गांधीजी ने 11 सूत्रीय मांगें किस पत्रिका के माध्यम से प्रस्तुत की थीं
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यंग इंडिया (31 जनवरी 1930)
| तिथि व पड़ाव | स्थान व तय की गई दूरी | प्रमुख घटनाएं एवं ऐतिहासिक महत्व |
|---|---|---|
12 मार्च 1930
(प्रस्थान दिवस) |
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साबरमती आश्रम (अहमदाबाद)
प्रस्थान बिंदु
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प्रातः 6:30 बजे 78 अनुयायियों के साथ पदयात्रा प्रारंभ; 'रघुपति राघव राजा राम' का संकीर्तन; अपार जनसमूह विदाई हेतु उमड़ा
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13–20 मार्च 1930
(प्रारंभिक पड़ाव) |
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असलाली, नडियाद व आणंद
खेड़ा जिला
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ग्रामीणों द्वारा भव्य स्वागत; सैकड़ों सरकारी पटवारियों व मुखियाओं ने पदों से सामूहिक त्यागपत्र दिए; खादी का व्यापक प्रचार
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21–29 मार्च 1930
(मध्य पड़ाव) |
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रास, जंबूसर व भरूच
नर्मदा नदी पार
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महिसागर नदी को नौका से पार किया; पंडित जवाहरलाल नेहरू ने जंबूसर में भेंट की; महिलाओं की अभूतपूर्व भागीदारी
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1–4 अप्रैल 1930
(सूरत क्षेत्र) |
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सूरत व नवसारी
दक्षिण गुजरात
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विदेशी वस्त्रों व शराब बहिष्कार का संकल्प; अमेरिकी पत्रकार वेब मिलर द्वारा वैश्विक स्तर पर यात्रा का सजीव प्रसारण
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5 अप्रैल 1930
(दांडी आगमन) |
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दांडी समुद्र तट
नवसारी जिला
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240 मील (385 किमी) की पदयात्रा पूर्ण कर दांडी पहुँचे; रात्रि प्रार्थना सभा में आत्म-शुद्धि व अहिंसा पर विशेष संबोधन
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6 अप्रैल 1930
(नमक कानून भंग) |
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दांडी समुद्र तट
प्रातः 6:30 बजे
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गांधीजी ने समुद्र तट से एक मुट्ठी प्राकृतिक नमक उठाकर ब्रिटिश कानून तोड़ा; सविनय अवज्ञा आंदोलन का राष्ट्रव्यापी औपचारिक शुभारंभ
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| क्षेत्र / प्रांत | प्रमुख नेतृत्वकर्ता | मुख्य गतिविधियां एवं जन-प्रतिरोध का स्वरूप |
|---|---|---|
तमिलनाडु
(तंजौर तट) |
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सी. राजगोपालाचारी
('राजाजी')
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त्रिचनापल्ली से वेदारण्यम तक 150 मील नमक मार्च (अप्रैल 1930); वेदारण्यम तट पर नमक कानून तोड़ा
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केरल
(मालाबार तट) |
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के. केलप्पन ('केरल गांधी')
एवं के. पी. केशव मेनन
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कालीकट से पय्यानूर तक ऐतिहासिक पदयात्रा; तटीय नमक बनाकर सविनय अवज्ञा; मंदिर प्रवेश का शंखनाद
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उत्तर-पश्चिम सीमांत
(NWFP - पेशावर) |
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खान अब्दुल गफ्फार खान
('सीमांत गांधी')
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'खुदाई खिदमतगार' (लाल कुर्ती आंदोलन); अहिंसक पश्तून सत्याग्रह; पेशावर पर जन-अधिकार
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ओडिशा
(कटक व बालेश्वर) |
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गोपबंधु चौधरी एवं
रमा देवी
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इंचुड़ी (बालेश्वर) के समुद्र तट पर नमक कानून भंग; कटक व पुरी में विदेशी वस्त्र बहिष्कार
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बिहार
(सारण, चंपारण, पटना) |
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डॉ. राजेंद्र प्रसाद एवं
अंबिका कांत सिंह
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खारे जल से शोरा व नमक निर्माण; चौकीदारी कर बंदी आंदोलन; नखास तालाब (पटना) पर सत्याग्रह
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असम व नगालैंड
(पूर्वोत्तर भारत) |
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रानी गाइदिनल्यू
(13 वर्षीय नगा वीरांगना)
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'हेरका आंदोलन'; ब्रिटिश करों का बहिष्कार; असम में छात्रों द्वारा कनिंघम सर्कुलर का कड़ा विरोध
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मध्य प्रांत व महाराष्ट्र
(वनीय क्षेत्र) |
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एम. एस. अणे एवं
स्थानीय गोंड-आदिवासी
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'जंगल सत्याग्रह'; आरक्षित वनों के नियमों का उल्लंघन कर पशु चराना व इमारती लकड़ी काटना
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संयुक्त प्रांत (यूपी)
(इलाहाबाद व रायबरेली) |
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जवाहरलाल नेहरू एवं
पुरुषोत्तम दास टंडन
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किसानों द्वारा 'ना-लगान व ना-टैक्स' (कर-रोको) अभियान; जमींदारों को किराया न देने का आह्वान
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| सामाजिक समूह / वर्ग | प्रमुख नेत्री व प्रतिनिधि व्यक्तित्व | भागीदारी का स्वरूप एवं प्रमुख उदाहरण |
|---|---|---|
महिला नेतृत्व
(अग्रिम पंक्ति) |
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सरोजिनी नायडू, कस्तूरबा गांधी, कमला नेहरू, स्वरूप रानी, अवंतिकाबाई गोखले
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धरासना नमक डिपो पर 2500 सत्याग्रहियों का नेतृत्व; लाठी प्रहारों का निर्भीक सामना; जेल यात्राएं
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पिकेटिंग व शराब बंदी
(सत्याग्रही महिलाएं) |
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हंसा मेहता, बसंती देवी, कमलादेवी चट्टोपाध्याय, नेली सेनगुप्त
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शराब, अफीम व विदेशी कपड़ों की दुकानों पर निरंतर धरने; विदेशी माल बेचने वाले व्यापारियों का सामाजिक बहिष्कार
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युवा व छात्र वर्ग
(वानर व मंजरी सेना) |
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सचिंद्रनाथ बसु, इंदिरा गांधी (मंजरी सेना प्रमुख), स्कूल-कॉलेज छात्र
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कनिंघम सर्कुलर का उल्लंघन; प्रभातफेरियां; गुप्त पर्चे बांटना; डाक-तार संचार में अवरोध
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व्यापारी व उद्योगपति
(आर्थिक समर्थन) |
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जी. डी. बिड़ला, जमनालाल बजाज, पुरुषोत्तम दास ठाकुरदास
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विदेशी माल के आयात समझौतों का बहिष्कार; कांग्रेस फंड को भारी आर्थिक अनुदान; खादी का विपणन
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जनजातीय व किसान वर्ग
(जंगल व कर-रोको) |
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रानी गाइदिनल्यू (नगालैंड), गोंड व कोरकू आदिवासी (मध्य प्रांत)
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जंगल कानूनों को तोड़कर मवेशी चराना; बिहार में चौकीदारी कर बंदी; बारदोली में सामूहिक हिजरत (पलायन)
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| सम्मेलन व समय | ब्रिटिश प्रधानमंत्री व भारतीय प्रतिनिधित्व | प्रमुख विचारणीय मुद्दे एवं परिणाम |
|---|---|---|
प्रथम गोलमेज सम्मेलन
(12 नवं 1930 – 19 जन 1931)
स्थान: लंदन |
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पीएम: रैम्जे मैकडोनाल्ड;
कुल 89 प्रतिनिधि; कांग्रेस अनुपस्थित; अंबेडकर (दलित), सप्रू (उदारवादी), आगा खां व जिन्ना (लीग)
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अखिल भारतीय संघ व प्रांतीय स्वायत्तता पर चर्चा; कांग्रेस के बिना सम्मेलन निष्फल; सप्रू-जयकर मध्यस्थता से गांधी रिहा
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द्वितीय गोलमेज सम्मेलन
(7 सितं 1931 – 1 दिसंबर 1931)
स्थान: लंदन |
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पीएम: रैम्जे मैकडोनाल्ड;
कांग्रेस के एकमात्र प्रतिनिधि: महात्मा गांधी (SS राजपूताना जहाज से);
सरोजिनी नायडू, मदन मोहन मालवीय, अंबेडकर
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सांप्रदायिक गतिरोध; अंबेडकर द्वारा दलित पृथक निर्वाचन की मांग; गांधीजी द्वारा विरोध; सम्मेलन पूर्णतः विफल; भारत लौटकर पुनः सविनय अवज्ञा
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तृतीय गोलमेज सम्मेलन
(17 नवं 1932 – 24 दिसं 1932)
स्थान: लंदन |
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पीएम: रैम्जे मैकडोनाल्ड;
मात्र 46 प्रतिनिधि; कांग्रेस व ब्रिटिश लेबर पार्टी अनुपस्थित; अंबेडकर व सप्रू शामिल
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भावी संविधान के अंतिम स्वरूप पर चर्चा; 1933 में श्वेत पत्र (White Paper) प्रकाशित; 1935 के भारत शासन अधिनियम की आधारशिला बना
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| समझौता / घटना व वर्ष | संबंधित प्रमुख पक्ष व नेता | प्रमुख प्रावधान एवं ऐतिहासिक परिणाम |
|---|---|---|
गांधी-इरविन समझौता
(5 मार्च 1931, दिल्ली) |
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महात्मा गांधी (कांग्रेस)
बनाम
लॉर्ड इरविन (वायसराय)
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सविनय अवज्ञा स्थगित; केवल अहिंसक बंदियों की रिहाई; तटीय नमक बनाने की छूट; पुलिस ज्यादती जांच अस्वीकृत; द्वितीय गोलमेज में कांग्रेस की भागीदारी तय
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कराची कांग्रेस अधिवेशन
(29 मार्च 1931, कराची) |
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अध्यक्ष: सरदार वल्लभभाई पटेल;
गांधीजी, नेहरू, सुभाष
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गांधी-इरविन समझौते की पुष्टि; नेहरू द्वारा प्रारूपित 'मौलिक अधिकार एवं राष्ट्रीय आर्थिक कार्यक्रम' पारित; भगत सिंह की फांसी पर क्षोभ
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सांप्रदायिक पंचाट
(16 अगस्त 1932, लंदन) |
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रैम्जे मैकडोनाल्ड
(ब्रिटिश प्रधानमंत्री)
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मुसलमान, सिख व ईसाइयों के साथ दलितों (डिप्रेस्ड क्लासेज) को भी पृथक निर्वाचक मंडल दिया; हिंदू समाज के विभाजनकारी प्रयास
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पूना पैक्ट
(24 सितंबर 1932, पुणे) |
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डॉ. बी. आर. अंबेडकर एवं
पंडित मदन मोहन मालवीय (गांधीजी)
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दलितों का पृथक निर्वाचन समाप्त; संयुक्त निर्वाचन के तहत प्रांतीय विधानसभाओं में सीटें 71 से बढ़ाकर 147 की गईं; केंद्रीय सभा में 18% आरक्षण
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आंदोलन की अंतिम वापसी
(अप्रैल 1934) |
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महात्मा गांधी एवं
कांग्रेस कार्यसमिति
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मई 1933 में सामूहिक से व्यक्तिगत सत्याग्रह में बदला; 7 अप्रैल 1934 को पूर्ण विराम; कांग्रेस ने 1935 के अधिनियम के चुनावों की ओर रुख किया
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