उत्तराखंड की मृदा और प्रकार
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उत्तराखंड की मृदा, भाबर की मृदा, तराई की मृदा, पर्वतीय मृदा, वन मृदा, जलोढ़ मृदा, मृदा अपरदन, संरक्षण, ढाल और मृदा संबंध, कृषि योग्य मृदा क्षेत्र की जानकारी।
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💡 व्याख्या
उत्तराखंड की मृदा का परिचय
उत्तराखंड में मृदा ऊंचाई और ढाल के अनुसार बदलती है। तराई में जलोढ़ मृदा सबसे उपजाऊ है और धान गेहूं गन्ना की खेती होती है। भाबर में कंकरीली पथरीली मृदा है और पानी नीचे चला जाता है इसलिए कृषि कम होती है। पर्वतीय क्षेत्र में पथरीली और वन मृदा मिलती है जहां सीढ़ीदार खेती होती है। मध्य हिमालय में भूरी वन मृदा मिलती है जहां बांज और चीड़ के वन हैं। महान हिमालय में पथरीली और हिमनद मृदा है जहां खेती नहीं होती। मृदा अपरदन पहाड़ों में गंभीर समस्या है।
भाबर और तराई की मृदा
भाबर की मृदा शिवालिक के नीचे 10 से 15 किलोमीटर चौड़ी पट्टी में कंकरीली पथरीली और रेतीली है। भाबर में नदियां लुप्त हो जाती हैं और पानी जमीन के नीचे चला जाता है इसलिए कुएं गहरे खोदने पड़ते हैं। भाबर में साल के वन मिलते हैं और कृषि कम होती है। तराई की मृदा भाबर के दक्षिण में 20 से 30 किलोमीटर चौड़ी पट्टी में जलोढ़ और चिकनी दोमट है और सबसे उपजाऊ है। तराई में धान गेहूं गन्ना की अधिक पैदावार होती है। तराई में ऊधमसिंह नगर और हरिद्वार जिले आते हैं।
पर्वतीय और वन मृदा
पर्वतीय मृदा मध्य और महान हिमालय में पथरीली, कम गहरी और कम उपजाऊ है। पर्वतीय मृदा में जैविक पदार्थ कम होता है और ढाल अधिक होने से अपरदन होता है। पर्वतीय मृदा में सीढ़ीदार खेत बनाकर मंडुवा, झंगोरा, चौलाई की खेती होती है। वन मृदा मध्य हिमालय में 1000 से 2500 मीटर ऊंचाई पर भूरी और काली होती है और जैविक पदार्थ अधिक होता है। वन मृदा में बांज, बुरांश, चीड़ के वन हैं। वन मृदा में चाय की खेती भी होती है। जलोढ़ मृदा दून घाटी में नदियों द्वारा लाई गई है और उपजाऊ है।
मृदा अपरदन संरक्षण और कृषि क्षेत्र
मृदा अपरदन उत्तराखंड में गंभीर समस्या है क्योंकि ढाल अधिक है और वर्षा तेज होती है। जल अपरदन से वर्षा में मिट्टी बह जाती है और हवा अपरदन से सूखी मिट्टी उड़ जाती है। अधिक ढाल में अधिक अपरदन होता है। सीढ़ीदार खेती, वृक्षारोपण, घास लगाना और बांध बनाना संरक्षण के उपाय हैं। कृषि के लिए तराई और दून सबसे अच्छे हैं जहां जलोढ़ मृदा है और सिंचाई सुविधा है। मध्य हिमालय में सीढ़ीदार खेतों में कम उपजाऊ मृदा में मोटे अनाज होते हैं। महान हिमालय में मृदा नहीं है और खेती नहीं होती।
ढाल और मृदा संबंध
ढाल और मृदा में गहरा संबंध है। कम ढाल में गहरी और उपजाऊ मृदा मिलती है जैसे तराई और दून में। अधिक ढाल में पतली और पथरीली मृदा मिलती है जैसे मध्य और महान हिमालय में। अधिक ढाल में वर्षा से मिट्टी तेजी से बहती है इसलिए सीढ़ीदार खेत बनाए जाते हैं। उत्तराखंड में 70 प्रतिशत क्षेत्र पहाड़ी है इसलिए मृदा पतली है। ढाल के अनुसार मृदा की गहराई और उपजाऊपन बदलता है। तराई में 0 से 5 डिग्री ढाल और मध्य हिमालय में 30 से 60 डिग्री ढाल है।
| मृदा प्रकार | विवरण |
|---|---|
| भाबर मृदा | शिवालिक नीचे 10 से 15 किमी चौड़ी कंकरीली पथरीली रेतीली पानी लुप्त साल वन कृषि कम |
| तराई मृदा | भाबर दक्षिण 20 से 30 किमी जलोढ़ चिकनी दोमट सबसे उपजाऊ धान गेहूं गन्ना ऊधमसिंह नगर हरिद्वार |
| पर्वतीय मृदा | मध्य महान हिमालय पथरीली कम गहरी कम उपजाऊ जैविक कम सीढ़ीदार खेती मंडुवा झंगोरा चौलाई |
| वन मृदा | 1000 से 2500 मी भूरी काली जैविक अधिक बांज बुरांश चीड़ वन चाय खेती अल्मोड़ा नैनीताल |
| जलोढ़ मृदा | दून घाटी नदियों द्वारा लाई गई उपजाऊ देहरादून कोटद्वार कोटदून पाटलीदून गेहूं धान |
| मृदा अपरदन | जल और हवा से अधिक ढाल में अधिक वर्षा तेज से मिट्टी बहना पहाड़ों में गंभीर समस्या |
| मृदा संरक्षण | सीढ़ीदार खेत वृक्षारोपण घास लगाना बांध बनाना समोच्च खेती ढाल कम करना |
| ढाल संबंध | कम ढाल गहरी उपजाऊ तराई दून 0 से 5 डिग्री अधिक ढाल पतली पथरीली मध्य हिमालय 30 से 60 डिग्री |
| कृषि योग्य क्षेत्र | तराई दून सबसे अधिक उपजाऊ जलोढ़ मध्य हिमालय कम उपजाऊ सीढ़ीदार महान हिमालय में खेती नहीं |