उत्तराखंड की भाषा एवं साहित्य: गढ़वाली, कुमाऊँनी, जौनसारी बोलियाँ, लोक साहित्य एवं प्रमुख साहित्यकार

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उत्तराखंड की भाषा एवं साहित्य: गढ़वाली, कुमाऊँनी, जौनसारी बोलियाँ, लोक साहित्य एवं प्रमुख साहित्यकार - ऑनलाइन प्रैक्टिस क्विज़

उत्तराखंड की प्रमुख भाषाओं, क्षेत्रीय बोलियों, समृद्ध लोक साहित्य तथा सुमित्रानंदन पंत, शैलेश मटियानी, मंगलेश डबराल, गिरदा जैसे मूर्धन्य साहित्यकारों पर आधारित संपूर्ण परीक्षोपयोगी अध्ययन सामग्री।

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प्रश्न 1

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💡 व्याख्या

उत्तराखंड की भाषायी संरचना एवं साहित्यिक परंपरा: एक विहंगम दृष्टि

देवभूमि उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान में यहां की समृद्ध भाषायी विविधता और उत्कृष्ट साहित्यिक धरोहर का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। हिमालय की सुरम्य उपत्यकाओं में विकसित हुई मध्य पहाड़ी भाषा समूह की गढ़वाली और कुमाऊँनी भाषाएं वैदिक संस्कृत, प्राकृत और शौरसेनी अपभ्रंश की गौरवमयी विकास यात्रा को दर्शाती हैं। इसके साथ ही सीमांत जनपदों में प्रचलित जौनसारी, रवांल्टी, जौनपुरी तथा तिब्बती-बर्मी भाषा परिवार से जुड़ी भोटिया उपबोलियां राज्य की भाषायी संपदा को बहुरंगी आयाम प्रदान करती हैं। उत्तराखंड के साहित्यकारों ने न केवल अपनी मातृभाषाओं में विपुल लोक साहित्य, गाथाओं और कविताओं की रचना की, अपितु राष्ट्रीय स्तर पर आधुनिक हिंदी साहित्य के विकास में भी युगांतरकारी भूमिका निभाई है। उत्तराखंड लोक सेवा आयोग और उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग की विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में राज्य की बोलियों, क्षेत्रीय शब्दावली तथा मूर्धन्य साहित्यकारों से संबंधित तथ्य अनिवार्य रूप से पूछे जाते हैं।

गढ़वाली एवं कुमाऊँनी बोलियों का वर्गीकरण एवं क्षेत्र विस्तार

भाषा वैज्ञानिक जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन ने अपने प्रसिद्ध भाषायी सर्वेक्षण में पहाड़ी भाषा समूह को पश्चिमी, मध्य और पूर्वी पहाड़ी में विभाजित किया था, जिसके अंतर्गत गढ़वाली और कुमाऊँनी को मध्य पहाड़ी भाषा के रूप में मान्यता मिली। गढ़वाली भाषा के अंतर्गत श्रीनगरिया, नागपुरिया, सलाणी, रांठी, बधाणी, गंगपरिया और मांझ-कुमैया जैसी विशिष्ट उपबोलियां पाई जाती हैं, जिनमें ऐतिहासिक रूप से पंवार राजवंश की राजभाषा रही श्रीनगरिया को मानक गढ़वाली का दर्जा प्राप्त है। दूसरी ओर, कुमाऊँनी भाषा के प्रमुख उपभेदों में खसपर्जिया, पछाईं, कुमैया, फलदाकोटिया, चौगर्ख्या, गंगोली, दानपुरिया, सीराली और सोरियाली सम्मिलित हैं। अल्मोड़ा के आसपास बोली जाने वाली खसपर्जिया को मानक कुमाऊँनी माना जाता है। देहरादून के पर्वतीय क्षेत्र में पश्चिमी पहाड़ी की जौनसारी और उत्तरकाशी की यमुना घाटी में रवांल्टी बोली बोली जाती है, जो अपनी अनूठी व्याकरणिक संरचना के लिए विख्यात हैं।

उत्तराखंड के मूर्धन्य साहित्यकार एवं हिंदी साहित्य को अवदान

उत्तराखंड की माटी ने हिंदी साहित्य को ऐसे अमर हस्ताक्षर दिए हैं जिन्होंने छायावाद, प्रगतिवाद, नई कविता और आंचलिक कथा साहित्य को समृद्ध किया। कौसानी में जन्मे सुमित्रानंदन पंत को प्रकृति के सुकुमार कवि के रूप में जाना जाता है। वे हिंदी साहित्य के प्रथम साहित्यकार थे जिन्हें वर्ष उन्नीस सौ अड़सठ में उनकी कालजयी कृति चिदंबरा के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार से अलंकृत किया गया। अल्मोड़ा के बाड़ेछीना में जन्मे शैलेश मटियानी ने आंचलिक कथा साहित्य में बोरीवली से बोरीबंदर तक और कबूतरखाना जैसे उपन्यासों के माध्यम से हाशिए के समाज और पर्वतीय पीड़ा को सशक्त वाणी दी। टिहरी के काफलपानी में जन्मे मंगलेश डबराल को उनके काव्य संग्रह हम जो देखते हैं के लिए वर्ष दो हजार में साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुआ। जनकवि गिरीश तिवारी गिरदा ने कुमाऊँ के जनआंदोलनों, चिपको और नशा नहीं रोजगार दो अभियानों में अपनी जनकविताओं और नगाड़ों के माध्यम से जनचेतना की अलख जगाई।

लोक साहित्य, पवाड़े एवं जागर गाथा परंपरा

लिखित साहित्य से भी अधिक समृद्ध उत्तराखंड का वाचिक लोक साहित्य है। सदियों से बिना लिपिबद्ध हुए भी यह लोक चेतना में जीवित रहा है। इसमें ऐतिहासिक शूरवीरों के शौर्य पर आधारित पवाड़े, प्रेम और संघर्ष की अमर गाथा राजुला-मालूशाही, जीतू बगड़वाल, तीलू रौतेली तथा माधो सिंह भंडारी की वीरगाथाएं प्रमुख हैं। जागर साहित्य में स्थानीय देवताओं की उत्पत्ति, ब्रह्मांड रचना और न्याय के विधान को डौंर-थाली और हुड़के की थाप पर काव्यात्मक रूप में प्रस्तुत किया जाता है। आधुनिक काल में मौलाराम तोमर, गुमानी पंत, लीलाधर जगूड़ी, वीरेन डंगवाल, तारादत्त गैरोला, भजन सिंह सिंह और विद्यासागर नौटियाल जैसे रचनाकारों ने उत्तराखंडी अस्मिता को राष्ट्रीय पटल पर स्थापित किया है।

परीक्षोपयोगी महत्वपूर्ण तथ्य: भाषा, साहित्य एवं पुरस्कार

  • हिंदी का पहला ज्ञानपीठ पुरस्कार: वर्ष उन्नीस सौ अड़सठ में सुमित्रानंदन पंत को उनकी प्रसिद्ध काव्य कृति चिदंबरा के लिए प्रदान किया गया।
  • कुमाऊँनी के आदि कवि: पंडित गुमानी पंत (लोक रत्न गुमानी) को कुमाऊँनी और संस्कृत के पहले लोक कवि का गौरव प्राप्त है।
  • गढ़वाली का पहला नाटक: पंडित भवानी दत्त थपलियाल द्वारा रचित प्रह्लाद को गढ़वाली भाषा का प्रथम मौलिक नाटक माना जाता है।
  • साहित्य अकादमी पुरस्कार: मंगलेश डबराल (हम जो देखते हैं), वीरेन डंगवाल (दुश्चक्र में सृष्टा) तथा लीलाधर जगूड़ी (अनुभव के आकाश में चांद) को इस प्रतिष्ठित पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
  • व्यास सम्मान: लीलाधर जगूड़ी को उनके प्रसिद्ध काव्य संग्रह जितने लोग उतने प्रेम के लिए वर्ष दो हजार अठारह में व्यास सम्मान प्रदान किया गया।
  • कुमाऊँनी बोली का मानकीकरण: अल्मोड़ा जनपद के मध्य भाग में बोली जाने वाली खसपर्जिया बोली को मानक साहित्यिक कुमाऊँनी स्वीकार किया जाता है।

प्रमुख साहित्यकार, जन्मस्थान एवं उनकी अमर साहित्यिक कृतियाँ

साहित्यकार का नामजन्मस्थान / जनपदप्रमुख कृतियां एवं विधा
सुमित्रानंदन पंतकौसानी (बागेश्वर)चिदंबरा, लोकायतन, पल्लव, वीणा, गुंजन, ग्राम्या (छायावादी काव्य)
शैलेश मटियानीबाड़ेछीना (अल्मोड़ा)बोरीवली से बोरीबंदर तक, कबूतरखाना, मुठभेड, चील (आंचलिक कथा साहित्य)
मंगलेश डबरालकाफलपानी (टिहरी गढ़वाल)पहाड़ पर लालटेन, घर का रास्ता, हम जो देखते हैं, आवाज भी एक जगह है
वीरेन डंगवालकीर्तिनगर (टिहरी गढ़वाल)इसी दुनिया में, दुश्चक्र में सृष्टा, कवि ने कहा (समकालीन हिंदी कविता)
लीलाधर जगूड़ीधंगण गांव (टिहरी गढ़वाल)नाटक जारी है, रात अब भी मौजूद है, जितने लोग उतने प्रेम
गिरीश तिवारी गिरदाहवालबाग (अल्मोड़ा)शिखरों के स्वर, हमारी कविता के आखर, नगाड़े खामोश हैं (जनकविता एवं नाटक)
गोविंद वल्लभ पंतरानीखेत (अल्मोड़ा)वरमाला, राजमुकुट, अंतःपुर का छिद्र, कोहिनूर का लुटेरा (ऐतिहासिक नाटक)
विद्यासागर नौटियालमालीदेवल (टिहरी गढ़वाल)टिहरी की कहानियां, भैंस का कटिया, भीम अकेला, सूरज सती (प्रगतिशील कथा)