उत्तराखंड में चिपको आंदोलन एवं प्रमुख वन संरक्षण आंदोलन
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उत्तराखंड में चिपको आंदोलन की पृष्ठभूमि, रेणी गांव की ऐतिहासिक घटना, गौरा देवी, सुंदरलाल बहुगुणा, चंडी प्रसाद भट्ट और अन्य वन सत्याग्रहों का संपूर्ण अध्ययन।
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💡 व्याख्या
चिपको आंदोलन एवं उत्तराखंड के वन संरक्षण आंदोलन: ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
उत्तराखंड का इतिहास प्राकृतिक संसाधनों, विशेष रूप से वनों के संरक्षण हेतु किए गए जनसंघर्षों से भरा पड़ा है। औपनिवेशिक काल में ब्रिटिश सरकार द्वारा वन अधिनियमों के माध्यम से स्थानीय ग्रामीणों के पारंपरिक वनाधिकार छीन लिए गए थे। इसके विरोध में कुमाऊँ और गढ़वाल में व्यापक असंतोष पनपा, जो समय-समय पर वन आंदोलनों के रूप में प्रस्फुटित हुआ। स्वतंत्रता के पश्चात भी जब वाणिज्यिक ठेकेदारों द्वारा हिमालयी संवेदनशील जंगलों का अंधाधुंध कटान जारी रहा, तब पर्वतीय जनता ने अपने पर्यावरण, जीवन और संस्कृति की रक्षा हेतु विश्व विख्यात चिपको आंदोलन की अलख जगाई।
चिपको आंदोलन का उद्भव, प्रमुख केंद्र एवं रेणी गांव की क्रांति
चिपको आंदोलन की व्यावहारिक शुरुआत वर्ष उन्नीस सौ तिहत्तर में चमोली जिले के गोपेश्वर और मंडल वनों से हुई थी। दशोली ग्राम स्वराज्य मंडल के प्रणेता चंडी प्रसाद भट्ट ने ग्रामीणों को संगठित कर पेड़ों से लिपटकर उन्हें कटने से बचाने का अहिंसक मार्ग दिखाया। इस आंदोलन का सबसे ऐतिहासिक मोड़ छब्बीस मार्च उन्नीस सौ चौहत्तर को चमोली जनपद की नीति घाटी में स्थित रेणी गांव में आया। जब पुरुष मुआवजे की वार्ता हेतु जिला मुख्यालय गए हुए थे, तब ठेकेदार के सशस्त्र कुल्हाड़ीधारी मजदूरों को देखकर गौरा देवी के नेतृत्व में गांव की सत्ताईस महिलाओं ने अपनी जान की परवाह किए बिना पेड़ों को अपनी बांहों में घेर लिया और कहा कि जंगल हमारा मायका है, इसे काटने से पहले हमारे सिर काटो। इस अप्रतिम साहस के आगे ठेकेदार और प्रशासन को नतमस्तक होना पड़ा।
चिपको एवं वन आंदोलनों के प्रमुख परीक्षोपयोगी तथ्य
चिपको आंदोलन को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने का श्रेय गांधीवादी पर्यावरणविद् सुंदरलाल बहुगुणा को जाता है, जिन्होंने कश्मीर से कोहिमा तक लगभग पांच हज़ार किलोमीटर की पदयात्रा कर हिमालय बचाओ देश बचाओ का अमर नारा दिया। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इस आंदोलन से प्रभावित होकर हिमालयी क्षेत्रों में एक हज़ार मीटर से अधिक ऊंचाई पर हरे पेड़ों के व्यावसायिक कटान पर पंद्रह वर्षों का ऐतिहासिक प्रतिबंध लगाया था। वर्ष उन्नीस सौ बयासी में चंडी प्रसाद भट्ट को रेमन मैग्सेसे पुरस्कार तथा वर्ष उन्नीस सौ छियासी में गौरा देवी को प्रथम वृक्ष मित्र पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
कुमाऊँ व गढ़वाल के ऐतिहासिक वन सत्याग्रह एवं प्रभाव
उत्तराखंड में वन चेतना का इतिहास अत्यंत प्राचीन है। वर्ष उन्नीस सौ इक्कीस में कुली बेगार प्रथा के अंत के साथ ही कुमाऊँ में वन पंचायतों के गठन की मांग उठी, जिसके परिणामस्वरूप वर्ष उन्नीस सौ इकतीस में ऐतिहासिक वन पंचायत अधिनियम पारित हुआ। तीस मई उन्नीस सौ तीस को टिहरी रियासत में जंगलों के कठोर कानूनों के विरोध में तिलाड़ी में एकत्र निहत्थी जनता पर राजा की सेना ने अंधाधुंध गोलियां चलाईं, जिसे तिलाड़ी नरसंहार अथवा रवांई कांड कहा जाता है। चिपको आंदोलन की सफलता ने आगे चलकर डूंगी-पैंतोली आंदोलन, मैती आंदोलन, रक्षा सूत्र आंदोलन और झपटो-छीनो आंदोलन जैसे कई पर्यावरण संरक्षण अभियानों को जन्म दिया।
| आंदोलन / घटना | स्थान, वर्ष एवं प्रमुख प्रणेता |
|---|---|
| चिपको आंदोलन की प्रथम गूंज | गोपेश्वर मंडल वन, उन्नीस सौ तिहत्तर, चंडी प्रसाद भट्ट |
| रेणी गांव चिपको महाक्रांति | रेणी गांव चमोली, छब्बीस मार्च उन्नीस सौ चौहत्तर, गौरा देवी |
| हिमालय बचाओ पदयात्रा | कश्मीर से कोहिमा, उन्नीस सौ इक्यासी से तिरासी, सुंदरलाल बहुगुणा |
| तिलाड़ी नरसंहार (रवांई कांड) | यमुना तट तिलाड़ी, तीस मई उन्नीस सौ तीस, चक्रधर जुयाल |
| वन पंचायत नियमावली लागू | संपूर्ण उत्तराखंड पर्वतीय क्षेत्र, वर्ष उन्नीस सौ इकतीस |
| डूंगी-पैंतोली बांज वन आंदोलन | चमोली जनपद, वर्ष उन्नीस सौ अस्सी, स्थानीय महिलाएं |
| मैती पर्यावरण आंदोलन | ग्वालदम चमोली, वर्ष उन्नीस सौ छियानवे, कल्याण सिंह रावत |
| रक्षा सूत्र आंदोलन | भिलंगना घाटी टिहरी, वर्ष उन्नीस सौ चौरानवे, सुरेश भाई |
| झपटो-छीनो वन अधिकार आंदोलन | लाता गांव चमोली, वर्ष उन्नीस सौ अट्ठानवे, स्थानीय ग्रामीण |