उत्तराखंड की संस्कृति, त्योहार और मेले

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उत्तराखंड की संस्कृति, त्योहार और मेले - ऑनलाइन प्रैक्टिस क्विज़

उत्तराखंड की संस्कृति, कुमाऊँनी और गढ़वाली संस्कृति, नंदा देवी राजजात, हरेला, फूलदेई, इगास-बग्वाल, घी संक्रांति, खतड़वा, उत्तरायणी, कुमाऊँनी होली, जागर परंपरा और प्रमुख मेलों की जानकारी।

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प्रश्न 1

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💡 व्याख्या

उत्तराखंड की संस्कृति का परिचय

उत्तराखंड की संस्कृति देवभूमि की संस्कृति है जो हिमालय की गोद में पली-बढ़ी है। उत्तराखंड में कुमाऊँनी और गढ़वाली दो प्रमुख संस्कृतियाँ हैं। कुमाऊँनी संस्कृति कुमाऊँ मंडल में और गढ़वाली संस्कृति गढ़वाल मंडल में प्रचलित है। उत्तराखंड की संस्कृति में लोकगीत, लोकनृत्य, लोककला, त्योहार और मेले महत्वपूर्ण हैं। उत्तराखंड के लोकगीतों में न्यौली, छपेली और छोलिया प्रसिद्ध हैं। लोकनृत्यों में छोलिया, झोड़ा, चांचरी और थड़िया प्रसिद्ध हैं। उत्तराखंड की संस्कृति में प्रकृति और देवताओं का विशेष महत्व है। यहाँ हर गांव में देवी-देवताओं के मंदिर हैं।

परीक्षोपयोगी महत्वपूर्ण तथ्य:
• उत्तराखंड की दो मुख्य संस्कृतियाँ कुमाऊँनी और गढ़वाली हैं।
• नंदा देवी राजजात यात्रा हर 12 साल में होती है जो 280 किमी लंबी है।
• हरेला सावन के पहले दिन मनाया जाता है जो पर्यावरण पर्व है।
• फूलदेई चैत्र माह में बच्चों द्वारा मनाया जाने वाला फूलों का त्योहार है।
• इगास-बग्वाल दिवाली के 11 दिन बाद मनाई जाती है जिसे बूढ़ी दिवाली भी कहते हैं।
• घी संक्रांति भादो माह में मनाई जाती है।
• खतड़वा आश्विन माह में पशुओं के लिए मनाया जाता है।
• उत्तरायणी मकर संक्रांति पर बागेश्वर में मनाई जाती है।
• कुमाऊँनी होली बैठकी, खड़ी और महिला होली के रूप में मनाई जाती है।
• जागर परंपरा देवताओं को जगाने की परंपरा है।

प्रमुख त्योहार

नंदा देवी राजजात यात्रा उत्तराखंड का सबसे बड़ा धार्मिक आयोजन है जो हर 12 साल में होती है। यह यात्रा नंदा देवी को ससुराल भेजने की परंपरा है। यात्रा कुरुड़ से शुरू होकर होमकुंड तक 280 किलोमीटर की दूरी तय करती है। यात्रा में चौसिंग्या खाडू यानी चार सींग वाला भेड़ मुख्य भूमिका में होता है। हरेला सावन के पहले दिन मनाया जाता है जिसमें धान, गेहूं, मक्का और उड़द के बीज बोए जाते हैं। हरेला पर्यावरण संरक्षण का पर्व है। फूलदेई चैत्र माह के पहले दिन मनाया जाता है जिसमें बच्चे फूल लेकर घर-घर जाते हैं और फूलदेई गीत गाते हैं।

इगास-बग्वाल, घी संक्रांति और खतड़वा

इगास-बग्वाल दिवाली के 11 दिन बाद कार्तिक शुक्ल एकादशी को मनाई जाती है। इसे बूढ़ी दिवाली भी कहा जाता है। इगास में भैला खेला जाता है जिसमें रस्सी से आग घुमाई जाती है। घी संक्रांति भादो माह की पहली गते को मनाई जाती है जिसमें घी खाना अनिवार्य माना जाता है। घी संक्रांति को घ्यूं त्यार भी कहा जाता है। खतड़वा आश्विन माह में मनाया जाता है जिसमें पशुओं की रक्षा के लिए आग जलाई जाती है और ककड़ी खिलाई जाती है। खतड़वा पशुपालकों का त्योहार है। उत्तरायणी मकर संक्रांति पर बागेश्वर में सरयू और गोमती के संगम पर मनाई जाती है जहाँ बड़ा मेला लगता है।

कुमाऊँनी होली और जागर परंपरा

कुमाऊँनी होली तीन प्रकार की होती है बैठकी होली, खड़ी होली और महिला होली। बैठकी होली मंदिरों में बैठकर गाई जाती है। खड़ी होली खड़े होकर गाई जाती है जिसमें ढोल और मंजीरा बजता है। महिला होली महिलाओं द्वारा मनाई जाती है। कुमाऊँनी होली में शास्त्रीय रागों का प्रयोग होता है। जागर परंपरा देवताओं को जगाने की परंपरा है जिसमें जागरिया गीत गाकर देवताओं का आह्वान करता है। जागर में हुड़का और थाली बजाई जाती है। जागर परंपरा में पांडव नृत्य और देवी जागर प्रसिद्ध हैं। जागर को यूनेस्को ने सांस्कृतिक धरोहर की सूची में शामिल करने की प्रक्रिया में है।

देवधाम एवं स्थानीय मेले

उत्तराखंड में मेले संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। प्रमुख मेलों में नंदा देवी मेला अल्मोड़ा और नैनीताल में, उत्तरायणी मेला बागेश्वर में, जागेश्वर मेला अल्मोड़ा में, पूर्णागिरि मेला चंपावत में, पिरान कलियर मेला रुड़की में और नानकमत्ता मेला उधमसिंह नगर में प्रसिद्ध हैं। नंदा देवी मेला सितंबर में मनाया जाता है। उत्तरायणी मेला मकर संक्रांति पर मनाया जाता है। जागेश्वर मेले में शिवरात्रि पर बड़ा आयोजन होता है। पूर्णागिरि मेला चैत्र नवरात्रि में होता है। पिरान कलियर उर्स मुस्लिम समुदाय का प्रसिद्ध मेला है। स्थानीय मेले गांवों की संस्कृति को दर्शाते हैं और लोगों को एकजुट करते हैं।

महत्वपूर्ण तथ्य / विषयविवरण
नंदा देवी राजजातहर 12 साल में, 280 किमी, कुरुड़ से होमकुंड, चौसिंग्या खाडू
हरेलासावन पहला दिन, पर्यावरण पर्व, धान गेहूं मक्का उड़द बीज बोना
फूलदेईचैत्र पहला दिन, बच्चों का त्योहार, फूलों का त्योहार
इगास-बग्वालदिवाली के 11 दिन बाद, बूढ़ी दिवाली, भैला खेलना
घी संक्रांतिभादो पहला दिन, घ्यूं त्यार, घी खाना अनिवार्य
खतड़वाआश्विन माह, पशु रक्षा त्योहार, आग जलाना
उत्तरायणीमकर संक्रांति, बागेश्वर, सरयू गोमती संगम, बड़ा मेला
कुमाऊँनी होलीबैठकी, खड़ी, महिला होली, शास्त्रीय राग
जागर परंपरादेवताओं को जगाना, हुड़का थाली, जागरिया, पांडव नृत्य
प्रमुख मेलेनंदा देवी, उत्तरायणी, जागेश्वर, पूर्णागिरि, पिरान कलियर

उत्तराखंड की संस्कृति कुमाऊँनी और गढ़वाली परंपराओं का संगम है। नंदा देवी राजजात सबसे बड़ी यात्रा है जो 12 साल में होती है। हरेला पर्यावरण पर्व है, फूलदेई फूलों का त्योहार है, इगास बूढ़ी दिवाली है। घी संक्रांति, खतड़वा और उत्तरायणी महत्वपूर्ण त्योहार हैं। कुमाऊँनी होली शास्त्रीय रागों पर आधारित है। जागर परंपरा देवताओं को जगाने की अनूठी परंपरा है। उत्तराखंड के मेले संस्कृति और एकता के प्रतीक हैं। लोकगीत, लोकनृत्य और लोककला उत्तराखंड की पहचान हैं। संस्कृति संरक्षण राज्य सरकार की प्राथमिकता है।