उत्तराखंड की अनुसूचित जनजातियाँ: थारू, जौनसारी, भोटिया, बुक्सा एवं राजी जनजाति का संपूर्ण विवरण
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उत्तराखंड की पाँच प्रमुख अनुसूचित जनजातियों के इतिहास, भौगोलिक वितरण, सामाजिक-धार्मिक मान्यताओं, अर्थव्यवस्था, पारंपरिक वेशभूषा और सांस्कृतिक उत्सवों पर आधारित प्रामाणिक अध्ययन सामग्री।
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💡 व्याख्या
उत्तराखंड की जनजातीय विरासत: ऐतिहासिक पृष्ठभूमि एवं संवैधानिक स्थिति
देवभूमि उत्तराखंड की सामाजिक और सांस्कृतिक संरचना में यहाँ की मूल जनजातियों का अद्वितीय योगदान है। राज्य की समृद्ध सांस्कृतिक विविधता में प्राचीन कोल-किरात, खस और तिब्बती-बर्मी तत्वों का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद तीन सौ बयालीस के अंतर्गत केंद्र सरकार द्वारा वर्ष उन्नीस सौ सड़सठ में उत्तराखंड की पाँच प्रमुख जातियों को आधिकारिक रूप से अनुसूचित जनजाति का दर्जा प्रदान किया गया था। इनमें थारू, जौनसारी, भोटिया, बुक्सा और राजी सम्मिलित हैं। वर्ष दो हजार ग्यारह की जनगणना के अनुसार राज्य की कुल जनसंख्या का लगभग दो दशमलव नौ प्रतिशत भाग अनुसूचित जनजातियों का है। ऊधमसिंह नगर जनपद सर्वाधिक जनजातीय आबादी वाला क्षेत्र है, जबकि रुद्रप्रयाग जनपद में सबसे कम जनजातीय जनसंख्या निवास करती है। उत्तराखंड लोक सेवा आयोग और उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग की परीक्षाओं में जनजातीय समाज की परंपराओं, त्योहारों, विवाह प्रथाओं और अर्थव्यवस्था से संबंधित प्रश्न अनिवार्य रूप से पूछे जाते हैं।
थारू एवं जौनसारी: संख्याबल एवं सामाजिक संगठन
जनसंख्या की दृष्टि से थारू उत्तराखंड का सबसे बड़ा जनजातीय समुदाय है, जिसका मुख्य जमावड़ा ऊधमसिंह नगर जनपद के खटीमा, सितारगंज और किच्छा क्षेत्रों में है। थारू स्वयं को राजस्थान के थार मरुस्थल से संबंधित और महाराणा प्रताप के वंशज किरात वंशीय मानते हैं। इनके समाज में मातृसत्तात्मक व्यवस्था के गहरे लक्षण मिलते हैं जहाँ महिलाओं को परिवार और संपत्ति में सर्वाधिकार प्राप्त होता है। थारू समाज दीपावली को शोक पर्व के रूप में मनाता है तथा इस दिन अपने पूर्वजों की स्मृति में पुतला दहन और भेंट अर्पित करता है। दूसरी ओर, गढ़वाल मंडल का सबसे बड़ा जनजातीय समूह जौनसारी है, जो देहरादून के चकराता, कालसी और त्यूणी विकासखंडों में केंद्रित है। जौनसारी स्वयं को पांडवों का वंशज मानते हैं। इनमें ऐतिहासिक रूप से बहुपति विवाह प्रथा का प्रचलन रहा है, यद्यपि आधुनिक शिक्षा के प्रसार से यह प्रथा अब समाप्त हो चुकी है। इनके प्रमुख आराध्य महासू देवता हैं, जिनका मुख्य तीर्थ हनोल में टोंस नदी के पावन तट पर स्थित है।
भोटिया, बुक्सा एवं राजी जनजाति की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान
उच्च हिमालयी घाटियों में निवास करने वाले भोटिया जनजाति के लोग अर्ध-घुमंतू और ऋतु-प्रवासी जीवनशैली के लिए जाने जाते हैं। ग्रीष्म ऋतु में ये उच्च बुग्यालों में स्थित ग्रीष्मकालीन आवास मैत में रहते हैं तथा शीतकाल में घाटियों में स्थित शीतकालीन आवास गुंडा या मुंसा में उतर आते हैं। वर्ष उन्नीस सौ बासठ के भारत-चीन युद्ध से पूर्व भोटिया व्यापारी तिब्बत के साथ वस्तु-विनिमय आधारित ऐतिहासिक व्यापार करते थे। ऊनी वस्त्र उद्योग, दन, थुलमा और चुटका निर्माण इनकी अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार है। बुक्सा जनजाति मुख्यतः तराई-भाबर क्षेत्र (ऊधमसिंह नगर के बाजपुर, काशीपुर तथा नैनीताल के रामनगर) में निवास करती है। इन्हें चंद राजाओं द्वारा बसाया गया माना जाता है और इनकी ग्राम पंचायत का मुखिया तखत कहलाता है। राजी जनजाति राज्य की सबसे कम आबादी वाली और एकमात्र आदिम जनजाति है, जो पिथौरागढ़ जनपद के कनालीछीना और धारचूला के सघन वनों में रहती है। इन्हें वनरावत या जंगल का राजा भी कहा जाता है। ये प्राचीन काल में मूक विनिमय व्यापार करते थे और काष्ठ कला में अत्यंत निपुण माने जाते हैं।
परीक्षोपयोगी महत्वपूर्ण तथ्य: उत्तराखंड की जनजातियाँ
- संवैधानिक मान्यता: वर्ष उन्नीस सौ सड़सठ में उत्तर प्रदेश शासन के समय पाँचों जातियों को अनुसूचित जनजाति घोषित किया गया।
- सर्वाधिक जनसंख्या: राज्य में सर्वाधिक आबादी वाली जनजाति थारू है, जिसके पश्चात जौनसारी समुदाय आता है।
- एकमात्र आदिम जनजाति: राजी (वनरावत) जनजाति को केंद्र सरकार द्वारा आदिम जनजाति समूह के रूप में मान्यता प्राप्त है।
- दीपावली को शोक पर्व: थारू जनजाति द्वारा दीपावली को पारंपरिक रूप से पूर्वजों के शोक पर्व के रूप में मनाया जाता है।
- ऋतु प्रवास की परंपरा: सीमांत भोटिया जनजाति शीतकाल और ग्रीष्मकाल के अनुसार आवास परिवर्तन करती है।
- महासू देवता का हनोल मंदिर: जौनसार-बावर के आराध्य देव महासू का प्रधान मंदिर देहरादून के हनोल में स्थित है।
- ग्राम पंचायत का तखत पद: बुक्सा जनजाति की पारंपरिक न्याय व्यवस्था में पंचायत के सर्वोच्च मुखिया को तखत कहा जाता है।
उत्तराखंड की पाँचों प्रमुख जनजातियों का तुलनात्मक विवरण
| जनजाति का नाम | मुख्य निवास क्षेत्र / जनपद | सामाजिक विशेषता, आराध्य देव एवं आर्थिकी |
|---|---|---|
| थारू जनजाति | ऊधमसिंह नगर (खटीमा, सितारगंज) | मातृसत्तात्मक समाज के लक्षण, किरात वंशीय, मदिरा को जाड़ कहना, कृषि प्रधान आर्थिकी। |
| जौनसारी जनजाति | देहरादून (चकराता), उत्तरकाशी, टिहरी | पांडवों के वंशज, महासू देवता आराध्य, बिस्सू व जागड़ा मेला, पारंपरिक ठोठा व हारुल नृत्य। |
| भोटिया जनजाति | पिथौरागढ़, चमोली, उत्तरकाशी | ऋतु प्रवासी समुदाय, तिब्बती-बर्मी भाषा प्रभाव, ऊन हस्तशिल्प, दन-थुलमा निर्माण एवं पशुपालन। |
| बुक्सा जनजाति | ऊधमसिंह नगर (बाजपुर), नैनीताल, पौड़ी | पंवार राजपूत वंशज, चामुंडा देवी आराध्या, तखत पंचायत प्रणाली, कृषि एवं दस्तकारी। |
| राजी (वनरावत) | पिथौरागढ़ (धारचूला, डीडीहाट) | आदिम जनजाति, वनों में निवास, काष्ठ कला में पारंगत, प्राचीन मूक व्यापार प्रणाली। |