1857 के विद्रोह के समय ब्रिटेन के प्रधानमंत्री
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लॉर्ड पामर्स्टन
| कारण का आयाम | विशिष्ट नीतियां एवं घटनाएं | भारतीय समाज पर प्रभाव व जन-असंतोष |
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राजनीतिक कारण |
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डलहौजी की हड़प नीति (सतारा, झांसी, नागपुर); 1856 में अवध का कुशासन आधार पर विलय; बहादुर शाह जफर का अपमान; नाना साहेब की पेंशन बंद
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देशी शासकों व नवाबों में असुरक्षा; राजदरबारों से जुड़े लाखों आश्रितों, सैनिकों व कर्मचारियों का पूर्ण विनाश
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आर्थिक कारण |
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स्थायी, रैयतवाड़ी व महालवाड़ी में अत्यधिक लगान मांग; 1852 का इनाम कमीशन; पारंपरिक हथकरघा व दस्तकारी का विनाश (वि-औद्योगीकरण)
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किसानों का भयानक ऋणजाल व भूमि बेदखली; साहुकारों का शोषण; लाखों शिल्पियों की भुखमरी व ग्रामीण दरिद्रता
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सामाजिक-धार्मिक कारण |
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सती प्रथा निषेध (1829); विधवा पुनर्विवाह (1856); ईसाई मिशनरियों का धर्मांतरण; 1850 का लेक्स लोकी एक्ट (धार्मिक अयोग्यता कानून)
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भारतीय परंपराओं में विदेशी हस्तक्षेप का भय; रूढ़िवादी व कुलीन वर्ग में 'धर्म संकट में है' की गहरी आशंका
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सैन्य कारण |
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1856 का सामान्य सेवा भर्ती अधिनियम (समुद्र पार जाना); 1854 का डाकघर कानून (मुफ्त डाक बंद); पदोन्नति में सूबेदार की सीमा; नस्लीय गाली-गलौज
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सैनिकों में धार्मिक पहचान मिटने का डर; ब्रिटिश सैनिकों से 3 गुना कम वेतन; अवध के सैनिकों में विशेष आक्रोश
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तात्कालिक कारण |
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दिसंबर 1856 में पुरानी 'ब्राउन बैस' मस्कट के स्थान पर नई 'एनफील्ड राइफल' की शुरुआत; चिकनाई हेतु गाय व सूअर की चर्बी युक्त कारतूस
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कारतूस को मुंह से काटना अनिवार्य; हिंदू-मुस्लिम दोनों धर्मों के सैनिकों की धार्मिक भावना पर सीधा आघात
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| विद्रोह का केंद्र | प्रमुख भारतीय नेतृत्वकर्ता | दमनकर्ता ब्रिटिश अधिकारी एवं परिणाम |
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दिल्ली
(केन्द्रीय स्थल) |
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बहादुर शाह जफर (सम्राट) एवं
जनरल बख्त खां (सैन्य प्रमुख)
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जॉन निकोलसन (मारा गया) व लेफ्टिनेंट हडसन; सितंबर 1857 में पुनः अधिकार; जफर को रंगून निर्वासित किया गया
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कानपुर
(गंगा तट) |
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नाना साहेब (धोंधू पंत), तात्या टोपे एवं
अजीमुल्लाह खां
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कॉलिन कैंपबेल व हैवलॉक; दिसंबर 1857 में पुनः कब्जा; नाना साहेब नेपाल पलायन; तात्या टोपे झांसी पहुंचे
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लखनऊ
(अवध) |
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बेगम हजरत महल एवं
बिरजिस काद्र (अल्पवयस्क नवाब)
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हेनरी लॉरेंस (मारा गया), आउट्रम व कैंपबेल; मार्च 1858 में बेगम हजरत महल पराजित होकर नेपाल पलायन कर गईं
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झांसी व ग्वालियर
(बुंदेलखंड) |
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रानी लक्ष्मीबाई एवं
तात्या टोपे (रामचंद्र पांडुरंग)
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सर ह्यूरोज; जून 1858 में कोटा-की-सराय (ग्वालियर) में रानी लड़ते हुए वीरगति; तात्या टोपे को 1859 में फांसी
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जगदीशपुर
(आरा, बिहार) |
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वीर कुंवर सिंह (80 वर्षीय जमींदार) एवं
भाई अमर सिंह
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विलियम टेलर और विंसेंट आयर; कुंवर सिंह ने ली ग्रैंड को हराया; घायल होकर अप्रैल 1858 में वीरगति पाई
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बरेली
(रुहेलखंड) |
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खान बहादुर खां
(रुहेला शासक वंशज)
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कॉलिन कैंपबेल; 1858 में बरेली का पतन; खान बहादुर खां को बाद में फांसी की सजा दी गई
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फैजाबाद
(अयोध्या) |
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मौलवी अहमदुल्लाह शाह
(डंका शाह)
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कॉलिन कैंपबेल; 50,000 रु. का इनाम घोषित था; पुवायां के राजा द्वारा धोखे से हत्या कराई गई
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इलाहाबाद व बनारस
(उत्तर प्रदेश) |
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मौलाना लियाकत अली
(खुसरो बाग केंद्र)
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कर्नल जेम्स नील; अत्यंत निर्मम नरसंहार व दमन; इलाहाबाद दुर्ग पर ब्रिटिश नियंत्रण स्थापित
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| केंद्र व घटना का समय | प्रमुख संघर्ष एवं ऐतिहासिक घटनाएं | रणनीतिक परिणाम एवं ब्रिटिश कार्रवाई |
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दिल्ली
(मई–सितंबर 1857) |
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11 मई को लाल किले पर अधिकार; कर्नल रिप्ले मारा गया; विद्रोही परिषद द्वारा शासन; बख्त खां द्वारा रक्षा
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20 सितंबर 1857 को दिल्ली का पतन; मिर्जा मुगल, खिज्र सुल्तान की गोली मारकर हत्या; बहादुर शाह बंदी
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कानपुर
(जून–दिसंबर 1857) |
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नाना साहेब द्वारा पेशवा घोषित होना; जनरल व्हीलर का आत्मसमर्पण; सतीचौरा व बीबीघर कांड
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हैवलॉक व कैंपबेल द्वारा भीषण दमन; दिसंबर 1857 में कानपुर पुनः विजित; नाना साहेब का नेपाल पलायन
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लखनऊ
(जून 1857–मार्च 1858) |
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चिनहट के युद्ध में लॉरेंस पराजित; रेजीडेंसी का 87 दिन घेरा; हेनरी लॉरेंस व नील मारे गए; बेगम का अदम्य नेतृत्व
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मार्च 1858 में कॉलिन कैंपबेल व गोरखा सेना द्वारा लखनऊ विजित; बेगम हजरत महल नेपाल पलायन
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ग्वालियर-झांसी
(मार्च–जून 1858) |
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ह्यूरोज द्वारा झांसी का घेरा; रानी का कालपी गमन; सिंधिया की सेना द्वारा रानी का समर्थन; ग्वालियर दुर्ग पर अधिकार
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17 जून 1858 को कोटा-की-सराय में रानी शहीद; ग्वालियर दुर्ग पुनः अंग्रेजों के हाथ; मध्य भारत में विद्रोह समाप्त
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जगदीशपुर
(जुलाई 1857–अप्रैल 1858) |
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दानापुर के सैनिकों का कुंवर सिंह से मिलना; आरा में ब्रिटिश घेराबंदी; कैप्टन ली ग्रैंड की ब्रिटिश टुकड़ी पराजित
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गंगा पार करते समय हाथ में गोली; 26 अप्रैल 1858 को कुंवर सिंह का देहांत; भाई अमर सिंह द्वारा छापामार संघर्ष
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| असफलता का मुख्य आयाम | विशिष्ट दुर्बलताएं एवं ऐतिहासिक साक्ष्य | विद्रोह पर पड़ा निर्णायक प्रभाव |
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सीमित भौगोलिक प्रसार |
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विद्रोह मुख्य रूप से उत्तर भारत (अवध, रुहेलखंड, बिहार) तक सीमित रहा; दक्षिण भारत, पंजाब, सिंध व राजस्थान शांत रहे
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अंग्रेजों को अप्रभावित क्षेत्रों (मद्रास, बंबई, पंजाब) से सैन्य संसाधन व सेना जुटाने का पूर्ण अवसर मिला
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देशी राजाओं की गद्दारी |
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ग्वालियर के सिंधिया, इंदौर के होलकर, हैदराबाद के निजाम, भोपाल के नवाब, पटियाला, नाभा व जींद के सिख शासकों का खुला समर्थन
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कैनिंग के अनुसार यदि सिंधिया भी विद्रोह में शामिल हो जाते तो अंग्रेजों को 'कल ही बोरिया-बिस्तर समेटना पड़ता'
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कुलीन व शिक्षित वर्ग की तटस्थता |
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आधुनिक पश्चिमी शिक्षा प्राप्त भारतीय बुद्धिजीवी, बड़े व्यापारी व महाजन पूरी तरह विद्रोह से विमुख रहे
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विद्रोह को राष्ट्रीय चेतना व आधुनिक वैचारिक दिशा देने वाला बौद्धिक नेतृत्व प्राप्त नहीं हो सका
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सामरिक व तकनीकी पिछड़ापन |
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विद्रोहियों के पास तलवारें, भाले व पुरानी बंदूकें; अंग्रेजों के पास त्वरित तार संचार (Telegraph), रेलवे व आधुनिक एनफील्ड राइफलें
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अंग्रेज सेनापति डाक-तार द्वारा पल-पल की सूचना पाकर त्वरित कूटनीतिक व सैन्य समन्वय कर सके
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साझा भविष्य दृष्टि का अभाव |
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विभिन्न नेता (नाना साहेब, लक्ष्मीबाई, बहादुर शाह) अपने खोए हुए रजवाड़े व जागीरें वापस पाने हेतु लड़ रहे थे
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पराजय के बाद भारत का कोई वैकल्पिक राजनीतिक-आर्थिक ढांचा तैयार नहीं था; अतीतमुखी दृष्टिकोण
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| पुस्तक का नाम (Book Title) | लेखक / विद्वान | विद्रोह के प्रति प्रमुख दृष्टिकोण व व्याख्या |
|---|---|---|
द इंडियन वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस
(1909 ई.) |
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विनायक दामोदर सावरकर
(वी. डी. सावरकर)
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राष्ट्रवादी दृष्टिकोण; अंग्रेजों के विरुद्ध योजनाबद्ध प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की संज्ञा दी
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अस्बाब-ए-बगावत-ए-हिंद
(1859 ई., उर्दू) |
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सर सैयद अहमद खां
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भारतीय भाषा में प्रथम विश्लेषणात्मक पुस्तक; सरकारी नीतियों व भारतीयों की उपेक्षा को कारण बताया
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Eighteen Fifty-Seven (1857)
(1957 ई.) |
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डॉ. सुरेंद्र नाथ सेन
(एस. एन. सेन)
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आधिकारिक इतिहासकार; धर्म की रक्षा से प्रारंभ होकर स्वतंत्रता संग्राम का रूप धारण करने का मत
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द सिपाही म्यूटिनी एंड द रिवोल्ट...
(1957 ई.) |
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आर. सी. मजूमदार
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समीक्षात्मक मत; 'न तो प्रथम, न राष्ट्रीय और न ही स्वतंत्रता संग्राम'; संकीर्ण हितों पर जोर
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द ग्रेट रिबेलियन
(1946 ई.) |
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अशोक मेहता
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विद्रोह के राष्ट्रीय चरित्र का प्रतिपादन; जनता और सिपाहियों के संयुक्त प्रतिरोध का समर्थन
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सिविल रिबेलियन इन द इंडियन म्यूटिनीज़
(1957 ई.) |
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शशि भूषण चौधरी
(एस. बी. चौधरी)
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सैन्य विद्रोह के साथ-साथ आम किसानों, जमींदारों व नागरिकों के नागरिक विद्रोह का साक्ष्य प्रस्तुत किया
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| प्रशासनिक / नीतिगत क्षेत्र | 1858 के उपरांत किए गए प्रमुख बदलाव | भारत पर युगांतरकारी ऐतिहासिक प्रभाव |
|---|---|---|
शासन प्रणाली
(1858 का अधिनियम) |
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ईस्ट इंडिया कंपनी का 100 वर्षीय शासन समाप्त; ब्रिटिश क्राउन का सीधा शासन; लंदन में भारत सचिव व 15 सदस्यीय परिषद
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गवर्नर-जनरल अब 'वायसराय' कहलाया; कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स व बोर्ड ऑफ कंट्रोल का द्वैध शासन समाप्त
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महारानी की घोषणा
(1 नवंबर 1858) |
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क्षेत्रीय विस्तार पर पूर्ण विराम; धार्मिक मामलों में अहस्तक्षेप की प्रतिज्ञा; सभी प्रजा को विधि के समक्ष समानता का आश्वासन
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भारतीयों ने इसे अपने अधिकारों का 'मैग्नाकार्टा' माना; यद्यपि व्यवहार में नस्लीय भेदभाव निरंतर जारी रहा
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देशी रियासतों के प्रति नीति |
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व्यपगत (हड़प) नीति समाप्त; राजाओं को दत्तक पुत्र गोद लेने की अनुमति; सीमाओं की गारंटी; संप्रभुता क्राउन के अधीन
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रियासतों को 'साम्राज्य का सुरक्षा कवच' बनाया गया; राजा व नवाब ब्रिटिश सत्ता के सबसे वफादार समर्थक बने
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सेना का पुनर्गठन
(पील आयोग) |
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बंगाल में अनुपात 1:2 व मद्रास-बंबई में 1:3; तोपखाना केवल अंग्रेजों के नियंत्रण में; जातीय व क्षेत्रीय रेजीमेंटों का गठन
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सैनिकों में राष्ट्रवाद की संभावना समाप्त करने हेतु 'फूट डालो और राज करो'; सिख, गोरखा व पठानों को मार्शल कौम माना
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धार्मिक व सामाजिक नीति |
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भारतीय सामाजिक सुधारों (सती, विवाह आदि) में कानून बनाने से अंग्रेजों ने हाथ खींच लिया; रूढ़िवादी तत्वों को संरक्षण
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सामंतों, जमींदारों व प्रतिक्रियावादी ताकतों से समझौता; हिंदू-मुस्लिम विभाजन को प्रोत्साहन देकर शासन सुदृढ़ किया
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