उत्तराखंड की राजव्यवस्था एवं प्रशासन: राज्य गठन, राज्यपाल, मुख्यमंत्री, विधानसभा और जिला प्रशासन
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उत्तराखंड राज्य के गठन का इतिहास, संवैधानिक संस्थाएं, राज्यपाल, मुख्यमंत्री, मंत्रिपरिषद, विधानसभा की संरचना, प्रशासनिक मंडल और जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली पर आधारित संपूर्ण परीक्षोपयोगी अध्ययन सामग्री।
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💡 व्याख्या
उत्तराखंड राज्य का गठन एवं संवैधानिक विकास
देवभूमि उत्तराखंड का भारतीय संघ के सत्तावीसवें राज्य के रूप में गठन नौ नवंबर सन दो हजार को हुआ था। उत्तर प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम सन दो हजार के अंतर्गत हिमालयी पर्वतीय जनपदों को मिलाकर इस नए राज्य की स्थापना की गई थी, जिसका मूल उद्देश्य लंबे संघर्ष के बाद पर्वतीय अंचल की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान, क्षेत्रीय आकांक्षाओं और विकास को गति देना था। उत्तराखंड की राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था भारतीय संविधान के संघीय ढांचे के अनुरूप संचालित होती है, जिसमें राज्य की विधायिका एकसदनिया है। उत्तराखंड लोक सेवा आयोग और उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग की विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में राज्य के गठन की तिथियों, प्रथम राज्यपाल, प्रथम मुख्यमंत्री, विधानसभा सीटों के परिसीमन, प्रशासनिक मंडलों और जिला प्रशासन की संरचना से संबंधित प्रश्न अनिवार्य रूप से पूछे जाते हैं।
राज्य की विधायिका: उत्तराखंड विधानसभा एवं निर्वाचन क्षेत्र
उत्तराखंड की विधि निर्माण संस्था विधानसभा देहरादून में स्थित है। राज्य में विधानसभा की कुल सत्तर निर्वाचित सीटें हैं, जिनमें से तेरह सीटें अनुसूचित जातियों के लिए तथा दो सीटें अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित हैं। अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित इन दो सीटों में देहरादून जनपद की चकराता विधानसभा सीट और ऊधमसिंह नगर जनपद की नानकमत्ता विधानसभा सीट सम्मिलित हैं। परिसीमन के पश्चात वर्तमान में हरिद्वार जनपद में सबसे अधिक ग्यारह विधानसभा सीटें हैं, जबकि बागेश्वर, चंपावत और रुद्रप्रयाग जनपदों में सबसे कम दो-दो विधानसभा सीटें हैं। इसके अतिरिक्त राज्यपाल द्वारा आंग्ल-भारतीय समुदाय के प्रतिनिधित्व हेतु एक सदस्य मनोनीत किए जाने का प्रावधान था, जिसे संविधान संशोधन के तहत समाप्त किया गया है। राज्य से लोकसभा के पांच तथा राज्यसभा के तीन सदस्य निर्वाचित होते हैं।
कार्यपालिका एवं प्रशासनिक संरचना: राज्यपाल, मुख्यमंत्री और जिला प्रशासन
राज्य की कार्यपालिका का औपचारिक प्रमुख राज्यपाल होता है, जिसकी नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। राज्य के शासन संचालन की वास्तविक शक्ति मुख्यमंत्री और उसकी मंत्रिपरिषद में निहित होती है। प्रशासनिक दृष्टि से उत्तराखंड को दो मंडलों—गढ़वाल मंडल और कुमाऊँ मंडल में विभाजित किया गया है, जिनके मुख्यालय क्रमशः पौड़ी और नैनीताल में स्थित हैं। इन मंडलों के प्रशासनिक नियंत्रण हेतु मंडलायुक्त नियुक्त होते हैं। वर्तमान में राज्य में कुल तेरह जिले हैं, जिनका जिला प्रशासन जिलाधिकारी के नेतृत्व में कानून-व्यवस्था, भू-राजस्व और विकास योजनाओं के क्रियान्वयन के माध्यम से संचालित होता है। राज्य सचिवालय देहरादून में स्थित है, जिसका प्रशासनिक प्रमुख मुख्य सचिव होता है।
परीक्षोपयोगी महत्वपूर्ण तथ्य: राजव्यवस्था एवं प्रशासन
- राज्य गठन की तिथि: नौ नवंबर सन दो हजार को भारत गणराज्य के सत्तावीसवें राज्य के रूप में स्थापित हुआ।
- प्रथम राज्यपाल: सुरजीत सिंह बरनाला उत्तराखंड के पहले राज्यपाल थे।
- प्रथम मुख्यमंत्री: नित्यानंद स्वामी उत्तराखंड के पहले निर्वाचित एवं अंतरिम मुख्यमंत्री रहे।
- विधानसभा की कुल सीटें: राज्य में सत्तर निर्वाचित विधानसभा सीटें हैं।
- प्रशासनिक मंडल: राज्य में कुल दो मंडल तथा तेरह जिले हैं।
- लोकसभा एवं राज्यसभा सीटें: लोकसभा की पांच तथा राज्यसभा की तीन सीटें हैं।
उत्तराखंड की प्रशासनिक एवं राजनीतिक संरचना का परीक्षोपयोगी विवरण
| प्रशासनिक एवं राजनीतिक इकाई | मुख्यालय एवं विवरण | महत्वपूर्ण आंकड़े |
|---|---|---|
| राजधानी नगर | देहरादून विधायी एवं प्रशासनिक केंद्र तथा भराड़ीसैंण गैरसैण ग्रीष्मकालीन राजधानी | दो राजधानी स्थल |
| प्रशासनिक मंडल | गढ़वाल मंडल मुख्यालय पौड़ी एवं कुमाऊँ मंडल मुख्यालय नैनीताल | कुल दो मंडल |
| प्रशासनिक जिले | उत्तराखंड के सभी पर्वतीय एवं मैदानी तेरह जनपद | कुल तेरह जिले |
| विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र | सत्तर निर्वाचित सीटें जिनमें तेरह अनुसूचित जाति तथा दो अनुसूचित जनजाति आरक्षित | कुल सत्तर सीटें |
| संसदीय प्रतिनिधित्व | लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र पांच सीटें एवं राज्यसभा तीन सीटें | कुल आठ सांसद |
| उच्च न्यायालय | नैनीताल जनपद में अवस्थित उत्तराखंड उच्च न्यायालय | राज्य का मुख्य न्यायालय |