उत्तराखंड का आधुनिक इतिहास - ब्रिटिश शासन एवं सामाजिक आंदोलन
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उत्तराखंड में ब्रिटिश शासन, कुमाऊँ कमिश्नरी, गढ़वाल प्रशासन, वन कानून, कुली बेगार प्रथा, टिहरी रियासत तथा आधुनिक काल के सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तनों की विस्तृत जानकारी।
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💡 व्याख्या
उत्तराखंड में ब्रिटिश शासन का प्रारंभ
सन 1815 में गोरखों की पराजय के बाद उत्तराखंड में ब्रिटिश शासन की स्थापना हुई। अंग्रेजों ने कुमाऊँ एवं गढ़वाल क्षेत्रों को अपने साम्राज्य में मिला लिया तथा यहाँ नई प्रशासनिक व्यवस्था लागू की। ब्रिटिश शासन काल में उत्तराखंड में अनेक प्रशासनिक, आर्थिक एवं सामाजिक परिवर्तन हुए जिन्होंने क्षेत्र के भविष्य को नया आकार दिया। इस काल में वन कानून, भूमि व्यवस्था एवं कर प्रणाली में महत्वपूर्ण बदलाव किए गए जिनका जनजीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा।
महत्वपूर्ण तथ्य: सन 1815 में सुगौली संधि के बाद उत्तराखंड ब्रिटिश साम्राज्य में शामिल हुआ। सन 1816 में कुमाऊँ को कमिश्नरी का दर्जा दिया गया तथा गढ़वाल को अलग प्रशासनिक इकाई बनाया गया। सन 1849 में टिहरी रियासत की स्थापना हुई। सन 1921 में कुली बेगार प्रथा के विरुद्ध आंदोलन हुआ।
कुमाऊँ कमिश्नरी का गठन
सन 1816 में अंग्रेजों ने कुमाऊँ को कमिश्नरी का दर्जा दिया तथा इसका मुख्यालय अल्मोड़ा में स्थापित किया। कुमाऊँ कमिश्नरी के अंतर्गत अल्मोड़ा, नैनीताल, पिथौरागढ़ एवं चंपावत क्षेत्र शामिल थे। ब्रिटिश प्रशासन ने कुमाऊँ में नई राजस्व व्यवस्था लागू की तथा भूमि कर की दरें निर्धारित कीं। इस व्यवस्था से क्षेत्र में प्रशासनिक स्थिरता आई तथा अंग्रेजों को इस क्षेत्र पर अपना नियंत्रण सुदृढ़ करने में सहायता मिली। कुमाऊँ कमिश्नरी ब्रिटिश काल में उत्तराखंड के प्रशासन का प्रमुख केंद्र बना रहा।
गढ़वाल का ब्रिटिश प्रशासन
गढ़वाल क्षेत्र को अंग्रेजों ने दो भागों में विभाजित किया। पूर्वी गढ़वाल को ब्रिटिश साम्राज्य में शामिल किया गया तथा पश्चिमी गढ़वाल को टिहरी रियासत के अंतर्गत रखा गया। ब्रिटिश गढ़वाल का प्रशासन पौड़ी एवं श्रीनगर से संचालित होता था। अंग्रेजों ने गढ़वाल में भी नई राजस्व व्यवस्था लागू की तथा वन संपदा का व्यापक दोहन प्रारंभ किया। इस काल में गढ़वाल में सड़कों एवं संचार साधनों का विकास हुआ जिससे क्षेत्र में आवागमन सुगम हुआ।
ब्रिटिशकालीन प्रशासनिक परिवर्तन
ब्रिटिश शासन काल में उत्तराखंड में अनेक प्रशासनिक परिवर्तन हुए। अंग्रेजों ने क्षेत्र को विभिन्न जिलों एवं परगनों में विभाजित किया तथा प्रत्येक इकाई के लिए अलग प्रशासनिक अधिकारी नियुक्त किए। उन्होंने न्याय व्यवस्था को संगठित किया तथा अदालतों की स्थापना की। इसके अतिरिक्त उन्होंने शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार किया तथा डाक एवं तार व्यवस्था की स्थापना की। इन परिवर्तनों ने उत्तराखंड में आधुनिक प्रशासनिक व्यवस्था की नींव रखी।
वन कानून एवं औपनिवेशिक वन नीति
ब्रिटिश शासन काल में उत्तराखंड में कठोर वन कानून लागू किए गए। सन 1878 के भारतीय वन अधिनियम के अंतर्गत वनों को सरकारी संपत्ति घोषित कर दिया गया तथा स्थानीय जनता के वन उपयोग के अधिकारों पर प्रतिबंध लगा दिया गया। इस कानून के कारण जनता को लकड़ी, घास एवं अन्य वन उत्पादों के लिए सरकारी अनुमति लेनी पड़ती थी। इन कठोर कानूनों के विरुद्ध जनता ने अनेक आंदोलन किए जिनमें चिपको आंदोलन सर्वाधिक प्रसिद्ध हुआ। वन कानूनों ने उत्तराखंड की जनता के जीवन पर गहरा प्रभाव डाला तथा उनके विरोध की भावना को जन्म दिया।
कुली बेगार प्रथा
ब्रिटिश शासन काल में उत्तराखंड में कुली बेगार प्रथा प्रचलित थी। इस प्रथा के अंतर्गत स्थानीय जनता को बिना पारिश्रमिक के ब्रिटिश अधिकारियों एवं सैनिकों के सामान ढोने के लिए बाध्य किया जाता था। इस प्रथा से जनता को अत्यधिक कष्ट उठाना पड़ता था तथा उनके खेत एवं व्यवसाय उजाड़ हो जाते थे। कुली बेगार प्रथा उत्तराखंड के इतिहास का एक कलंक मानी जाती है जिसने जनता के जीवन को अत्यंत कठिन बना दिया। इस प्रथा के विरुद्ध जनता ने अनेक आंदोलन किए तथा अंततः सन 1921 में यह प्रथा समाप्त कर दी गई।
कुली बेगार विरोध आंदोलन
कुली बेगार प्रथा के विरुद्ध उत्तराखंड में व्यापक आंदोलन हुआ। सन 1921 में बद्रीनाथ एवं केदारनाथ क्षेत्रों में जनता ने संगठित होकर इस प्रथा का विरोध किया। इस आंदोलन का नेतृत्व स्थानीय नेताओं एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं ने किया तथा इसमें बड़ी संख्या में जनता शामिल हुई। आंदोलन के परिणामस्वरूप ब्रिटिश सरकार को कुली बेगार प्रथा समाप्त करने के लिए विवश होना पड़ा। यह आंदोलन उत्तराखंड के इतिहास में सामाजिक न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम सिद्ध हुआ तथा इसने आगे के आंदोलनों के लिए प्रेरणा का काम किया।
टिहरी रियासत का इतिहास
सन 1849 में टिहरी रियासत की स्थापना हुई जब अंग्रेजों ने पश्चिमी गढ़वाल को सुदर्शन शाह को सौंप दिया। टिहरी रियासत ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन एक स्वायत्त रियासत थी जिसका अपना प्रशासन एवं सेना थी। रियासत के शासकों ने क्षेत्र में शिक्षा, स्वास्थ्य एवं सड़कों के विकास पर ध्यान दिया। टिहरी रियासत ने सन 1949 तक अपना अस्तित्व बनाए रखा तथा भारत की स्वतंत्रता के बाद यह भारतीय संघ में शामिल हो गई। टिहरी रियासत का इतिहास उत्तराखंड के आधुनिक इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय है।
आधुनिक उत्तराखंड के सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तन
आधुनिक काल में उत्तराखंड में अनेक सामाजिक एवं राजनीतिक परिवर्तन हुए। ब्रिटिश शासन काल में शिक्षा के प्रसार से जागरूकता बढ़ी तथा सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध आंदोलन प्रारंभ हुए। सन 1920 के दशक में असहयोग आंदोलन में उत्तराखंड की जनता ने बढ़-चढ़कर भाग लिया। स्वतंत्रता संग्राम में उत्तराखंड के अनेक सेनानियों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सन 1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद उत्तराखंड भारतीय संघ का अभिन्न अंग बन गया। सन 2000 में उत्तराखंड को अलग राज्य का दर्जा मिला जिससे क्षेत्र के विकास का नया युग प्रारंभ हुआ।
| महत्वपूर्ण तथ्य / विषय | विवरण |
|---|---|
| सुगौली संधि | सन 1815 में गोरखों की पराजय एवं ब्रिटिश शासन का प्रारंभ |
| कुमाऊँ कमिश्नरी | सन 1816 में गठन, मुख्यालय अल्मोड़ा |
| वन अधिनियम | सन 1878 के भारतीय वन अधिनियम के अंतर्गत कठोर नियम |
| कुली बेगार प्रथा | सन 1921 में आंदोलन के बाद समाप्त |
| टिहरी रियासत | सन 1849 में स्थापना, सन 1949 में भारत में विलय |
| चिपको आंदोलन | वन कानूनों के विरुद्ध प्रसिद्ध पर्यावरण आंदोलन |
| अलग राज्य | सन 2000 में उत्तराखंड राज्य का गठन |