराव प्रथम
(1761–1772 ई.) |
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हैदराबाद के निजाम व मैसूर के हैदर अली को पराजित किया; 1771 में मुगलों को पुनः पेंशनभोगी बनाया
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पानीपत के घावों को 10 वर्ष में भर दिया; मराठा प्रतिष्ठा पुनर्स्थापित; क्षय रोग से असामयिक मृत्यु साम्राज्य हेतु आघात
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बाजीराव द्वितीय
(1796–1818 ई.) |
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अयोग्य व षड्यंत्रकारी; 1802 में अंग्रेजों से बसीन की सहायक संधि की; 1817–18 में तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध
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मराठा परिसंघ का पूर्ण विघटन; पेशवा पद समाप्त; बिठूर (कानपुर) में 8 लाख पेंशन पर निर्वासित
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| विस्तार का चरण व काल | प्रमुख क्षेत्र व नेतृत्वकर्ता | राजनीतिक व सामरिक परिणाम |
|---|---|---|
प्रथम चरण (1646–1680)
[स्वराज्य स्थापना] |
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महाराष्ट्र, कोंकण, कर्नाटक (जिंजी-वेल्लोर)
नेतृत्व: छत्रपति शिवाजी महाराज
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बीजापुर व मुगलों से स्वतंत्र हिंदू स्वराज्य की नींव; पहाड़ी किलों व नौसेना का निर्माण; रायगढ़ राजधानी
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द्वितीय चरण (1680–1707)
[स्वाधीनता संग्राम] |
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दक्कन, जिंजी, सतारा व संपूर्ण महाराष्ट्र
नेतृत्व: शंभाजी, राजाराम व ताराबाई
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औरंगजेब की 25 वर्षीय दक्कन घेराबंदी का विफल प्रतिरोध; जनयुद्ध द्वारा मुगलों को थकाकर पीछे धकेला
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तृतीय चरण (1707–1740)
[उत्तर भारत की ओर प्रयाण] |
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मालवा, गुजरात, बुंदेलखंड, राजस्थान सीमा
नेतृत्व: पेशवा बाजीराव प्रथम
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मुगल प्रभुत्व को सीधी चुनौती; दिल्ली तक धावे; दक्कन से बाहर निकलकर केंद्रीय भारत पर पूर्ण आधिपत्य
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चतुर्थ चरण (1740–1761)
[कटक से अटक तक] |
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पंजाब (अटक), ओडिशा (कटक), बंगाल, दिल्ली
नेतृत्व: बालाजी बाजीराव व रघुनाथराव
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मुगल सम्राट मराठों के संरक्षण में; भारत की सर्वोच्च राजनीतिक सत्ता; अहमद शाह अब्दाली से सीधा टकराव
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| मराठा घराना व प्रमुख केंद्र | संस्थापक व प्रमुख शासक | राजनीतिक भूमिका एवं प्रभाव |
|---|---|---|
पेशवा घराना
(पुणे, महाराष्ट्र) |
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बालाजी विश्वनाथ;
बाजीराव प्रथम, माधवराव
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मराठा संघ का सर्वोच्च प्रधान; समस्त विदेशी व राष्ट्रीय नीतियों का नियंत्रक केंद्र; शनिवार वाड़ा से शासन
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सिंधिया / शिंदे घराना
(ग्वालियर व उज्जैन) |
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रानोजी सिंधिया;
महादजी सिंधिया, दौलतराव
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उत्तर भारत की राजनीति के निर्णायक नियामक; मुगल सम्राट के संरक्षक (वकील-ए-मुतलक); सुसज्जित तोपखाना
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होलकर घराना
(इंदौर व महेश्वर) |
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मल्हारराव होलकर;
अहिल्याबाई, जसवंतराव
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मालवा का आर्थिक संवर्धन; अहिल्याबाई का न्यायप्रिय शासन व राष्ट्रव्यापी मंदिर निर्माण; अंग्रेजों को कड़ी टक्कर
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गायकवाड़ घराना
(बड़ौदा, गुजरात) |
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पीलाजीराव व दामाजी;
सयाजीराव गायकवाड़
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गुजरात व काठियावाड़ से चौथ-सरदेशमुखी संग्रह; आंतरिक प्रशासन में स्थायित्व व आधुनिक शिक्षा को बढ़ावा
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भोंसले घराना
(नागपुर, महाराष्ट्र) |
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रघूजी भोंसले प्रथम;
जानोजी भोंसले
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पूर्वी भारत (ओडिशा, छत्तीसगढ़, बंगाल) में मराठा शक्ति का विस्तार; नवाब अलीवर्दी खां को चौथ हेतु विवश किया
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| युद्ध का चरण / घटक | शामिल पक्ष व प्रमुख सेनापति | घटनाक्रम, सामरिक कारण व परिणाम |
|---|---|---|
लड़ाकू पक्ष व प्रमुख नेता |
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मराठा सेना (सदाशिवराव भाऊ, विश्वासराव, इब्राहिम गर्दी, मल्हारराव होलकर)
बनाम
अफगान संघ (अहमद शाह अब्दाली, नजीब-उद-दौला, शुजाउद्दौला)
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मराठे अकेले पड़े; राजपूत, जाट (सूरजमल) व सिख तटस्थ; अवध व रुहेलखंड अब्दाली के पक्ष में एकजुट
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सामरिक परिस्थितियां व रसद |
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मराठों द्वारा पारंपरिक गनिमी कावा त्यागकर प्रत्यक्ष मोर्चा लेना; भारी गैर-सैनिक (तीर्थयात्री) दल साथ होना
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अब्दाली ने यमुना पार कर मराठा रसद पूर्णतः काटी; मराठा शिविर में 2 माह तक भीषण भुखमरी फैली
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14 जनवरी 1761 का संग्राम |
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इब्राहिम खां गर्दी के तोपखाने का प्रारंभिक भीषण प्रहार; दोपहर में विश्वासराव के सिर में घातक गोली लगी
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सदाशिवराव भाऊ हाथी छोड़ घोड़े पर लड़े व वीरगति पाई; मल्हारराव होलकर रणक्षेत्र से हटे; मराठा सेना में भगदड़
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मानव व भौतिक क्षति |
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28,000 प्रमुख मराठा वीर सैनिक रणभूमि में मारे गए; जनकोजी सिंधिया व इब्राहिम गर्दी बंदी बनाकर कत्ल
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महाराष्ट्र का शायद ही कोई ऐसा परिवार था जिसने अपना कोई सगा संबंधी न खोया हो; संपूर्ण पीढ़ी नष्ट
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ऐतिहासिक व दीर्घकालिक प्रभाव |
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मराठों का अखिल भारतीय साम्राज्य का स्वप्न सदा के लिए चकनाचूर; पेशवा बालाजी बाजीराव का शोक में निधन
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भारत में सत्ता शून्यता उत्पन्न हुई; ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को प्लासी (1757) व बक्सर (1764) से भारत विजय का खुला मार्ग मिला
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