उत्तराखंड की मंदिर वास्तुकला एवं स्थापत्य: कत्यूरी, नागर शैली, पंच केदार एवं पंच बद्री

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उत्तराखंड की मंदिर वास्तुकला एवं स्थापत्य: कत्यूरी, नागर शैली, पंच केदार एवं पंच बद्री - ऑनलाइन प्रैक्टिस क्विज़

उत्तराखंड के प्रसिद्ध मंदिरों की वास्तुकला, कत्यूरी एवं चंद स्थापत्य शैली, नागर शैली के शिखर, केदारनाथ, बद्रीनाथ, जागेश्वर, कटारमल, पंच केदार एवं पंच बद्री पर आधारित संपूर्ण परीक्षोपयोगी अध्ययन सामग्री।

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उत्तराखंड की मंदिर वास्तुकला एवं ऐतिहासिक स्थापत्य परंपरा

देवभूमि उत्तराखंड की पावन धरा अपनी आध्यात्मिक महत्ता के साथ-साथ अद्वितीय एवं भव्य मंदिर वास्तुकला के लिए संपूर्ण विश्व में विख्यात है। हिमालय की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और भूकंपीय संवेदनशीलता के अनुरूप विकसित हुई यह स्थापत्य कला सदियों से भारतीय वास्तुकला का गौरव रही है। राज्य के विभिन्न अंचलों में प्रागैतिहासिक गुहा चित्रों, कत्यूरी कालीन प्रस्तर मंदिरों, चंद व पंवार कालीन राजप्रासादों तथा काठकुणी शैली के आवासीय भवनों का उत्कृष्ट संगम दिखाई देता है। उत्तराखंड के अधिकांश प्राचीन मंदिर शास्त्रीय नागर शैली, हिमाद्री शैली और पैगोडा अथवा छत्र युक्त मंडप शैली में निर्मित हैं। उत्तराखंड लोक सेवा आयोग और उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग की विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में राज्य के ऐतिहासिक मंदिरों की स्थापत्य शैलियों, उनके निर्माताओं, गर्भगृह की संरचना और पंच केदार व पंच बद्री से जुड़े प्रश्न अनिवार्य रूप से पूछे जाते हैं।

कत्यूरी एवं चंद कालीन स्थापत्य कला की विशिष्टताएं

मध्यकालीन उत्तराखंड में कत्यूरी राजवंश का शासनकाल स्थापत्य कला का स्वर्णिम युग माना जाता है। सातवीं से बारहवीं शताब्दी के मध्य कत्यूरी राजाओं ने कुमाऊँ और गढ़वाल में अनेक विशाल देवालयों का निर्माण कराया। कत्यूरी मंदिर स्थापत्य मुख्य रूप से रेखा-देवल नागर शैली पर आधारित है, जिसमें भारी प्रस्तर शिलाओं को बिना चूने-गारे के लोहे की मजबूत सांकलों और डाट प्रणाली से जोड़ा गया है। अल्मोड़ा का प्रसिद्ध जागेश्वर मंदिर समूह, बैजनाथ मंदिर समूह और कटारमल का विशाल सूर्य मंदिर कत्यूरी शिल्प कौशल के अद्वितीय शिखर हैं। कटारमल सूर्य मंदिर जिसे बूटधारी सूर्य प्रतिमा हेतु जाना जाता है, कोणार्क के बाद उत्तर भारत का सबसे महत्वपूर्ण सूर्य मंदिर माना जाता है। इसके पश्चात चंद राजाओं ने बालेश्वर मंदिर (चंपावत) और अल्मोड़ा के नंदा देवी मंदिर में बारीक नक्काशीदार प्रस्तर कला का विकास किया।

पंच केदार एवं पंच बद्री: आध्यात्मिक भूगोल और वास्तुकला

गढ़वाल हिमालय में स्थित पंच केदार भगवान शिव के विविध स्वरूपों की साधना के प्रमुख केंद्र हैं। महाभारत कालीन अनुश्रुतियों के अनुसार पांडवों को दर्शन से बचने हेतु भगवान शिव ने वृषभ (बैल) का रूप धारण किया था, जिनके विभिन्न अंग पांच स्थानों पर प्रकट हुए। केदारनाथ में शिव के पृष्ठ भाग (कूबड़) की पूजा शिला रूप में होती है, जो विशाल पत्थरों से निर्मित भव्य छत्र प्रासाद नागर शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है। द्वितीय केदार तुंगनाथ विश्व का सर्वाधिक ऊंचाई पर स्थित शिव मंदिर है जहां भगवान शिव की भुजाओं की पूजा होती है। तृतीय केदार मध्यमहेश्वर में नाभि, चतुर्थ केदार रुद्रनाथ में मुख तथा पंचम केदार कल्पेश्वर में जटाओं की पूजा होती है। कल्पेश्वर एकमात्र ऐसा केदार है जिसके कपाट वर्ष भर खुले रहते हैं। दूसरी ओर, चमोली जनपद में स्थित पंच बद्री में विशाल बद्री (बद्रीनाथ धाम), योग ध्यान बद्री (पांडुकेश्वर), भविष्य बद्री (सुभाई), वृद्ध बद्री (अणिमठ) तथा आदि बद्री (कर्णप्रयाग मार्ग) सम्मिलित हैं। बद्रीनाथ मंदिर का वर्तमान रंग-बिरंगा सिंहद्वार और शंकुधारी पैगोडा स्वरूप स्थानीय और बौद्ध स्थापत्य का समन्वय दर्शाता है।

अल्मोड़ा का जागेश्वर धाम एवं बैजनाथ मंदिर समूह

कुमाऊँ में जटागंगा के सुरम्य तट पर घने देवदार वनों के मध्य स्थित जागेश्वर धाम को उत्तराखंड का पांचवां धाम भी कहा जाता है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के संरक्षण में यह समूह लगभग एक सौ चौबीस छोटे-बड़े मंदिरों का संकुल है, जिसमें महामृत्युंजय मंदिर सबसे प्राचीन और जागेश्वर मुख्य मंदिर विशालतम है। बागेश्वर में गोमती नदी के तट पर स्थित बैजनाथ मंदिर समूह में मां पार्वती की आदमकद प्रस्तर प्रतिमा और नक्काशीदार शिवलिंग कत्यूरी मूर्तिकला के चरम सौंदर्य को अभिव्यक्त करते हैं।

परीक्षोपयोगी महत्वपूर्ण तथ्य: उत्तराखंड की मंदिर वास्तुकला

  • सर्वाधिक ऊंचाई पर स्थित मंदिर: तृतीय केदार तुंगनाथ (रुद्रप्रयाग) समुद्र तल से लगभग तीन हजार छह सौ अस्सी मीटर की ऊंचाई पर स्थित है।
  • उत्तराखंड का पांचवां धाम: अल्मोड़ा जनपद में स्थित जागेश्वर धाम मंदिर समूह को पांचवें धाम के रूप में मान्यता प्राप्त है।
  • सूर्य मंदिर कटारमल: कत्यूरी शासक कटारमल देव द्वारा निर्मित यह मंदिर कुमाऊँ का सबसे बड़ा सूर्य मंदिर है।
  • वर्ष भर खुले रहने वाला केदार: पंचम केदार कल्पेश्वर (उर्गम घाटी) के कपाट शीतकाल में भी खुले रहते हैं।
  • बालेश्वर मंदिर की शैली: चंपावत स्थित चंद कालीन बालेश्वर मंदिर पंचायतन एवं उत्कृष्ट प्रस्तर नक्काशी शैली का प्रतीक है।
  • बद्रीनाथ धाम के मुख्य पुजारी: केरल के नंबूदरीपाद ब्राह्मण होते हैं जिन्हें आदरपूर्वक रावल कहा जाता है।

पंच केदार एवं पंच बद्री की भौगोलिक एवं स्थापत्य अवस्थिति

तीर्थ / मंदिर का नामअवस्थिति / जनपदपूजित स्वरूप / स्थापत्य शैली
केदारनाथ धाम (प्रथम केदार)रुद्रप्रयाग जनपद (मंदाकिनी तट)शिव के पृष्ठ भाग (कूबड़) की शिला पूजा, छत्र-प्रासाद नागर शैली।
मध्यमहेश्वर (द्वितीय केदार)रुद्रप्रयाग जनपद (चौखंबा तलहटी)शिव की नाभि की पूजा, मध्यकालीन नागर रेखा-देवल शैली।
तुंगनाथ (तृतीय केदार)रुद्रप्रयाग जनपद (चंद्रशिला पर्वत)शिव की भुजाओं की पूजा, पत्थरों से निर्मित नागर देवल शिखर।
रुद्रनाथ (चतुर्थ केदार)चमोली जनपद (गोपेश्वर वन क्षेत्र)शिव के नील-लोहित मुख (चेहरे) की पूजा, प्राकृतिक गुफा मंदिर।
कल्पेश्वर (पंचम केदार)चमोली जनपद (उर्गम घाटी)शिव की जटाओं (केश) की पूजा, प्राकृतिक चट्टानी गुहा मंदिर।
बद्रीनाथ (विशाल बद्री)चमोली जनपद (अलकनंदा तट)भगवान विष्णु की पद्मासन पद्मासन मुद्रा, पैगोडा एवं शंकुधारी शैली।
आदि बद्री मंदिर समूहचमोली जनपद (कर्णप्रयाग मार्ग)सोलह मंदिरों का समूह (वर्तमान में चौदह), गुप्त एवं कत्यूरी नागर शैली।