उत्तराखंड का लोक संगीत एवं नृत्य: गढ़वाली, कुमाऊँनी संगीत, जागर परंपरा, लोक वाद्य एवं प्रमुख लोक कलाकार

⌄
-- Questions Uttarakhand GK

उत्तराखंड का लोक संगीत एवं नृत्य: गढ़वाली, कुमाऊँनी संगीत, जागर परंपरा, लोक वाद्य एवं प्रमुख लोक कलाकार - ऑनलाइन प्रैक्टिस क्विज़

उत्तराखंड के समृद्ध लोक संगीत, पारंपरिक लोक नृत्यों जैसे छोलिया, पांडव, झोड़ा, प्रमुख लोक वाद्य यंत्रों और प्रसिद्ध लोक कलाकारों पर आधारित संपूर्ण परीक्षोपयोगी अध्ययन सामग्री।

प्रश्न 1 / --
00:00
2%
प्रश्न 1

लोडिंग...

💡 व्याख्या

उत्तराखंड का पारंपरिक लोक संगीत एवं नृत्य: सांस्कृतिक स्वरूप

देवभूमि उत्तराखंड की पावन धरा अपनी अलौकिक प्राकृतिक छटा के साथ-साथ अत्यंत समृद्ध और जीवंत लोक संगीत तथा नृत्य परंपरा के लिए संपूर्ण विश्व में विख्यात है। हिमालय की ऊंची चोटियों, गहरी घाटियों, कलकल बहती नदियों और शांत बुग्यालों के मध्य विकसित हुआ यह लोक संगीत पर्वतीय जीवन के उल्लास, विरह, प्रकृति प्रेम और गहन ईश्वरीय आस्था का सजीव दर्पण है। राज्य के दोनों प्रमुख मंडलों गढ़वाल और कुमाऊँ में लोक संगीत और नृत्यों की अपनी अनूठी शैलियां, सुर और ताल हैं, जो सदियों से मौखिक परंपरा के रूप में निरंतर पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रवाहमान रहे हैं। राज्य स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं जैसे उत्तराखंड लोक सेवा आयोग और उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग में लोक संस्कृति, पारंपरिक वाद्य यंत्रों, लोक गीतों और सांस्कृतिक विभूतियों से संबंधित प्रश्न निरंतर पूछे जाते हैं।

उत्तराखंड की प्रमुख लोक गीत शैलियां एवं जागर परंपरा

राज्य के लोक गीतों को ऋतुगीत, संस्कार गीत, प्रणय गीत, गाथा गीत और धार्मिक भजनों में वर्गीकृत किया जाता है। चैती, बसंती, खुदेड़, झोड़ा, चांचरी, बाजूबंद और न्यौली यहां के प्रमुख पारंपरिक लोक गीत हैं। खुदेड़ गीतों में नवविवाहिता का मायके की याद में छलकता मार्मिक विरह भाव होता है, जबकि बाजूबंद जंगलों और बांज के वनों में गाए जाने वाले पारंपरिक संवाद प्रधान प्रणय गीत हैं। उत्तराखंड की लोक संस्कृति का सर्वाधिक गूढ़ और आध्यात्मिक अंग यहां की 'जागर परंपरा' है। जागर का शाब्दिक अर्थ देवताओं को जगाना होता है। इसमें मुख्य गायक जिसे जगरिया कहा जाता है, डौंर-थाली अथवा हुड़के की थाप पर स्थानीय देवी-देवताओं जैसे गोलू देवता, गंगनाथ, भोलू, नरसिंह, नागराजा और पांडवों की पौराणिक गाथाओं का सस्वर गायन करता है, जिससे संबंधित देवता पश्वा या डंगरिया के शरीर में अवतरित होकर जनसमस्याओं का समाधान करते हैं।

प्रमुख पारंपरिक लोक नृत्य: छोलिया, पांडव और झोड़ा

उत्तराखंड के लोक नृत्यों में शौर्य और उल्लास का अद्भुत सामंजस्य देखने को मिलता है। कुमाऊँ का 'छोलिया नृत्य' एक प्राचीन युद्ध नृत्य है, जो खस और राजपूत योद्धाओं की परंपरा से जुड़ा है। इसमें नर्तक पारंपरिक सफेद चोला, पगड़ी, तलवार और ढाल लेकर ढोल-दमाऊँ और तुरही की रणभेरी जैसी धुन पर हैरतअंगेज करतब दिखाते हैं। गढ़वाल अंचल में महाभारत की गाथाओं पर आधारित 'पांडव नृत्य' शीतकाल में फसलों की कटाई के पश्चात पूरी निष्ठा से किया जाता है। इसके अतिरिक्त कुमाऊँ के बसंत और कौथिकों में सामूहिक गोल घेरा बनाकर गाया और नाचा जाने वाला 'झोड़ा नृत्य' तथा गढ़वाल का 'चौंफला एवं थड्या नृत्य' लोक रंजन के प्रमुख साधन हैं। टिहरी क्षेत्र का प्रसिद्ध 'लांगवीर नृत्य' पुरुषों द्वारा सीधे खड़े बांस के खंभे के शीर्ष पर पेट के बल संतुलन बनाकर किया जाने वाला अद्वितीय करतब नृत्य है।

पारंपरिक लोक वाद्य यंत्र एवं लोक संगीत के पुरोधा

उत्तराखंड के लोक वाद्यों को चर्म वाद्य, सुषिर वाद्य, घन वाद्य और तंत वाद्य में बांटा गया है। राज्य का आधिकारिक वाद्य यंत्र 'ढोल' माना जाता है, जिसे दमाऊँ के साथ तालबद्ध रूप से बजाया जाता है। औजी समुदाय ढोल सागर के प्राचीन तालों के पारंगत ज्ञाता होते हैं। डमरूनुमा 'हुड़का' कुमाऊँनी जागरों और गीतों की रीढ़ है, जबकि तांबे या पीतल से बना घुमावदार 'रणसिंघा' मांगलिक अवसरों और रणक्षेत्र में बजाया जाता है। अन्य प्रमुख वाद्यों में मशकबीन, मोछंग, डौंर और थाली सम्मिलित हैं। आधुनिक काल में इस समृद्ध परंपरा को वैश्विक मंच पर स्थापित करने में पद्मश्री प्रीतम भरतवाण, लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी, स्वर्गीय गोपाल बाबू गोस्वामी, हीरा सिंह राणा, चंद्र सिंह राही और बसंती बिष्ट जैसी महान विभूतियों का योगदान अतुलनीय रहा है।

परीक्षोपयोगी महत्वपूर्ण तथ्य: लोक संगीत, नृत्य एवं वाद्य यंत्र

  • राज्य वाद्य यंत्र: वर्ष 2015 में ढोल को आधिकारिक रूप से उत्तराखंड का राज्य वाद्य यंत्र घोषित किया गया था।
  • ढोल सागर के ज्ञाता: ढोल वादन के गूढ़ शास्त्रीय ज्ञान और तालों के संकलन को 'ढोल सागर' कहा जाता है।
  • जागर सम्राट: प्रसिद्ध लोकगायक प्रीतम भरतवाण को जागर गायन में अद्वितीय योगदान हेतु पद्मश्री सम्मान से नवाजा गया है।
  • पहली महिला जागर गायिका: बसंती बिष्ट उत्तराखंड की सुप्रसिद्ध पहली महिला जागर गायिका हैं, जिन्हें भारत सरकार द्वारा पद्मश्री प्रदान किया गया है।
  • गढ़वाल के कबीर / लोकगायक: नरेंद्र सिंह नेगी को गढ़वाल लोक संगीत का सबसे सशक्त हस्ताक्षर और लोक चेतना का प्रतिनिधि गायक माना जाता है।
  • छोलिया नृत्य का मूल: पिथौरागढ़ और चंपावत में विवाह के अवसर पर बारात की अगुवाई में किया जाने वाला पारंपरिक तलवार नृत्य।

उत्तराखंड के प्रमुख लोक नृत्य एवं उनकी विशेषताएं

लोक नृत्य का नामसंबंधित क्षेत्र / मंडलमुख्य विशेषता एवं गायन प्रसंग
छोलिया नृत्यकुमाऊँ (पिथौरागढ़, चंपावत)तलवार और ढाल के साथ युद्ध कौशल प्रदर्शित करने वाला पौराणिक वीर नृत्य।
पांडव नृत्यगढ़वाल (चमोली, रुद्रप्रयाग, पौड़ी)महाभारत कालीन पांडवों के जीवन प्रसंगों पर आधारित आध्यात्मिक अनुष्ठानिक नृत्य।
झोड़ा एवं चांचरीकुमाऊँ (बागेश्वर, अल्मोड़ा)स्त्री-पुरुषों द्वारा गोल घेरा बनाकर गाए जाने वाले सामूहिक ऋतु एवं प्रेम नृत्य।
लांगवीर नृत्यगढ़वाल (टिहरी गढ़वाल)ऊंचे सीधे बांस के खंभे के शीर्ष पर संतुलन बनाकर किया जाने वाला कठिन कलाबाजी नृत्य।
थड्या एवं चौंफलागढ़वाल मंडलवसंत पंचमी पर आंगन में सामूहिक रूप से बिना किसी वाद्य यंत्र के किया जाने वाला नृत्य।
रणभूत नृत्यगढ़वाल अंचलयुद्ध में वीरगति प्राप्त वीरों की आत्मा की शांति हेतु किया जाने वाला पारंपरिक नृत्य।