उत्तराखंड की कृषि और उद्यानिकी - पर्वतीय और तराई कृषि की संपूर्ण जानकारी

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उत्तराखंड की कृषि और उद्यानिकी - पर्वतीय और तराई कृषि की संपूर्ण जानकारी - ऑनलाइन प्रैक्टिस क्विज़

उत्तराखंड की कृषि, पर्वतीय खेती, तराई कृषि, मंडुवा झंगोरा चौलाई, सेब कीवी आड़ू माल्टा उत्पादन, जैविक खेती और औषधीय पौधों की विस्तृत जानकारी।

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💡 व्याख्या

उत्तराखंड की कृषि और उद्यानिकी का परिचय

उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि और उद्यानिकी है। राज्य की लगभग सत्तर प्रतिशत जनसंख्या कृषि पर निर्भर है। यहाँ की कृषि को दो भागों में बांटा जाता है। पर्वतीय कृषि और तराई कृषि। पर्वतीय क्षेत्र में सीढ़ीदार खेतों में खेती की जाती है जबकि तराई क्षेत्र में समतल भूमि पर आधुनिक कृषि होती है। राज्य में जलवायु विविधता के कारण विभिन्न प्रकार की फसलें उगाई जाती हैं। गेहूं, धान, मंडुवा, झंगोरा, चौलाई, दालें और तिलहन यहाँ की प्रमुख फसलें हैं।

परीक्षोपयोगी महत्वपूर्ण तथ्य:
• उत्तराखंड में मंडुवा को कोदा और झंगोरा को सावा भी कहा जाता है।
• राज्य में सेब उत्पादन में उत्तरकाशी और नैनीताल अग्रणी जिले हैं।
• कीवी उत्पादन में बागेश्वर जिला प्रसिद्ध है।
• जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए जैविक उत्तराखंड मिशन चलाया जा रहा है।
• तेजपत्ता, कुटकी और अतीस प्रमुख औषधीय पौधे हैं।

पर्वतीय कृषि और तराई कृषि

पर्वतीय कृषि उत्तराखंड के पहाड़ी जिलों में की जाती है जहाँ सीढ़ीदार खेत बनाए जाते हैं। यहाँ वर्षा आधारित कृषि अधिक होती है। मंडुवा, झंगोरा, चौलाई, राजमा और आलू पर्वतीय क्षेत्र की प्रमुख फसलें हैं। तराई कृषि ऊधमसिंहनगर, हरिद्वार और नैनीताल के मैदानी क्षेत्रों में होती है जहाँ गेहूं, धान, गन्ना और सरसों का उत्पादन अधिक होता है। तराई क्षेत्र पंजाब की तरह उर्वर माना जाता है।

झूम कृषि की स्थिति

उत्तराखंड में झूम कृषि को स्थानांतरित कृषि कहा जाता है और यह पहले जौनसार क्षेत्र में प्रचलित थी। अब सरकार द्वारा इसे नियंत्रित किया गया है। झूम कृषि में जंगल को काटकर खेती की जाती थी जिससे पर्यावरण को हानि होती थी। वर्तमान में सीढ़ीदार और स्थायी कृषि को बढ़ावा दिया जा रहा है।

पारंपरिक फसलें - मंडुवा, झंगोरा, चौलाई

मंडुवा, झंगोरा और चौलाई उत्तराखंड की पारंपरिक मोटे अनाज की फसलें हैं। मंडुवा को रागी भी कहा जाता है और यह पौष्टिकता से भरपूर है। झंगोरा व्रत में उपयोग किया जाता है। चौलाई की खेती उच्च हिमालयी क्षेत्रों में होती है। ये फसलें सूखा सहनशील हैं और कम पानी में उग जाती हैं। राज्य सरकार इनके उत्पादन को बढ़ावा दे रही है।

फल उत्पादन - सेब, कीवी, आड़ू, माल्टा

उत्तराखंड फल उत्पादन में समृद्ध है। सेब का उत्पादन उत्तरकाशी, नैनीताल और अल्मोड़ा में अधिक होता है। कीवी उत्पादन में बागेश्वर अग्रणी है। नाशपाती, आड़ू, प्लम और खुबानी शीतोष्ण फल हैं। माल्टा, संतरा और नींबू वर्गीय फल कुमाऊं क्षेत्र में अधिक उगाए जाते हैं। रामगढ़ नैनीताल को फलों की घाटी कहा जाता है।

जैविक खेती और औषधीय पौधे

उत्तराखंड में जैविक खेती को विशेष बढ़ावा दिया जा रहा है। राज्य को जैविक राज्य बनाने का लक्ष्य रखा गया है। यहाँ रसायन मुक्त खेती पर जोर दिया जाता है। औषधीय एवं सुगंधित पौधों की खेती में तेजपत्ता, तुलसी, कुटकी, अतीस, जटामासी और अश्वगंधा प्रमुख हैं। चमोली और पिथौरागढ़ औषधीय पौधों के लिए प्रसिद्ध हैं। जड़ी बूटी शोध संस्थान गोपेश्वर में स्थित है।

महत्वपूर्ण तथ्य / विषयविवरण
पर्वतीय प्रमुख फसलेंमंडुवा, झंगोरा, चौलाई, राजमा, आलू, गेहूं
तराई प्रमुख फसलेंधान, गेहूं, गन्ना, सरसों, दलहन
सेब उत्पादन क्षेत्रउत्तरकाशी, नैनीताल, अल्मोड़ा, देहरादून
कीवी उत्पादनबागेश्वर, नैनीताल, पिथौरागढ़
माल्टा उत्पादनअल्मोड़ा, बागेश्वर, नैनीताल
औषधीय पौधेतेजपत्ता, कुटकी, अतीस, जटामासी, तुलसी
जैविक खेती मिशनजैविक उत्तराखंड मिशन, रसायन मुक्त कृषि

उत्तराखंड की कृषि और उद्यानिकी राज्य की सांस्कृतिक पहचान भी है। मंडुवा और झंगोरा जैसे मोटे अनाज को सुपर फूड माना जाता है। सेब और माल्टा उत्पादन से किसानों की आय बढ़ रही है। जैविक खेती और औषधीय पौधों की खेती भविष्य में राज्य की अर्थव्यवस्था को मजबूत करेगी।