उत्तराखंड का पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी: हिमालयी जैव विविधता, प्रमुख जन आंदोलन, जल एवं वन संरक्षण
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उत्तराखंड के समृद्ध पर्यावरण, हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र, जैव विविधता हॉटस्पॉट, चिपको एवं मैती जैसे ऐतिहासिक पर्यावरण आंदोलनों, ग्लेशियर संरक्षण और नदी तंत्र पर आधारित प्रामाणिक अध्ययन सामग्री।
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💡 व्याख्या
उत्तराखंड की हिमालयी पारिस्थितिकी एवं जैव विविधता का वैश्विक महत्व
देवभूमि उत्तराखंड भौगोलिक और पर्यावरणीय दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील एवं महत्वपूर्ण राज्य है। हिमालयी पर्वत शृंखलाओं की गोद में बसा यह राज्य वैश्विक स्तर पर मान्य हिमालयी जैव विविधता हॉटस्पॉट का एक अभिन्न अंग है। यहाँ उपोष्णकटिबंधीय तराई मैदानों से लेकर अल्पाइन बुग्यालों और हिमाच्छादित शिखरों तक विविध प्रकार के पारिस्थितिक तंत्र पाए जाते हैं। राज्य के वनाच्छादित क्षेत्र गंगा और यमुना जैसी जीवनदायिनी राष्ट्रीय नदियों के जलग्रहण का मुख्य आधार हैं। उत्तराखंड में लगभग पैंतालीस प्रतिशत से अधिक भूभाग पर वन आच्छादन पाया जाता है, जो देश के कार्बन सिंक और जलवायु संतुलन में अमूल्य योगदान देता है। उत्तराखंड लोक सेवा आयोग और उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग की विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में राज्य के वन प्रकारों, पर्यावरणीय आंदोलनों, जल संरक्षण नीतियों, हिमनदों की सुरक्षा और संवेदनशील क्षेत्रों से संबंधित प्रश्न अनिवार्य रूप से पूछे जाते हैं।
ऐतिहासिक वन संरक्षण आंदोलन एवं जनचेतना की अनूठी विरासत
पर्यावरण और वनों की रक्षा के लिए जनसहभागिता का जैसा उदाहरण उत्तराखंड ने प्रस्तुत किया है, वैसा संपूर्ण विश्व में दुर्लभ है। वर्ष उन्नीस सौ चौहत्तर में चमोली जनपद के रैणी गांव से प्रारंभ हुआ चिपको आंदोलन वैश्विक स्तर पर पर्यावरण संरक्षण का पर्याय बना। गौरा देवी के नेतृत्व में स्थानीय महिलाओं ने पेड़ों से चिपक कर उन्हें कुल्हाड़ियों से कटने से बचाया था। इस अहिंसक आंदोलन को चंडी प्रसाद भट्ट और सुंदरलाल बहुगुणा ने दार्शनिक ऊंचाई प्रदान की। इसके उपरांत वर्ष उन्नीस सौ चौरानवे में कल्याण सिंह रावत द्वारा प्रारंभ किया गया मैती आंदोलन एक अद्वितीय भावनात्मक पहल साबित हुआ, जिसमें विवाह के पावन अवसर पर वर-वधू द्वारा एक फलदार पौधा रोपने की सुंदर परंपरा स्थापित की गई। इसके अतिरिक्त रक्षा सूत्र आंदोलन, दूधातोली लोक विकास संस्थान के माध्यम से पानी राखो आंदोलन तथा नदी बचाओ अभियानों ने स्थानीय समुदायों को जल, जंगल और जमीन के सतत प्रबंधन से जोड़ा।
ग्लेशियर, जल संरक्षण एवं जलवायु परिवर्तन की चुनौतियां
उत्तराखंड के गंगोत्री, यमुनोत्री, पिंडारी, मिलम और चौराबाड़ी जैसे विशाल हिमनद उत्तर भारत के करोड़ों लोगों की जल सुरक्षा का प्राथमिक आधार हैं। वर्तमान में वैश्विक तापमान में वृद्धि और जलवायु परिवर्तन के कारण इन ग्लेशियरों के पीछे हटने की दर तीव्र हुई है, जिससे उच्च हिमालयी क्षेत्रों में हिमानी झीलों के टूटने और अचानक आने वाली बाढ़ का खतरा बढ़ गया है। इसके समाधान हेतु राज्य में पारंपरिक जल स्रोतों जैसे नौलों, धारों, चाल-खाल और गूलों के पुनर्जीवन पर विशेष बल दिया जा रहा है। साथ ही भागीरथी इको-सेंसिटिव जोन और नंदा देवी बायोस्फीयर रिजर्व जैसे क्षेत्रों में अनियंत्रित निर्माण कार्यों और प्लास्टिक प्रदूषण पर कठोर प्रतिबंध लगाकर नाजुक हिमालयी ढलानों को भूस्खलन और मानव-वन्यजीव संघर्ष से बचाने का निरंतर प्रयास किया जा रहा है।
परीक्षोपयोगी महत्वपूर्ण तथ्य: पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी
- चिपको आंदोलन की प्रणेता: गौरा देवी के नेतृत्व में वर्ष उन्नीस सौ चौहत्तर में चमोली के रैणी गांव से प्रारंभ हुआ।
- मैती आंदोलन के जनक: वर्ष उन्नीस सौ चौरानवे में चमोली के ग्वालदम में शिक्षक कल्याण सिंह रावत द्वारा स्थापित किया गया।
- पानी राखो आंदोलन: पौड़ी गढ़वाल के उफरैंखाल क्षेत्र में सच्चिदानंद भारती द्वारा जल संरक्षण हेतु संचालित किया गया।
- चिपको नारा: क्या हैं जंगल के उपकार, मिट्टी, पानी और बयार, जिंदा रहने के अधिकार—सुंदरलाल बहुगुणा द्वारा प्रचारित।
- राज्य का सबसे बड़ा ग्लेशियर: उत्तरकाशी जनपद में स्थित गंगोत्री हिमनद राज्य का सबसे विशाल ग्लेशियर है।
- पहला पर्यावरण अनुकूल गांव: दूधातोली क्षेत्र का उफरैंखाल गांव जल और वन संवर्धन का आदर्श मॉडल बना।
उत्तराखंड के प्रमुख पर्यावरणीय आंदोलन एवं संस्थापक व्यक्तित्व
| आंदोलन / पर्यावरणीय पहल | वर्ष एवं प्रमुख केंद्र | मुख्य नेतृत्वकर्ता एवं उद्देश्य |
|---|---|---|
| चिपको आंदोलन | उन्नीस सौ चौहत्तर (रैणी गांव, चमोली) | गौरा देवी, चंडी प्रसाद भट्ट, सुंदरलाल बहुगुणा (अंगू वृक्षों की रक्षा एवं वन अधिकार) |
| मैती आंदोलन | उन्नीस सौ चौरानवे (ग्वालदम, चमोली) | कल्याण सिंह रावत (विवाह के अवसर पर भावनात्मक वृक्षारोपण एवं कन्या कल्याण) |
| पानी राखो आंदोलन | उन्नीस सौ अस्सी के दशक (उफरैंखाल, पौड़ी) | सच्चिदानंद भारती (सूखे पहाड़ों पर चाल-खाल निर्माण एवं जल संरक्षण) |
| रक्षा सूत्र आंदोलन | उन्नीस सौ चौरासी (भिलंगना घाटी, टिहरी) | सुरेश भाई एवं स्थानीय महिलाएं (हरे पेड़ों पर रक्षा सूत्र बांधकर कटान विरोध) |
| झपटो-छीनो आंदोलन | उन्नीस सौ अट्ठानवे (लता गांव, चमोली) | स्थानीय सीमांत ग्रामीण (नंदा देवी राष्ट्रीय उद्यान में पारंपरिक अधिकारों की मांग) |
| नदी बचाओ आंदोलन | दो हजार आठ (टिहरी एवं उत्तरकाशी) | सुरेश भाई एवं पर्यावरणविद (अविरल और निर्मल गंगा हेतु बड़े बांधों का विरोध) |